स्वामिन की भगति छाँड़, कार करे सौ औऱ ।
स्वाँग भरे साधौ के, खडे दुआरी चौर ।१५०१ ।
भावार्थ : -- स्वामी की भक्ति को छोड़ कर बाकी सारे सौ ठो काम करते हैँ । ये सज्जनता का स्वांग भरे हुवे वास्तव मेँ चोर हैँ, जो तेरी द्वारि पर खड़े हैं ॥
काम चोर पूजन करे, आरती दिए उतार ।
सील साधना साध के, धारे जोगाधार ।१५०२।
भावार्थ : -- काम चोर पूजा करते है, आरितियाँ उतारते है । कर्मशील, कर्म की साधना करके अपनी सफलता का मार्ग प्रसस्त करते हैं ॥
हरि हरि हरि हरिअरि ररत, अरि अरि हरिअ न होत ।
हरि हरि परिहरि बिअ बिअत, हरिअरि हरिअरि जोत ।१५०३।
भावार्थ : -- हे री ! हरि हरि गाने से हरीयाली नहिं होती । हरि हरि गाना छोड़ पहले खेत जोत, उसमें बीज बो फ़िर धीरे-धीरे हरियाली छाएगी ॥
दीपक अरु खद्योत के, सुहा गहन तम माहि ।
ऐसेउ खल के छ्ल छबि, तमगुन के सो लाहि।१५०४ ।
भावार्थ : - दीपक और जुगनू की शोभा गहनतम अँधेरे से ही है ॥ ऐसे ही दुष्ट जनों की बनावटी शोभा अज्ञान, आलस्य क्रोधादि अवगुणों से ही है ॥
तमोगुन गहें कौतुकी, खेल करे खद्योत ॥
दिए बिगाड़े सकल खेल, सूर उदय जब होत। १५०५।
भावार्थ : -- तामसी गुणों ग्रहण कर जुगनू खेल-तमाशे करता रहता है ।जब सूर्य उदय होता है तब उसके सारा खेल बिगाड़ देता है ॥
तमोहर तम हरन कर, भरे जगत उजियार ।
लोचन पलकन ढाँप लिए, कहै अजहुँ अँधियार ।१५०६।
भावार्थ : -- तामसी गुण हरण कर तमसहारी ने अंधेरेजगत मेँ उजाला भर दिया ॥ जिसने अपने नेत्रों को पलकों से आच्छादित किया हुवा है उसके अनुसार अभी अन्धेरा है ॥
प्यासे मुख को जल दे, भूखे असन प्रदाएँ ।
निर्बसनी को बसन दे, मति हिन को मत दाएँ ।१५०७।
भावार्थ : -- प्यासे को जल दें भोजन नहिं, भूखी को भोजन दें । वस्त्रहीन को वस्त्र दें, बुद्धिहीन को सदबुद्धि देँ मत-सम्मत नहीं ॥
अर्थात : -- "जिसको जिसकी आवश्यकता है, उसको वही वस्तु दान करें"
जेतक माँहि पेट भरे, ततख तव अधिकार ।
भरत अकण्ठ बमन करे, कह तिन भ्रष्टा चार ।१५०८।
भावार्थ : -- जितने में तुम्हारी आधार भूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके तुम्हारा उतने पर ही अधिकार है । यदि कोई इससे अधिक के लिए अधिकृत है वह भृष्टाचारी है । जिसने आकंठ भर लिया है, और उल्टियाँ कर रहा है सर्वप्रथम वही दंड का अधिकारी है ॥
टिप्पणी : -- सारे भारतीय ही भ्रष्टाचारी हैं, तो इस देश को कारावास काहे नहीं बना देते, कारावास को देश बनाए देते हैँ ॥ ये नेता लोगन जो है, अरे वही जो स्वयं को दूधवा के धुले कहते हैं ,देश इन्हेँ सौँप देते हैँ, जो है ।
जन जन को भरमाइ के, सेवक बने अधीस ।
खावे खेत पियें नदी, बुझि न भूख अरु तीस ।१५०९ ।
भावार्थ : -- भारतीय जनता को भ्रमित करते हुवे स्वयं को सेवक कहकर भारत की सत्ता पाने वाले, राजा बन बैठे । ये भारत के पूरे खेत खा गए, नदी की नदी पी गए फ़िर भी इनकी भूख औऱ प्यास नहीँ मिटी ।।
औषध बासन जल अन्न, जेन केन कर दात ।
मत दायन मैं भल भॉंति, परखो पात कुपात ।१५१०।
भावार्थ : -- औषधि वस्त्र जल आन आदि जीवन के साधन आवश्यकता के आधार पर दाय । इसमे पात्र विचार नहीं करना चाहिए । किन्तु में सुपात्र एवम कुपात्र की भली प्रकार से परीक्षा कर लें यदि ग्राही कुपात्र हैं तो यह दान कदापि नहीं करना चाहिए ॥ कारण की ऐसे कुदान से जीवन-संकट उत्पन्न हो सकता है ॥ अपने अपने राष्ट्र में पशु-पक्षियों की संख्या से भी अवगत रहें, यह पारिस्थतिक संतुलन के लिए परम आवश्यक है ॥
