सीवॉं कूँ सैनी रखै, सैनी कूँ सैनैस ।
सद्चरित दुहु नैंन रखे, होत सुरक्छित देस ।१४८१ ।
भावार्थ : -- सीमा को सैनिक रक्षे । सैनिक को सेनापति । दोनों के नैनों में सद्चरित्र बसा हो, तब कोई देश सुरक्षीत होता है ॥
सज्जन को सेवक मिले, सेवक कू सनमान ।
मानहु के त्याग सोंह, होत जगत कल्यान ।१४८२।
भावार्थ : -- सज्जनता को ही सेवक मिलना चाहिए । सेवक को सम्मान मिलना चाहिए ॥ जो इस सम्मान का भी त्याग करे, उस त्याग से ही समस्त जगत का कल्याण सम्भव है ॥
सँमली है कि धवली है, है भारी कि सुडोल ।
पापा जी धणी हो तो देखे कौण कपोल ।१४८३।
भावार्थ : -- पहले का समय और था जब बड़े-बूढ़े कुटुम देखा करते थे,उसकी विरदावली देखा करते थे, कुटुम के सत्कृत्य देखते थे,गोधन, भूधन देखते थे और कन्या को देखे बिना ही संबंध स्वीकार कर लेते थे । फिर कन्या देखने वाला समय आया । अब तो समय ही ऐसा दिखावे वाला आ गया जी, सवलाई है कि मलमलाई है कि माड़ी है कि ठाड्डी है । पापा जी धनी हो तो छोरी के गाल कोई ना देखे, पैसा वसूल है तो जो है कबूल है॥
सौजन सुजनता से तो आग फूस का बैर ।
रायाजी देस बहार, फिरता मारे पैर ।१४८४।
भावार्थ : -- तेरे इस राजा जी का सज्जनता, उदारशय, भलमनसाही, भद्रता से तो आग और फूस जैसा वैर है औऱ देस छोड़ के बाहर पैर मारे फिर रहा हे ।
देसाधीस धँसाए दिए, जगां चोरि की लाग ।
अन्न रतन के भाउ किए, ल्गा आग मेँ आग ।१४८५।
भावार्थ : -- देस को इन बने हुवे अधीशों ने डुबो दिया डाका-चोरी की इन्हें लत पडी हुई है ॥ अन्न को इन्होंने रत्नों के भाव कर दिया पकाने की आग में आग लगा दी । खादन महंगा हो तो सत्ता सस्ते मेँ मिलती है, क्यों ?
रचे सलौने स्याम के, मंदर मनि गच ढार ।
गरुअन तो भूखी मरे, बैठे प्रभो बहार ।१४८६।
भावार्थ : -- मणियों से खचित कर श्याम सलौने के मन्दिर रचे जा रहे हैं ।किन्तु गौवें तो भूखी मर रही है, वहां भगवान कहाँ हैँ वे तो उन मन्दिरोँ के बाहर बैठे हैं ॥ फिर पूजा किसकी ?
पास देस में छुरी धर जपत राम का नाम ।
जमुना गए जमुना दास, गंगा गंगा राम ।१४८७।
भावार्थ : -- पार्श्व देश में छुरी रखे हैं राम का नाम जपते, जमुना गए जमुना दास गंगा 'गंगाराम' ॥
बिधाता जब जनम जुगाए, गिनकर दय उर साँस ।
धरे जोगवना जब लग, सबकुछ तेरे पास ।१४८७।
भावार्थ : -- जन्मदाता ने जब जन्म का संयोग किया, तब हृदय को गिन कर ही सांस दी थी। जब तक यह संकलित रहेगी तब तक तेरे पास सबकुछ है, इसके टूट जाने के पश्चात तेरे पास कुछ नहीं होगा ॥
काया जोगन में रहै, आया ना कछु काम ।
माया वाकी एहि रही, रहे न माया राम ।१४८८।
भावार्थ : -- जो केवल काया का पालन-पोषण करने में ही अनुरक्त रहा, किसी के कुछ काम नहीं आया । कल वे माया राम नहीं रहे..... हाँ उसकी माया यहीं रह गई ॥
जाका नाउहि काल है, वाका कवन भरोस ।
जीवन जोगन छाँड़ि के, रह अपने संतोस ।१४८९।
भावार्थ : -- जिसका नाम ही काल है, समय है, मृत्यु है, कलुषता है, अवसर है, उसका क्या भरोसा न जाने कब उससे भेंट हो जाए । एतएव जीवन-साधन का संचय क परित्याग कर, और अपने संतोष में ही रह ॥
सीधी सीधी बात है, उलटा वाका पौन ।
चाकर राज नीति करे, करे चाकरी कौन ।१४९०।
भावार्थ : -- सीधी सी बात है इनके सारे पंखें उलटे है । यदि चाकर राजनीति करेगा तो चाकरी कौन करेगा, राजा/सुवामी करेगा ? क्यों उद्योग जगत ?
