शाने गुमाँ कहता था, मैं हूँ रस्ते बाज़ ।
रहजन से पहले उठा, देखो किस अंदाज़।१६३१।
भावार्थ : -- एक तो उसे अपनी शान का गुमान था फिर कहता फिरता मैं तो ईमानदार हूँ, सच्चा हूँ, मेरे जैसा शैख़ दुन्या में कोई है ही नहीं । ये समझ नहीं आया वो डाकुओं से पहले क्यूँ उठ गया देखो उठा भी तो किस अंदाज से ॥
गरीबी ख़स्त हाल हुइ गरीब हाले-तंग ।
रोज़ी और रोटी से है रोज़ नई जंग । १६३२।
शाह हुवे फ़रमाँदार है रय्यत आज़ार ।
क़ौमी तिरंगे तेरा उड़ा हुवा है रंग ॥
फ़रमाँदार = सेवक
ख़याल में भी खजहजा, हुवे पहुँच से दूर ।
रोज़ा रोज़े-हश्र हुवा,खावैं क्या हज़ूर ।१६३३।
भावार्थ : --खजहजे ( फल और मेवे ) ख्यालों से भी दूर हो गए हैं | उनका जश्ने-रोज़ा हुवा हमारा क़यामते- क़याम हुई । अब किब्ला-ए-आलम बताएंगे क्या छोड़े और क्या खाएँ ।।
कहीं पे सुबहो दम हुई कहीं पे सादिक शाम हुई..,
उनका जश्ने-रोज़ा हुवा हमारा क़यामते- क़याम हुई.....
देखो हाजी मियाँ कू , हाजी कस कहलाए ।
मक्का मदिना छोड़ के सिम्त कलीसा जाए ।१६३४।
भवार्थ : -- देखो उन हाजी मियाओं को ये हाजी कैसे कहलाए। कहते हैं हम तो मक्के मदीना छोड़ के कलीसे में हज करेंगे.....॥ भैया तू यमन है कि क्या है.…. नई पहले स्पष्ट कर लें.....
रइअत तेरी परबरी हाटों हाट बिकाए ।
जोई मुश्ते- माल गहि अपने घर ले जाए ।१६३५ ।
भावार्थ : -- रे जनता जनार्दन तेरी सुरक्षा, सहायता , सेवा खुबाजारों में खुल्ले बीक रही है । जिसकी मुट्ठी में माल है वही उसे अपने घर लिए जा रहा है ॥
हुकुम रानी किए चोरी तापर सीना जोरि ।
दूजी आफत मोल लिए, कहु एक रहि का थोरि ।१६३६ ।
भावार्थ : - ये हुक्म रानी जी चोरी भी करती ही उसपर सीना जोरि भी करती है डंडे-तोप जो धरा दिए एक आफत कम थी जो दूसरी मोल ले लिए.....लो बताओ भला.....सोने के भाव में कोई अड़ंगा मोल लेता ही क्या.....
सर-जमीने-हिन्द तिरा माज़ी करे सवाल ।
ब-अदब बता तू कैसे हुई सुपेदोलाल ।१६३७ ।
ये तातारी तुपक ची वो तुरकी तख्शीर ।
ये शहानी शहकारी इमाम की ताज़ीर ॥
ये बगर वो बारगाह, बाग़ो बुरुज बलंद ।
मरमरी ये महल सरा वो शाह नजरे बंद ॥
आईना-ए- अकबरी औ तख्तों की तक़रीर ।
मुहताजों के खून से, लिखी गई ताबीर ॥
इसलिए ये सफेदो-लाल है
माज़ी = अतीत
शाह = बहादर शाह
तारें-कश के नाज़ करे रहे-सितारे साज़ ।
शाह-सवार ज़रर कहे मैं हूँ गहरे बाज़ ।१६३८।
भावार्थ : -- रहे-सितारे-तारकश ख़ुदा को खुद पर नाज़..,
शह -सवार ज़र्रा कहे मे हूँ इक्का बाज़.....
