रविवार, 29 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६६ ॥ -----

संचित सम्पद बार के, सम्पद साधन जोए । 
तासों सम मह मूरखा, अगजग लग ना होए ।१६६१। 
भावार्थ : -- अपनी संचित सम्पदा में आग लगा के फिर जो उसी सम्पदा को प्राप्त करने के साधन संजोता हो । संसार में ढूंढ आओ उसके जैसा महा मूर्ख कहीं नहीं मिलेगा ॥

अगन सँवारत लौह जस, लौह सँवारत हेम । 
हेम सँवारत सुभग तस, सुभग सँवारत प्रेम ।१६६२। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार अग्नि लोहे को, लोहा स्वर्ण को सवर्ण सोहाग को संवारता है उसी प्रकार सौभाग्य जनक कर्म प्रेम को संवारते है ॥

प्रियतम आपनि संग किए, तू तू मैं मैं काहि । 
आप को खोए हमहि गए, रहे कौन जग माहि ।१६६३। 
भावार्थ : -- प्रियतम आप के संग हम ने तू तू मैं मैं काहे की । आप ( संग)  को भी खो दिया, हम ( प्रसंग ) भी नहीं रहे अब कहो जग में कौन रह गया ॥

बिरवा पुहुप पुहुप रंग, पवन गंध प्रसंग । 
नयन सपन सपन साजन, फिर तू काहु एकंग ।१६६४। 
भावार्थ : -- बिरवा फूल के संग है फूल रंग के संग है , पवन के संग गंध है । नयन संग सपन, सपन  संग साजन है फिर तू क्यों एकंग है ॥

राम नाम मुख जाप के, बर आसन तो पाए । 
कहत सुबुधी निपते तब, आहहु निकसत नाए ।१६६५। 
भावार्थ : --   ईश्वर का जाप करने से ऊंचा सिंहासन तो मिल जाता है । सुबुद्धि जन कहते हैं जब वहां से गिरते हैं न तब मुख से हाय हाय भी नहीं निकलती । भैया इतने ऊंचा बैठो कि गिरे तो हाय हाय कर सके ॥

डोले माहि डोल रहा, पहन पंच परिधान । 
ऐसो भगत देख कहत भगवनहु हे भगवान ।१६६५। 
भावार्थ : -- तुम्हारे परम भक्त जन सेवक पंच परिधान पहन के डोलों में ही डोलते रहते हैं ॥ ऐसे भगत सेवको  को देखकर भगवान भी हे भगवान ! कहता है ।

जल कन सुबचन धर्म धन, जोई रखे सँजोए । 
पुनि जलावन जोग धरे, निर्धन कबहु न होइ ।१६६७। 
भावाथ : -- जो राष्ट्र जल अन्न सुभाषितम् सहित धर्म एवं ईंधन का संग्रह करता हो,  वह राष्ट  कभी निर्धन  नहीं होता ॥

स्पष्टीकरण : -- एक राष्ट हेतु  धर्म का तात्पर्य है  : -- सत्य, अहिंसा, शौच एवं दान 
                        " अहिंसा से शान्ति एवं पशुधन की वृद्धि होती है ॥"

धन अपव्ययन जस कृपन पसु धन नसे सँभार । 
बाताबरन दुषन नसे, आसा धीरज हार ।१६६८। 
भावार्थ : -- धन अपव्ययं से नष्ट होता है, यश कृपणता से नष्ट होता है । पशु धन सार-सम्भार से नष्ट होता है । हवा-पानी प्रदुषण से नष्ट होते है । धैर्य आशान्वित होने से नष्ट हो जाता है ॥




शुक्रवार, 27 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६५॥ -----

बटमारु के नत नीरत, चोरन की चतुराइ । 
पाखनी के परमारथ , जन जन के मन भाइ ।१६५१ । 
भावार्थ : -- अब तो जनता जनार्दन के मन को दूसरों का स्वत्व हरण करने वाले भाते हैं और लुटेरों की कला और नृत्य एवं पाखंडियों का परमार्थ ही भाता है ॥ 

कहत दुर्मूल दुरमूल, आँखि देखावहिं डाँटि । 
सबद पाती सासक किए, हम केहि ते कहुँ घाटि ।१६५२। 
भावार्थ : -- मँहगाई को महगाई  कह दो तो अपने चाटुकारों को आँख दे दे के डँटवाता है । धूत बुडबग कहीं के ये महंगाई थोड़े ही  छे.....ऐसा बोल के  । जब शब्द पाती को शासक नियुक्त करना था तो 'हम ' क्या  किसी से घाट थे ॥ 

रामायन अग जग सुना, किया परस्पर प्रीति । 
रे  भारती सठ तेरी , भई बिपरीत रीति ।१६५३। 
भावार्थ : -- रामायण को सारे संसार ने श्रवण किया । और श्रवण कर सौहार्दयता एवं परस्पर प्रीति  करते हुवे सौहार्द का व्यवहार सीखा । रे दुष्ट भारतीयों तुम्हारी बुद्धि विपरीत हो गई ॥ 

 " अरे सठ भारतीय ! तू वर्ण से विवर्ण हो गया किन्तु गोरे अभी तक गोरे हैं यह स्मरण रहे " 

बढ़नी तेतकहि अनुकूल, जाके जेतक मूल । 
प्रतिकूल एक दिन निपतत, किए निज नास समूल ।१६५४। 
भावार्थ : -- समृद्धि योग्यता के अनुकूल होनी चाहिए । अनुचित साधनों से प्राप्त की गई प्रतिकूल समृद्धि पतन का कारण बनती है और एक दिन पूर्णत: नष्ट कर देती है ॥ 

सम्पद जल धनपत कमल, चेरे रबि समतूल । 
तब लग नैन फूरित किए, जब लग जल गह मूल ।१६५५। 
भावार्थ : -- सम्पदा/प्रतिष्ठा यदि जल है तो धनपति कमल है, चाटुकार उस रवि के समतुल्य हैं जो तब तक प्रसन्नता भरते हैं जब तक जड़ को जल प्राप्त  रहता है ॥ 

मुरझाए मुख सिक्त करे, बड़हर क़तर ब्योँत । 
निर्बल पौध सहार दे, अस जन सेवक जोत ।१६५६। 
भावार्थ :--  मुरझाए हुवे मुख को जो सिक्त करे, बढे चढ़े की काँट-छाँट करे । निर्बल पौधे को सहार दे, ऐसा जन सेवक नियुक्त करना चाहिए ॥ 

पात पल बरन फूल फल, बलकल कल संवाद । 
अर्थ कनक मुख धार के, लाहे सार स्वाद ।१६५७ । 
भावार्थ : -- पत्र पल्लव है, वर्ण समूह फले हुवे फूल है । सुमधुर संवाद छिलका है । अर्थ के कणों को ही मुख में आधारित कर उसके सार का स्वाद लेना चाहिए ॥  

प्रीति सोषइ रोष को लोभइ को संतोष । 
दिनकर ओस सोषइ तस अपब्ययन धन कोष ।१६५८। 
भावाथ : -- रोष की शोषक प्रीति है ,जैसे लोभ की शोषक संतोष है । जैसे ओस बिनु का शोषक दिनकर है वैसे ही अपव्यय धन के कोष को शोषित करता है ॥ 

