शनिवार, 10 मई 2014

----- मिनिस्टर राजू १२९ -----

'राजू ! क्या देख रहे हो ? '

राजू : -- मास्टर जी! जादू !!!

'किस जादूगरनी का ?'

राजू : -- मास्टर जी ! उसी जादूगरनी का जो पेट की दासी पत्राकारिता की स्वामिनि बनी बैठी है जिसका नाम है 'मीडिया'

 'अच्छा !'

राजू : -- हाँ ! मास्टर जी ! और न यह फूल को कबूतर बना देती है, सिंग को गीदड़ ब्ना देती है, खाली गिलास में जादू से मत भर देती है, किसी भी मोबाइल वाले, गैस वाले, तेल वाले, चाय के बागान वाले को प्रधान मंत्री बना देती है,

" फिर तू कुछ काहे नहीं बन जाता "   

राजू : -- मास्टर जी ! फ़ोकट में थोड़े ही बनाती है, मुुंह भराई लेती है फ़िर बनाती है  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...