तार = किरण, रस्सी
मजलिसी कहे वाह रे, हमरे लंबरदार ।
तुहरे लंबरदार हैं रहजन के सरदार ।१६३९ ।
भावार्थ : -- सभा सदस्य गरब कर कहते हैं वाह रे ये हैं हमारे मुखिया । ये मुखिया नहीं हैं ये तो भुखिया तो डाकुओं के सरदार हैं, नाम है डाकू भूखिया सिंग ॥
परदे के इस पार कोइ पर्दे के उस पार ।
जोइ वक़ूफ़े-दीद है सोइ करे दीदार । १६४० ।
वक़ूफ़े-दीद = ज्ञान चक्षु
रहजन से पहले उठा, देखो किस अंदाज़।१६३१।
भावार्थ : -- एक तो उसे अपनी शान का गुमान था फिर कहता फिरता मैं तो ईमानदार हूँ, सच्चा हूँ, मेरे जैसा शैख़ दुन्या में कोई है ही नहीं । ये समझ नहीं आया वो डाकुओं से पहले क्यूँ उठ गया देखो उठा भी तो किस अंदाज से ॥
गरीबी ख़स्त हाल हुइ गरीब हाले-तंग ।
रोज़ी और रोटी से है रोज़ नई जंग । १६३२।
शाह हुवे फ़रमाँदार है रय्यत आज़ार ।
क़ौमी तिरंगे तेरा उड़ा हुवा है रंग ॥
फ़रमाँदार = सेवक
ख़याल में भी खजहजा, हुवे पहुँच से दूर ।
रोज़ा रोज़े-हश्र हुवा,खावैं क्या हज़ूर ।१६३३।
भावार्थ : --खजहजे ( फल और मेवे ) ख्यालों से भी दूर हो गए हैं | उनका जश्ने-रोज़ा हुवा हमारा क़यामते- क़याम हुई । अब किब्ला-ए-आलम बताएंगे क्या छोड़े और क्या खाएँ ।।
कहीं पे सुबहो दम हुई कहीं पे सादिक शाम हुई..,
उनका जश्ने-रोज़ा हुवा हमारा क़यामते- क़याम हुई.....
देखो हाजी मियाँ कू , हाजी कस कहलाए ।
मक्का मदिना छोड़ के सिम्त कलीसा जाए ।१६३४।
भवार्थ : -- देखो उन हाजी मियाओं को ये हाजी कैसे कहलाए। कहते हैं हम तो मक्के मदीना छोड़ के कलीसे में हज करेंगे.....॥ भैया तू यमन है कि क्या है.…. नई पहले स्पष्ट कर लें.....
रइअत तेरी परबरी हाटों हाट बिकाए ।
जोई मुश्ते- माल गहि अपने घर ले जाए ।१६३५ ।
भावार्थ : -- रे जनता जनार्दन तेरी सुरक्षा, सहायता , सेवा खुबाजारों में खुल्ले बीक रही है । जिसकी मुट्ठी में माल है वही उसे अपने घर लिए जा रहा है ॥
हुकुम रानी किए चोरी तापर सीना जोरि ।
दूजी आफत मोल लिए, कहु एक रहि का थोरि ।१६३६ ।
भावार्थ : - ये हुक्म रानी जी चोरी भी करती ही उसपर सीना जोरि भी करती है डंडे-तोप जो धरा दिए एक आफत कम थी जो दूसरी मोल ले लिए.....लो बताओ भला.....सोने के भाव में कोई अड़ंगा मोल लेता ही क्या.....
सर-जमीने-हिन्द तिरा माज़ी करे सवाल ।
ब-अदब बता तू कैसे हुई सुपेदोलाल ।१६३७ ।
ये तातारी तुपक ची वो तुरकी तख्शीर ।
ये शहानी शहकारी इमाम की ताज़ीर ॥
ये बगर वो बारगाह, बाग़ो बुरुज बलंद ।
मरमरी ये महल सरा वो शाह नजरे बंद ॥
आईना-ए- अकबरी औ तख्तों की तक़रीर ।
मुहताजों के खून से, लिखी गई ताबीर ॥
इसलिए ये सफेदो-लाल है
माज़ी = अतीत
शाह = बहादर शाह
तारें-कश के नाज़ करे रहे-सितारे साज़ ।
शाह-सवार ज़रर कहे मैं हूँ गहरे बाज़ ।१६३८।
भावार्थ : -- रहे-सितारे-तारकश ख़ुदा को खुद पर नाज़..,
शह -सवार ज़र्रा कहे मे हूँ इक्का बाज़.....
तार = किरण, रस्सी
मजलिसी कहे वाह रे, हमरे लंबरदार ।
तुहरे लंबरदार हैं रहजन के सरदार ।१६३९ ।
भावार्थ : -- सभा सदस्य गरब कर कहते हैं वाह रे ये हैं हमारे मुखिया । ये मुखिया नहीं हैं ये तो भुखिया तो डाकुओं के सरदार हैं, नाम है डाकू भूखिया सिंग ॥
परदे के इस पार कोइ पर्दे के उस पार ।
जोइ वक़ूफ़े-दीद है सोइ करे दीदार । १६४० ।
वक़ूफ़े-दीद = ज्ञान चक्षु
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