सोमवार, 26 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५५॥ -----

भावाभिव्यंजन हेतु, भाषा साधन रूप । 
वाके राख रखे जोइ, साधत सतत सरूप ।१५५१। 
भावार्थ : -- भाषा भावों की अभिव्यक्ति हेतु साधन मात्र है । उस  उपकरण को संजो कर रखना चाहिए जो भावाभिव्यक्ति को सतत स्वरूप में कुशलता पूर्वक साधता हो ॥ 

भाषन बर साधन बरे , होत न को भल नाहि । 
हो भावक जब भावना, होवत भलमन साहि ।१५५२। 
भावार्थ : -- अभिव्यक्ति हेतु  उत्तम उपकरण के चयन कर लेने मात्र से ही कोई सज्जन नहीं हो जाता । जब ध्यान-चिंतन,निमित्त-कारण कथन-निर्धारण,परिकल्पं श्रेष्ठ होने से ही कोई श्रेष्ठि होता है ॥ 

अर्थात : -- श्रेष्ठ उपकरण से ही कार्य सिद्ध नहीं हो जाता, श्रेष्ठ उत्पादन भी होना चाहिए  ॥ 

भालु करे बर मंत्रना, कपि कारए बर काज । 
जटायु पैह बर गति अस रहे राम के राज ।१५५३। 
भावार्थ : -- मनुष्य की तो बात ही क्या जहां भालू श्रेष्ठ मंत्रणाएं करते थे, बन्दर बड़े बड़े कार्य सिद्ध कर देते थे ( प्रमाण है ) गीद्ध वीर गति को प्राप्त होते थे ऐसा था राम का राज ॥  

राम राज में भालु कपि, मंत्री बन दिए मंत्र । 
अजहुँ सबइ बिपरीत भए, जे कास सासन तंत्र ।१५५४। 
भावार्थ : -- राम-राज में भालू और कपि मंत्री हुवा करते थे । अर्थात भगवान के भाव ने पशुओं को भी मनुष्य बना दिया अपने सदृश्य पूज्यनीय कर दिया ॥ अद्यावधि ये कैसा शासन तंत्र हैं की जहां मनुष्य, भालु रीछ गिद्ध प्रवित्ति के हो गए हैं ॥ 

बेद सुर धूनी पावनी, कहे नहीं बिन हेतु । 
भगवन लंका पार गए, बँधे सिंधु मह सेतु ।१५५५।  
भावार्थ : --  वेद-शास्त्रों ने माँ गंगा को यूं ही पावन नहीं कहा वह पावन है, इसका प्रमाण है  उसका संचयित जल चिरकाल तक शुद्ध रहता है । भले आप उसे गंगा माँ मत कहिए अथवा  देवी मत कहिए । आप श्रीराम को भगवान मत कहिए किन्तु उनका चरित्र वास्तविक है सिंधु पर बंधा हुवा सेतु इसका प्रमाण है ॥ 

क्रोधागन द्योत दहन  , माया के दुइ रूप । 
असत संग आसुरी है, न तरु देई सरूप ।१५५६। 
भावार्थ : -- क्रोध की अग्नि हो चाहे वह सुरुया की अग्नि हो चाहे केवल अग्नि हो वही द्विरूपी माया है । यदि असत्य के साथ है, तो वह आसुरी  है अन्यथा  दैवी स्वरूप है 

जैसे : -- दावाग्नि आसुरी प्रकृति की है हव्यवाहन देवी है । न्याय के विरुद्ध की क्रोधाग्नि आसुरी है अन्याय के विरुद्ध देवी है । पौध प्रस्फुरित करे तो वह सौर्याग्नि देवी है नष्ट करे तो आसुरी है ॥ 

संस्कार संस्कृति जो , देस रूप सिँगार । 
साहित्य संगीत कला, कंकण किंकनि हार ।१५५७ । 
भावार्थ : --सस्कार एवं सस्कृति यदि किसी राष्ट्र के रूप -श्रृंगार हैं तो साहित्य, संगीत एवं कला उसके आभूषण हैं ॥ 

हारनहार सोच करे, जयनहार ले सीख । 
सो संग्रामांगन में  ,सदा बिजय ही लीख।१५५८। 
भावार्थ : -- यदि हारनहार समीक्षा करे एवं जयनहार शिक्षा ले । तो जयनहार कठिनाइयों से जूझकर जीवन के मुख पृष्ठ पर सदा विजय ही उल्लखित करता है ॥ 

जेइ सोचत मुदित रहे, पदक पैह का पाए । 
सोचत जे खोए का का, बहुरत बहु पछिताए ।१५५८। 
भावार्थ : --  इस संसार में जब कोई श्रेष्ठ पदक प्राप्त होता  तब इस एक प्राप्ति पर ही हम सदा मुदित रहते हैं कि आह !! क्या पाया । किन्तु जब  इस पदक को लौटाने का समय आता है, तब यह सोच कर हम पश्चाताप करते हैं कि आह ! क्या क्या खो दिया ॥ 

  'किसी पदक के प्राप्त होने पर ऐसा पद प्राप्त करो की उस पदक के खोने पर पश्चाताप न हो.....' 

सात सिंधु में जल भरे, गन अवगण सब जोइ । 
अवगुन छाँड़ गन गाहे, हंस कहावै सोइ ।१५५९। 
भावार्थ : -- सात सिंधु में जल भरा है गुण एवं अवगुण दोनों से परिपूर्ण है। जो अवगुण को त्याग  कर केवल गुण ग्रहण करता है वही विवेकी हंस कहलाता है ।। 

सोइ सौजन आप सोंह, करे जगत उपकार । 
जो पाछे पछताए के, भूल किए स्वीकार ।१५६० । 
भावार्थ : -- वह सज्जन जगत के सह स्वयं को भी उदारता पूर्वक उपकृत करता है, जो अपनी त्रुटियाँ स्वीकार कर बाद में उसका पश्चाताप करे ॥   




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