सोमवार, 2 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५७ ॥ -----,

जे संसार सागर सब नैया देइ उतार । 
साधौ सोइ जानिये, जोइ लगावै पार ।१५७१। 
भावार्थ : -- यह संसार सागर के समान है । इसमे नैया तो कोई भी उतार देता है । सज्जन उसी को मानना चाहिए जो उसे पार लगा कर परम लक्ष्य को प्राप्त करे॥ 


आधिक में तो दोष है क्वचित मैं कर तोष । 
जे जग जीवन सोष किए, जे आजीवन पोष ।१५७२। 
भावार्थ : -- विषयों की अधिकता में दोष निहित रहता है, चाहे यह विषय न्यायोचित मार्ग से ही अर्जित क्यों हों, इसलिए क्वचित में ही संतोष करना चाहिए । अधिकता जगत के जीवन का शोषण कर अर्जित की जाती है अत: उसमें सौ दोष होते हैं । क्वचित उसका आजीवन पोषण कर अर्जित की जाती है अत: यह दोष मुक्त है ॥   

धन से पूर्ण काम हो, मन से हो अभिज्ञानि । 
तन से सेवा सील हो, सोइ जन धनमानि ।१५७३। 
भावार्थ : -- जो धन से पूर्ण कामी हो एवं मन से सत्य-असत्य की परख रखता हो ॥ जो तन से सेवा शील हो, संसार में वही धनवान है शेष सभी निर्धन है ॥ 

भोजन हेतु पोषन हो, बासन ढांके गात । 
छत सिरु छादन हेतु हो, तहँ के जन अभिजात ।१५७४। 
भावार्थ : -- जिसके लिए भोजन केवल पोषण के हेतु हो स्वाद हेतु नहीं । वस्त्र तन का
ढकाव हेतु हो चलन हेतु नहीं । भवन शीश पर का आच्छादन हो वैभव प्रदर्शन हेतु नहीं । तो वहां के वासी का वर्ग अभिजात वर्ग हैं ॥ 

कुकरनी संग हो रहे, धनिक पीन ते पीन । 
साधौ होवै दिनोदिन, दीन दीन ते दीन ।१५७५। 
भावार्थ : -- हे सज्जनो ! यह व्यवस्था ऐसी दुराचारी है की इसमें कुकर्म का संग प्राप्त कर धनी पुष्टतम हुवा जा रहा है । और दीन दिनोदिन दीनतमहुवा जा रहा है ॥ 

स्पष्टीकरण : -- किसी राष्ट्र में केवल मनुष्य जाति ही निवास नहीं करती, अपितु पशु-पक्षी के संग सम्पूर्ण जीव-जगत भी निवासरत होते है। राष्ट्र की उन्नति में उनकी संख्या एवं जीवनचर्या का आकलन समाहित होना चाहिए ॥ पूर्वकाल में मनुष्य के सह पशु पक्षियों की भी गणना होती थी ॥ जिसके सह उस देश के पारिस्थतिक संतुलन का चिंतन होता था ॥  

पहिले साँस सँग परिहरे, बहुरि परिहरे प्रान । 
परतस् स्वजन हरिए कँह , बारो देह मसान ।१५७६। 
भावार्थ : -- सर्वप्रथम स्वांस साथ छोड़ती हैं फिर प्राण । तत्पश्चात स्वजन भी धीरे से कहते हैं, अब देह श्मशान में जला देते हैं ॥   

बिटप लगाया और नै फल को औरहि खाए । 
ऐसो करतब कीजिये, मरन परन सुख दाए ।१५७७। 
भावार्थ : -- विटप किसी और ने लगाया, फल हम खा रहे हैं। ऐसे कार्य करने चाहिए जो मृत्योपरांत भी सुख देवें दुःख नहीं ॥ 

काल अस समदीठी है, देखे धरम न जात । 

आए औचक लेइ जाए, देखे दिवस न रात ।१५७८। 
भावार्थ : -- मृत्यु ऐसी समदृष्टा है जो धर्म-जाति, धनता-दीनता, दिवस-रयन, वर्ण-विवर्ण नहीं देखती । वह औचक ही आती है और संग लिए जाती है ॥ 

जी जुगावन राख रखे, रखहारे चहुँ ओर । 
भय सन भयधन कौन जौ बैठा भीतर ठोर ।१५७९। 
भावार्थ : -- जीवन-रक्षा हेतु चारों ओर रक्षकों को तो रख लिया । रे मूर्ख ! उस भय से भयंकर कौन है जो मृत्यु बनकर तेरे भीतर बैठा है ॥  

हे लिखधारी लिखित मैं, लगे नेम के ढेर । 
मिळत दोषी गली गली, कौड़ी मैं दस सेर ।१५८०। 
भावार्थ : -- हे नयमन लिखिता !  हे नियामकों के रचयिता !! और कितने नियम बनाएगा, पुस्तकों में पहले ही ढेरों लिखे पड़े हैं इन्हें कोई कबाड़ी भी नहीं लेता । और ये अपराधी हैं की गली गली में कौड़ी में मिलते हैं ॥ 











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