जहां सिंहासनहु मिले, गाइ राम के नाम । 
सोइ जुग मिले परम गति, करत जग हित काम ।१६५९। 
भावार्थ : -- जिस युग में ईश्वर का नाम जपने भर से सिंहासन मिल जाता हो । उस युग में परमार्थ करते जाओ, परम गति अवश्य ही मिलेगी ॥ 

मन रंजन कि जीवन धन, साधन को संजोग। 
यह होतब बिनु भला जब किए जग दुर उपजोग ।१६६० । 
भावार्थ : -- किसी साधन का आविष्कार चाहे मनोरंजन हेतु हो चाहे जीवन की आधार भूत आवश्यकताओं हेतु हो । यदि संसार द्वारा उसका दुरपयोग किया जाता हो तो ऐसे आविष्कार अविष्कृत न होना ही श्रेष्ठ है ॥ 







मंगलवार, 24 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६४ ॥ -----

एक मुद्रा एक बस्तु जात, दोनहु जगत प्रसिद्ध । 
एक होत कछु सधे नहीं, दुजन होत सब सिद्ध ।१६४१। 

भावार्थ : -- एक मुद्रा है एक आवश्यक वस्तु है । दोनों ही संसार भर में प्रसिद्ध हैं ॥ एक यदि पास में हो तो कुछ नहीं सधता दूसरा हो तो सब कुछ साध्य है ॥

स्पष्टीकरण १ : -- एक नगर में एक सेठ रहता था, उसके पास एक मुट्ठी कण और मन भर मुद्रा थी । पास में भूखों की एक वसति थी । कुछ समय पश्चात उस नगर में एक साधू आया । भूखे साधू के चरणों से लिपट गए । कहने लगे महाराज कुछ ऐसा कीजिए कि उस सेठ का धन  सम्यक रूप से वितरित हो और हम भूखे न रहे ॥ सेठ के पास भूमि भी थी साधू ने वे मुट्ठी भर कण मांगे और सारी भूमि में बो दिए । बढ़िया उपज हुई सभी को श्रम का पुरस्कार सम्यक स्वरूप में प्राप्त हुवा और सब सुखी हो गए; मुद्रा धरी की धरी रह गई ।

स्पष्टीकरण : -- एक दूसरे नगर में  दुसरा सेठ रहता था मुट्ठी भर मुद्रा और मन भर  कण लिए । वहां भी लोगों की यही स्थिति थी । साधू ने वहां सेठ को प्रवचन दिया .....साधू की बातों में आकर उसने कण को तो दान कर दिया किन्तु मुद्रा को जी से लगाए रखा ।
वसति वासीयों ने कण लिए और अपनी अपनी भूमि में बो दिए, बढ़िया उपज हुई सबको श्रम का सम्यक पुरस्कार मिला और वे सुखी हो गए । मुद्रा फिर धरी की धरी रह गई ॥

तो भैया सार यह है कि मुद्रा धन नहीं है धन अर्जन का साधन है धन तो अन्न जल ही है । अब किसी देश की अर्थ व्यवस्था मुद्रा पर आधारित है तो वह छद्म व्यवस्था है ।

'अन्न की कोई योजना हो तो अन्न चाहिए मुद्रा नहीं'

सुख के साधन भूत धन, जथारथ माहि  अर्थ । 
ए अर्थ सरनि अर्थान्वित, इ सोंह सकल ब्यर्थ ।१६४२।
भावार्थ : -- सुख के साधन भूत द्रव्य ही यथार्थ में अर्थ है । यह वस्तु आधारित अर्थप्रणाली ही महत्वपूर्ण है इसके सम्मुख सेष सभी व्यर्थ हैं ॥

सुख के साधन भूत धन, कहत सबहि धनवंत । 
सबते बाद संतोष है, कह गए साधौ संत ।१६४३। 
भावार्थ : -- धनवानों का यह मत है कि सुख के साधन का आधार गोचर विषय है । संत विद्वान कह गए हैं, सुख का सबसे बड़ा साधन संतोष है ॥

मनि रतन में चोर लगे, सड़े कोठ मैं नाज । 
बाल मुकुन भूखन मरे,  आयो कैसो राज ।१६४४। 
भावार्थ : -- हीरा कोयला  में चोर लगे हुवे हैं  । अन्न कोष में अन्न सड़ रहा है । देश का बचपन भूखा मर रहा है, ये कैसी  शासन आ गया ॥

सतत खनिज उत्खात किए धरे बिलास निवास । 
कहुँ त रातिन सूर बरे, कहुँ न दीपहु उजास ।१६४३। 
भावार्थ : -- संसार में असमानता इस प्रकार व्याप्त हैं कि खनिज संसाधनों का निरंतर दोहन कर विलास भवन में संचित किया जा रहा है ।परिणामतस् कहीं तो रातें सूर्य सी प्रकाशित हैं और  दीपक जितना भी प्रकाश नहीं हैं ॥

जमनाङ्गल कि चारि बरन, करे राज सब जात । 
बिषय भोग मैं चित लगे, को को कछु न आत ।१६४४। 
 भावार्थ : -- यवन, आंग्ल, और चार वर्ण इन सभी लोगों ने राज कर लिया । यदि बुद्धि विषयों के भोगने में लगी रहे तब चाहे कोई भी क्यों न हो उसे कुछ नहीं आएगा ॥

" प्राकृति संसाधनों का इतना सन्दोहन हुवा, समानता की व्यवस्था किसी भी शासन काल में नहीं हुई और देखो उस सुवर्ण उर्फ़ बिरहमन को..... बिषय के भोगने में विवर्ण हो गया.....बोले तो धब्बा.....और वो क्षत्रिय.....अब तक समझ नहीं आया इसका मस्तिष्क कहाँ लगा है.....और वो बाबू साहेब.....न बाबू रहा न साहेब.....बचा हुवा कौन सा ब्रम्हांड फोड़ लेगा ( गाड पार्टिकल्स का पता लगाना) ।।

गोंड़ गवाँर नृपाल महि जमन महा महिपाल ।
साम न दान न भेद कलि, केबल दंड कराल ।१६४५।
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास जी ॥ -----

सन्दर्भ : -- यह दोहा चार पांच सौ वर्ष पूर्व की शासन व्यवस्था का वर्णन कर रहा है ॥
भावार्थ : -- कलयुग में जंगली लोग एवं गँवार पृथ्वी के राजा हो गए हैं और एवं मलेच्छादि भगवान । इनके शासन में न दान है न शान्ति है न ही भेद का सही प्रयोग है ये केवल असमर्थों को कठोर दंड देते हैं ॥

पियतम पावस काल मैं, कहँ कोकिल के बैन । 
जब मुख गढ़ गढ़ बोलिहैं, चुपी रहन दौ नैन ।१६४५।  
भावार्थ : -- रे प्रियतम पावस काल में कोकिल की मीठी कहाँ । जब देश में नक्कार बोलते रहे तो  तूती  को चुप ही रहना चाहिए ॥ दूसरे जब मुख गढ़ गढ़ बोलने लगता है तब नैनों वाली प्यारी सांकेतिक भाषा विलुप्त हो जाती है ॥

पहिले बंचक धींग मिले, हेरत देस बहार । 
अजहुँ  बक ध्यानी रूप, मिले डहार डहार ।१६४६।  
भावार्थ : -- पहले दुष्ट, ठग, धूर्त देश के बाहर लंका में मिलते थे वो भी ढूंढने पर ।  अब तो वह बक ध्यानी बने हुवे बिना ढूंढे सरलता पूर्वक मिलने लगे हैं ॥

