बुराई अनुहार करत, करता गया बुराइ ।
को बिपति जब कंठ गही, हेरन लगा भलाइ ।१६२१ ।
भावार्थ : -- बुराई का अनुशरण करते हुवे तू बुराइयां करता गया । जब किसी विपत्ति से घिर गया तब अपनी की हुई भलाइयों को ढूंढता फिरा ॥
टिप्पणी : -- "इतनी भलाई तो अवश्य करनी चाहिए कि विपरीत समय पर पराई प्रार्थना की आवश्यकता न पड़े "
अंतर्मन कठपूतरा, गाहे रसरी देह |
रसरी अंतर्मन धरा, मिटे देह सो नेह ।१६२२।
भावार्थ : -- यह अंतर्मन कठपुतला हो गया इसकी रश्मियाँ देह ने धारण कर ली | जब यह रश्मियाँ अनतरमन के हाथों होगी देह से मोह तभी छूटेगा ||
सम्मान अमृत सोंह है, गरल सोंह अव्मान |
साँचा साधू सोइ जौ करे गरल का पान । १६२३।
भावार्थ : -- सम्मान अमृत के सामान है अवमान यद्यपि विष के सामान है | सच्चा साधू वही हैजो अमृत का त्याग कर विष ग्रहण करे ॥
ना बन ना गोचर बचे, न कहुँ नदी के तीर ।
उत्खाती अस खात किए, बचे न कुंज करीर ।१६२४।
भावार्थ :- न वन बचे, न वन गोचर बचे, न कहीं नदियों के तट ही बचे । सत्यानाशियों ने उन्हें ऐसा खोदा की छायादार वृक्ष तो क्या लता मंडित करील तक नहीं बचे । ।
सुर नदी बलखाए चली, मेलन नील समूँद ।
मेलत घटा रूप उठी, उतरी घर बन बूँद ।१६२५।
भावार्थ : -- नील नीरधि से मिलने को सरिवरा बल खाती चली । मिलकर घटा बन के उठी, घर घर बिंदु बन उतरी ॥
बिअ बिथुरन बिदहन बिअन, जोगत पंथ बियाड़ ।
रे बिअनहरू बेगि करु, दे बिरवा के बाड़ ।१६२६ ।
भावार्थ : - बीज बिखरने की प्रतीक्षा में हैं , खेत जुताई-बुआई की प्रतीक्षा में हैं। रे बोवनहार शीघता करो, अपने खेतों में वृक्षों का बाड़ बांधो ॥
जे जग लामा पंथ है, जीवन पटतर बाहि ।
आगे पाछे देख तब, भली भाँति संचाहि ।१६२७।
भावार्थ : -- ये संसार एक लंबा पंथ है । यह जीवन एक वाहन के सदृश्य है । भूत, भविष्य पर दृष्टि लगाए रखने से ही यह भली भांति संचालित होगा ॥
उच पियारा उचक कू, नीचक कू नीचाइ ।
एक है जीवन आचरन, दूजन सोच कहाइ ।१६२८ ।
भावार्थ : -- ऊँचे को ऊंचाई प्रिय होती है नीच को नीचाई । इस सूत्र में एक जीवन शैली है दुसरा विचार है ॥
तेरे अंतर जगत कू जाने जाननहार ।
दर्पन जीवन आचरन, दैवै सबहि उचार ।१६२९।
भावार्थ : -- तेरे अंतर जगत को जानने वाले जानते हैं । जीवन शैली वह दर्पण है जो अंतर जगत के दृश्यों को अभिव्यक्त कर देता है ॥
बिनु माँग मिले दान है, माँग मिले सो भीख ।
माँगे भी जो ना मिले, कहत फकीरा सीख ।१६३०।
भावाथ :-- बिना मांगे मिले वही दान है, माँगने से मिले वो भीख है ॥ और जो माँगने से भी नहीं मिले फकीर लोग उसे शिक्षा कहते है ॥
