बुधवार, 14 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५२॥ -----,

जे देहि एक पुतरा अन्तर एक आधान ।                  
चाहे रावन भीत कर, चाहे तो भगवान ।१५२१।
भावार्थ : -- यह देह एक पुतले के समान है । इसका अंतर एक प्रतष्ठान है । जिसमें चाहे तो रावण को प्रतिष्ठित करो चाहे भगवान को ॥यह  स्मरण रहे कि  देह रूपी यह पुतला मरता है, अन्तर आत्मा कभी नहीं मरती ॥

लब्धि के कर लालसा, ल्हे लाह पर लाह । 
अस लाहन के लाह का, जो दय अमरत नाह ।१५२२। 
भावार्थ : - लोभ की लिप्सा करते हुवे लाभ पर लाभ तो होता गया । किन्तु ऐसी लाभ भी किस काम के जो अमरत्व प्रदान नहीं कर सकते ॥

लाह लहे अमरत मिले, तो मैं लाहूँ लाख ।
यह लाह लब्धि किस काम की , देह भई जब राख ।१५२३।
भावार्थ : -- लाभ लब्धने से यदि अमरत्व प्राप्त होता हो, तो मैं इसकी लाख अभिलाषा करूँ । जब देह को ही जल कर राख होना है फ़िर यह लाभ यह लब्धि किस काम की ॥

जित गया भई जित गया, कहता ढोल बजाए । 
बुराई तो सोंह खड़ी, फिर कहु केहि जिता ए ।१५२४। 
भावार्थ : -- जीत गया भई जीत गया यह ढोल बजा बजा कर कह रहा है । पर बुराई तो को णा जीती गई यह तो सामने खडी है । फिर कहो इसने किसको जीता ।

'बुराई पर बुराई की विजय'

स्पष्टीकरण : -- विद्यमान व्यवस्था को अपना मत- सम्मत देने का अर्थ है, हमें भ्रष्टाचार, अनाचार, दुराचार आदि कदाचार स्वीकार हैं.….

देउ है की दानउ है, बैठा ऊँची पीठ । 
रे भलमन डीठे तबहि, वाकी सहि सहि दीठ ।१५२५। 
भावार्थ : -- कोई व्यक्ति चाहे ज्ञान से चाहे विचार से चाहे धन से अथवा किसी भी भांति से जब उच्च आसंदी पर आसीत होता है तभी उसकी वास्तविक परिचय प्राप्त होता है कि वह देव है कि दानव, जोगी है कि भोगी, संयोगी है कि वियोगी, रागी है कि वैरागी, दानी है कि ग्राही, प्रतिभागी है कि त्यागी,चोर है कि चौकीदार ॥

लाग लाग कहता रहा, राग लाग आलाप ।
लॉग लगाई न लगे, लागै आपन आप ।१५२६।
भावार्थ : --  राग का आलाप कर  लाग जा लाग जा कैंदा रहा पर लागि कोणा । भई ये आग है फाग थोड़े ही है ये लगाने से नहीं लगती अपणे आप लगती है ॥

घनक घनक घनकन करे, प्रगसे कनक ज्वाल । 
घन बाही ढाल ढले कि, छाए घटा घनकाल ।१५२७। 
भावार्थ : -- कई बार शब्द भ्रान्ति प्रस्तुत करते हैं, उनमें निहित अर्थ यथार्थ प्रकट नहीं करते जैसे : -- घन घन करते हुवे कोई गर्जना कर रहा है विद्युत अथवा चिंगारी प्रकट हो रही है । कोई हथोड़े वाला कुछ ढल रहा है, अथवा काली घटा छाई हुई है ॥

तन के लागि लाग कहे, मन ते लागत नाहि । 
जान केतक बिबाह किए, कहते हम अबिबाहि ।१५२८। 
भावार्थ : -- जो मन की लगन को प्रीति नहीं कहते और तन की लगन को ही प्रीति कहते हैं । उन्होंने जाने कितने विवाह किए हैं, और स्वयं को अविवाहित कहते हैं ॥  

सब सिंधु जल बिंदु भरे, मुकुति भया को ऐक । 
केतक जन जनमत मरे, भए जग कोइ प्रबेक ।१५२९। 
भावार्थ : -- सभी सिंधु जल-बिन्दुओं से परिपूर्ण हैं किन्तु कोई-कोई बिंदु ही मुक्ता का स्वरूप लेती है । संसार में जाने कितने लोग आते हैं और चले जाते हैं, पर उनमें कोई-कोई ही श्रेष्ठ-होता है ॥ अर्थात जल की कोई बिंदु ही मुक्तिका बनती है और मुक्तिकाओं में कोई-कोई ही श्रेष्ठ होता है ॥ 

तन कू सोधए तप चरन, धन कू  सोधए  दान । 
मन कू सोधए हरिभजन, कह गए बुध बिद्वान ।१५३० । 
भावार्थ : -- बुद्ध प्रबुद्धगण कह गए हैं कि त्याग एवं तपस्या तन को परिष्कृत करता है  , दान धन को परिष्कृत करता है । ईश्वर का स्मरण -भजन मन को परिष्कृत करता है ।। 










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