शनिवार, 21 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६३॥ -----

सासन राजसि चाहता , अरु राजा का राज । 
लोक तंत्र तजित क्यूँ न , राज करे सब काज ।१६३१। 
भावार्थ : -- रे जनता.... जनार्दन.....जब तुझे राजसी शासन ही चाहिए और राजा का राज चाहिए ।  तो फिर क्यूँ न इस लोक तंत्र को छोड़ दें उसके स्थान पर राजतंत्र को सब कार्य करने दे ॥

खेतन मैं खेती भली, खेत करन मैं खेल । 
खेत होता धान भला, खेल करन मैं हेल ।१६३२। 
भावार्थ : -- खेत में खेती ही अच्छी लगती है मिल-माल नहीं ।  समतलीकरण में बालकों का खेल भला लगता है, रण नहीं ॥ खेत होता अन्न अच्छा लगता है, वीर रक्षा करते अच्छा लगता है मरता नहीं, हुंकार खेल में ही अच्छी लगती है रण में नहीं ॥

धुनी धवन बानी बरन, बासित दंतागार । 
तन बर बसनाभरन दे, बहोरि बहिर निकार ।१६३३। 
भावार्थ : -- शब्द, वाणी, वर्ण और गुंजन ये सभी दन्त गृह में निवास करते हैं । जैसे वक्ता सिंगर कर बहिर्गमन करता है, वैसे ही इन्हें भी उत्तम वस्त्राभूषण से सुसज्जित कर, फिर बाहर भेजना चाहिए ॥

प्रति दिन पहर छन प्रति पल, खड़ा सीस पर काल । 
मानस जेइ बिचार ले, परे न धरम अकाल ।१६३४। 
भावाथ : -- प्रत्येक समय मृत्यु शीश पर खडी है । मानव यदि यह विचार करे तो संसार में पुण्य का अकाल ही न हो ।।

एक बाद अरु एक बिबाद, दोनउ नाउ उपाधि । 
जब दोउ एक संजुग भए, जने दुर्बिनाय बाधि ।१६३५। 
भावार्थ : -- एक वाद दुसरा विवाद, दोनों का नाम उपद्रवी है । जब ये दोनों एक साथ होते हैं तब ये उद्दंडता एवं अशांति को जन्म देते हैं ॥

रचैता रचना आपनी , लागे  हीरा  लाल । 
औरन  मोल जानी के, आपन धरे सँभाल ।१६३६। 
भावार्थ : -- रचयिता हेतु अपनी रचना हीरे मोतियों सी लगती है । उसे औरों की रचनाओं का भी मोल जानना चाहिए, अपनी भी संभालकर रखनी चाहिए ॥

मोल जुगाया कोइरा, किए सब वाकी चाह । 
मोल मुलाया हीरका, चाहिए कोऊ नाह ।१६३७। 
भावार्थ : -- यदि कोयला मूल्य का जुगाड़ कर लेवे तो सब उसकी चाह करने लगते हैं । यदि हीरा मोल मुलाई में मिलने लग जाए वह किसी को नहीं चाहिए ॥

भावार्थ : -- कुछ लोगों को दुर्मूल्या चाहिए,  कुछ लोगों को गुणवत्ता चाहिए,  कुछ ही लोग है जिन्हें केवल आवश्यक पदार्थ चाहिए ॥

मनि मंडप सिरु छाए के, साधौ धुनी रमाए । 
ऐतक जोड़ जुगाड़ में,  केत धर्म हो जाए । १६३८। 
भावार्थ : - रत्न जड़ित मंडप में ये बाबा लोग धुनी रमा के परबचन देते हैं । ये मत करो वो मत करो । इतना जोड़ जुगाड़ में तो दस बीस गौशाला खुल जाए ॥ सच्ची बात तो कड़वी लगेगी ॥ 

भव्य आयोजनो का प्रबंध कर फिर कथा बांचना यह शास्त्रों में कहीं लिखा है ? 

 खारे जल को सोध के, भूमि भूमि बरखाए । 
नर सेवक हो सूर सम, बीअ बीअ बिकसाए ।१६३९। 
भावार्थ : -- नर सेवक को सूर्य के सदृश्य होना चाहिए जो खारे अनुपयोगी जल को शोधन कर प्रत्येक स्थान पर समान स्वरूप में वर्षा  करते हुवे प्रत्येक बीज को विकसित करता है ॥

तेरे जोग जुगावने, बरते  लोग पराए। 
तेरे दिये चुगावने, मरपर सद्गत दाए ।१६४०। 
भावार्थ : -- तेरे द्वारा संचित की गई धन-सम्पदा का उपयोग दूसरे करेंगे । तेरे दिए दाने ही मरणोपरांत तुझे सद्गति प्रदान करेंगे ॥
  






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