जनहित हुँत मत दान लिए, बेच रहे मद राए ।
ऐसी मदमोहिनी रसन, कहु का नहि कहवाए ।१४९१।
भावार्थ : -- जनता-जनार्दन का कल्याण हेतु बने हुवे राजा ने मत का दान ग्रहण किया । और मदिरा का धंधा करते हैँ । अब ऐसी मदोन्मत्त जिह्वा कहो तो क्या नहीं कहलवा दे ।
दीनन का झोपरा जिन, अटारा दिए दिखाए ।
अटारा झोपर आपुना, कर रँह सदा भुखाए ।१४९२।
भावार्थ : -- जिन्हें दूसरों की विपन्नता, सम्पन्नता और अपनी सम्पन्नता, विपन्नता दिखतीं है । ऐसों की माया जनित क्षुधा कभी शान्त नहीं होती ॥
कोउ आपुनि जाग जगै, कोउ जगावै सूर ।
बाँगढू कहे जागा जग, बाँग दिए अरुनचूर ।१४९३।
भावार्थ : -- कोई सूर्योदय से पूर्व स्वयं जागृत हो जाता है, कोई सूर्योदय होने पर जागृत होता है । मूर्ख कव्वे कहते है, रुदथ/मुर्गे के बाँग देने से जग-जागरण होता है ॥
कुटिलता उसका है धरम , नेता जिसकी जात ।
लात पेट में मार के, करे पीठ में घात ।१४९४।
जैसेउ जमोगनी घिउ, टेढ़े करज निकसात ।
पहाड़ नीचक ऊँट अस, लाए बिनु नाहिं आत ।१४९५ ।
भावार्थ : -- जैसे जमा हुवा घृत उंगली टेढ़ी करने से ही निकलता है वैसे ही पहाङी के नीचे लाए बिना ऊँट भी नहीं आता ॥
कुंजरहु चिउँटी डीठे, बइठत उँची पीठ ।
दिरिस का कछु दोष नहीं, दोषित तेरी दीठ।१४९६ ।
भावार्थ : -- ऊँचे आसनों पर बैठ कर हाथी भी चींटीं दिखाई देता है, अन्यथा तो कहाँ हाथी कहाँ तू । इसमें दृश्य का कोई दोष नहीं है, हमारी दृष्टी दूषित है ॥
जुगौना है कि जोगना, पुनि पुनि माँगन आए ।
कौड़ी के जो जोग नहि, झोरी भर भर दाए ।१४९७।
भावार्थ : -- ये पालनहार है, रक्षक हैं, कि भिखारी हैँ रक्षित हैँ । ''जो वारंवार माँगने खड़े हो जाते हैं' । कौड़ी भर के योग्य नहीं है, और तुम इन्हेँ झोली भर भर कर दे रहे हो ॥
झूठ कंठ की तीस है, साँच कुलीनस कूल ।
झूठ बीए कंटक उगे,साँच बोए फलफूल ।१४९८ ।
भावार्थ : -- मिथ्या कंठ की प्यास है तो सत्य नदी किनारे का जल है । झूठ बोने से कंटक ही उपजेगे सत्य बौने से फलफूल ॥
गौरस गौत्सर्जन की महिमा कही न जाए ।
भिषज् जलावन सार घिउ, दूध मलाई दाय ।१४९९।
भावार्थ : -- गौ रस और गाउँ उत्सृजन् की महिमा वर्णनातीत है । यह भिषज् ईंधन, मख्खन घृत, दूध मलाई जेसे बहुंत से उत्पाद देते हैं ॥
जुगित जोग जोरन सौंह, परिहासित संवाद ।
बिलौरे कथन सार सह, महि के मिले स्वाद ।१५००।
भावार्थ : -- हास परिहास युक्त वक्तव्य जेसे दुग्ध-योग एवं दिया गया योजन है । जिसके मंथन से कथन-सार के सह आमोद-प्रमोद की मही प्राप्त होती है ॥
