चार तराजू तौल ले, धर अनहित के भार ।
जग जन हित को कृत करे, बहुतै करें बिचार। १५६१ ।
भावार्थ : -- पहले अनहित के बटखड़े रखकर किसी बात को भली भाँती परख लें । यदि कोई कार्य जनहित के सह जगत के हित का हो तो उसे बहुत सोच-विचार कर करना चाहिए ।
नियंता नव नेम रचे, जो अपनी प्रत्यास ।
होवनिहार समउ बने, वाके गल का पास ।१५६२ ।
भावार्थ : -- नियंता यदि अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु, अपनी महत्वाकांक्षाओं के वशीभूत होकर किसी नए नियम की रचना करता है अथवा नियमों को परिवर्तित करता है । तब आने वाले समय वह नियम उसी के गले का पाश बन जाते हैं ॥
ते नृप भारत भारती, भूले ना लवलेस ।
जो जनम लिए महि आपनि, प्रान दाए परदेस ।१५६३।
भावार्थ : -- भारत के, भारतीयों के चित्त से वह राजा विस्मृत नहीं होना चाहिए जिसने जन्म तो लिया अपनी भूमि में और प्राण दान दिया पराई भूमि में ॥
एकै पदक अपदस्थ सों तो जे दुर्गत होइ ।
सोइ गति सोच रे भगत, जब देही कर खोइ ।१५६४।
भावार्थ : -- एक पदक से अपदस्थ होकर यह दुर्गति हो गई । भारत शासन की प्रिय वाहन संस्था का रथ गया,प्रासाद गया और पेट भर कर निंदा हुई । जब यह शरीर हाथ से जाएगा हे भक्त ! उस गति क विषय में विचार कर ॥
"क्या भारत शासन को किसी निजी वाहन संस्था का प्रचार करना चाहिए ?"
सासक जोग जुगत करे, जीव करे संतोष ।
जीवाधान राख रखे, भरे रहे धन कोष ।१५६५।
भावार्थ : -- किसी राष्ट्र का शासक (लोकतांत्रिक राष्ट्र में लोकसेवक ) यदि जीवन के आधार भूत साधनों को संचित रखते हुवे उसकी उपलब्धता हेतु उत्तम उपाय करे और जीव-जगत संतोष करे तब उस राष्ट्र के भण्डार भरे रहते हैं ॥
दीनता दावानल सम, धनता सिंधु समान ।
बरख बुझावै जो अनल , सो सासक घन मान ।१५६६।
भावार्थ : -- किसी राष्ट्र की निर्धनता दावाग्नि के सदृश्य होती है ( यहां निर्धनता का अर्थ व्यापक है, जिसे धन की कामना है वह निर्धन है ) एवं सम्पन्नता ( जिसे धन की कामना न हो वह संपन्न है ) सिंधु के समान है । जो शासक इस दावाग्नि का शमन करने में समर्थ शासन सूर्यताप एवं संचायक समूह मेघ के सदृश्य होता है ।
टिप्पणी : -- "भारत अकाल ग्रस्त क्षेत्र है"
ग्यान गुन परिहार कै, धन को दे जो मान ।
जग हेराए मिले नहीं, वासों को मुरखान ।१५६७।
भावार्थ : -- ज्ञान एवं गुणों का त्याग कर जो धन को ही सन्मानित करते हैं । संसार भर में ढूंढ लिया, उन जैसा कोई मूर्ख नहीं मिला ॥
बचन बेष का जानिए, मन मलीन नर नारि ।
सुपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख बिचारि ॥
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ -- ‘वाणी और वेश से किसी मन के मैले स्त्री या पुरुष को जानना संभव नहीं है। शूर्पणखा, मारीचि, रावण और पूतना ने सुंदर वेश धरे थे किन्तु उनका मन छल एवं कपटके मलिन वस्त्रों से ढका था ।’’
संचित धन सों जी जुगे, सो तो भा उत्खात ।
जग अर्जन उत्पन्न करे, सोइ सकल उत्पाद ।१५६८।
भावार्थ : -- ऊर्जा से ही कोई काया संचालित होती है, ऊर्जा से ही कोई जनतंत्र गतिमान रहता है ।यदि संचित धन-संपत्ति से जीवन यापन किया जाए तो वह संचित धन उत्पाद नहीं उत्खात कहलाता है, उत्पाद नहीं । श्रम शील होकर हम जीवन-धन को उपजाएँ, वही सकल घरेलू उत्पाद कहलाता है ॥
अर्थात : -- यदि घर में संचित धन को बेचकर वैभव दर्शाया जाए तो वह घर खोद कर विलास करना कहलाएगा। आजीविका कमानी चाहिए उत्पन्न करनी चाहिए
ऊर्जा के उत्पादन स्त्रोत हैं : - सौर-ऊर्जा, पवन-ऊर्जा, अन्न जिसे हमें उपजाना चाहिए । खोद खोद कर खाना नहीं चाहिए ।
बाप-दादाओं की छोड़ी हुई संपत्ति भी बिना कमाई के समाप्त हो जाती है, चाहे कोई केतना बढ़ा सामंत/जमीदार क्यों न हो.....