 नदिया हृदय सिंधु चहे, चहे जलावन आग । 
मीचक हृदय प्रान चहे, लम्पट कामिन लाग ।१६४७। 
 ----- । । विदुर नीति ।।  -----
भावार्थ : --  नदी का ह्रदय सिंधु को चाहता है, ईंधन का ह्रदय अग्नि को चाहता है, मीचक का ह्रदय प्राण को चाहता है लम्पट सदा कंचन कामिनी की चाह में रहते हैं ॥

रसना तब लग रस लहे जब लग घट में बाड़ । 
करन घटे लोचन घटे, सनै सनै दे छाँड़ ।१६४८  । 
भावार्थ : -- जिह्वा को तब तक स्वाद प्राप्त करना चाहिए  जब तक देह बढ़ती रहे । जब यह बढ़त,  घटती की और उन्मुख हो तब शनै शनै रसास्वादन का त्याग करते जाना चाहिए ॥

सागर सब जल खार है, सुरसरि पबित अधार । 
दुहु  मेले घन बन बरखे, करन नेह बिस्तार ।१६४९। 
भावार्थ : -- सागर का सारा जल खारा है अर्थात उसमें सौ दोष हैं, और सुरसरिता पवित्रता का आधार है । फिर भी दोनों मेल करते हुवे घन बन कर बरसते हैं इस हेतु कि संसार में प्रेम का विस्तार हो घृणा का नहीं ॥

खनिज उपाइ अनेक किए बनिज उपाइ अनेक । 
गाँउ गँवारु गार लिखे, आपनी पौ प्रबेक ।१६५० । 

भावार्थ : -- खनिज खनन के एवं बनियों की समृद्ध के तो सौ उपाय करता है । गाँव वाले बेचारे निरीह प्राणी को 'गाली व स्वयं को राष्ट्र-अवतंस समझ कर सबसे जी जी  कहलवाता है ॥ 





शनिवार, 21 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६३॥ -----

सासन राजसि चाहता , अरु राजा का राज । 
लोक तंत्र तजित क्यूँ न , राज करे सब काज ।१६३१। 
भावार्थ : -- रे जनता.... जनार्दन.....जब तुझे राजसी शासन ही चाहिए और राजा का राज चाहिए ।  तो फिर क्यूँ न इस लोक तंत्र को छोड़ दें उसके स्थान पर राजतंत्र को सब कार्य करने दे ॥

खेतन मैं खेती भली, खेत करन मैं खेल । 
खेत होता धान भला, खेल करन मैं हेल ।१६३२। 
भावार्थ : -- खेत में खेती ही अच्छी लगती है मिल-माल नहीं ।  समतलीकरण में बालकों का खेल भला लगता है, रण नहीं ॥ खेत होता अन्न अच्छा लगता है, वीर रक्षा करते अच्छा लगता है मरता नहीं, हुंकार खेल में ही अच्छी लगती है रण में नहीं ॥

धुनी धवन बानी बरन, बासित दंतागार । 
तन बर बसनाभरन दे, बहोरि बहिर निकार ।१६३३। 
भावार्थ : -- शब्द, वाणी, वर्ण और गुंजन ये सभी दन्त गृह में निवास करते हैं । जैसे वक्ता सिंगर कर बहिर्गमन करता है, वैसे ही इन्हें भी उत्तम वस्त्राभूषण से सुसज्जित कर, फिर बाहर भेजना चाहिए ॥

प्रति दिन पहर छन प्रति पल, खड़ा सीस पर काल । 
मानस जेइ बिचार ले, परे न धरम अकाल ।१६३४। 
भावाथ : -- प्रत्येक समय मृत्यु शीश पर खडी है । मानव यदि यह विचार करे तो संसार में पुण्य का अकाल ही न हो ।।

एक बाद अरु एक बिबाद, दोनउ नाउ उपाधि । 
जब दोउ एक संजुग भए, जने दुर्बिनाय बाधि ।१६३५। 
भावार्थ : -- एक वाद दुसरा विवाद, दोनों का नाम उपद्रवी है । जब ये दोनों एक साथ होते हैं तब ये उद्दंडता एवं अशांति को जन्म देते हैं ॥

रचैता रचना आपनी , लागे  हीरा  लाल । 
औरन  मोल जानी के, आपन धरे सँभाल ।१६३६। 
भावार्थ : -- रचयिता हेतु अपनी रचना हीरे मोतियों सी लगती है । उसे औरों की रचनाओं का भी मोल जानना चाहिए, अपनी भी संभालकर रखनी चाहिए ॥

मोल जुगाया कोइरा, किए सब वाकी चाह । 
मोल मुलाया हीरका, चाहिए कोऊ नाह ।१६३७। 
भावार्थ : -- यदि कोयला मूल्य का जुगाड़ कर लेवे तो सब उसकी चाह करने लगते हैं । यदि हीरा मोल मुलाई में मिलने लग जाए वह किसी को नहीं चाहिए ॥

भावार्थ : -- कुछ लोगों को दुर्मूल्या चाहिए,  कुछ लोगों को गुणवत्ता चाहिए,  कुछ ही लोग है जिन्हें केवल आवश्यक पदार्थ चाहिए ॥

मनि मंडप सिरु छाए के, साधौ धुनी रमाए । 
ऐतक जोड़ जुगाड़ में,  केत धर्म हो जाए । १६३८। 
भावार्थ : - रत्न जड़ित मंडप में ये बाबा लोग धुनी रमा के परबचन देते हैं । ये मत करो वो मत करो । इतना जोड़ जुगाड़ में तो दस बीस गौशाला खुल जाए ॥ सच्ची बात तो कड़वी लगेगी ॥ 

भव्य आयोजनो का प्रबंध कर फिर कथा बांचना यह शास्त्रों में कहीं लिखा है ? 

 खारे जल को सोध के, भूमि भूमि बरखाए । 
नर सेवक हो सूर सम, बीअ बीअ बिकसाए ।१६३९। 
भावार्थ : -- नर सेवक को सूर्य के सदृश्य होना चाहिए जो खारे अनुपयोगी जल को शोधन कर प्रत्येक स्थान पर समान स्वरूप में वर्षा  करते हुवे प्रत्येक बीज को विकसित करता है ॥

तेरे जोग जुगावने, बरते  लोग पराए। 
तेरे दिये चुगावने, मरपर सद्गत दाए ।१६४०। 
भावार्थ : -- तेरे द्वारा संचित की गई धन-सम्पदा का उपयोग दूसरे करेंगे । तेरे दिए दाने ही मरणोपरांत तुझे सद्गति प्रदान करेंगे ॥
  






शुक्रवार, 20 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६३॥ -----

शाने गुमाँ कहता था, मैं हूँ रस्ते बाज़ । 
रहजन से पहले उठा, देखो किस अंदाज़।१६३१।  
भावार्थ : -- एक तो उसे अपनी शान का गुमान था फिर कहता फिरता मैं तो ईमानदार हूँ, सच्चा हूँ, मेरे जैसा शैख़ दुन्या में कोई है ही नहीं । ये समझ नहीं आया वो डाकुओं से पहले क्यूँ उठ गया देखो उठा भी तो किस अंदाज से ॥ 

गरीबी ख़स्त  हाल हुइ गरीब हाले-तंग । 
रोज़ी और रोटी से है रोज़ नई जंग । १६३२। 

शाह हुवे फ़रमाँदार है रय्यत आज़ार । 

क़ौमी तिरंगे तेरा उड़ा हुवा है रंग  ॥ 

फ़रमाँदार = सेवक 

ख़याल में भी  खजहजा, हुवे पहुँच से दूर । 
रोज़ा रोज़े-हश्र हुवा,खावैं क्या हज़ूर ।१६३३। 
भावार्थ : --खजहजे ( फल और मेवे ) ख्यालों से भी दूर हो गए हैं |  उनका जश्ने-रोज़ा हुवा हमारा क़यामते- क़याम हुई । अब किब्ला-ए-आलम बताएंगे क्या छोड़े और क्या खाएँ ।। 

  कहीं पे सुबहो दम हुई  कहीं पे सादिक शाम हुई.., 
उनका जश्ने-रोज़ा हुवा हमारा क़यामते- क़याम हुई..... 

