गुरुवार, 29 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५६ ॥ -----

चार तराजू तौल ले, धर अनहित के भार । 
जग जन हित को कृत करे, बहुतै करें बिचार। १५६१ । 
भावार्थ : -- पहले अनहित के बटखड़े रखकर किसी बात को भली भाँती परख लें । यदि कोई कार्य जनहित के सह जगत के हित का हो तो उसे बहुत सोच-विचार कर करना चाहिए ।   

नियंता नव नेम रचे, जो अपनी प्रत्यास । 
होवनिहार समउ बने,  वाके गल का पास ।१५६२ । 
भावार्थ : -- नियंता यदि अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु, अपनी महत्वाकांक्षाओं के वशीभूत होकर किसी नए नियम की रचना करता है अथवा नियमों को परिवर्तित करता है । तब आने वाले समय वह नियम उसी के गले का पाश बन जाते हैं ॥ 

ते नृप भारत भारती, भूले ना लवलेस । 
जो जनम लिए महि आपनि, प्रान दाए परदेस ।१५६३। 
भावार्थ : -- भारत के, भारतीयों के चित्त से वह राजा विस्मृत नहीं होना चाहिए जिसने जन्म तो लिया अपनी भूमि में और प्राण दान दिया पराई भूमि में ॥ 

एकै पदक अपदस्थ सों तो जे दुर्गत होइ । 

सोइ गति सोच रे भगत, जब देही कर खोइ ।१५६४। 
भावार्थ : -- एक पदक से अपदस्थ होकर यह दुर्गति हो गई । भारत शासन की प्रिय वाहन संस्था का रथ गया,प्रासाद गया  और पेट भर कर निंदा हुई ।   जब यह शरीर हाथ से जाएगा हे भक्त ! उस गति क विषय में विचार कर ॥  

"क्या भारत शासन को किसी निजी वाहन संस्था  का प्रचार करना चाहिए ?"

सासक जोग जुगत करे, जीव करे संतोष । 
जीवाधान राख रखे, भरे रहे धन कोष ।१५६५। 
भावार्थ : -- किसी राष्ट्र का शासक (लोकतांत्रिक राष्ट्र में लोकसेवक ) यदि जीवन के आधार भूत साधनों को संचित रखते हुवे उसकी उपलब्धता हेतु उत्तम उपाय करे और जीव-जगत संतोष करे तब उस राष्ट्र के भण्डार भरे रहते हैं ॥ 

दीनता दावानल सम, धनता सिंधु समान । 
बरख बुझावै जो अनल , सो सासक घन मान ।१५६६। 
भावार्थ : -- किसी राष्ट्र की निर्धनता दावाग्नि के सदृश्य होती है ( यहां निर्धनता का अर्थ व्यापक है, जिसे धन की कामना है वह  निर्धन है ) एवं सम्पन्नता ( जिसे धन की कामना न हो वह संपन्न है ) सिंधु के समान है । जो शासक इस दावाग्नि का शमन करने में समर्थ  शासन सूर्यताप एवं संचायक समूह मेघ के सदृश्य होता है । 

टिप्पणी : -- "भारत अकाल ग्रस्त क्षेत्र है" 

ग्यान गुन परिहार कै, धन को दे जो मान । 

जग हेराए मिले नहीं, वासों को मुरखान ।१५६७। 
भावार्थ : -- ज्ञान एवं गुणों का त्याग कर जो धन को ही सन्मानित करते हैं ।  संसार भर में ढूंढ लिया, उन जैसा कोई मूर्ख नहीं मिला  ॥ 

बचन बेष का जानिए, मन मलीन नर नारि । 
सुपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख बिचारि ॥ 
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----

भावार्थ -- ‘वाणी और वेश से किसी मन के मैले स्त्री या पुरुष को जानना संभव नहीं है। शूर्पणखा, मारीचि, रावण और पूतना ने सुंदर वेश धरे थे किन्तु उनका मन छल एवं कपटके मलिन वस्त्रों से ढका था ।’’

संचित धन सों जी जुगे, सो तो भा उत्खात । 
जग अर्जन उत्पन्न करे, सोइ सकल उत्पाद ।१५६८। 
भावार्थ : -- ऊर्जा से ही कोई काया संचालित होती है, ऊर्जा से ही कोई जनतंत्र गतिमान रहता है ।यदि संचित धन-संपत्ति से जीवन यापन किया जाए तो वह संचित धन उत्पाद नहीं उत्खात कहलाता है, उत्पाद नहीं । श्रम शील होकर हम जीवन-धन को उपजाएँ, वही सकल घरेलू उत्पाद कहलाता है ॥  

अर्थात : -- यदि घर में संचित धन को बेचकर वैभव दर्शाया जाए तो वह घर खोद कर विलास करना कहलाएगा। आजीविका कमानी चाहिए उत्पन्न करनी चाहिए 

ऊर्जा के उत्पादन स्त्रोत हैं : - सौर-ऊर्जा, पवन-ऊर्जा, अन्न जिसे हमें उपजाना चाहिए । खोद खोद कर खाना नहीं चाहिए । 

बाप-दादाओं की छोड़ी हुई संपत्ति भी बिना कमाई के समाप्त हो जाती है, चाहे कोई केतना बढ़ा सामंत/जमीदार क्यों न हो..... 

