अध्ययन सन चिंतन कर, कारत बहुत बिचार ।
अनुभूत सों भूति करौ, जेई ज्ञाना धार ।१६०१ ।
भावार्थ : - अध्ययन के सह चिंत्तन कर बहुंत सोच-विचार करते हुवे उन विचारों का भलीभांत परीक्षण कर उनकी अनुभूति करना यही ज्ञान का आधार है ॥ ( कैथरोल से प्रेरित )
अापन कुल के तम हरे, ज्ञान दीप समान ।
भू तम हर सो सूर सम, जगत रूप भगवान ।१६०२।
भावार्थ : -- जो ज्ञान केवल अपने कुल के ही अज्ञान रूपी अन्धकार का हरण करता हो वह दीपक के सादृश्य है । जो केवल पृथ्वी के अज्ञान रूपी अन्धकार का हरण करता हो वह ज्ञान सूर्य के सादृश्य है, जो ब्रह्माण्ड के अन्धकार का हरण करता हो वह ज्ञान ही ईश्वर है ॥
जननी सीख संग लहे जनमत गर्भ निधान ।
यह तब लग कर गहि रहे जब लग हो न प्रयान ।१६०३।
भावार्थ : -- माता की शिक्षा गर्भस्थ काल से प्रारम्भ होकर जन्म होने तक संग रहती है । यह तब तक हस्त ग्रहण किए रहती है जब तक मृत्यु न हो जाए ॥
जब लग जी मैं जी रहे, तब लग रहि मुख आभ ।
जो मरनी पर राख भए, ऐसे मुख का लाभ ।१६०४।
भावार्थ : -- जब तक इस जी में जी रहता है इस मुख की आभा तब तक ही रहती है । यदि मरणोपरणात यह राख हो जाए तो फिर ऐसे मुख-कांति से परमार्थ की कांति अच्छी है ॥
पाठक पथिक पटतर हो, पथ दर्सक सब ग्रन्थ ।
पथिक तैसे चर चरे, दरस धरे जस पंथ ।१६०५।
भावार्थ : -- यदि पाठक जीवन रूपी पथ के पथिक सदृश्य है, तो सभी धर्म -ग्रन्थ पथ प्रदर्शक हैं ॥ जैसा पंथ दृष्टिगत होता है वह वैसे ही संचरित रहता है॥ अर्थात यह वैसे ही आचरण बरतता है जैसा उसे बरतने को कहा जाता है ॥
स्पष्टीकरण : -- यदि मार्ग में कहीं खड्डा दिखाई पड़े, उसे लांघना ही उचित है । पथ का यह स्वभाव है कि एक निश्चित काल के पश्चात उसमें कुछ खड्डे हो ही जाते हैं ॥ पथ प्रदर्शक केवल पथ दर्शाता है खड्डे स्वयं देखने पड़ते है ॥ और समझाऊँ ?
पितु चंदन चिता चढ़ाए, पूँछ धर धेनु दाए ।
ग्राही कहे रे दानी, ग्रास कहाँ सो आए ।१६०६।
भावार्थ : -- पिता को चन्दन की सुन्दर चिता में चढ़ा दिया । फिर पूँछ पकड़ के धेनु दान की और शार्टकट से स्वर्ग भी पहुंचा दिया ॥ अब ग्राही विनति करे है, रे दानी ! ये बता इसका चारा कौन देगा तेरा श्वसुर ॥
अधुना मानस जग भया, आलस बहुत ब्याप ।
कौतुक के सब दरसनी, कौतुक करे न आप ।१६०७ ।
भावार्थ : -- अधुनातन समय में मनुष्य जगत में आलस्य व्याप्त हो गया है । खेल-तमाशा को सब देखना चाहते हैं करना कोई नहीं चाहता ॥
साँच श्रवन साँच दरसन, कानन लोचन चाह ।
साधु निगदन दरसावन, निज मुख चाहे नाह ।१६०८।
भावार्थ : -- कर्ण एवं लोचन सत्य सुनना एवं देखना तो चाहते हैं । किन्तु अपना यह जो मुख है वह न तो सत्य कहना नहीं चाहता है न सत्य दर्शाना चाहता है ।
देह बड़ी मायामयी, इसकी माया जान ।
रसन लोचन श्रवन वदन, जे सुख देहिहि दान ।१६०९।
भावार्थ :-- यह देह साधन माया वायी है इसकी माया को इस प्रकार से जानी जा सकती है कि रसना, दृष्टि श्रुति साधन, वदन जैसे अवयव जो बाह्य जगत की अनुभूत कराते हैं यह अनुभूति इस देह की ही दें है ॥ अर्थात मृत्यु पश्चात यह अनुभूति अप्राप्य होगी ॥
हिया के चूल्हा बरे, नक धुकनी सन धौंक ।
काय कढ़ाए रुधिर चढ़े, ग्रास जलावन झौंक ।१६१०।
भावार्थ : -- ह्रदय का चूल्हा जल रहा है, नासिका की धौंकनी से उसे धौंक । काया की कढ़ाई में रुधिर चढ़ा हुवा है ग्रास का ईंधन दे अन्यथा वह चूल्हा ठंडा हो जाएगा ॥
