शुक्रवार, 23 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५४॥ -----,

निरखत नौबत आपनी, बहुत करे अभिमान । 
आवै सबहि गर्भ पंथ, जावै सों समसान ।१५४१। 
भावार्थ : --अपने तन की शोभा, धन की शोभा, उपबन की शोभा को देख देख कर बहुंत अभिमान करता है । आते तो सभी गर्भ के द्वार से है और जाते श्मशान से ही हैं कोई श्मशान से आए और गर्भ द्वार से  जाए तो फिर अभिमान करे । 

सोना खाए मैल करे, करता फिर अभिमान । 
मैल खावे सोन करे, सोई महिमा वान।१५४२। 
भावार्थ : -- सोना खाता है मिट्टी कर देता है फिर अभिमान भी करता है  । जो मिटटी खाए सोना करे माहत्म्य उसी का है ॥ जैसे : -- पेड़-पौधे 

भावार्थ : -- पेड़ में पैसे नहीं सोना लगता है । ई होने बाला  'बि' पक्ष की कभी किसान से भेंट नहीं हुई अन्यथा वो अच्छे से समझा देता कहाँ क्या लगता है ॥ 

अजहुँ हरे कल फुर फरे, परसों फर फरियाए । 
ठिया ठौर मह आपनी, एक तरु अवसि लगाए ।१५४३।

भावार्थ : -- अभी हरे होंगे कल उसमें फूल उगेंगे परसों वह फलों से भर जाएगा । अपने निवासित स्थान पर क्वाचित्क एक  तरु अवश्य ही लगाना चाहिए ॥ 

अर्थात : -- क्वाचित्क एक विचार अवश्य ही ऐसा उपजाना चाहिए ।  जो आने वाल कालखण्ड में  नौनिहालों का मार्ग दर्शन कर सके ॥  

होए रुग्णित कोउ देस, चाहे हो कृष काइ  । 
अर्घी मुद्रा अस अबरन , जो सब दोष गुँठाए ।१५४४। 
भावार्थ : -- कोई देश कृशकाय हो अथवा रोगग्रस्त हो । बहुमूल्य ( अर्घ्य ) मुद्रा ऐसी वस्त्रावरण है जो सभी दोषों को ढक देती है ॥ 

तमो गुन ग्राम हरन हुँत, गवन दिवाकर बार । 
जे न होइ सकै तो एक, दीपक अवसि उजियार ।१५४५। 
भावार्थ : -- अज्ञान, आलस्य आदि अवगुण समूह रूपी अँधेरे का हरण करने हेतु एक सूर्य उगा कर जाना चाहिए  । यह न हो सके तो एक दीपक अवश्य ही जलाना चाहिए ॥

राजित मंदर मूरती, जदपि अहइ पाषान । 
तेरे ह्रदय भाव भरे, तो सरूप भगवान ।१५४६। 
भावार्थ : -- देवल में प्रतिस्थापित प्रतिमा यद्यपि पाषाण ही है । तेरे ह्रदय में यदि श्रद्धा है, भक्ति है तो वह भगवान का स्वरूप है ॥

दूसरे : -- सदविचार केवल शब्दों के समूह भर होते है, यदि उन्हें माना जाए तो वह सत्य का स्वरूप हो जाते है ॥

सच का अनुग्रह सरल है, कठिन है स्वीकार । 
अनुग्रहि सों स्वीकरता, होवइ अधिक उदार ।१५४७। 
भावार्थ : -- सत्य का आग्रह करना सरल है, आग्रह को स्वीकार करना कठिन है । स्वीकर्ता, सत्याग्रही से अधिक उदार होता है ॥

इंद्रिइ मिले सब रस लिए, बिषय मिले लिए भोग । 
रे मानस रे मूरखा, किए ना सद उपजोग ।१५४८। 
भावार्थ : -- इन्द्रियाँ  मिली तो रसास्वादन कर लिया । विषय मिले तो भोग लिया । अरे मानस अरे मुर्ख तूने कठिनता से प्राप्य साधनों का कोई सदुपयोग नहीं किया ॥

बहुरि बहुरि जल दाए जूँ, बीय में जागे प्रान । 
बार बार समुझाए तों, मूरख भए बिद्वान ।१५४९। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार पून: पून: जल सिक्त करने से सुषुप्त बीज अर्थात में प्राण जागृत हो अर्थता वह ज्ञान वान जाते है । उसी प्रकार वारंवार समझाने से सत्त्वप्रधान अज्ञान भी ज्ञानवान हो जाता है ।।

पयस जमोग दधिज ज्योँ मेघ मीर अनुवाद । 
राम चरित्र मानस त्योँ , रामायन संवाद ।१५५०। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार संकलित पयस् का अनुवाद दधिज है, समुद्र का अनुवाद मेघ है ।  उसी प्रकार श्री रामायण अनुवाद श्री राम चरित्र मानस  है, ऐसा विद्वानजन कहते हैं  ॥

कारण ? : -- सीता चरन चोंच हति भागा । मूढ़ मंद मति कारन कागा ॥
                    ----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----


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