गुरुवार, 8 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५० ॥ -----

स्वामिन की भगति छाँड़, कार करे सौ औऱ । 
स्वाँग भरे साधौ के, खडे दुआरी चौर ।१५०१ । 
भावार्थ : -- स्वामी की भक्ति को छोड़ कर बाकी सारे सौ ठो काम करते हैँ । ये सज्जनता का स्वांग भरे हुवे वास्तव मेँ चोर हैँ, जो तेरी द्वारि पर खड़े हैं ॥

काम चोर पूजन करे, आरती दिए उतार । 
सील साधना साध के, धारे जोगाधार ।१५०२। 
भावार्थ : -- काम चोर पूजा करते है, आरितियाँ उतारते है । कर्मशील, कर्म की साधना करके अपनी सफलता का मार्ग प्रसस्त करते हैं ॥

हरि हरि हरि हरिअरि ररत, अरि अरि हरिअ न होत । 
हरि हरि परिहरि बिअ बिअत, हरिअरि हरिअरि जोत ।१५०३। 
भावार्थ : -- हे री ! हरि हरि गाने से हरीयाली नहिं होती । हरि हरि गाना छोड़ पहले खेत जोत, उसमें बीज बो फ़िर धीरे-धीरे हरियाली छाएगी ॥

दीपक अरु खद्योत के, सुहा गहन तम माहि ।
ऐसेउ खल के छ्ल छबि, तमगुन के सो लाहि।१५०४ । 
भावार्थ : - दीपक और जुगनू की शोभा गहनतम अँधेरे से ही  है ॥ ऐसे ही दुष्ट जनों की बनावटी शोभा अज्ञान, आलस्य  क्रोधादि अवगुणों से ही है ॥

 तमोगुन गहें कौतुकी, खेल करे खद्योत ॥
 दिए बिगाड़े सकल खेल, सूर उदय जब होत। १५०५। 
भावार्थ : -- तामसी गुणों  ग्रहण कर जुगनू  खेल-तमाशे करता रहता है ।जब सूर्य उदय होता है तब उसके सारा खेल बिगाड़ देता है ॥

तमोहर तम हरन कर, भरे जगत उजियार । 
लोचन पलकन ढाँप लिए, कहै अजहुँ अँधियार ।१५०६। 
भावार्थ : --   तामसी गुण हरण कर तमसहारी ने अंधेरेजगत मेँ उजाला भर दिया ॥ जिसने अपने नेत्रों को पलकों से आच्छादित किया हुवा है उसके अनुसार अभी अन्धेरा है ॥

प्यासे मुख को जल दे, भूखे असन प्रदाएँ । 
निर्बसनी को बसन दे, मति हिन को मत दाएँ ।१५०७। 
भावार्थ : -- प्यासे को जल दें भोजन नहिं, भूखी को भोजन दें । वस्त्रहीन को वस्त्र दें, बुद्धिहीन को सदबुद्धि देँ मत-सम्मत नहीं ॥

अर्थात : -- "जिसको जिसकी आवश्यकता है, उसको वही वस्तु दान करें"

जेतक माँहि पेट भरे, ततख तव अधिकार । 
भरत अकण्ठ बमन करे, कह तिन भ्रष्टा चार ।१५०८। 
भावार्थ : -- जितने में तुम्हारी आधार भूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके तुम्हारा उतने पर ही अधिकार है । यदि कोई इससे अधिक के लिए अधिकृत है वह भृष्टाचारी है । जिसने आकंठ भर लिया है, और उल्टियाँ कर रहा है सर्वप्रथम वही दंड का अधिकारी है ॥

टिप्पणी : -- सारे भारतीय ही भ्रष्टाचारी हैं, तो इस देश को कारावास काहे नहीं बना देते, कारावास को देश बनाए देते हैँ ॥ ये नेता लोगन जो है, अरे वही जो स्वयं को दूधवा के धुले कहते हैं ,देश इन्हेँ सौँप देते हैँ, जो है ।

जन जन को भरमाइ के, सेवक बने अधीस । 
खावे खेत पियें नदी, बुझि न भूख अरु तीस ।१५०९ । 
भावार्थ : -- भारतीय जनता को भ्रमित करते हुवे स्वयं को सेवक कहकर भारत की सत्ता पाने वाले,  राजा बन बैठे । ये भारत के पूरे खेत खा गए, नदी की नदी पी गए फ़िर भी इनकी भूख औऱ प्यास नहीँ मिटी ।।

औषध बासन जल अन्न, जेन केन कर दात । 
मत दायन मैं भल भॉंति, परखो पात कुपात ।१५१०। 
भावार्थ : -- औषधि वस्त्र जल आन आदि जीवन के साधन आवश्यकता के आधार पर दाय । इसमे पात्र  विचार नहीं करना चाहिए । किन्तु  में सुपात्र एवम कुपात्र की भली प्रकार से परीक्षा कर लें यदि ग्राही कुपात्र हैं तो यह दान कदापि  नहीं करना चाहिए ॥  कारण की ऐसे कुदान से जीवन-संकट उत्पन्न हो सकता है ॥ अपने अपने राष्ट्र में पशु-पक्षियों की संख्या से भी अवगत रहें, यह पारिस्थतिक संतुलन के लिए परम आवश्यक है ॥   









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