धूप धूपत ताप तपत, छाया के सुख जान । 
चार कोस चर तिसत मर, जानौ जल के दान ।१५६९। 
भावार्थ : -- अनुकूलित वातावरण का परित्याग कर धूप में धूपो ताप  में तपो तब जानों कि छाया का सुख क्या होता है । बहुमूल्य वाहनों से बाहर आकर चार कोस चल कर देखो फिर जल-दान का महत्व समझ में आएगा । 

कन रतन भए रुगनित तन, प्रदूषित भई बात । 
खुदै खनिज तहँ होत है, बिकल अंग नवजात ।१५७०। 
भावार्थ : -- अन्न-कण रत्न हो जाते हैं, शरीर रुग्णित हो  वायुमंडल प्रदूषित हो जाता है । जिस स्थान पर खनिज-उत्खात  वहां के नवजात विकलांग हो रहे हैं ॥ अर्थात वह क्षेत्र गैस से पीड़ित भोपाल है ॥  


    






----- मिनिस्टर राजू १३४ -----

" राजू ! क्या सुन रहे हो? "

राजू :-- मास्टर जी ! अज़ान,

" अज़ान..... और तू ? "

राजू : -- सुननी पड़ रही है मास्टर जी! मस्जिद में एक  नया नया मुल्ला जो आया है.…. 

मंगलवार, 27 मई 2014

----- मिनिस्टर राजू १३३ -----

राजू : -- मास्टर जी ! पहले तो ये लंबा सेतु बाँध के भगवान नै भगवती ल्याई फेर छोड़ दी.....क्यूँ तो ल्याई, ल्याई थी तो फेर क्यूँ छोड़ दी..?

 ' मेर ताईं के पूछे ह भगवान ताईं पूछ'

राजू : -- मास्टर जी ! इस खातिर तो मरणों पडोगो,

 'हाँ तो मर जा'

राजू : -- मास्टर जी ! के गारंटी ह  मरे पाच्छे भगवान मिलोगो

' इसीलिए यो धरम बणायो गयो ह 'पुण कमा भगवान नै पा' फेर धोरे बैठा के पूछ जो पूछना ह.....  

सोमवार, 26 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५५॥ -----

भावाभिव्यंजन हेतु, भाषा साधन रूप । 
वाके राख रखे जोइ, साधत सतत सरूप ।१५५१। 
भावार्थ : -- भाषा भावों की अभिव्यक्ति हेतु साधन मात्र है । उस  उपकरण को संजो कर रखना चाहिए जो भावाभिव्यक्ति को सतत स्वरूप में कुशलता पूर्वक साधता हो ॥ 

भाषन बर साधन बरे , होत न को भल नाहि । 
हो भावक जब भावना, होवत भलमन साहि ।१५५२। 
भावार्थ : -- अभिव्यक्ति हेतु  उत्तम उपकरण के चयन कर लेने मात्र से ही कोई सज्जन नहीं हो जाता । जब ध्यान-चिंतन,निमित्त-कारण कथन-निर्धारण,परिकल्पं श्रेष्ठ होने से ही कोई श्रेष्ठि होता है ॥ 

अर्थात : -- श्रेष्ठ उपकरण से ही कार्य सिद्ध नहीं हो जाता, श्रेष्ठ उत्पादन भी होना चाहिए  ॥ 

भालु करे बर मंत्रना, कपि कारए बर काज । 
जटायु पैह बर गति अस रहे राम के राज ।१५५३। 
भावार्थ : -- मनुष्य की तो बात ही क्या जहां भालू श्रेष्ठ मंत्रणाएं करते थे, बन्दर बड़े बड़े कार्य सिद्ध कर देते थे ( प्रमाण है ) गीद्ध वीर गति को प्राप्त होते थे ऐसा था राम का राज ॥  

राम राज में भालु कपि, मंत्री बन दिए मंत्र । 
अजहुँ सबइ बिपरीत भए, जे कास सासन तंत्र ।१५५४। 
भावार्थ : -- राम-राज में भालू और कपि मंत्री हुवा करते थे । अर्थात भगवान के भाव ने पशुओं को भी मनुष्य बना दिया अपने सदृश्य पूज्यनीय कर दिया ॥ अद्यावधि ये कैसा शासन तंत्र हैं की जहां मनुष्य, भालु रीछ गिद्ध प्रवित्ति के हो गए हैं ॥ 

बेद सुर धूनी पावनी, कहे नहीं बिन हेतु । 
भगवन लंका पार गए, बँधे सिंधु मह सेतु ।१५५५।  
भावार्थ : --  वेद-शास्त्रों ने माँ गंगा को यूं ही पावन नहीं कहा वह पावन है, इसका प्रमाण है  उसका संचयित जल चिरकाल तक शुद्ध रहता है । भले आप उसे गंगा माँ मत कहिए अथवा  देवी मत कहिए । आप श्रीराम को भगवान मत कहिए किन्तु उनका चरित्र वास्तविक है सिंधु पर बंधा हुवा सेतु इसका प्रमाण है ॥ 

