बिना जोग जगाई जो, जमोगन सों समृद्ध ।
होवत सोइ भूमि देस, अलप बयस मह बृद्ध ।१५३१।
भावार्थ : -- जो राष्ट्र भूमि संचित निधि से ही समृद्धि प्रदर्शित करता हो, उन्हें उपजाता न हो । वह राष्ट्र अल्प आयु में ही वृद्ध हो जाता है ॥
''प्रति दिन की दिवाली एक दिन दिवाला निकाल देती है, समझे अमरीक्का टाइप"
पूर्व में भारत की आर्थिक समृद्धि का भेद यही था की वह अपनी समस्त निधियाँ उपजाता था एवं संचित की संभाल रखता था । कृषि उपज, वनोपज, पशु संवर्द्धन से.....
हे जन रूप जनार्दना, जग पत पालन हार ।
निर्धन को बिसारी कै, निर्धनता सिरु धार ।१५३२।
भावार्थ : -- हे जान हे जनार्दन स्वरूप हे जगत्पति चराचर के पालनहारी । आप निर्धन को सिरौधार न करें कारण कि जो धन का कामी एवं निकृष्ट माया से सम्मोहित होता है वही निर्धन होता है । अत: आप निर्धनता को सिरौधार करें निर्धन को नहीं ॥
पुहुपासीस सीस लहे, कंटक चरन गहाए ।
कृतज्ञ कंठ अवनत होत, सीस चरन परसाए ।१५३३।
भावार्थ : -- पत्र पुष्प आशीष आदि उत्तम पदार्थ शीश पर ही धार्य हैं । कंटक, बाधाएं आदि निकृष्ट पदार्थ चरण को प्राप्त होती हैं । उपकृत कंठ अवनत होकर शीश को चरण का स्पर्श कराता है ॥
देस काइ कलेबर दिए , नगस्थि नदि नद नारि ।
पयस रुधिरू पयोधि ह्रदय , आमिष जीवन धारि।१५३४।
भावार्थ : -- यदि किसी राष्ट्र को शरीर की आकृति दें तो पर्वत श्रेणियाँ उसकी अस्थि समूह होंगी नदी नद उसकी धमनी एवं शिराएं होंगी । जल ही उसका रक्त होगा, समुद्र उसका ह्रदय होगा । समस्त जीव धारी उस शरीर को शौष्ठव प्रदान करने वाला मांस होगें ॥
स्पष्टीकरण : -- >> प्रत्येक राष्ट्र को अपने रक्त की समय समय पर जांच करवानी चाहिए । हैं वह है तो कितना है, अशुद्ध तो नहीं कोई ब्लाकेज तो नहीं है काहे की एक बार जापान को हृदय घात की बिमारी हो गई थी तो भारत ने उसे रक्तदान किया था अब पडोसी माँगता फिरता है मुझे खून दो, मुझे खून दो इसको सिकलीन है का ।
>> हड्डियां मजबूत होनी चाहिए वह क्षतिग्रस्त नहीं होनी चाहिए काहे की वही शरीर की रक्षा करती हैं ।
>> ह्रदय से तेलबाले को दूर ही रखना चाहिए काहे की वो कृत्रम पम्प लगा देता है ।
>> आमिष यदि क्वचित हो जाएगा तो त्वचा में झुर्रियां बोले तो रिंकल पड़ जाएंगी फिर वह किसी भी प्रसादन शल्य क्रिया बोले तो कॉस्मेटिक सर्जरी से ठीक नहीं होंगी और फिर राष्ट्र अल्प आयु में ही वृद्ध हो जाएगा.....अब समझ में आया मिस. एल. अमरिक्क्का.....
आपन जीवन धन जगा, संचै राख सँभार ।
कोइ तिरछ नयन करे त, वासे कर रखबार ।१५३५।
भावार्थ : -- अपनी जीवन की आधार भूत आवश्यकताओं को सिमित कर उसे उपजाना चाहिए । संचय धन संभाल रखना चाहिए । उसपर यदि कोई वक्रदृष्टि रखे तो उससे उसकी रक्षा करनी चाहिए । किसी राष्ट्र की समृद्ध अर्थ व्यवस्था का यही मूलमन्त्र है ॥ अन्यथा कागजी ( पत्र ) एवं अंक मुद्रा का क्या मोल.....
