एक मुद्रा एक बस्तु जात, दोनहु जगत प्रसिद्ध ।
एक होत कछु सधे नहीं, दुजन होत सब सिद्ध ।१६४१।
भावार्थ : -- एक मुद्रा है एक आवश्यक वस्तु है । दोनों ही संसार भर में प्रसिद्ध हैं ॥ एक यदि पास में हो तो कुछ नहीं सधता दूसरा हो तो सब कुछ साध्य है ॥
स्पष्टीकरण १ : -- एक नगर में एक सेठ रहता था, उसके पास एक मुट्ठी कण और मन भर मुद्रा थी । पास में भूखों की एक वसति थी । कुछ समय पश्चात उस नगर में एक साधू आया । भूखे साधू के चरणों से लिपट गए । कहने लगे महाराज कुछ ऐसा कीजिए कि उस सेठ का धन सम्यक रूप से वितरित हो और हम भूखे न रहे ॥ सेठ के पास भूमि भी थी साधू ने वे मुट्ठी भर कण मांगे और सारी भूमि में बो दिए । बढ़िया उपज हुई सभी को श्रम का पुरस्कार सम्यक स्वरूप में प्राप्त हुवा और सब सुखी हो गए; मुद्रा धरी की धरी रह गई ।
स्पष्टीकरण : -- एक दूसरे नगर में दुसरा सेठ रहता था मुट्ठी भर मुद्रा और मन भर कण लिए । वहां भी लोगों की यही स्थिति थी । साधू ने वहां सेठ को प्रवचन दिया .....साधू की बातों में आकर उसने कण को तो दान कर दिया किन्तु मुद्रा को जी से लगाए रखा ।
वसति वासीयों ने कण लिए और अपनी अपनी भूमि में बो दिए, बढ़िया उपज हुई सबको श्रम का सम्यक पुरस्कार मिला और वे सुखी हो गए । मुद्रा फिर धरी की धरी रह गई ॥
तो भैया सार यह है कि मुद्रा धन नहीं है धन अर्जन का साधन है धन तो अन्न जल ही है । अब किसी देश की अर्थ व्यवस्था मुद्रा पर आधारित है तो वह छद्म व्यवस्था है ।
'अन्न की कोई योजना हो तो अन्न चाहिए मुद्रा नहीं'
सुख के साधन भूत धन, जथारथ माहि अर्थ ।
ए अर्थ सरनि अर्थान्वित, इ सोंह सकल ब्यर्थ ।१६४२।
भावार्थ : -- सुख के साधन भूत द्रव्य ही यथार्थ में अर्थ है । यह वस्तु आधारित अर्थप्रणाली ही महत्वपूर्ण है इसके सम्मुख सेष सभी व्यर्थ हैं ॥
सुख के साधन भूत धन, कहत सबहि धनवंत ।
सबते बाद संतोष है, कह गए साधौ संत ।१६४३।
भावार्थ : -- धनवानों का यह मत है कि सुख के साधन का आधार गोचर विषय है । संत विद्वान कह गए हैं, सुख का सबसे बड़ा साधन संतोष है ॥
मनि रतन में चोर लगे, सड़े कोठ मैं नाज ।
बाल मुकुन भूखन मरे, आयो कैसो राज ।१६४४।
भावार्थ : -- हीरा कोयला में चोर लगे हुवे हैं । अन्न कोष में अन्न सड़ रहा है । देश का बचपन भूखा मर रहा है, ये कैसी शासन आ गया ॥
सतत खनिज उत्खात किए धरे बिलास निवास ।
कहुँ त रातिन सूर बरे, कहुँ न दीपहु उजास ।१६४३।
भावार्थ : -- संसार में असमानता इस प्रकार व्याप्त हैं कि खनिज संसाधनों का निरंतर दोहन कर विलास भवन में संचित किया जा रहा है ।परिणामतस् कहीं तो रातें सूर्य सी प्रकाशित हैं और दीपक जितना भी प्रकाश नहीं हैं ॥
जमनाङ्गल कि चारि बरन, करे राज सब जात ।
बिषय भोग मैं चित लगे, को को कछु न आत ।१६४४।
भावार्थ : -- यवन, आंग्ल, और चार वर्ण इन सभी लोगों ने राज कर लिया । यदि बुद्धि विषयों के भोगने में लगी रहे तब चाहे कोई भी क्यों न हो उसे कुछ नहीं आएगा ॥