क्रोधागन द्योत दहन  , माया के दुइ रूप । 
असत संग आसुरी है, न तरु देई सरूप ।१५५६। 
भावार्थ : -- क्रोध की अग्नि हो चाहे वह सुरुया की अग्नि हो चाहे केवल अग्नि हो वही द्विरूपी माया है । यदि असत्य के साथ है, तो वह आसुरी  है अन्यथा  दैवी स्वरूप है 

जैसे : -- दावाग्नि आसुरी प्रकृति की है हव्यवाहन देवी है । न्याय के विरुद्ध की क्रोधाग्नि आसुरी है अन्याय के विरुद्ध देवी है । पौध प्रस्फुरित करे तो वह सौर्याग्नि देवी है नष्ट करे तो आसुरी है ॥ 

संस्कार संस्कृति जो , देस रूप सिँगार । 
साहित्य संगीत कला, कंकण किंकनि हार ।१५५७ । 
भावार्थ : --सस्कार एवं सस्कृति यदि किसी राष्ट्र के रूप -श्रृंगार हैं तो साहित्य, संगीत एवं कला उसके आभूषण हैं ॥ 

हारनहार सोच करे, जयनहार ले सीख । 
सो संग्रामांगन में  ,सदा बिजय ही लीख।१५५८। 
भावार्थ : -- यदि हारनहार समीक्षा करे एवं जयनहार शिक्षा ले । तो जयनहार कठिनाइयों से जूझकर जीवन के मुख पृष्ठ पर सदा विजय ही उल्लखित करता है ॥ 

जेइ सोचत मुदित रहे, पदक पैह का पाए । 
सोचत जे खोए का का, बहुरत बहु पछिताए ।१५५८। 
भावार्थ : --  इस संसार में जब कोई श्रेष्ठ पदक प्राप्त होता  तब इस एक प्राप्ति पर ही हम सदा मुदित रहते हैं कि आह !! क्या पाया । किन्तु जब  इस पदक को लौटाने का समय आता है, तब यह सोच कर हम पश्चाताप करते हैं कि आह ! क्या क्या खो दिया ॥ 

  'किसी पदक के प्राप्त होने पर ऐसा पद प्राप्त करो की उस पदक के खोने पर पश्चाताप न हो.....' 

सात सिंधु में जल भरे, गन अवगण सब जोइ । 
अवगुन छाँड़ गन गाहे, हंस कहावै सोइ ।१५५९। 
भावार्थ : -- सात सिंधु में जल भरा है गुण एवं अवगुण दोनों से परिपूर्ण है। जो अवगुण को त्याग  कर केवल गुण ग्रहण करता है वही विवेकी हंस कहलाता है ।। 

सोइ सौजन आप सोंह, करे जगत उपकार । 
जो पाछे पछताए के, भूल किए स्वीकार ।१५६० । 
भावार्थ : -- वह सज्जन जगत के सह स्वयं को भी उदारता पूर्वक उपकृत करता है, जो अपनी त्रुटियाँ स्वीकार कर बाद में उसका पश्चाताप करे ॥   




शुक्रवार, 23 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५४॥ -----,

निरखत नौबत आपनी, बहुत करे अभिमान । 
आवै सबहि गर्भ पंथ, जावै सों समसान ।१५४१। 
भावार्थ : --अपने तन की शोभा, धन की शोभा, उपबन की शोभा को देख देख कर बहुंत अभिमान करता है । आते तो सभी गर्भ के द्वार से है और जाते श्मशान से ही हैं कोई श्मशान से आए और गर्भ द्वार से  जाए तो फिर अभिमान करे । 

सोना खाए मैल करे, करता फिर अभिमान । 
मैल खावे सोन करे, सोई महिमा वान।१५४२। 
भावार्थ : -- सोना खाता है मिट्टी कर देता है फिर अभिमान भी करता है  । जो मिटटी खाए सोना करे माहत्म्य उसी का है ॥ जैसे : -- पेड़-पौधे 

भावार्थ : -- पेड़ में पैसे नहीं सोना लगता है । ई होने बाला  'बि' पक्ष की कभी किसान से भेंट नहीं हुई अन्यथा वो अच्छे से समझा देता कहाँ क्या लगता है ॥ 

अजहुँ हरे कल फुर फरे, परसों फर फरियाए । 
ठिया ठौर मह आपनी, एक तरु अवसि लगाए ।१५४३।

भावार्थ : -- अभी हरे होंगे कल उसमें फूल उगेंगे परसों वह फलों से भर जाएगा । अपने निवासित स्थान पर क्वाचित्क एक  तरु अवश्य ही लगाना चाहिए ॥ 

अर्थात : -- क्वाचित्क एक विचार अवश्य ही ऐसा उपजाना चाहिए ।  जो आने वाल कालखण्ड में  नौनिहालों का मार्ग दर्शन कर सके ॥  