कबिता ऐसी सद्गुनी, जो रसहिन रसियाए ।
बिबरन को सुबरन करे, गंधहिन सुगंधाए ।१५३६।
भावार्थ : -- कविता में ऐसा सद्गुण है की वह रसहीन विषय को रसवंत कर देती है । विवर्ण को सुवर्ण एवं गंधहीन विषय को सुगन्धित कर देती है ॥
सारी खनि उत्खात दिए, चारि दिवस मैं बार ।
अगहुँ तेरे नौनिहाल, माँगहि हाथ पसार ।१५३७।
भावार्थ : -- यदि अपनी संचित सम्पदा को खोद के अल्प समय में ही भस्म कर दोगे । तब आने वाले समय में तुम्हारे नवनिहाल, अपनी आधार भूत आवश्यकताओं को हाथ पसार कर माँगते फिरेंगे ॥
सैनी जोग जुगावने, जोई देस अकूत ।
जेइ काल बयस तिन्हनि, कहत साँति के दूत ।१५३८।
भावार्थ : --जिस देश ने जितना अकूत सैन्य सामग्री संचयित की हो। विद्यमान काल एवं परिस्थिति में उस देश ( अथवा देशाध्यक्ष ) को ही शान्ति- दूत कहा जाता है ॥
जग भरता की यह भूमि, अहहए अस उपजाउ ।
साजन उपजत जी उठे, मरे मानस बियाउ ।१५३९।
भावार्थ : - हे सज्जनो !जगत के पालन हार की यह पावन धरा ऐसी उपजाऊ है । यदि इसमें मरे हुवे मन को भी बो दें तो वह भी व्युत्पन्न हो कर जीवित हो उठेगा ॥
एक शब्द है धाराधर, धरे अर्थ दुहु धार ।
एक जीवन आधार दे दुज दिए घाट उतार ।१५४०।
भावार्थ : -- एक शब्द है 'धाराधर' जिसमें दुधारी अर्थ है दोनों में ही धार है । एक अर्थ एवं धार जीवन को आधार देता है दुसरा जीवन को समाप्त कर देता है ॥
धाराधार = मेघ, तलवार
हे जन रूप जनार्दना, जग पत पालन हार ।
निर्धन को बिसारी कै, निर्धनता सिरु धार ।१५३२।
भावार्थ : -- हे जान हे जनार्दन स्वरूप हे जगत्पति चराचर के पालनहारी । आप निर्धन को सिरौधार न करें कारण कि जो धन का कामी एवं निकृष्ट माया से सम्मोहित होता है वही निर्धन होता है । अत: आप निर्धनता को सिरौधार करें निर्धन को नहीं ॥
पुहुपासीस सीस लहे, कंटक चरन गहाए ।
कृतज्ञ कंठ अवनत होत, सीस चरन परसाए ।१५३३।
भावार्थ : -- पत्र पुष्प आशीष आदि उत्तम पदार्थ शीश पर ही धार्य हैं । कंटक, बाधाएं आदि निकृष्ट पदार्थ चरण को प्राप्त होती हैं । उपकृत कंठ अवनत होकर शीश को चरण का स्पर्श कराता है ॥
देस काइ कलेबर दिए , नगस्थि नदि नद नारि ।
पयस रुधिरू पयोधि ह्रदय , आमिष जीवन धारि।१५३४।
भावार्थ : -- यदि किसी राष्ट्र को शरीर की आकृति दें तो पर्वत श्रेणियाँ उसकी अस्थि समूह होंगी नदी नद उसकी धमनी एवं शिराएं होंगी । जल ही उसका रक्त होगा, समुद्र उसका ह्रदय होगा । समस्त जीव धारी उस शरीर को शौष्ठव प्रदान करने वाला मांस होगें ॥