" प्राकृति संसाधनों का इतना सन्दोहन हुवा, समानता की व्यवस्था किसी भी शासन काल में नहीं हुई और देखो उस सुवर्ण उर्फ़ बिरहमन को..... बिषय के भोगने में विवर्ण हो गया.....बोले तो धब्बा.....और वो क्षत्रिय.....अब तक समझ नहीं आया इसका मस्तिष्क कहाँ लगा है.....और वो बाबू साहेब.....न बाबू रहा न साहेब.....बचा हुवा कौन सा ब्रम्हांड फोड़ लेगा ( गाड पार्टिकल्स का पता लगाना) ।।
गोंड़ गवाँर नृपाल महि जमन महा महिपाल ।
साम न दान न भेद कलि, केबल दंड कराल ।१६४५।
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास जी ॥ -----
सन्दर्भ : -- यह दोहा चार पांच सौ वर्ष पूर्व की शासन व्यवस्था का वर्णन कर रहा है ॥
भावार्थ : -- कलयुग में जंगली लोग एवं गँवार पृथ्वी के राजा हो गए हैं और एवं मलेच्छादि भगवान । इनके शासन में न दान है न शान्ति है न ही भेद का सही प्रयोग है ये केवल असमर्थों को कठोर दंड देते हैं ॥
पियतम पावस काल मैं, कहँ कोकिल के बैन ।
जब मुख गढ़ गढ़ बोलिहैं, चुपी रहन दौ नैन ।१६४५।
भावार्थ : -- रे प्रियतम पावस काल में कोकिल की मीठी कहाँ । जब देश में नक्कार बोलते रहे तो तूती को चुप ही रहना चाहिए ॥ दूसरे जब मुख गढ़ गढ़ बोलने लगता है तब नैनों वाली प्यारी सांकेतिक भाषा विलुप्त हो जाती है ॥
पहिले बंचक धींग मिले, हेरत देस बहार ।
अजहुँ बक ध्यानी रूप, मिले डहार डहार ।१६४६।
भावार्थ : -- पहले दुष्ट, ठग, धूर्त देश के बाहर लंका में मिलते थे वो भी ढूंढने पर । अब तो वह बक ध्यानी बने हुवे बिना ढूंढे सरलता पूर्वक मिलने लगे हैं ॥
नदिया हृदय सिंधु चहे, चहे जलावन आग ।
मीचक हृदय प्रान चहे, लम्पट कामिन लाग ।१६४७।
----- । । विदुर नीति ।। -----
भावार्थ : -- नदी का ह्रदय सिंधु को चाहता है, ईंधन का ह्रदय अग्नि को चाहता है, मीचक का ह्रदय प्राण को चाहता है लम्पट सदा कंचन कामिनी की चाह में रहते हैं ॥
रसना तब लग रस लहे जब लग घट में बाड़ ।
करन घटे लोचन घटे, सनै सनै दे छाँड़ ।१६४८ ।
भावार्थ : -- जिह्वा को तब तक स्वाद प्राप्त करना चाहिए जब तक देह बढ़ती रहे । जब यह बढ़त, घटती की और उन्मुख हो तब शनै शनै रसास्वादन का त्याग करते जाना चाहिए ॥
सागर सब जल खार है, सुरसरि पबित अधार ।
दुहु मेले घन बन बरखे, करन नेह बिस्तार ।१६४९।
भावार्थ : -- सागर का सारा जल खारा है अर्थात उसमें सौ दोष हैं, और सुरसरिता पवित्रता का आधार है । फिर भी दोनों मेल करते हुवे घन बन कर बरसते हैं इस हेतु कि संसार में प्रेम का विस्तार हो घृणा का नहीं ॥
खनिज उपाइ अनेक किए बनिज उपाइ अनेक ।
गाँउ गँवारु गार लिखे, आपनी पौ प्रबेक ।१६५० ।
भावार्थ : -- खनिज खनन के एवं बनियों की समृद्ध के तो सौ उपाय करता है । गाँव वाले बेचारे निरीह प्राणी को 'गाली व स्वयं को राष्ट्र-अवतंस समझ कर सबसे जी जी कहलवाता है ॥