देखो हाजी मियाँ कू , हाजी कस कहलाए  ।  
मक्का मदिना छोड़ के सिम्त कलीसा जाए ।१६३४। 
भवार्थ : -- देखो उन हाजी मियाओं को ये हाजी कैसे कहलाए। कहते हैं हम तो मक्के मदीना छोड़ के कलीसे में हज करेंगे.....॥ भैया तू यमन है कि क्या है.…. नई पहले स्पष्ट कर लें..... 

रइअत तेरी परबरी  हाटों हाट बिकाए । 
जोई मुश्ते- माल गहि अपने घर ले जाए ।१६३५ । 
भावार्थ : -- रे जनता जनार्दन तेरी सुरक्षा, सहायता , सेवा खुबाजारों में खुल्ले बीक रही है । जिसकी मुट्ठी में माल है वही उसे अपने घर लिए जा रहा है ॥ 

हुकुम रानी किए चोरी तापर सीना जोरि । 
दूजी आफत मोल लिए, कहु एक रहि का थोरि ।१६३६ । 
भावार्थ : - ये हुक्म रानी जी चोरी भी करती ही उसपर सीना जोरि भी करती है डंडे-तोप जो धरा दिए  एक आफत कम थी जो दूसरी मोल ले लिए.....लो बताओ भला.....सोने के भाव में कोई अड़ंगा मोल लेता ही क्या..... 

सर-जमीने-हिन्द तिरा माज़ी करे सवाल । 
ब-अदब बता तू कैसे हुई सुपेदोलाल ।१६३७ । 


ये तातारी तुपक ची वो तुरकी तख्शीर । 
ये शहानी शहकारी इमाम की ताज़ीर ॥ 

ये बगर वो बारगाह, बाग़ो बुरुज बलंद । 
मरमरी ये महल सरा वो शाह नजरे बंद ॥ 

आईना-ए- अकबरी औ  तख्तों की तक़रीर । 
मुहताजों के खून से, लिखी गई ताबीर ॥ 

इसलिए ये सफेदो-लाल है 
माज़ी = अतीत 
 शाह = बहादर शाह 

तारें-कश के नाज़ करे रहे-सितारे साज़ । 
शाह-सवार ज़रर कहे मैं हूँ गहरे बाज़ ।१६३८। 
भावार्थ : -- रहे-सितारे-तारकश ख़ुदा को खुद पर नाज़..,
                  शह -सवार ज़र्रा कहे मे हूँ इक्का बाज़.....


तार = किरण, रस्सी

मजलिसी कहे वाह रे, हमरे लंबरदार ।  
तुहरे लंबरदार हैं रहजन के सरदार ।१६३९ । 
 भावार्थ : -- सभा सदस्य गरब कर कहते हैं वाह रे ये हैं हमारे मुखिया । ये मुखिया  नहीं हैं ये तो भुखिया तो  डाकुओं के सरदार हैं, नाम है डाकू भूखिया सिंग ॥ 

परदे के इस पार कोइ  पर्दे के उस पार । 
जोइ वक़ूफ़े-दीद है सोइ करे दीदार । १६४० । 

वक़ूफ़े-दीद = ज्ञान चक्षु 








बुधवार, 18 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६२॥ -----

बुराई अनुहार करत, करता गया बुराइ । 
को बिपति जब कंठ गही, हेरन लगा भलाइ ।१६२१ । 
भावार्थ : -- बुराई का अनुशरण करते हुवे तू बुराइयां करता गया । जब किसी विपत्ति से घिर गया तब अपनी की हुई भलाइयों को ढूंढता फिरा ॥ 

टिप्पणी : -- "इतनी भलाई तो अवश्य करनी चाहिए कि विपरीत समय पर पराई प्रार्थना की आवश्यकता न पड़े "

अंतर्मन कठपूतरा, गाहे रसरी देह | 

रसरी अंतर्मन धरा, मिटे देह सो नेह ।१६२२। 
भावार्थ : -- यह अंतर्मन कठपुतला हो गया  इसकी रश्मियाँ देह ने धारण कर ली | जब यह रश्मियाँ अनतरमन के हाथों होगी देह से मोह तभी छूटेगा || 

सम्मान अमृत सोंह है, गरल सोंह अव्मान | 
साँचा साधू सोइ जौ करे गरल का पान । १६२३। 
भावार्थ : -- सम्मान अमृत के सामान है अवमान यद्यपि विष के सामान है | सच्चा साधू वही हैजो अमृत का त्याग कर विष ग्रहण करे ॥ 

ना बन ना गोचर बचे, न कहुँ नदी के तीर । 
उत्खाती अस खात किए, बचे न कुंज करीर ।१६२४। 
भावार्थ :- न वन बचे, न वन गोचर बचे, न कहीं  नदियों के तट ही बचे । सत्यानाशियों ने उन्हें ऐसा खोदा की छायादार वृक्ष तो क्या लता मंडित करील तक नहीं बचे । । 

सुर नदी बलखाए चली, मेलन नील समूँद । 
मेलत घटा रूप उठी, उतरी  घर बन बूँद ।१६२५। 
भावार्थ : -- नील नीरधि से मिलने को सरिवरा बल खाती चली । मिलकर घटा बन के उठी, घर घर बिंदु बन उतरी ॥ 

बिअ बिथुरन बिदहन बिअन, जोगत पंथ बियाड़ । 
रे बिअनहरू बेगि करु, दे बिरवा के बाड़ ।१६२६ । 
भावार्थ : - बीज बिखरने की प्रतीक्षा में हैं , खेत जुताई-बुआई की प्रतीक्षा में हैं। रे बोवनहार शीघता करो, अपने खेतों में वृक्षों का बाड़ बांधो ॥ 

जे जग लामा पंथ है, जीवन पटतर बाहि । 
आगे पाछे देख तब, भली भाँति संचाहि ।१६२७। 
भावार्थ : -- ये संसार एक लंबा पंथ है । यह जीवन एक वाहन के सदृश्य है ।  भूत, भविष्य पर दृष्टि लगाए रखने से ही यह भली भांति संचालित होगा ॥ 

उच पियारा उचक कू, नीचक कू नीचाइ । 
एक है जीवन आचरन, दूजन सोच कहाइ ।१६२८ । 
भावार्थ : -- ऊँचे को ऊंचाई प्रिय होती है नीच को नीचाई । इस सूत्र में एक जीवन शैली है दुसरा विचार है ॥ 

तेरे अंतर जगत कू जाने जाननहार । 
दर्पन जीवन आचरन, दैवै सबहि उचार ।१६२९। 
भावार्थ : -- तेरे अंतर जगत को जानने वाले जानते हैं ।  जीवन शैली वह दर्पण है जो अंतर जगत के दृश्यों को अभिव्यक्त कर देता है ॥ 

बिनु माँग मिले दान है, माँग मिले सो भीख । 
माँगे  भी जो ना मिले, कहत फकीरा सीख ।१६३०।  
भावाथ :-- बिना मांगे मिले वही दान है, माँगने से मिले वो भीख है ॥ और जो माँगने से भी नहीं मिले फकीर लोग उसे शिक्षा कहते है ॥ 







मंगलवार, 17 जून 2014

----- मिनिस्टर राजू १३५ -----

राजू : -- मास्टर जी ! जब प्रधान एंट्री ई अमेरिका की भूमि पर अपने चरण रखेंगे तब उन्हें वहां से उसे भारत कैसा दिखाई देगा..?

 " राजू ! वहां जाने के पश्चात फिर भारत थोड़े ही दिखाई देता है, बस चीन दिखाई देती है....."

शनिवार, 14 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६१ ॥ -----

लख चौरासी जोनियाँ, भव बंधन परिभास । 
सेष परिगत जीउ कोट  , मनुज द्वारि निकास ।१६११। 
भावार्थ : -- चौरासी लाख योनियाँ भाव-बंधन को परिभाषित कराती हैं । सेष सभी जीव योनियाँ जीवन रूपी  प्रासाद के परिगत भित्ति हैं केवल मनुज योनि ही उस प्रसाद से मुक्त होने का द्वार है ॥

टिप्पणी : -- निकृष्ट जीव योनियाँ उत्कृष्ट कार्य कारित कर उत्तम योनि को प्राप्त होती हैं, ज्ञात जीवधारियों में सर्वोत्तम जीवधारी मनुष्य ही है ॥

"मनुष्य, मनुष्य ही रहे उसकी पदावनति न हो । परम पद प्राप्ति हेतु उसे सतत प्रयास करना चाहिए"

बसनाछादन अन्न कन, प्रथमक राखनहार । 
अबर अनगिन राख रखे, सासन तिन परिहार ।१६१२। 
भावार्थ : -- जीवों को भोजन, मानव को भोजन सहित आच्छादन, और छाया यह जीवन के प्राथमिक रक्षक हैं ॥ शासन ने इनको तो त्याग दिया है, और अन्य अनेको रक्षक रख लिए हैं ॥

" नौनिहाल कुपोषण के शत्रु से जूझ रहे हैं,  किसान आत्महत्या कर रहे हैं, और भारत के अंधे शासन को जहाज - बेड़े दिखाई दे रहे....."

काम क्रोध मद अरु  लोभ, बिरह सोक भय रोग । 
जैसे बैरी सों खड़े, तेसिउ साधन जोग ।१६१३। 
भावार्थ : -- का हो की क्रोध हो मद- लोभ हो कि प्रिय विषय का वियोग हो कि शोक हो कि भय हो कि रोग हो । जैसा शत्रु सम्मुख हो वैसी ही सैन्य -सज्जा रखनी चाहिए । कुपोषण के लिए युद्ध-पोत क्या करेगा ? शत्रु का भय है ? जितने सैन्य साधन है वह अद्यावधि में पर्याप्त हैं ॥

सेष हुँते सोधकरन, सज्जन हुँत उपदेस । 
सेवा धर्म भृताचरन, जान सेवक हुँत देस ।१६१४। 
भावार्थ : -- उपदेश एवं  सिद्धांत प्रतिपादन यह पुण्यात्मा का कार्य है । शेष का यह कार्य है कि वह इसे आचरण में लाए और स्वयं का शुद्धिकरण करे दूसरों को उपदेश न देने लगे ॥ राजधर्म राजा का कार्य है, जन सेवक का कार्य है कि वह जनता जनार्दन के परायण, सेवा में संलग्न होकर सेवा के धर्म का आचरण करे ॥

सबते बर हविगह उदर, बाह उदर के बाह । 
रसन बर सरूप असन, बहोरि हविरु सुवाह ।१६१ ५। 
भावार्थ : -- सबसे श्रेष्ठ हविर्गृह उदर है, हवि वाहन से श्रेष्ठ जठराग्नि है । हविरशन  भोजन स्वरूप श्रेष्ठ है, तत्पश्चात वह आहुति रूप में श्रेष्ठ है ॥

स्पष्टीकरण : --  अन्न अधिक भोक्ता किंचित होने के कारण द्वापर- युग यज्ञ प्रधान था ।  सड़ाव से हविरशन अन्न की उत्तम गति थी ॥

पेट अगन सोइ असन दिए, लपेटे सोइ सूत । 
आपन लाख लिखे जोइ, रहा भूत का भूत ।१६१६। 
भावार्थ : -- पेट की आग को वही भोजन दिया तन पर वही सूत लपेटा  । फिर जो स्वयं को आधुनिक काल का श्रेष्ठ समझ रहा है वह भूत का ही भूत रहा,  आगे नहीं बढ़ा ॥

अर्थात : -- अधुनातन काल में मनुष्य जाति का पतन ही हुवा है, उत्थान नहीं.....

हस्त अत्यंत ही विरल अंग है, जो केवल वानर एवं मनुष्य में पाया जाता है यदि गगन विहारी रहे तो हाथ पंख में परिवर्तित हो जाएंगे, और मनुष्य जाति अधोपतन की और अग्रसर होगी.....,

आपन सार बारी कै, रयनै भरे उजास । 
वह दीपक फिर बुझ गया, भानुवन्त कर आस ।१६१४ । 
भावाथ : -- अपना सार दग्ध कर  जिसने रयनी को उज्जवलित कर दिया । वह दीपक, फिर सूर्य की आस में   बुझ गया ॥

दिवस रयनी के निआन, रयनी दिवस निआन । 
रीत बिपित संग जुगे, दरसौ देइ धियान ।१६१५। 
भावर्थ : -- दिवस का अंतिम परिणाम रात्रि है,  रात्रि की अंतिम परिणीति  दिवस है । यदि ध्यान पूर्वक देखें तो रीत एवं विपरीत में परस्पर सम्बन्ध है ॥

अर्थात : -- "यदि कहीं बुराई है तो उसका परिणाम अवश्य ही अच्छाई ही है"

बसनाभूषन धार जूँ, दुल्हन लागे ठूँठ । 
सुठि सुठि सब्द सिँगार तौं, आगे साँच प्रति झूठ ।१६१६। 
भावार्थ : -- वस्त्र आभूषण धारण कर जिस प्रकार खूंटी भी दुल्हन लगती है वस्तुत: वह दुल्हन होती नहीं । उसी प्रकार सुन्दर सुंदर शब्दों का श्रृंगार कर  प्रत्येक झूठ भी सत्य ही लगता है वस्तुत: वह सत्य  होता नहीं।। 

पहिले हेरे ना मिले, तरु अाधानाधार । 

अधुने हेरे ना मिले, कहुँ अधार हरियार ।१६१७ । 
भावार्थ : -- पूर्व काल में यदि वृक्ष आरोपण करना होता था तो ढूँढने से भी वृक्षहीन भूमि नहीं मिलता थी  । अधुनातन काल ऐसा है, जहां ढूँढो तो हरियाली नहीं मिलती ॥ 


पहिले हेर ना मिले दिये दान के पात ।
हे री हेर बिना मिले पात पात अधुनात ।१६१८।

भावार्थ : --  पूर्वकाल में ढूंढे से भी दान की गई वस्तु का लेवाल नहीं मिलता था । हे सखी ! अब तो ये बिना ढूढे ही पत्र पत्र पर सरलता पूर्वक उपलब्ध हैं । अर्थात लेने को सब हैं दाता चाहिए ॥ रे जननी  तूने कैसे पूत जने हैं, दाता जन दाता भिखारी मत जन ॥  

खाया पहना आपना, जोआ सोइ पराए । 

जी धरन हुँत जोड़ लगा, ईधन केत जराए । १६१९ । 
भावार्थ : -- जो खाया जो पहना वाही अपना है जो जोड़ा वह  पराया है । अब जोड़ लगा कि अपना जीवन संजोने हेतु  तूने कितनी ऊर्जा व्यय की ।। 

भोग बिलास लॉस देख, भरम पड़े सब लोग । 
एकै जीवन जीउ रहे, सब जीवन के भोग ।१६२० । 
भावार्थ : -- भोग विलास की चमक देखकर सभी उसके चक्कर में पड़े हैं । और इस जीवन को ही एकमात्र समझकर सारे जीवन के भोग, इस एक ही जीवन में समाप्त कर रहे हैं ॥ 

भावार्थ : --  "यह जीवन एकमात्र नहीं हैं सितारों से आगे एक जहां और भी है " 

बुधवार, 11 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १६० ॥ -----

अध्ययन सन चिंतन कर, कारत बहुत बिचार । 
अनुभूत सों भूति करौ, जेई ज्ञाना धार ।१६०१ । 
भावार्थ : - अध्ययन के  सह चिंत्तन कर बहुंत सोच-विचार करते हुवे  उन विचारों का भलीभांत परीक्षण कर उनकी अनुभूति करना यही ज्ञान का आधार है  ॥ ( कैथरोल से प्रेरित ) 

अापन कुल के तम हरे, ज्ञान  दीप समान । 
भू तम हर सो सूर सम, जगत रूप भगवान ।१६०२। 
भावार्थ : -- जो ज्ञान केवल अपने कुल के ही अज्ञान रूपी अन्धकार का हरण  करता हो वह दीपक के सादृश्य है । जो केवल पृथ्वी के अज्ञान रूपी अन्धकार का हरण करता हो वह ज्ञान सूर्य के सादृश्य है, जो ब्रह्माण्ड के अन्धकार का हरण करता हो वह ज्ञान ही ईश्वर है ॥   

जननी सीख संग लहे जनमत गर्भ निधान । 
यह तब लग कर गहि रहे जब लग हो न प्रयान ।१६०३। 
भावार्थ : -- माता की शिक्षा गर्भस्थ काल से प्रारम्भ होकर जन्म होने तक संग रहती है । यह तब तक हस्त ग्रहण किए रहती है जब तक मृत्यु न हो जाए ॥  

जब लग जी मैं जी रहे, तब लग रहि मुख आभ । 
जो मरनी पर राख भए, ऐसे मुख का लाभ ।१६०४। 
भावार्थ : -- जब तक इस जी में जी रहता है इस मुख की आभा तब तक ही रहती है । यदि मरणोपरणात यह राख हो जाए तो फिर ऐसे मुख-कांति से परमार्थ की कांति अच्छी है ॥ 

पाठक पथिक पटतर हो, पथ दर्सक सब ग्रन्थ । 
पथिक तैसे चर चरे, दरस धरे जस पंथ ।१६०५। 
भावार्थ : -- यदि पाठक जीवन रूपी पथ के पथिक सदृश्य है, तो सभी धर्म -ग्रन्थ पथ प्रदर्शक हैं ॥ जैसा पंथ दृष्टिगत होता है वह वैसे ही संचरित रहता है॥ अर्थात यह वैसे ही आचरण बरतता है जैसा उसे बरतने को कहा जाता है ॥ 

स्पष्टीकरण : -- यदि मार्ग में कहीं खड्डा दिखाई पड़े, उसे लांघना ही उचित है । पथ का यह स्वभाव है कि एक निश्चित काल के पश्चात  उसमें कुछ खड्डे हो ही जाते हैं ॥  पथ प्रदर्शक केवल पथ दर्शाता है खड्डे स्वयं देखने पड़ते है ॥ और समझाऊँ ? 

पितु चंदन चिता चढ़ाए, पूँछ धर धेनु दाए  । 
ग्राही कहे रे दानी, ग्रास कहाँ सो आए ।१६०६। 
भावार्थ : -- पिता को चन्दन की सुन्दर चिता में चढ़ा दिया । फिर पूँछ पकड़ के धेनु दान की और शार्टकट से स्वर्ग भी पहुंचा दिया ॥ अब ग्राही विनति करे है,  रे दानी ! ये बता इसका चारा कौन देगा तेरा श्वसुर ॥

 अधुना मानस जग भया, आलस बहुत ब्याप । 
कौतुक के सब दरसनी, कौतुक करे न आप ।१६०७ । 
भावार्थ : -- अधुनातन समय में  मनुष्य जगत में आलस्य व्याप्त हो गया है । खेल-तमाशा को सब देखना चाहते हैं करना कोई नहीं चाहता ॥ 

साँच श्रवन साँच दरसन, कानन लोचन चाह । 
साधु निगदन दरसावन, निज मुख चाहे नाह ।१६०८। 
भावार्थ : --  कर्ण एवं लोचन सत्य सुनना एवं देखना तो चाहते हैं  । किन्तु अपना यह जो मुख है वह न तो सत्य कहना नहीं चाहता है न सत्य दर्शाना चाहता है । 

 देह बड़ी मायामयी, इसकी माया जान । 
रसन लोचन श्रवन वदन, जे सुख देहिहि दान ।१६०९। 
भावार्थ :-- यह देह साधन  माया वायी है इसकी माया को इस प्रकार से जानी जा सकती है कि रसना, दृष्टि श्रुति साधन, वदन जैसे अवयव जो बाह्य जगत की अनुभूत कराते हैं यह अनुभूति इस देह की ही दें है  ॥  अर्थात मृत्यु  पश्चात यह अनुभूति अप्राप्य होगी ॥

हिया के चूल्हा बरे,  नक धुकनी सन धौंक । 
 काय कढ़ाए रुधिर चढ़े,  ग्रास जलावन झौंक ।१६१०। 
भावार्थ : --  ह्रदय का चूल्हा जल रहा है,  नासिका की धौंकनी से उसे धौंक । काया की कढ़ाई में रुधिर चढ़ा हुवा है ग्रास का ईंधन दे अन्यथा वह चूल्हा ठंडा हो जाएगा ॥





शनिवार, 7 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५९ ॥ -----,

अधुनावधि नव चहत नहि, नव जुग के कृतकार  । 
करत नवल परिहार कर, जीर्न के उद्धार ।१५९१। 
भावार्थ : --हे नव युग के रचनाकार अद्यावधि को नवल कृति  की आवश्यकता नहीं है  कारण कि  प्राग कृतियाँ ही पर्याप्त है अत: तू नवकृति का विचार त्याग, जीर्ण का  उद्धार कर ॥  