स्पष्टीकरण : -- >> प्रत्येक राष्ट्र को अपने रक्त की समय समय पर जांच करवानी चाहिए । हैं वह है तो कितना है, अशुद्ध तो नहीं कोई ब्लाकेज तो नहीं है काहे की एक बार जापान को हृदय घात की बिमारी हो गई थी तो भारत ने उसे रक्तदान किया था अब पडोसी माँगता फिरता है मुझे खून दो, मुझे खून दो इसको सिकलीन है का ।
>> हड्डियां मजबूत होनी चाहिए वह क्षतिग्रस्त नहीं होनी चाहिए काहे की वही शरीर की रक्षा करती हैं ।
>> ह्रदय से तेलबाले को दूर ही रखना चाहिए काहे की वो कृत्रम पम्प लगा देता है ।
>> आमिष यदि क्वचित हो जाएगा तो त्वचा में झुर्रियां बोले तो रिंकल पड़ जाएंगी फिर वह किसी भी प्रसादन शल्य क्रिया बोले तो कॉस्मेटिक सर्जरी से ठीक नहीं होंगी और फिर राष्ट्र अल्प आयु में ही वृद्ध हो जाएगा.....अब समझ में आया मिस. एल. अमरिक्क्का.....
आपन जीवन धन जगा, संचै राख सँभार ।
कोइ तिरछ नयन करे त, वासे कर रखबार ।१५३५।
भावार्थ : -- अपनी जीवन की आधार भूत आवश्यकताओं को सिमित कर उसे उपजाना चाहिए । संचय धन संभाल रखना चाहिए । उसपर यदि कोई वक्रदृष्टि रखे तो उससे उसकी रक्षा करनी चाहिए । किसी राष्ट्र की समृद्ध अर्थ व्यवस्था का यही मूलमन्त्र है ॥ अन्यथा कागजी ( पत्र ) एवं अंक मुद्रा का क्या मोल.....
कबिता ऐसी सद्गुनी, जो रसहिन रसियाए ।
बिबरन को सुबरन करे, गंधहिन सुगंधाए ।१५३६।
भावार्थ : -- कविता में ऐसा सद्गुण है की वह रसहीन विषय को रसवंत कर देती है । विवर्ण को सुवर्ण एवं गंधहीन विषय को सुगन्धित कर देती है ॥
सारी खनि उत्खात दिए, चारि दिवस मैं बार ।
अगहुँ तेरे नौनिहाल, माँगहि हाथ पसार ।१५३७।
भावार्थ : -- यदि अपनी संचित सम्पदा को खोद के अल्प समय में ही भस्म कर दोगे । तब आने वाले समय में तुम्हारे नवनिहाल, अपनी आधार भूत आवश्यकताओं को हाथ पसार कर माँगते फिरेंगे ॥
सैनी जोग जुगावने, जोई देस अकूत ।
जेइ काल बयस तिन्हनि, कहत साँति के दूत ।१५३८।
भावार्थ : --जिस देश ने जितना अकूत सैन्य सामग्री संचयित की हो। विद्यमान काल एवं परिस्थिति में उस देश ( अथवा देशाध्यक्ष ) को ही शान्ति- दूत कहा जाता है ॥
जग भरता की यह भूमि, अहहए अस उपजाउ ।
साजन उपजत जी उठे, मरे मानस बियाउ ।१५३९।
भावार्थ : - हे सज्जनो !जगत के पालन हार की यह पावन धरा ऐसी उपजाऊ है । यदि इसमें मरे हुवे मन को भी बो दें तो वह भी व्युत्पन्न हो कर जीवित हो उठेगा ॥
एक शब्द है धाराधर, धरे अर्थ दुहु धार ।
एक जीवन आधार दे दुज दिए घाट उतार ।१५४०।
भावार्थ : -- एक शब्द है 'धाराधर' जिसमें दुधारी अर्थ है दोनों में ही धार है । एक अर्थ एवं धार जीवन को आधार देता है दुसरा जीवन को समाप्त कर देता है ॥
धाराधार = मेघ, तलवार
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