होए रुग्णित कोउ देस, चाहे हो कृष काइ  । 
अर्घी मुद्रा अस अबरन , जो सब दोष गुँठाए ।१५४४। 
भावार्थ : -- कोई देश कृशकाय हो अथवा रोगग्रस्त हो । बहुमूल्य ( अर्घ्य ) मुद्रा ऐसी वस्त्रावरण है जो सभी दोषों को ढक देती है ॥ 

तमो गुन ग्राम हरन हुँत, गवन दिवाकर बार । 
जे न होइ सकै तो एक, दीपक अवसि उजियार ।१५४५। 
भावार्थ : -- अज्ञान, आलस्य आदि अवगुण समूह रूपी अँधेरे का हरण करने हेतु एक सूर्य उगा कर जाना चाहिए  । यह न हो सके तो एक दीपक अवश्य ही जलाना चाहिए ॥

राजित मंदर मूरती, जदपि अहइ पाषान । 
तेरे ह्रदय भाव भरे, तो सरूप भगवान ।१५४६। 
भावार्थ : -- देवल में प्रतिस्थापित प्रतिमा यद्यपि पाषाण ही है । तेरे ह्रदय में यदि श्रद्धा है, भक्ति है तो वह भगवान का स्वरूप है ॥

दूसरे : -- सदविचार केवल शब्दों के समूह भर होते है, यदि उन्हें माना जाए तो वह सत्य का स्वरूप हो जाते है ॥

सच का अनुग्रह सरल है, कठिन है स्वीकार । 
अनुग्रहि सों स्वीकरता, होवइ अधिक उदार ।१५४७। 
भावार्थ : -- सत्य का आग्रह करना सरल है, आग्रह को स्वीकार करना कठिन है । स्वीकर्ता, सत्याग्रही से अधिक उदार होता है ॥

इंद्रिइ मिले सब रस लिए, बिषय मिले लिए भोग । 
रे मानस रे मूरखा, किए ना सद उपजोग ।१५४८। 
भावार्थ : -- इन्द्रियाँ  मिली तो रसास्वादन कर लिया । विषय मिले तो भोग लिया । अरे मानस अरे मुर्ख तूने कठिनता से प्राप्य साधनों का कोई सदुपयोग नहीं किया ॥

बहुरि बहुरि जल दाए जूँ, बीय में जागे प्रान । 
बार बार समुझाए तों, मूरख भए बिद्वान ।१५४९। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार पून: पून: जल सिक्त करने से सुषुप्त बीज अर्थात में प्राण जागृत हो अर्थता वह ज्ञान वान जाते है । उसी प्रकार वारंवार समझाने से सत्त्वप्रधान अज्ञान भी ज्ञानवान हो जाता है ।।

पयस जमोग दधिज ज्योँ मेघ मीर अनुवाद । 
राम चरित्र मानस त्योँ , रामायन संवाद ।१५५०। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार संकलित पयस् का अनुवाद दधिज है, समुद्र का अनुवाद मेघ है ।  उसी प्रकार श्री रामायण अनुवाद श्री राम चरित्र मानस  है, ऐसा विद्वानजन कहते हैं  ॥

कारण ? : -- सीता चरन चोंच हति भागा । मूढ़ मंद मति कारन कागा ॥
                    ----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----


बुधवार, 21 मई 2014

----- मिनिस्टर राजू १३२ -----

'राजू ! क्या देख रहे हो ?'

राजू : -- मास्टर जी ! भ्रष्ट तंत्र के चौथे खम्बे का पाँचवाँ कोण.....

मंगलवार, 20 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५३॥ -----

बिना जोग जगाई जो, जमोगन सों समृद्ध । 
होवत सोइ भूमि देस, अलप बयस मह बृद्ध ।१५३१। 
भावार्थ : -- जो राष्ट्र भूमि संचित निधि से ही समृद्धि प्रदर्शित करता हो, उन्हें उपजाता न हो । वह राष्ट्र अल्प आयु में ही वृद्ध हो जाता है ॥ 

''प्रति दिन की दिवाली एक दिन दिवाला निकाल देती है, समझे अमरीक्का टाइप" 

पूर्व में भारत की आर्थिक समृद्धि का भेद यही था की वह अपनी समस्त निधियाँ उपजाता था एवं संचित की संभाल रखता था । कृषि उपज, वनोपज, पशु संवर्द्धन से.....

हे जन रूप जनार्दना, जग पत पालन हार । 
निर्धन को बिसारी कै, निर्धनता सिरु धार ।१५३२। 
भावार्थ : -- हे जान हे जनार्दन स्वरूप हे जगत्पति चराचर के पालनहारी । आप निर्धन को सिरौधार न करें कारण कि जो धन का कामी एवं निकृष्ट माया से सम्मोहित होता है वही निर्धन होता है । अत: आप निर्धनता को सिरौधार करें निर्धन को नहीं ॥

पुहुपासीस सीस लहे, कंटक चरन गहाए । 
कृतज्ञ कंठ अवनत होत, सीस चरन परसाए ।१५३३। 
भावार्थ : -- पत्र पुष्प आशीष आदि उत्तम पदार्थ शीश पर ही धार्य हैं । कंटक, बाधाएं आदि निकृष्ट पदार्थ चरण को प्राप्त होती हैं । उपकृत कंठ अवनत होकर शीश को चरण का स्पर्श कराता है ॥

