रविवार, 11 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५१॥ -----

 नखनेमि कोउ दिवाकर, दीपक कोउ विचार । 
सबहि अन्तर ज्ञान अगन, जो किए जग उजियार ।१५११।   
भावार्थ : --कोई विचार सूर्य है कोई चन्द्र है तो कोई केवल दीपक है । सभी में ज्ञान रूपी अग्नि अन्तर्निहित है, जो करने की साधन स्वरूपा है ।। 

घटकारु घट कारी दिए , बाट बाट बेचाए । 
बलिहारी सोइ घट की, जामे नीर समाए ।१५१२। 
भावार्थ : -कुम्हार ने घड़े बना दिए जो पग पग पर बिकने को रखे हैं । महिमा उसी घड़े की है, जिसने जल धारण कर प्यासे की प्यास बुझाई ॥  

जगती जोति सोए भली, बर बर करे उजार । 
जोई काल कलुष करी, वासे भल अँधियार ।१५१३। 
भावार्थ : --   दीपशिखा वही उत्तम हैं जो जल जल कर स्वयं कलुषित हो जाए किन्तु अँधेरे को उज्जवलित कर दे । जिसकी कलुषता से अँधकार भी कलंकित हो जाए फ़िर ऐसी शिखाओं से तो अंधियारा ही अच्छा है ॥

हे आहारी अवसि कल, होहु तुअहु आहार । 
कहत ज्ञान लोचन जेहि, चाक गमन संसार ।१५१४। 
भावार्थ : -- हे आहारी ! कल तुम भी अवश्य ही आहार बनोगे । जैसे आहारी हो, वैसा आहार बनोगे । तुम सब को खाओ तुम्हें कोई न खाए यह न्याय नहीं है ।  विद्वानगण इसे ही जन्म-मृत्यु का चक्र कहते हैं । इस लिए अहिंसावादी होते हुवे शाकाहारी बनो औऱ अपनी मुक्ति का उपाय करो ॥

दोषी नै तो दोष् किए, गहें काल के पास । 
रे निर्दोषी काल हरे, तेरे काहे साँस ।१५१५। 
भावार्थ : -- अपराधी ने तो अपराध किया इस हेतु उसे फांसी हुई । रे निरपराधी ! तेरे साँस काल ने क्योँ हरे ॥

भूखे प्यासे जिउ को, भोजन पानी दान । 
रे अधम कर जोंग धरम, पंथ चरत ए बिधान ।१५१६। 
भावार्थ : -- भूखे को भजन दे प्यासे को पानी दे । अरे अधर्मी पापी रे नीच इस विधि से तु राह चलते पुण्य कमाएगा ॥

नाउ धरे मह कलाधर, कला धरे ना कोइ । 
जो कोइ कृति कृतक करे, कला नाथ है सोइ ।१५१७। 
भावार्थ : --  नाम  रख लिया कलाधर, कलाकार, चितरकार, कथाकार, पत्तरकार, ये कार वो कार । पर कार धरे कोई । जो कोई रचना रचता हो कलानाथ वही है।

नाउ धरे को कलाधर, कला करे को और । 
घन घन घन बाही करे , घनकन घन घनरौर ।१५१८। 
भावार्थ : -- कलाधर नाम किसी का है , कलाक़ारी कोई औऱ कर रहा है ।  घन घन, घन वाही अर्थात समुद्र करता है, और घनघन की गर्जना घन करता है ॥

कला कौसल नाउ धार, करा बहुस घनरौर ।
कौसल अपना छाँड़ के, कला किए कई औऱ ।१५१९।
भावार्थ : -- मैं फलानी कार का डिराइबर हूँ । कह कह कर कान फाड़ दिए । अपनी  डिराईबरी को छोड़ के,  और पता नहीं का का चला रहा है॥

पुतरा मार गिराए के, देवें लोग बधाए । 
रावन तो जिउता रहे, मर मर आप सिधाए ।१५२०। 
भावार्थ : -- पुतले को मार के सब बधाई देते फिरते हैं ।  रावण कभी नहीं मरता वह जीवित ही रहता है, मारने वाले मर जाते हैं ॥

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