एक होत कछु सधे नहीं, दुजन होत सब सिद्ध ।१६४१।
भावार्थ : -- एक मुद्रा है एक आवश्यक वस्तु है । दोनों ही संसार भर में प्रसिद्ध हैं ॥ एक यदि पास में हो तो कुछ नहीं सधता दूसरा हो तो सब कुछ साध्य है ॥
स्पष्टीकरण १ : -- एक नगर में एक सेठ रहता था, उसके पास एक मुट्ठी कण और मन भर मुद्रा थी । पास में भूखों की एक वसति थी । कुछ समय पश्चात उस नगर में एक साधू आया । भूखे साधू के चरणों से लिपट गए । कहने लगे महाराज कुछ ऐसा कीजिए कि उस सेठ का धन सम्यक रूप से वितरित हो और हम भूखे न रहे ॥ सेठ के पास भूमि भी थी साधू ने वे मुट्ठी भर कण मांगे और सारी भूमि में बो दिए । बढ़िया उपज हुई सभी को श्रम का पुरस्कार सम्यक स्वरूप में प्राप्त हुवा और सब सुखी हो गए; मुद्रा धरी की धरी रह गई ।
स्पष्टीकरण : -- एक दूसरे नगर में दुसरा सेठ रहता था मुट्ठी भर मुद्रा और मन भर कण लिए । वहां भी लोगों की यही स्थिति थी । साधू ने वहां सेठ को प्रवचन दिया .....साधू की बातों में आकर उसने कण को तो दान कर दिया किन्तु मुद्रा को जी से लगाए रखा ।
वसति वासीयों ने कण लिए और अपनी अपनी भूमि में बो दिए, बढ़िया उपज हुई सबको श्रम का सम्यक पुरस्कार मिला और वे सुखी हो गए । मुद्रा फिर धरी की धरी रह गई ॥
तो भैया सार यह है कि मुद्रा धन नहीं है धन अर्जन का साधन है धन तो अन्न जल ही है । अब किसी देश की अर्थ व्यवस्था मुद्रा पर आधारित है तो वह छद्म व्यवस्था है ।
'अन्न की कोई योजना हो तो अन्न चाहिए मुद्रा नहीं'
सुख के साधन भूत धन, जथारथ माहि अर्थ ।
ए अर्थ सरनि अर्थान्वित, इ सोंह सकल ब्यर्थ ।१६४२।
भावार्थ : -- सुख के साधन भूत द्रव्य ही यथार्थ में अर्थ है । यह वस्तु आधारित अर्थप्रणाली ही महत्वपूर्ण है इसके सम्मुख सेष सभी व्यर्थ हैं ॥
सुख के साधन भूत धन, कहत सबहि धनवंत ।
सबते बाद संतोष है, कह गए साधौ संत ।१६४३।
भावार्थ : -- धनवानों का यह मत है कि सुख के साधन का आधार गोचर विषय है । संत विद्वान कह गए हैं, सुख का सबसे बड़ा साधन संतोष है ॥
मनि रतन में चोर लगे, सड़े कोठ मैं नाज ।
बाल मुकुन भूखन मरे, आयो कैसो राज ।१६४४।
भावार्थ : -- हीरा कोयला में चोर लगे हुवे हैं । अन्न कोष में अन्न सड़ रहा है । देश का बचपन भूखा मर रहा है, ये कैसी शासन आ गया ॥
सतत खनिज उत्खात किए धरे बिलास निवास ।
कहुँ त रातिन सूर बरे, कहुँ न दीपहु उजास ।१६४३।
भावार्थ : -- संसार में असमानता इस प्रकार व्याप्त हैं कि खनिज संसाधनों का निरंतर दोहन कर विलास भवन में संचित किया जा रहा है ।परिणामतस् कहीं तो रातें सूर्य सी प्रकाशित हैं और दीपक जितना भी प्रकाश नहीं हैं ॥
जमनाङ्गल कि चारि बरन, करे राज सब जात ।
बिषय भोग मैं चित लगे, को को कछु न आत ।१६४४।
भावार्थ : -- यवन, आंग्ल, और चार वर्ण इन सभी लोगों ने राज कर लिया । यदि बुद्धि विषयों के भोगने में लगी रहे तब चाहे कोई भी क्यों न हो उसे कुछ नहीं आएगा ॥