रचना सबहि बिधि सम्मत, रीति असम्मत होए । 
रीतिलिप्त को दंड दए ,  रचना करतल जोए ।१५९२। 
भावार्थ : -- निर्माण कोई भी हो वह विधि विरुद्ध नहीं होता, उस निर्माण की प्रक्रिया विधि विरुद्ध होती है । अत: निर्माण को राजसात करते हुवे, प्रक्रिया में संलिप्त कर्त्ता को दण्डित करना चाहिए ॥ 

कर्म उद्यम संग जुगे, धरम संग आचार । 
पाप कुकरम संग जुगे, पुन जग सत्कृत कार ।१५९३।  
भावार्थ : -- कर्म उद्यम पर ही आधरित होता है, धरम आचरण पर । पाप कुकर्मों पर आधारित होता है, पुण्य जगत के हितकारी कार्यों पर ॥ 

जग मह राजन सोइ है, जो दै बहुस उदार । 
रंक साधन भूत हेतु, धन का संचयकार ।१५९४। 
 भावार्थ  : -- संसार में  राजा वही है जो न्यायोचित लाभ को संयम पूर्वक अर्जन एवं व्ययन करते हुवे शेष का उदार होकर दान करे,  जो पूर्णकामी हो जाए वह राजाओं का राजा है । रंक वह है जो अपनी आधार भूत आवश्यकता हेतु ऐहिक सुखों  के साधन भूत द्रव्यों का संचयन करता हो ॥ 

मैं पंच भूति पूतरा, कहत तेहि बिग्यान । 
मैं अन्तर्मन चिदगगन, कहत  दरसन ग्यान  ।१५९५ । 
भावार्थ : -  मैं पंच -तत्त्व ( अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल, आकाश ) से निर्मित देह हूँ , इसे विज्ञान कहते हैं । मैं अंतर में अवस्थित जीवात्मा हूँ ब्रह्म हूँ प्रकृति पुरुष ( आत्मा ) जीव,जगत ,माया, संघटन-विघटन  आदि विषयों के  निरूपण को दर्शन कहते हैं और ज्ञान कहते । 

अर्थात : -- पदार्थ के बाह्य स्वरूप के अध्ययन को विज्ञान कहते हैं एवं उसके आतंरिक गूढ़ विषयों के अध्ययन को ज्ञान अथवा  अध्यात्म कहते हैं ॥ 

बाहरी रूप दरस के, हेत राखियो नाह । 
लीला नाउ रखे राम, करत रंग रिल्लाह ।१५९६ । 
भावार्थ : -- केवल बाहरी स्वरूप को दर्श कर उससे प्रभावित नहीं  चाहिए । एक लीला ने अपना नाम राम रख लिया, पता चला उसके अंतर में तो रंग रिल्लाह हो रही थी ॥ 

काया धारे जनम लिए होहिहि अवसि बिहान । 
सतायुज हो कि सहसायु, चाहे हो भगवान ।१५९७ । 
भावार्थ : -- यदि काया धारण कर जन्म लिया तो उस काया का अवसान होना निश्चत है । वह चाहे शतायुज हो चाहे सहस्त्रायुज हो अथवा शाश्वत स्वरूप स्वयं ईश्वर ही क्यों न हो ॥ 

चिंत इहि लोक के चिंतन कर, चिन्ताकुल परलोक । 
ते जन चित ब्यापत नहि, भोग बिषय के सोक ।१५९८। 
भावार्थ : -- जो इहलोक की चिंता करते हुवे परलोक के चिंतन से व्याकुल रहते हैं । ऐसे पुरुष के चित्त को भोग विषयों की वियोग जनित पीड़ा व्यथित नहीं करती ॥ 

झूठ अनख जगाई के,गहे जग मृषा वाद । 
बेर बिरोध बिप्लव तहँ, लहे पूरन  प्रमाद ।१५९९ । 
भावार्थ : -- असत्य में परस्पर दुरस्पर्धा उत्प्रेरित कर, जब संसार ने मृषावाद को अंगीकार किया हो । तब वहां वैर-विरोध, संकट, दुराचरण आदि काल के कर्मकल्प पूर्ण प्रमाद को प्राप्त होते हैं ॥ 

सार सँजोत जौं बाढ़त, केसिनि के कल केस । 
मृषावाद गहत तौं जग ,  बाढ़त कपटी बेस । १६००।   
भावाथ : -- सार संजो कर जिस प्रकार केशिनी के केश वर्द्धित होते  हैं । उसी प्रकार मृषावाद से अंगीकृत संसार में  कपट व्यवहार का वर्द्धन होता है ॥ 






गुरुवार, 5 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५ ८ ॥ -----,

लाकुटिक लिये लकुटिया, हेरे दूषनहार । 
रे दुजन ते पाहिले, अपने सिर पर मार ।१५८१।
भावार्थ : -- शासक,सेवक,चौकीदार; डंडा लिए दोषियों के खोज करे । रे चौक्किदार ! दूसरे का फोड़ने से पहले अपना सिर फोड़ ॥ 

अर्थात : - कोई विधेयक अन्य पर लागू करने से पूर्व शासन-प्रशासन उसे स्वयं पर लागू करे अन्यथा विधेयक निरर्थक हैं एवं दूषित विधृति में इनका निर्माण समय का अपव्यय है ॥   

मैं स्वामि मैं लाकुडिक, मैं ही साधु सुजान । 
जाका मुख मैं मैं करे, छाग सम तेहि जान ।१५८२। 
भावार्थ : -- मैं स्वामी हूँ, मैं सेवक भी हूँ मैं चौकीदार हूँ मैं दण्डधारी भी हूँ मैं उत्तम पुरुष हूँ मैं ही विद्वान हूँ मैं ये हूँ मैं वो हूँ । जिस आसन धारी का मुख मैं मैं करता है उसे बकरा के समान समझना चाहिए ॥  

पहिले गन ले दन्त तब दाए गउ दानवंत । 
दान पैहि गउ जो गाहि, गिने न वाके दन्त ।१५८३। 
भावाथ : -- दानदाता को गौदान करने से पहले उसके दन्त की गणना कर लेनी चाहिए । ग्राही को यदि दान में गौ प्राप्त हो तो उसके दांतों की गणना नहीं करनी चाहिए । 

अर्थात : -- दानदाता द्वारा गन-दोष की परीक्षा कर केवल उपयोगी पदार्थों का ही दान करना चाहिए । दानग्रहीता को गुण -दोष का विचार किए बिना प्राप्य अनुपयोगी पदार्थ को उपयोगी बनाना चाहिए ॥ 

हितकारी को कृत करे पूर्ण लगन लगाए । 
अन्तररहित रीत बरे, लगन आप लग जाए ।१५८४। 
भावार्थ : -- यदि कोई हितकारी कृत्य करें तो मनोयोग सहित पूर्ण लगन से करे । यदि कार्य निर्विध्न हो अबाध एवं निरंतर स्वरूप में हो तो लगन स्वयं ही लग जाती है ॥ 

करिहउँ अँधुआ भगति तो, होहू बंधुआ दास । 
दोष जुगित जे श्रीबिग्रह, बँधत सोइ के पास ।१५८५। 
भावार्थ : -- अंधभक्ति किसी की भी नहीं करनी चाहिए,  यह श्रीविग्रह ईश्वर का ही क्यों न हो उसमें कुछ न कुछ दोष अवश्य होता है वही दोष बंधुआ भक्त के बंधन का कारण बनते है और अंधा भक्त बंधुआ दास हो जाता है  फिर वह ईश्वरीय गुणों के सह अनीश्वरीय अवगुणों का भी अनुशरण करने लगता है ॥ 