देस काइ कलेबर दिए , नगस्थि नदि नद नारि । 
पयस रुधिरू पयोधि  ह्रदय , आमिष जीवन धारि।१५३४। 

भावार्थ : --  यदि किसी राष्ट्र को शरीर की आकृति दें तो  पर्वत श्रेणियाँ उसकी अस्थि समूह होंगी नदी नद उसकी धमनी एवं शिराएं होंगी । जल ही उसका रक्त होगा, समुद्र उसका ह्रदय होगा । समस्त जीव धारी उस शरीर को शौष्ठव प्रदान करने वाला मांस होगें ॥

स्पष्टीकरण : -- >> प्रत्येक राष्ट्र को अपने रक्त की समय समय पर जांच करवानी चाहिए ।  हैं वह है तो कितना है, अशुद्ध तो नहीं कोई ब्लाकेज तो नहीं है काहे की एक बार जापान को हृदय घात की बिमारी हो गई थी तो भारत ने उसे रक्तदान किया था अब पडोसी माँगता फिरता है मुझे खून दो, मुझे खून दो इसको सिकलीन है का ।

>> हड्डियां मजबूत होनी चाहिए वह क्षतिग्रस्त नहीं होनी चाहिए काहे की वही शरीर की रक्षा करती हैं ।

>> ह्रदय से तेलबाले को दूर ही रखना चाहिए काहे की वो कृत्रम पम्प लगा देता है ।

>> आमिष यदि क्वचित हो जाएगा तो त्वचा में झुर्रियां बोले तो रिंकल पड़ जाएंगी फिर वह किसी भी प्रसादन शल्य क्रिया बोले तो कॉस्मेटिक सर्जरी से ठीक नहीं होंगी और फिर राष्ट्र अल्प आयु में ही वृद्ध हो जाएगा.....अब समझ में आया मिस. एल. अमरिक्क्का.....


आपन जीवन धन जगा, संचै राख सँभार । 
कोइ  तिरछ नयन करे त, वासे कर रखबार ।१५३५। 
भावार्थ : -- अपनी जीवन की आधार भूत आवश्यकताओं को सिमित कर उसे उपजाना चाहिए । संचय धन संभाल रखना चाहिए । उसपर यदि कोई वक्रदृष्टि रखे तो उससे उसकी रक्षा करनी चाहिए । किसी राष्ट्र की समृद्ध अर्थ व्यवस्था का यही मूलमन्त्र है ॥ अन्यथा कागजी ( पत्र ) एवं अंक मुद्रा का क्या मोल.....

कबिता ऐसी सद्गुनी, जो रसहिन रसियाए । 
बिबरन को सुबरन करे, गंधहिन सुगंधाए ।१५३६। 
भावार्थ : -- कविता में ऐसा सद्गुण है की वह रसहीन विषय को रसवंत कर देती है । विवर्ण को सुवर्ण एवं गंधहीन विषय को सुगन्धित कर देती है ॥ 

सारी खनि उत्खात दिए, चारि दिवस मैं बार । 
अगहुँ तेरे नौनिहाल, माँगहि हाथ पसार ।१५३७। 
भावार्थ : -- यदि अपनी संचित सम्पदा को खोद के अल्प समय में ही भस्म कर दोगे ।  तब आने वाले समय में तुम्हारे नवनिहाल, अपनी आधार भूत आवश्यकताओं को हाथ पसार कर माँगते फिरेंगे ॥
   
सैनी जोग जुगावने, जोई देस अकूत । 
जेइ काल बयस तिन्हनि, कहत साँति के दूत ।१५३८। 
 भावार्थ : --जिस देश ने जितना अकूत सैन्य सामग्री संचयित की हो। विद्यमान काल एवं परिस्थिति में उस देश ( अथवा देशाध्यक्ष ) को ही शान्ति- दूत कहा जाता है ॥

जग भरता की यह भूमि, अहहए अस उपजाउ ।   
साजन उपजत जी उठे, मरे मानस बियाउ ।१५३९। 
भावार्थ : -  हे सज्जनो !जगत के पालन हार की यह पावन धरा  ऐसी उपजाऊ है । यदि इसमें  मरे हुवे मन को भी बो दें तो वह भी व्युत्पन्न हो कर जीवित हो उठेगा ॥

एक शब्द है धाराधर, धरे अर्थ दुहु धार । 
एक जीवन आधार दे दुज दिए घाट उतार ।१५४०। 
भावार्थ : -- एक शब्द है 'धाराधर' जिसमें दुधारी अर्थ है दोनों में ही धार है । एक अर्थ एवं धार जीवन को आधार देता है दुसरा  जीवन को समाप्त कर देता है ॥