" प्राकृति संसाधनों का इतना सन्दोहन हुवा, समानता की व्यवस्था किसी भी शासन काल में नहीं हुई और देखो उस सुवर्ण उर्फ़ बिरहमन को..... बिषय के भोगने में विवर्ण हो गया.....बोले तो धब्बा.....और वो क्षत्रिय.....अब तक समझ नहीं आया इसका मस्तिष्क कहाँ लगा है.....और वो बाबू साहेब.....न बाबू रहा न साहेब.....बचा हुवा कौन सा ब्रम्हांड फोड़ लेगा ( गाड पार्टिकल्स का पता लगाना) ।।
गोंड़ गवाँर नृपाल महि जमन महा महिपाल ।
साम न दान न भेद कलि, केबल दंड कराल ।१६४५।
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास जी ॥ -----
सन्दर्भ : -- यह दोहा चार पांच सौ वर्ष पूर्व की शासन व्यवस्था का वर्णन कर रहा है ॥
भावार्थ : -- कलयुग में जंगली लोग एवं गँवार पृथ्वी के राजा हो गए हैं और एवं मलेच्छादि भगवान । इनके शासन में न दान है न शान्ति है न ही भेद का सही प्रयोग है ये केवल असमर्थों को कठोर दंड देते हैं ॥
पियतम पावस काल मैं, कहँ कोकिल के बैन ।
जब मुख गढ़ गढ़ बोलिहैं, चुपी रहन दौ नैन ।१६४५।
भावार्थ : -- रे प्रियतम पावस काल में कोकिल की मीठी कहाँ । जब देश में नक्कार बोलते रहे तो तूती को चुप ही रहना चाहिए ॥ दूसरे जब मुख गढ़ गढ़ बोलने लगता है तब नैनों वाली प्यारी सांकेतिक भाषा विलुप्त हो जाती है ॥
पहिले बंचक धींग मिले, हेरत देस बहार ।
अजहुँ बक ध्यानी रूप, मिले डहार डहार ।१६४६।
भावार्थ : -- पहले दुष्ट, ठग, धूर्त देश के बाहर लंका में मिलते थे वो भी ढूंढने पर । अब तो वह बक ध्यानी बने हुवे बिना ढूंढे सरलता पूर्वक मिलने लगे हैं ॥
नदिया हृदय सिंधु चहे, चहे जलावन आग ।
मीचक हृदय प्रान चहे, लम्पट कामिन लाग ।१६४७।
----- । । विदुर नीति ।। -----
भावार्थ : -- नदी का ह्रदय सिंधु को चाहता है, ईंधन का ह्रदय अग्नि को चाहता है, मीचक का ह्रदय प्राण को चाहता है लम्पट सदा कंचन कामिनी की चाह में रहते हैं ॥
रसना तब लग रस लहे जब लग घट में बाड़ ।
करन घटे लोचन घटे, सनै सनै दे छाँड़ ।१६४८ ।
भावार्थ : -- जिह्वा को तब तक स्वाद प्राप्त करना चाहिए जब तक देह बढ़ती रहे । जब यह बढ़त, घटती की और उन्मुख हो तब शनै शनै रसास्वादन का त्याग करते जाना चाहिए ॥
सागर सब जल खार है, सुरसरि पबित अधार ।
दुहु मेले घन बन बरखे, करन नेह बिस्तार ।१६४९।
भावार्थ : -- सागर का सारा जल खारा है अर्थात उसमें सौ दोष हैं, और सुरसरिता पवित्रता का आधार है । फिर भी दोनों मेल करते हुवे घन बन कर बरसते हैं इस हेतु कि संसार में प्रेम का विस्तार हो घृणा का नहीं ॥
खनिज उपाइ अनेक किए बनिज उपाइ अनेक ।
गाँउ गँवारु गार लिखे, आपनी पौ प्रबेक ।१६५० ।
भावार्थ : -- खनिज खनन के एवं बनियों की समृद्ध के तो सौ उपाय करता है । गाँव वाले बेचारे निरीह प्राणी को 'गाली व स्वयं को राष्ट्र-अवतंस समझ कर सबसे जी जी कहलवाता है ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें