मंगलवार, 6 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४९ ॥ -----

जनहित हुँत मत दान लिए, बेच रहे मद राए । 
ऐसी मदमोहिनी रसन, कहु का नहि कहवाए ।१४९१। 
भावार्थ : -- जनता-जनार्दन का कल्याण हेतु बने हुवे राजा ने मत का दान ग्रहण किया ।  और मदिरा का धंधा करते हैँ । अब ऐसी मदोन्मत्त जिह्वा कहो तो क्या नहीं कहलवा दे ।

दीनन का झोपरा जिन, अटारा दिए दिखाए ।
अटारा झोपर आपुना, कर रँह सदा भुखाए ।१४९२।  
भावार्थ : -- जिन्हें दूसरों की विपन्नता, सम्पन्नता और अपनी सम्पन्नता, विपन्नता दिखतीं है ।  ऐसों की माया जनित क्षुधा कभी शान्त नहीं होती ॥

कोउ आपुनि जाग जगै, कोउ जगावै सूर । 
बाँगढू कहे जागा जग, बाँग दिए अरुनचूर ।१४९३। 
भावार्थ : -- कोई सूर्योदय से पूर्व स्वयं जागृत हो जाता है, कोई सूर्योदय होने पर जागृत होता है । मूर्ख कव्वे   कहते है, रुदथ/मुर्गे के बाँग देने से जग-जागरण होता है ॥

कुटिलता उसका है धरम , नेता जिसकी जात । 
लात पेट में मार के, करे पीठ में घात ।१४९४।   


जैसेउ जमोगनी घिउ, टेढ़े करज निकसात । 
पहाड़ नीचक ऊँट अस, लाए बिनु नाहिं आत ।१४९५ । 
भावार्थ : -- जैसे जमा हुवा घृत उंगली टेढ़ी करने से ही निकलता है वैसे ही  पहाङी के नीचे लाए बिना ऊँट भी नहीं आता ॥ 


कुंजरहु चिउँटी डीठे, बइठत उँची पीठ । 
दिरिस का कछु दोष नहीं, दोषित तेरी दीठ।१४९६ ।  
भावार्थ : -- ऊँचे आसनों पर बैठ कर हाथी भी चींटीं दिखाई देता है, अन्यथा तो कहाँ हाथी कहाँ तू ।  इसमें दृश्य का कोई दोष नहीं है, हमारी दृष्टी दूषित है ॥

जुगौना है कि जोगना, पुनि पुनि माँगन आए । 
कौड़ी के जो जोग नहि, झोरी भर भर दाए ।१४९७। 
भावार्थ : -- ये पालनहार है, रक्षक हैं, कि भिखारी हैँ रक्षित हैँ । ''जो वारंवार माँगने खड़े हो जाते हैं' । कौड़ी भर के योग्य नहीं है, और तुम इन्हेँ झोली भर भर कर दे रहे हो ॥  


झूठ कंठ की तीस है, साँच कुलीनस कूल । 
झूठ  बीए कंटक उगे,साँच बोए फलफूल ।१४९८ । 
भावार्थ : -- मिथ्या कंठ की प्यास है तो सत्य नदी किनारे का जल है । झूठ बोने से कंटक ही उपजेगे सत्य बौने से फलफूल ॥ 


गौरस गौत्सर्जन की महिमा कही न जाए ।
भिषज् जलावन सार घिउ, दूध मलाई दाय ।१४९९।  
भावार्थ : -- गौ रस और गाउँ उत्सृजन् की महिमा वर्णनातीत है । यह भिषज् ईंधन, मख्खन घृत, दूध मलाई जेसे बहुंत से उत्पाद देते हैं ॥

जुगित जोग जोरन सौंह, परिहासित संवाद ।
बिलौरे कथन सार सह, महि के मिले स्वाद ।१५००।
भावार्थ : -- हास परिहास युक्त वक्तव्य जेसे दुग्ध-योग एवं दिया गया योजन है । जिसके मंथन से कथन-सार के सह आमोद-प्रमोद की मही प्राप्त होती है ॥

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...