धाराधार = मेघ, तलवार 

बुधवार, 14 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५२॥ -----,

जे देहि एक पुतरा अन्तर एक आधान ।                  
चाहे रावन भीत कर, चाहे तो भगवान ।१५२१।
भावार्थ : -- यह देह एक पुतले के समान है । इसका अंतर एक प्रतष्ठान है । जिसमें चाहे तो रावण को प्रतिष्ठित करो चाहे भगवान को ॥यह  स्मरण रहे कि  देह रूपी यह पुतला मरता है, अन्तर आत्मा कभी नहीं मरती ॥

लब्धि के कर लालसा, ल्हे लाह पर लाह । 
अस लाहन के लाह का, जो दय अमरत नाह ।१५२२। 
भावार्थ : - लोभ की लिप्सा करते हुवे लाभ पर लाभ तो होता गया । किन्तु ऐसी लाभ भी किस काम के जो अमरत्व प्रदान नहीं कर सकते ॥

लाह लहे अमरत मिले, तो मैं लाहूँ लाख ।
यह लाह लब्धि किस काम की , देह भई जब राख ।१५२३।
भावार्थ : -- लाभ लब्धने से यदि अमरत्व प्राप्त होता हो, तो मैं इसकी लाख अभिलाषा करूँ । जब देह को ही जल कर राख होना है फ़िर यह लाभ यह लब्धि किस काम की ॥

जित गया भई जित गया, कहता ढोल बजाए । 
बुराई तो सोंह खड़ी, फिर कहु केहि जिता ए ।१५२४। 
भावार्थ : -- जीत गया भई जीत गया यह ढोल बजा बजा कर कह रहा है । पर बुराई तो को णा जीती गई यह तो सामने खडी है । फिर कहो इसने किसको जीता ।

'बुराई पर बुराई की विजय'

स्पष्टीकरण : -- विद्यमान व्यवस्था को अपना मत- सम्मत देने का अर्थ है, हमें भ्रष्टाचार, अनाचार, दुराचार आदि कदाचार स्वीकार हैं.….

देउ है की दानउ है, बैठा ऊँची पीठ । 
रे भलमन डीठे तबहि, वाकी सहि सहि दीठ ।१५२५। 
भावार्थ : -- कोई व्यक्ति चाहे ज्ञान से चाहे विचार से चाहे धन से अथवा किसी भी भांति से जब उच्च आसंदी पर आसीत होता है तभी उसकी वास्तविक परिचय प्राप्त होता है कि वह देव है कि दानव, जोगी है कि भोगी, संयोगी है कि वियोगी, रागी है कि वैरागी, दानी है कि ग्राही, प्रतिभागी है कि त्यागी,चोर है कि चौकीदार ॥

लाग लाग कहता रहा, राग लाग आलाप ।
लॉग लगाई न लगे, लागै आपन आप ।१५२६।
भावार्थ : --  राग का आलाप कर  लाग जा लाग जा कैंदा रहा पर लागि कोणा । भई ये आग है फाग थोड़े ही है ये लगाने से नहीं लगती अपणे आप लगती है ॥

घनक घनक घनकन करे, प्रगसे कनक ज्वाल । 
घन बाही ढाल ढले कि, छाए घटा घनकाल ।१५२७। 
भावार्थ : -- कई बार शब्द भ्रान्ति प्रस्तुत करते हैं, उनमें निहित अर्थ यथार्थ प्रकट नहीं करते जैसे : -- घन घन करते हुवे कोई गर्जना कर रहा है विद्युत अथवा चिंगारी प्रकट हो रही है । कोई हथोड़े वाला कुछ ढल रहा है, अथवा काली घटा छाई हुई है ॥

तन के लागि लाग कहे, मन ते लागत नाहि । 
जान केतक बिबाह किए, कहते हम अबिबाहि ।१५२८। 
भावार्थ : -- जो मन की लगन को प्रीति नहीं कहते और तन की लगन को ही प्रीति कहते हैं । उन्होंने जाने कितने विवाह किए हैं, और स्वयं को अविवाहित कहते हैं ॥  

सब सिंधु जल बिंदु भरे, मुकुति भया को ऐक । 
केतक जन जनमत मरे, भए जग कोइ प्रबेक ।१५२९। 
भावार्थ : -- सभी सिंधु जल-बिन्दुओं से परिपूर्ण हैं किन्तु कोई-कोई बिंदु ही मुक्ता का स्वरूप लेती है । संसार में जाने कितने लोग आते हैं और चले जाते हैं, पर उनमें कोई-कोई ही श्रेष्ठ-होता है ॥ अर्थात जल की कोई बिंदु ही मुक्तिका बनती है और मुक्तिकाओं में कोई-कोई ही श्रेष्ठ होता है ॥ 

तन कू सोधए तप चरन, धन कू  सोधए  दान । 
मन कू सोधए हरिभजन, कह गए बुध बिद्वान ।१५३० । 
भावार्थ : -- बुद्ध प्रबुद्धगण कह गए हैं कि त्याग एवं तपस्या तन को परिष्कृत करता है  , दान धन को परिष्कृत करता है । ईश्वर का स्मरण -भजन मन को परिष्कृत करता है ।। 










