शनिवार, 14 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६१ ॥ -----

लख चौरासी जोनियाँ, भव बंधन परिभास । 
सेष परिगत जीउ कोट  , मनुज द्वारि निकास ।१६११। 
भावार्थ : -- चौरासी लाख योनियाँ भाव-बंधन को परिभाषित कराती हैं । सेष सभी जीव योनियाँ जीवन रूपी  प्रासाद के परिगत भित्ति हैं केवल मनुज योनि ही उस प्रसाद से मुक्त होने का द्वार है ॥

टिप्पणी : -- निकृष्ट जीव योनियाँ उत्कृष्ट कार्य कारित कर उत्तम योनि को प्राप्त होती हैं, ज्ञात जीवधारियों में सर्वोत्तम जीवधारी मनुष्य ही है ॥

"मनुष्य, मनुष्य ही रहे उसकी पदावनति न हो । परम पद प्राप्ति हेतु उसे सतत प्रयास करना चाहिए"

बसनाछादन अन्न कन, प्रथमक राखनहार । 
अबर अनगिन राख रखे, सासन तिन परिहार ।१६१२। 
भावार्थ : -- जीवों को भोजन, मानव को भोजन सहित आच्छादन, और छाया यह जीवन के प्राथमिक रक्षक हैं ॥ शासन ने इनको तो त्याग दिया है, और अन्य अनेको रक्षक रख लिए हैं ॥

" नौनिहाल कुपोषण के शत्रु से जूझ रहे हैं,  किसान आत्महत्या कर रहे हैं, और भारत के अंधे शासन को जहाज - बेड़े दिखाई दे रहे....."

काम क्रोध मद अरु  लोभ, बिरह सोक भय रोग । 
जैसे बैरी सों खड़े, तेसिउ साधन जोग ।१६१३। 
भावार्थ : -- का हो की क्रोध हो मद- लोभ हो कि प्रिय विषय का वियोग हो कि शोक हो कि भय हो कि रोग हो । जैसा शत्रु सम्मुख हो वैसी ही सैन्य -सज्जा रखनी चाहिए । कुपोषण के लिए युद्ध-पोत क्या करेगा ? शत्रु का भय है ? जितने सैन्य साधन है वह अद्यावधि में पर्याप्त हैं ॥

सेष हुँते सोधकरन, सज्जन हुँत उपदेस । 
सेवा धर्म भृताचरन, जान सेवक हुँत देस ।१६१४। 
भावार्थ : -- उपदेश एवं  सिद्धांत प्रतिपादन यह पुण्यात्मा का कार्य है । शेष का यह कार्य है कि वह इसे आचरण में लाए और स्वयं का शुद्धिकरण करे दूसरों को उपदेश न देने लगे ॥ राजधर्म राजा का कार्य है, जन सेवक का कार्य है कि वह जनता जनार्दन के परायण, सेवा में संलग्न होकर सेवा के धर्म का आचरण करे ॥

सबते बर हविगह उदर, बाह उदर के बाह । 
रसन बर सरूप असन, बहोरि हविरु सुवाह ।१६१ ५। 
भावार्थ : -- सबसे श्रेष्ठ हविर्गृह उदर है, हवि वाहन से श्रेष्ठ जठराग्नि है । हविरशन  भोजन स्वरूप श्रेष्ठ है, तत्पश्चात वह आहुति रूप में श्रेष्ठ है ॥

स्पष्टीकरण : --  अन्न अधिक भोक्ता किंचित होने के कारण द्वापर- युग यज्ञ प्रधान था ।  सड़ाव से हविरशन अन्न की उत्तम गति थी ॥

पेट अगन सोइ असन दिए, लपेटे सोइ सूत । 
आपन लाख लिखे जोइ, रहा भूत का भूत ।१६१६। 
भावार्थ : -- पेट की आग को वही भोजन दिया तन पर वही सूत लपेटा  । फिर जो स्वयं को आधुनिक काल का श्रेष्ठ समझ रहा है वह भूत का ही भूत रहा,  आगे नहीं बढ़ा ॥

अर्थात : -- अधुनातन काल में मनुष्य जाति का पतन ही हुवा है, उत्थान नहीं.....