सद्चरित दुहु नैंन रखे, होत सुरक्छित देस ।१४८१ ।
भावार्थ : -- सीमा को सैनिक रक्षे । सैनिक को सेनापति । दोनों के नैनों में सद्चरित्र बसा हो, तब कोई देश सुरक्षीत होता है ॥
सज्जन को सेवक मिले, सेवक कू सनमान ।
मानहु के त्याग सोंह, होत जगत कल्यान ।१४८२।
भावार्थ : -- सज्जनता को ही सेवक मिलना चाहिए । सेवक को सम्मान मिलना चाहिए ॥ जो इस सम्मान का भी त्याग करे, उस त्याग से ही समस्त जगत का कल्याण सम्भव है ॥
सँमली है कि धवली है, है भारी कि सुडोल ।
पापा जी धणी हो तो देखे कौण कपोल ।१४८३।
भावार्थ : -- पहले का समय और था जब बड़े-बूढ़े कुटुम देखा करते थे,उसकी विरदावली देखा करते थे, कुटुम के सत्कृत्य देखते थे,गोधन, भूधन देखते थे और कन्या को देखे बिना ही संबंध स्वीकार कर लेते थे । फिर कन्या देखने वाला समय आया । अब तो समय ही ऐसा दिखावे वाला आ गया जी, सवलाई है कि मलमलाई है कि माड़ी है कि ठाड्डी है । पापा जी धनी हो तो छोरी के गाल कोई ना देखे, पैसा वसूल है तो जो है कबूल है॥
सौजन सुजनता से तो आग फूस का बैर ।
रायाजी देस बहार, फिरता मारे पैर ।१४८४।
भावार्थ : -- तेरे इस राजा जी का सज्जनता, उदारशय, भलमनसाही, भद्रता से तो आग और फूस जैसा वैर है औऱ देस छोड़ के बाहर पैर मारे फिर रहा हे ।
देसाधीस धँसाए दिए, जगां चोरि की लाग ।
अन्न रतन के भाउ किए, ल्गा आग मेँ आग ।१४८५।
भावार्थ : -- देस को इन बने हुवे अधीशों ने डुबो दिया डाका-चोरी की इन्हें लत पडी हुई है ॥ अन्न को इन्होंने रत्नों के भाव कर दिया पकाने की आग में आग लगा दी । खादन महंगा हो तो सत्ता सस्ते मेँ मिलती है, क्यों ?
रचे सलौने स्याम के, मंदर मनि गच ढार ।
गरुअन तो भूखी मरे, बैठे प्रभो बहार ।१४८६।
भावार्थ : -- मणियों से खचित कर श्याम सलौने के मन्दिर रचे जा रहे हैं ।किन्तु गौवें तो भूखी मर रही है, वहां भगवान कहाँ हैँ वे तो उन मन्दिरोँ के बाहर बैठे हैं ॥ फिर पूजा किसकी ?
पास देस में छुरी धर जपत राम का नाम ।
जमुना गए जमुना दास, गंगा गंगा राम ।१४८७।
भावार्थ : -- पार्श्व देश में छुरी रखे हैं राम का नाम जपते, जमुना गए जमुना दास गंगा 'गंगाराम' ॥
बिधाता जब जनम जुगाए, गिनकर दय उर साँस ।
धरे जोगवना जब लग, सबकुछ तेरे पास ।१४८७।
भावार्थ : -- जन्मदाता ने जब जन्म का संयोग किया, तब हृदय को गिन कर ही सांस दी थी। जब तक यह संकलित रहेगी तब तक तेरे पास सबकुछ है, इसके टूट जाने के पश्चात तेरे पास कुछ नहीं होगा ॥
काया जोगन में रहै, आया ना कछु काम ।
माया वाकी एहि रही, रहे न माया राम ।१४८८।
भावार्थ : -- जो केवल काया का पालन-पोषण करने में ही अनुरक्त रहा, किसी के कुछ काम नहीं आया । कल वे माया राम नहीं रहे..... हाँ उसकी माया यहीं रह गई ॥
जाका नाउहि काल है, वाका कवन भरोस ।
जीवन जोगन छाँड़ि के, रह अपने संतोस ।१४८९।
भावार्थ : -- जिसका नाम ही काल है, समय है, मृत्यु है, कलुषता है, अवसर है, उसका क्या भरोसा न जाने कब उससे भेंट हो जाए । एतएव जीवन-साधन का संचय क परित्याग कर, और अपने संतोष में ही रह ॥
सीधी सीधी बात है, उलटा वाका पौन ।
चाकर राज नीति करे, करे चाकरी कौन ।१४९०।
भावार्थ : -- सीधी सी बात है इनके सारे पंखें उलटे है । यदि चाकर राजनीति करेगा तो चाकरी कौन करेगा, राजा/सुवामी करेगा ? क्यों उद्योग जगत ?
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