को बिपति जब कंठ गही, हेरन लगा भलाइ ।१६२१ ।
भावार्थ : -- बुराई का अनुशरण करते हुवे तू बुराइयां करता गया । जब किसी विपत्ति से घिर गया तब अपनी की हुई भलाइयों को ढूंढता फिरा ॥
टिप्पणी : -- "इतनी भलाई तो अवश्य करनी चाहिए कि विपरीत समय पर पराई प्रार्थना की आवश्यकता न पड़े "
अंतर्मन कठपूतरा, गाहे रसरी देह |
रसरी अंतर्मन धरा, मिटे देह सो नेह ।१६२२।
भावार्थ : -- यह अंतर्मन कठपुतला हो गया इसकी रश्मियाँ देह ने धारण कर ली | जब यह रश्मियाँ अनतरमन के हाथों होगी देह से मोह तभी छूटेगा ||
सम्मान अमृत सोंह है, गरल सोंह अव्मान |
साँचा साधू सोइ जौ करे गरल का पान । १६२३।
भावार्थ : -- सम्मान अमृत के सामान है अवमान यद्यपि विष के सामान है | सच्चा साधू वही हैजो अमृत का त्याग कर विष ग्रहण करे ॥
ना बन ना गोचर बचे, न कहुँ नदी के तीर ।
उत्खाती अस खात किए, बचे न कुंज करीर ।१६२४।
भावार्थ :- न वन बचे, न वन गोचर बचे, न कहीं नदियों के तट ही बचे । सत्यानाशियों ने उन्हें ऐसा खोदा की छायादार वृक्ष तो क्या लता मंडित करील तक नहीं बचे । ।
सुर नदी बलखाए चली, मेलन नील समूँद ।
मेलत घटा रूप उठी, उतरी घर बन बूँद ।१६२५।
भावार्थ : -- नील नीरधि से मिलने को सरिवरा बल खाती चली । मिलकर घटा बन के उठी, घर घर बिंदु बन उतरी ॥
बिअ बिथुरन बिदहन बिअन, जोगत पंथ बियाड़ ।
रे बिअनहरू बेगि करु, दे बिरवा के बाड़ ।१६२६ ।
भावार्थ : - बीज बिखरने की प्रतीक्षा में हैं , खेत जुताई-बुआई की प्रतीक्षा में हैं। रे बोवनहार शीघता करो, अपने खेतों में वृक्षों का बाड़ बांधो ॥
जे जग लामा पंथ है, जीवन पटतर बाहि ।
आगे पाछे देख तब, भली भाँति संचाहि ।१६२७।
भावार्थ : -- ये संसार एक लंबा पंथ है । यह जीवन एक वाहन के सदृश्य है । भूत, भविष्य पर दृष्टि लगाए रखने से ही यह भली भांति संचालित होगा ॥
उच पियारा उचक कू, नीचक कू नीचाइ ।
एक है जीवन आचरन, दूजन सोच कहाइ ।१६२८ ।
भावार्थ : -- ऊँचे को ऊंचाई प्रिय होती है नीच को नीचाई । इस सूत्र में एक जीवन शैली है दुसरा विचार है ॥
तेरे अंतर जगत कू जाने जाननहार ।
दर्पन जीवन आचरन, दैवै सबहि उचार ।१६२९।
भावार्थ : -- तेरे अंतर जगत को जानने वाले जानते हैं । जीवन शैली वह दर्पण है जो अंतर जगत के दृश्यों को अभिव्यक्त कर देता है ॥
बिनु माँग मिले दान है, माँग मिले सो भीख ।
माँगे भी जो ना मिले, कहत फकीरा सीख ।१६३०।
भावाथ :-- बिना मांगे मिले वही दान है, माँगने से मिले वो भीख है ॥ और जो माँगने से भी नहीं मिले फकीर लोग उसे शिक्षा कहते है ॥
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