ऐसी मदमोहिनी रसन, कहु का नहि कहवाए ।१४९१।
भावार्थ : -- जनता-जनार्दन का कल्याण हेतु बने हुवे राजा ने मत का दान ग्रहण किया । और मदिरा का धंधा करते हैँ । अब ऐसी मदोन्मत्त जिह्वा कहो तो क्या नहीं कहलवा दे ।
दीनन का झोपरा जिन, अटारा दिए दिखाए ।
अटारा झोपर आपुना, कर रँह सदा भुखाए ।१४९२।
भावार्थ : -- जिन्हें दूसरों की विपन्नता, सम्पन्नता और अपनी सम्पन्नता, विपन्नता दिखतीं है । ऐसों की माया जनित क्षुधा कभी शान्त नहीं होती ॥
कोउ आपुनि जाग जगै, कोउ जगावै सूर ।
बाँगढू कहे जागा जग, बाँग दिए अरुनचूर ।१४९३।
भावार्थ : -- कोई सूर्योदय से पूर्व स्वयं जागृत हो जाता है, कोई सूर्योदय होने पर जागृत होता है । मूर्ख कव्वे कहते है, रुदथ/मुर्गे के बाँग देने से जग-जागरण होता है ॥
कुटिलता उसका है धरम , नेता जिसकी जात ।
लात पेट में मार के, करे पीठ में घात ।१४९४।
जैसेउ जमोगनी घिउ, टेढ़े करज निकसात ।
पहाड़ नीचक ऊँट अस, लाए बिनु नाहिं आत ।१४९५ ।
भावार्थ : -- जैसे जमा हुवा घृत उंगली टेढ़ी करने से ही निकलता है वैसे ही पहाङी के नीचे लाए बिना ऊँट भी नहीं आता ॥
कुंजरहु चिउँटी डीठे, बइठत उँची पीठ ।
दिरिस का कछु दोष नहीं, दोषित तेरी दीठ।१४९६ ।
भावार्थ : -- ऊँचे आसनों पर बैठ कर हाथी भी चींटीं दिखाई देता है, अन्यथा तो कहाँ हाथी कहाँ तू । इसमें दृश्य का कोई दोष नहीं है, हमारी दृष्टी दूषित है ॥
जुगौना है कि जोगना, पुनि पुनि माँगन आए ।
कौड़ी के जो जोग नहि, झोरी भर भर दाए ।१४९७।
भावार्थ : -- ये पालनहार है, रक्षक हैं, कि भिखारी हैँ रक्षित हैँ । ''जो वारंवार माँगने खड़े हो जाते हैं' । कौड़ी भर के योग्य नहीं है, और तुम इन्हेँ झोली भर भर कर दे रहे हो ॥
झूठ कंठ की तीस है, साँच कुलीनस कूल ।
झूठ बीए कंटक उगे,साँच बोए फलफूल ।१४९८ ।
भावार्थ : -- मिथ्या कंठ की प्यास है तो सत्य नदी किनारे का जल है । झूठ बोने से कंटक ही उपजेगे सत्य बौने से फलफूल ॥
गौरस गौत्सर्जन की महिमा कही न जाए ।
भिषज् जलावन सार घिउ, दूध मलाई दाय ।१४९९।
भावार्थ : -- गौ रस और गाउँ उत्सृजन् की महिमा वर्णनातीत है । यह भिषज् ईंधन, मख्खन घृत, दूध मलाई जेसे बहुंत से उत्पाद देते हैं ॥
जुगित जोग जोरन सौंह, परिहासित संवाद ।
बिलौरे कथन सार सह, महि के मिले स्वाद ।१५००।
भावार्थ : -- हास परिहास युक्त वक्तव्य जेसे दुग्ध-योग एवं दिया गया योजन है । जिसके मंथन से कथन-सार के सह आमोद-प्रमोद की मही प्राप्त होती है ॥
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