अनुभूत सों भूति करौ, जेई ज्ञाना धार ।१६०१ ।
भावार्थ : - अध्ययन के सह चिंत्तन कर बहुंत सोच-विचार करते हुवे उन विचारों का भलीभांत परीक्षण कर उनकी अनुभूति करना यही ज्ञान का आधार है ॥ ( कैथरोल से प्रेरित )
अापन कुल के तम हरे, ज्ञान दीप समान ।
भू तम हर सो सूर सम, जगत रूप भगवान ।१६०२।
भावार्थ : -- जो ज्ञान केवल अपने कुल के ही अज्ञान रूपी अन्धकार का हरण करता हो वह दीपक के सादृश्य है । जो केवल पृथ्वी के अज्ञान रूपी अन्धकार का हरण करता हो वह ज्ञान सूर्य के सादृश्य है, जो ब्रह्माण्ड के अन्धकार का हरण करता हो वह ज्ञान ही ईश्वर है ॥
जननी सीख संग लहे जनमत गर्भ निधान ।
यह तब लग कर गहि रहे जब लग हो न प्रयान ।१६०३।
भावार्थ : -- माता की शिक्षा गर्भस्थ काल से प्रारम्भ होकर जन्म होने तक संग रहती है । यह तब तक हस्त ग्रहण किए रहती है जब तक मृत्यु न हो जाए ॥
जब लग जी मैं जी रहे, तब लग रहि मुख आभ ।
जो मरनी पर राख भए, ऐसे मुख का लाभ ।१६०४।
भावार्थ : -- जब तक इस जी में जी रहता है इस मुख की आभा तब तक ही रहती है । यदि मरणोपरणात यह राख हो जाए तो फिर ऐसे मुख-कांति से परमार्थ की कांति अच्छी है ॥
पाठक पथिक पटतर हो, पथ दर्सक सब ग्रन्थ ।
पथिक तैसे चर चरे, दरस धरे जस पंथ ।१६०५।
भावार्थ : -- यदि पाठक जीवन रूपी पथ के पथिक सदृश्य है, तो सभी धर्म -ग्रन्थ पथ प्रदर्शक हैं ॥ जैसा पंथ दृष्टिगत होता है वह वैसे ही संचरित रहता है॥ अर्थात यह वैसे ही आचरण बरतता है जैसा उसे बरतने को कहा जाता है ॥
स्पष्टीकरण : -- यदि मार्ग में कहीं खड्डा दिखाई पड़े, उसे लांघना ही उचित है । पथ का यह स्वभाव है कि एक निश्चित काल के पश्चात उसमें कुछ खड्डे हो ही जाते हैं ॥ पथ प्रदर्शक केवल पथ दर्शाता है खड्डे स्वयं देखने पड़ते है ॥ और समझाऊँ ?
पितु चंदन चिता चढ़ाए, पूँछ धर धेनु दाए ।
ग्राही कहे रे दानी, ग्रास कहाँ सो आए ।१६०६।
भावार्थ : -- पिता को चन्दन की सुन्दर चिता में चढ़ा दिया । फिर पूँछ पकड़ के धेनु दान की और शार्टकट से स्वर्ग भी पहुंचा दिया ॥ अब ग्राही विनति करे है, रे दानी ! ये बता इसका चारा कौन देगा तेरा श्वसुर ॥
अधुना मानस जग भया, आलस बहुत ब्याप ।
कौतुक के सब दरसनी, कौतुक करे न आप ।१६०७ ।
भावार्थ : -- अधुनातन समय में मनुष्य जगत में आलस्य व्याप्त हो गया है । खेल-तमाशा को सब देखना चाहते हैं करना कोई नहीं चाहता ॥
साँच श्रवन साँच दरसन, कानन लोचन चाह ।
साधु निगदन दरसावन, निज मुख चाहे नाह ।१६०८।
भावार्थ : -- कर्ण एवं लोचन सत्य सुनना एवं देखना तो चाहते हैं । किन्तु अपना यह जो मुख है वह न तो सत्य कहना नहीं चाहता है न सत्य दर्शाना चाहता है ।
देह बड़ी मायामयी, इसकी माया जान ।
रसन लोचन श्रवन वदन, जे सुख देहिहि दान ।१६०९।
भावार्थ :-- यह देह साधन माया वायी है इसकी माया को इस प्रकार से जानी जा सकती है कि रसना, दृष्टि श्रुति साधन, वदन जैसे अवयव जो बाह्य जगत की अनुभूत कराते हैं यह अनुभूति इस देह की ही दें है ॥ अर्थात मृत्यु पश्चात यह अनुभूति अप्राप्य होगी ॥
हिया के चूल्हा बरे, नक धुकनी सन धौंक ।
काय कढ़ाए रुधिर चढ़े, ग्रास जलावन झौंक ।१६१०।
भावार्थ : -- ह्रदय का चूल्हा जल रहा है, नासिका की धौंकनी से उसे धौंक । काया की कढ़ाई में रुधिर चढ़ा हुवा है ग्रास का ईंधन दे अन्यथा वह चूल्हा ठंडा हो जाएगा ॥
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