हस्त अत्यंत ही विरल अंग है, जो केवल वानर एवं मनुष्य में पाया जाता है यदि गगन विहारी रहे तो हाथ पंख में परिवर्तित हो जाएंगे, और मनुष्य जाति अधोपतन की और अग्रसर होगी.....,

आपन सार बारी कै, रयनै भरे उजास । 
वह दीपक फिर बुझ गया, भानुवन्त कर आस ।१६१४ । 
भावाथ : -- अपना सार दग्ध कर  जिसने रयनी को उज्जवलित कर दिया । वह दीपक, फिर सूर्य की आस में   बुझ गया ॥

दिवस रयनी के निआन, रयनी दिवस निआन । 
रीत बिपित संग जुगे, दरसौ देइ धियान ।१६१५। 
भावर्थ : -- दिवस का अंतिम परिणाम रात्रि है,  रात्रि की अंतिम परिणीति  दिवस है । यदि ध्यान पूर्वक देखें तो रीत एवं विपरीत में परस्पर सम्बन्ध है ॥

अर्थात : -- "यदि कहीं बुराई है तो उसका परिणाम अवश्य ही अच्छाई ही है"

बसनाभूषन धार जूँ, दुल्हन लागे ठूँठ । 
सुठि सुठि सब्द सिँगार तौं, आगे साँच प्रति झूठ ।१६१६। 
भावार्थ : -- वस्त्र आभूषण धारण कर जिस प्रकार खूंटी भी दुल्हन लगती है वस्तुत: वह दुल्हन होती नहीं । उसी प्रकार सुन्दर सुंदर शब्दों का श्रृंगार कर  प्रत्येक झूठ भी सत्य ही लगता है वस्तुत: वह सत्य  होता नहीं।। 

पहिले हेरे ना मिले, तरु अाधानाधार । 

अधुने हेरे ना मिले, कहुँ अधार हरियार ।१६१७ । 
भावार्थ : -- पूर्व काल में यदि वृक्ष आरोपण करना होता था तो ढूँढने से भी वृक्षहीन भूमि नहीं मिलता थी  । अधुनातन काल ऐसा है, जहां ढूँढो तो हरियाली नहीं मिलती ॥ 


पहिले हेर ना मिले दिये दान के पात ।
हे री हेर बिना मिले पात पात अधुनात ।१६१८।

भावार्थ : --  पूर्वकाल में ढूंढे से भी दान की गई वस्तु का लेवाल नहीं मिलता था । हे सखी ! अब तो ये बिना ढूढे ही पत्र पत्र पर सरलता पूर्वक उपलब्ध हैं । अर्थात लेने को सब हैं दाता चाहिए ॥ रे जननी  तूने कैसे पूत जने हैं, दाता जन दाता भिखारी मत जन ॥  

खाया पहना आपना, जोआ सोइ पराए । 

जी धरन हुँत जोड़ लगा, ईधन केत जराए । १६१९ । 
भावार्थ : -- जो खाया जो पहना वाही अपना है जो जोड़ा वह  पराया है । अब जोड़ लगा कि अपना जीवन संजोने हेतु  तूने कितनी ऊर्जा व्यय की ।। 

भोग बिलास लॉस देख, भरम पड़े सब लोग । 
एकै जीवन जीउ रहे, सब जीवन के भोग ।१६२० । 
भावार्थ : -- भोग विलास की चमक देखकर सभी उसके चक्कर में पड़े हैं । और इस जीवन को ही एकमात्र समझकर सारे जीवन के भोग, इस एक ही जीवन में समाप्त कर रहे हैं ॥ 

भावार्थ : --  "यह जीवन एकमात्र नहीं हैं सितारों से आगे एक जहां और भी है " 

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