रविवार, 11 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५१॥ -----

 नखनेमि कोउ दिवाकर, दीपक कोउ विचार । 
सबहि अन्तर ज्ञान अगन, जो किए जग उजियार ।१५११।   
भावार्थ : --कोई विचार सूर्य है कोई चन्द्र है तो कोई केवल दीपक है । सभी में ज्ञान रूपी अग्नि अन्तर्निहित है, जो करने की साधन स्वरूपा है ।। 

घटकारु घट कारी दिए , बाट बाट बेचाए । 
बलिहारी सोइ घट की, जामे नीर समाए ।१५१२। 
भावार्थ : -कुम्हार ने घड़े बना दिए जो पग पग पर बिकने को रखे हैं । महिमा उसी घड़े की है, जिसने जल धारण कर प्यासे की प्यास बुझाई ॥  

जगती जोति सोए भली, बर बर करे उजार । 
जोई काल कलुष करी, वासे भल अँधियार ।१५१३। 
भावार्थ : --   दीपशिखा वही उत्तम हैं जो जल जल कर स्वयं कलुषित हो जाए किन्तु अँधेरे को उज्जवलित कर दे । जिसकी कलुषता से अँधकार भी कलंकित हो जाए फ़िर ऐसी शिखाओं से तो अंधियारा ही अच्छा है ॥

हे आहारी अवसि कल, होहु तुअहु आहार । 
कहत ज्ञान लोचन जेहि, चाक गमन संसार ।१५१४। 
भावार्थ : -- हे आहारी ! कल तुम भी अवश्य ही आहार बनोगे । जैसे आहारी हो, वैसा आहार बनोगे । तुम सब को खाओ तुम्हें कोई न खाए यह न्याय नहीं है ।  विद्वानगण इसे ही जन्म-मृत्यु का चक्र कहते हैं । इस लिए अहिंसावादी होते हुवे शाकाहारी बनो औऱ अपनी मुक्ति का उपाय करो ॥

दोषी नै तो दोष् किए, गहें काल के पास । 
रे निर्दोषी काल हरे, तेरे काहे साँस ।१५१५। 
भावार्थ : -- अपराधी ने तो अपराध किया इस हेतु उसे फांसी हुई । रे निरपराधी ! तेरे साँस काल ने क्योँ हरे ॥

भूखे प्यासे जिउ को, भोजन पानी दान । 
रे अधम कर जोंग धरम, पंथ चरत ए बिधान ।१५१६। 
भावार्थ : -- भूखे को भजन दे प्यासे को पानी दे । अरे अधर्मी पापी रे नीच इस विधि से तु राह चलते पुण्य कमाएगा ॥

नाउ धरे मह कलाधर, कला धरे ना कोइ । 
जो कोइ कृति कृतक करे, कला नाथ है सोइ ।१५१७। 
भावार्थ : --  नाम  रख लिया कलाधर, कलाकार, चितरकार, कथाकार, पत्तरकार, ये कार वो कार । पर कार धरे कोई । जो कोई रचना रचता हो कलानाथ वही है।

नाउ धरे को कलाधर, कला करे को और । 
घन घन घन बाही करे , घनकन घन घनरौर ।१५१८। 
भावार्थ : -- कलाधर नाम किसी का है , कलाक़ारी कोई औऱ कर रहा है ।  घन घन, घन वाही अर्थात समुद्र करता है, और घनघन की गर्जना घन करता है ॥

कला कौसल नाउ धार, करा बहुस घनरौर ।
कौसल अपना छाँड़ के, कला किए कई औऱ ।१५१९।
भावार्थ : -- मैं फलानी कार का डिराइबर हूँ । कह कह कर कान फाड़ दिए । अपनी  डिराईबरी को छोड़ के,  और पता नहीं का का चला रहा है॥

पुतरा मार गिराए के, देवें लोग बधाए । 
रावन तो जिउता रहे, मर मर आप सिधाए ।१५२०। 
भावार्थ : -- पुतले को मार के सब बधाई देते फिरते हैं ।  रावण कभी नहीं मरता वह जीवित ही रहता है, मारने वाले मर जाते हैं ॥

शनिवार, 10 मई 2014

----- मिनिस्टर राजू १२९ -----

'राजू ! क्या देख रहे हो ? '

राजू : -- मास्टर जी! जादू !!!

'किस जादूगरनी का ?'

राजू : -- मास्टर जी ! उसी जादूगरनी का जो पेट की दासी पत्राकारिता की स्वामिनि बनी बैठी है जिसका नाम है 'मीडिया'

 'अच्छा !'