धूप धूपत ताप तपत, छाया के सुख जान ।
चार कोस चर तिसत मर, जानौ जल के दान ।१५६९।
भावार्थ : -- अनुकूलित वातावरण का परित्याग कर धूप में धूपो ताप में तपो तब जानों कि छाया का सुख क्या होता है । बहुमूल्य वाहनों से बाहर आकर चार कोस चल कर देखो फिर जल-दान का महत्व समझ में आएगा ।
कन रतन भए रुगनित तन, प्रदूषित भई बात ।
खुदै खनिज तहँ होत है, बिकल अंग नवजात ।१५७०।
भावार्थ : -- अन्न-कण रत्न हो जाते हैं, शरीर रुग्णित हो वायुमंडल प्रदूषित हो जाता है । जिस स्थान पर खनिज-उत्खात वहां के नवजात विकलांग हो रहे हैं ॥ अर्थात वह क्षेत्र गैस से पीड़ित भोपाल है ॥
जग जन हित को कृत करे, बहुतै करें बिचार। १५६१ ।
भावार्थ : -- पहले अनहित के बटखड़े रखकर किसी बात को भली भाँती परख लें । यदि कोई कार्य जनहित के सह जगत के हित का हो तो उसे बहुत सोच-विचार कर करना चाहिए ।
नियंता नव नेम रचे, जो अपनी प्रत्यास ।
होवनिहार समउ बने, वाके गल का पास ।१५६२ ।
भावार्थ : -- नियंता यदि अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु, अपनी महत्वाकांक्षाओं के वशीभूत होकर किसी नए नियम की रचना करता है अथवा नियमों को परिवर्तित करता है । तब आने वाले समय वह नियम उसी के गले का पाश बन जाते हैं ॥
ते नृप भारत भारती, भूले ना लवलेस ।
जो जनम लिए महि आपनि, प्रान दाए परदेस ।१५६३।
भावार्थ : -- भारत के, भारतीयों के चित्त से वह राजा विस्मृत नहीं होना चाहिए जिसने जन्म तो लिया अपनी भूमि में और प्राण दान दिया पराई भूमि में ॥
एकै पदक अपदस्थ सों तो जे दुर्गत होइ ।
सोइ गति सोच रे भगत, जब देही कर खोइ ।१५६४।
भावार्थ : -- एक पदक से अपदस्थ होकर यह दुर्गति हो गई । भारत शासन की प्रिय वाहन संस्था का रथ गया,प्रासाद गया और पेट भर कर निंदा हुई । जब यह शरीर हाथ से जाएगा हे भक्त ! उस गति क विषय में विचार कर ॥
"क्या भारत शासन को किसी निजी वाहन संस्था का प्रचार करना चाहिए ?"