स्वाँग भरे साधौ के, खडे दुआरी चौर ।१५०१ ।
भावार्थ : -- स्वामी की भक्ति को छोड़ कर बाकी सारे सौ ठो काम करते हैँ । ये सज्जनता का स्वांग भरे हुवे वास्तव मेँ चोर हैँ, जो तेरी द्वारि पर खड़े हैं ॥
काम चोर पूजन करे, आरती दिए उतार ।
सील साधना साध के, धारे जोगाधार ।१५०२।
भावार्थ : -- काम चोर पूजा करते है, आरितियाँ उतारते है । कर्मशील, कर्म की साधना करके अपनी सफलता का मार्ग प्रसस्त करते हैं ॥
हरि हरि हरि हरिअरि ररत, अरि अरि हरिअ न होत ।
हरि हरि परिहरि बिअ बिअत, हरिअरि हरिअरि जोत ।१५०३।
भावार्थ : -- हे री ! हरि हरि गाने से हरीयाली नहिं होती । हरि हरि गाना छोड़ पहले खेत जोत, उसमें बीज बो फ़िर धीरे-धीरे हरियाली छाएगी ॥
दीपक अरु खद्योत के, सुहा गहन तम माहि ।
ऐसेउ खल के छ्ल छबि, तमगुन के सो लाहि।१५०४ ।
भावार्थ : - दीपक और जुगनू की शोभा गहनतम अँधेरे से ही है ॥ ऐसे ही दुष्ट जनों की बनावटी शोभा अज्ञान, आलस्य क्रोधादि अवगुणों से ही है ॥
तमोगुन गहें कौतुकी, खेल करे खद्योत ॥
दिए बिगाड़े सकल खेल, सूर उदय जब होत। १५०५।
भावार्थ : -- तामसी गुणों ग्रहण कर जुगनू खेल-तमाशे करता रहता है ।जब सूर्य उदय होता है तब उसके सारा खेल बिगाड़ देता है ॥
तमोहर तम हरन कर, भरे जगत उजियार ।
लोचन पलकन ढाँप लिए, कहै अजहुँ अँधियार ।१५०६।
भावार्थ : -- तामसी गुण हरण कर तमसहारी ने अंधेरेजगत मेँ उजाला भर दिया ॥ जिसने अपने नेत्रों को पलकों से आच्छादित किया हुवा है उसके अनुसार अभी अन्धेरा है ॥
प्यासे मुख को जल दे, भूखे असन प्रदाएँ ।
निर्बसनी को बसन दे, मति हिन को मत दाएँ ।१५०७।
भावार्थ : -- प्यासे को जल दें भोजन नहिं, भूखी को भोजन दें । वस्त्रहीन को वस्त्र दें, बुद्धिहीन को सदबुद्धि देँ मत-सम्मत नहीं ॥
अर्थात : -- "जिसको जिसकी आवश्यकता है, उसको वही वस्तु दान करें"
जेतक माँहि पेट भरे, ततख तव अधिकार ।
भरत अकण्ठ बमन करे, कह तिन भ्रष्टा चार ।१५०८।
भावार्थ : -- जितने में तुम्हारी आधार भूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके तुम्हारा उतने पर ही अधिकार है । यदि कोई इससे अधिक के लिए अधिकृत है वह भृष्टाचारी है । जिसने आकंठ भर लिया है, और उल्टियाँ कर रहा है सर्वप्रथम वही दंड का अधिकारी है ॥
टिप्पणी : -- सारे भारतीय ही भ्रष्टाचारी हैं, तो इस देश को कारावास काहे नहीं बना देते, कारावास को देश बनाए देते हैँ ॥ ये नेता लोगन जो है, अरे वही जो स्वयं को दूधवा के धुले कहते हैं ,देश इन्हेँ सौँप देते हैँ, जो है ।
जन जन को भरमाइ के, सेवक बने अधीस ।
खावे खेत पियें नदी, बुझि न भूख अरु तीस ।१५०९ ।
भावार्थ : -- भारतीय जनता को भ्रमित करते हुवे स्वयं को सेवक कहकर भारत की सत्ता पाने वाले, राजा बन बैठे । ये भारत के पूरे खेत खा गए, नदी की नदी पी गए फ़िर भी इनकी भूख औऱ प्यास नहीँ मिटी ।।
औषध बासन जल अन्न, जेन केन कर दात ।
मत दायन मैं भल भॉंति, परखो पात कुपात ।१५१०।
भावार्थ : -- औषधि वस्त्र जल आन आदि जीवन के साधन आवश्यकता के आधार पर दाय । इसमे पात्र विचार नहीं करना चाहिए । किन्तु में सुपात्र एवम कुपात्र की भली प्रकार से परीक्षा कर लें यदि ग्राही कुपात्र हैं तो यह दान कदापि नहीं करना चाहिए ॥ कारण की ऐसे कुदान से जीवन-संकट उत्पन्न हो सकता है ॥ अपने अपने राष्ट्र में पशु-पक्षियों की संख्या से भी अवगत रहें, यह पारिस्थतिक संतुलन के लिए परम आवश्यक है ॥
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