नर नारी जोग जुगाए दोउ रचत परिबारु  । 
समुदाय पुनि समाज भए, परिबारु समाहार ।१५८६।  
भावार्थ : -- " स्त्री-पुरुष के सम्यक एवं पारस्परिक सु-सम्बन्ध पारिवारिक इकाई का निर्माण करते है.."परिवारों के समाहार से समुदाय एवं समाज  निर्मित होता है ॥

धर्म कदाचित सुबिचिता विचारिन्हि संचाइ  । 

देस जाति कौटुमिक जन, जाके कृत अनुयाइ ।१५८७। 
भावार्थ : --   धर्म कदाचित सुविचित सुविचारों का संग्रह है कोई व्यक्ति कौटुम्ब जाति समाज जिसका अनुशरण  करता है ॥

कलाकृति हो कि को भनिति, ऐतक  हो अवतंस । 
रचनाकार नाउ बिना, पावै आप प्रसंस ।१५७८। 
भावार्थ : -- कोई कलाकृति अथवा भणिति इतनी उत्कृष्ट होनी चाहिए कि उसे प्रशंसा प्राप्त करने हेतु रचनाकार के नाम की आवश्यकता न पड़े ॥

साधन चहे जो को हो , पहि दुर्जन के हाथ । 
दुर्दसा निहचित  लहि जौ  गहि खल माया साथ ।१५८९। 
भावार्थ : --  ऐहिक सुख के द्रव्यों का साधन हो, ज्ञान का साधन हो सुचना एवं संचार साधन हो,  अथवा कोई भी क्यों न हो  यदि वह आसुरी माया की संगती कर दुर्जनों के  हाथ लग गया तब उसका सत्यानाश होना  निश्चित है ॥ 

गन तंत्र  भीत गठित दल, निज हेतु गयउ भूल । 
जेइ दलगत रीति बने, प्रगति पंथ के सूल ।१५९०। 
भावार्थ : -- गणतंत्र  के अंतर्गत गठित निर्वाचन दलों को अपने  उद्देश्य विस्मृत हो गए, परिणाम स्वरूप निर्वाचन प्रणाली की यह दलगत रीति राष्ट्र के प्रगति-पंथ का कंटक बनी हुई है ॥








सोमवार, 2 जून 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५७ ॥ -----,

जे संसार सागर सब नैया देइ उतार । 
साधौ सोइ जानिये, जोइ लगावै पार ।१५७१। 
भावार्थ : -- यह संसार सागर के समान है । इसमे नैया तो कोई भी उतार देता है । सज्जन उसी को मानना चाहिए जो उसे पार लगा कर परम लक्ष्य को प्राप्त करे॥ 


आधिक में तो दोष है क्वचित मैं कर तोष । 
जे जग जीवन सोष किए, जे आजीवन पोष ।१५७२। 
भावार्थ : -- विषयों की अधिकता में दोष निहित रहता है, चाहे यह विषय न्यायोचित मार्ग से ही अर्जित क्यों हों, इसलिए क्वचित में ही संतोष करना चाहिए । अधिकता जगत के जीवन का शोषण कर अर्जित की जाती है अत: उसमें सौ दोष होते हैं । क्वचित उसका आजीवन पोषण कर अर्जित की जाती है अत: यह दोष मुक्त है ॥   

धन से पूर्ण काम हो, मन से हो अभिज्ञानि । 
तन से सेवा सील हो, सोइ जन धनमानि ।१५७३। 
भावार्थ : -- जो धन से पूर्ण कामी हो एवं मन से सत्य-असत्य की परख रखता हो ॥ जो तन से सेवा शील हो, संसार में वही धनवान है शेष सभी निर्धन है ॥ 

भोजन हेतु पोषन हो, बासन ढांके गात । 
छत सिरु छादन हेतु हो, तहँ के जन अभिजात ।१५७४। 
भावार्थ : -- जिसके लिए भोजन केवल पोषण के हेतु हो स्वाद हेतु नहीं । वस्त्र तन का
ढकाव हेतु हो चलन हेतु नहीं । भवन शीश पर का आच्छादन हो वैभव प्रदर्शन हेतु नहीं । तो वहां के वासी का वर्ग अभिजात वर्ग हैं ॥ 

कुकरनी संग हो रहे, धनिक पीन ते पीन । 
साधौ होवै दिनोदिन, दीन दीन ते दीन ।१५७५। 
भावार्थ : -- हे सज्जनो ! यह व्यवस्था ऐसी दुराचारी है की इसमें कुकर्म का संग प्राप्त कर धनी पुष्टतम हुवा जा रहा है । और दीन दिनोदिन दीनतमहुवा जा रहा है ॥ 

स्पष्टीकरण : -- किसी राष्ट्र में केवल मनुष्य जाति ही निवास नहीं करती, अपितु पशु-पक्षी के संग सम्पूर्ण जीव-जगत भी निवासरत होते है। राष्ट्र की उन्नति में उनकी संख्या एवं जीवनचर्या का आकलन समाहित होना चाहिए ॥ पूर्वकाल में मनुष्य के सह पशु पक्षियों की भी गणना होती थी ॥ जिसके सह उस देश के पारिस्थतिक संतुलन का चिंतन होता था ॥  

पहिले साँस सँग परिहरे, बहुरि परिहरे प्रान । 
परतस् स्वजन हरिए कँह , बारो देह मसान ।१५७६। 
भावार्थ : -- सर्वप्रथम स्वांस साथ छोड़ती हैं फिर प्राण । तत्पश्चात स्वजन भी धीरे से कहते हैं, अब देह श्मशान में जला देते हैं ॥   

बिटप लगाया और नै फल को औरहि खाए । 
ऐसो करतब कीजिये, मरन परन सुख दाए ।१५७७। 
भावार्थ : -- विटप किसी और ने लगाया, फल हम खा रहे हैं। ऐसे कार्य करने चाहिए जो मृत्योपरांत भी सुख देवें दुःख नहीं ॥ 

काल अस समदीठी है, देखे धरम न जात । 

आए औचक लेइ जाए, देखे दिवस न रात ।१५७८। 
भावार्थ : -- मृत्यु ऐसी समदृष्टा है जो धर्म-जाति, धनता-दीनता, दिवस-रयन, वर्ण-विवर्ण नहीं देखती । वह औचक ही आती है और संग लिए जाती है ॥ 

जी जुगावन राख रखे, रखहारे चहुँ ओर । 
भय सन भयधन कौन जौ बैठा भीतर ठोर ।१५७९। 
भावार्थ : -- जीवन-रक्षा हेतु चारों ओर रक्षकों को तो रख लिया । रे मूर्ख ! उस भय से भयंकर कौन है जो मृत्यु बनकर तेरे भीतर बैठा है ॥  

हे लिखधारी लिखित मैं, लगे नेम के ढेर । 
मिळत दोषी गली गली, कौड़ी मैं दस सेर ।१५८०। 
भावार्थ : -- हे नयमन लिखिता !  हे नियामकों के रचयिता !! और कितने नियम बनाएगा, पुस्तकों में पहले ही ढेरों लिखे पड़े हैं इन्हें कोई कबाड़ी भी नहीं लेता । और ये अपराधी हैं की गली गली में कौड़ी में मिलते हैं ॥ 











----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...