सासक जोग जुगत करे, जीव करे संतोष ।
जीवाधान राख रखे, भरे रहे धन कोष ।१५६५।
भावार्थ : -- किसी राष्ट्र का शासक (लोकतांत्रिक राष्ट्र में लोकसेवक ) यदि जीवन के आधार भूत साधनों को संचित रखते हुवे उसकी उपलब्धता हेतु उत्तम उपाय करे और जीव-जगत संतोष करे तब उस राष्ट्र के भण्डार भरे रहते हैं ॥
दीनता दावानल सम, धनता सिंधु समान ।
बरख बुझावै जो अनल , सो सासक घन मान ।१५६६।
भावार्थ : -- किसी राष्ट्र की निर्धनता दावाग्नि के सदृश्य होती है ( यहां निर्धनता का अर्थ व्यापक है, जिसे धन की कामना है वह निर्धन है ) एवं सम्पन्नता ( जिसे धन की कामना न हो वह संपन्न है ) सिंधु के समान है । जो शासक इस दावाग्नि का शमन करने में समर्थ शासन सूर्यताप एवं संचायक समूह मेघ के सदृश्य होता है ।
टिप्पणी : -- "भारत अकाल ग्रस्त क्षेत्र है"
ग्यान गुन परिहार कै, धन को दे जो मान ।
जग हेराए मिले नहीं, वासों को मुरखान ।१५६७।
भावार्थ : -- ज्ञान एवं गुणों का त्याग कर जो धन को ही सन्मानित करते हैं । संसार भर में ढूंढ लिया, उन जैसा कोई मूर्ख नहीं मिला ॥
बचन बेष का जानिए, मन मलीन नर नारि ।
सुपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख बिचारि ॥
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ -- ‘वाणी और वेश से किसी मन के मैले स्त्री या पुरुष को जानना संभव नहीं है। शूर्पणखा, मारीचि, रावण और पूतना ने सुंदर वेश धरे थे किन्तु उनका मन छल एवं कपटके मलिन वस्त्रों से ढका था ।’’
संचित धन सों जी जुगे, सो तो भा उत्खात ।
जग अर्जन उत्पन्न करे, सोइ सकल उत्पाद ।१५६८।
भावार्थ : -- ऊर्जा से ही कोई काया संचालित होती है, ऊर्जा से ही कोई जनतंत्र गतिमान रहता है ।यदि संचित धन-संपत्ति से जीवन यापन किया जाए तो वह संचित धन उत्पाद नहीं उत्खात कहलाता है, उत्पाद नहीं । श्रम शील होकर हम जीवन-धन को उपजाएँ, वही सकल घरेलू उत्पाद कहलाता है ॥
अर्थात : -- यदि घर में संचित धन को बेचकर वैभव दर्शाया जाए तो वह घर खोद कर विलास करना कहलाएगा। आजीविका कमानी चाहिए उत्पन्न करनी चाहिए
ऊर्जा के उत्पादन स्त्रोत हैं : - सौर-ऊर्जा, पवन-ऊर्जा, अन्न जिसे हमें उपजाना चाहिए । खोद खोद कर खाना नहीं चाहिए ।
बाप-दादाओं की छोड़ी हुई संपत्ति भी बिना कमाई के समाप्त हो जाती है, चाहे कोई केतना बढ़ा सामंत/जमीदार क्यों न हो.....
धूप धूपत ताप तपत, छाया के सुख जान ।
चार कोस चर तिसत मर, जानौ जल के दान ।१५६९।
भावार्थ : -- अनुकूलित वातावरण का परित्याग कर धूप में धूपो ताप में तपो तब जानों कि छाया का सुख क्या होता है । बहुमूल्य वाहनों से बाहर आकर चार कोस चल कर देखो फिर जल-दान का महत्व समझ में आएगा ।
कन रतन भए रुगनित तन, प्रदूषित भई बात ।
खुदै खनिज तहँ होत है, बिकल अंग नवजात ।१५७०।
भावार्थ : -- अन्न-कण रत्न हो जाते हैं, शरीर रुग्णित हो वायुमंडल प्रदूषित हो जाता है । जिस स्थान पर खनिज-उत्खात वहां के नवजात विकलांग हो रहे हैं ॥ अर्थात वह क्षेत्र गैस से पीड़ित भोपाल है ॥
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