राजू : -- हाँ ! मास्टर जी ! और न यह फूल को कबूतर बना देती है, सिंग को गीदड़ ब्ना देती है, खाली गिलास में जादू से मत भर देती है, किसी भी मोबाइल वाले, गैस वाले, तेल वाले, चाय के बागान वाले को प्रधान मंत्री बना देती है,

" फिर तू कुछ काहे नहीं बन जाता "   

राजू : -- मास्टर जी ! फ़ोकट में थोड़े ही बनाती है, मुुंह भराई लेती है फ़िर बनाती है  

गुरुवार, 8 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १५० ॥ -----

स्वामिन की भगति छाँड़, कार करे सौ औऱ । 
स्वाँग भरे साधौ के, खडे दुआरी चौर ।१५०१ । 
भावार्थ : -- स्वामी की भक्ति को छोड़ कर बाकी सारे सौ ठो काम करते हैँ । ये सज्जनता का स्वांग भरे हुवे वास्तव मेँ चोर हैँ, जो तेरी द्वारि पर खड़े हैं ॥

काम चोर पूजन करे, आरती दिए उतार । 
सील साधना साध के, धारे जोगाधार ।१५०२। 
भावार्थ : -- काम चोर पूजा करते है, आरितियाँ उतारते है । कर्मशील, कर्म की साधना करके अपनी सफलता का मार्ग प्रसस्त करते हैं ॥

हरि हरि हरि हरिअरि ररत, अरि अरि हरिअ न होत । 
हरि हरि परिहरि बिअ बिअत, हरिअरि हरिअरि जोत ।१५०३। 
भावार्थ : -- हे री ! हरि हरि गाने से हरीयाली नहिं होती । हरि हरि गाना छोड़ पहले खेत जोत, उसमें बीज बो फ़िर धीरे-धीरे हरियाली छाएगी ॥

दीपक अरु खद्योत के, सुहा गहन तम माहि ।
ऐसेउ खल के छ्ल छबि, तमगुन के सो लाहि।१५०४ । 
भावार्थ : - दीपक और जुगनू की शोभा गहनतम अँधेरे से ही  है ॥ ऐसे ही दुष्ट जनों की बनावटी शोभा अज्ञान, आलस्य  क्रोधादि अवगुणों से ही है ॥

 तमोगुन गहें कौतुकी, खेल करे खद्योत ॥
 दिए बिगाड़े सकल खेल, सूर उदय जब होत। १५०५। 
भावार्थ : -- तामसी गुणों  ग्रहण कर जुगनू  खेल-तमाशे करता रहता है ।जब सूर्य उदय होता है तब उसके सारा खेल बिगाड़ देता है ॥

तमोहर तम हरन कर, भरे जगत उजियार । 
लोचन पलकन ढाँप लिए, कहै अजहुँ अँधियार ।१५०६। 
भावार्थ : --   तामसी गुण हरण कर तमसहारी ने अंधेरेजगत मेँ उजाला भर दिया ॥ जिसने अपने नेत्रों को पलकों से आच्छादित किया हुवा है उसके अनुसार अभी अन्धेरा है ॥

प्यासे मुख को जल दे, भूखे असन प्रदाएँ । 
निर्बसनी को बसन दे, मति हिन को मत दाएँ ।१५०७। 
भावार्थ : -- प्यासे को जल दें भोजन नहिं, भूखी को भोजन दें । वस्त्रहीन को वस्त्र दें, बुद्धिहीन को सदबुद्धि देँ मत-सम्मत नहीं ॥

अर्थात : -- "जिसको जिसकी आवश्यकता है, उसको वही वस्तु दान करें"

जेतक माँहि पेट भरे, ततख तव अधिकार । 
भरत अकण्ठ बमन करे, कह तिन भ्रष्टा चार ।१५०८। 
भावार्थ : -- जितने में तुम्हारी आधार भूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके तुम्हारा उतने पर ही अधिकार है । यदि कोई इससे अधिक के लिए अधिकृत है वह भृष्टाचारी है । जिसने आकंठ भर लिया है, और उल्टियाँ कर रहा है सर्वप्रथम वही दंड का अधिकारी है ॥

टिप्पणी : -- सारे भारतीय ही भ्रष्टाचारी हैं, तो इस देश को कारावास काहे नहीं बना देते, कारावास को देश बनाए देते हैँ ॥ ये नेता लोगन जो है, अरे वही जो स्वयं को दूधवा के धुले कहते हैं ,देश इन्हेँ सौँप देते हैँ, जो है ।

जन जन को भरमाइ के, सेवक बने अधीस । 
खावे खेत पियें नदी, बुझि न भूख अरु तीस ।१५०९ । 
भावार्थ : -- भारतीय जनता को भ्रमित करते हुवे स्वयं को सेवक कहकर भारत की सत्ता पाने वाले,  राजा बन बैठे । ये भारत के पूरे खेत खा गए, नदी की नदी पी गए फ़िर भी इनकी भूख औऱ प्यास नहीँ मिटी ।।

औषध बासन जल अन्न, जेन केन कर दात । 
मत दायन मैं भल भॉंति, परखो पात कुपात ।१५१०। 
भावार्थ : -- औषधि वस्त्र जल आन आदि जीवन के साधन आवश्यकता के आधार पर दाय । इसमे पात्र  विचार नहीं करना चाहिए । किन्तु  में सुपात्र एवम कुपात्र की भली प्रकार से परीक्षा कर लें यदि ग्राही कुपात्र हैं तो यह दान कदापि  नहीं करना चाहिए ॥  कारण की ऐसे कुदान से जीवन-संकट उत्पन्न हो सकता है ॥ अपने अपने राष्ट्र में पशु-पक्षियों की संख्या से भी अवगत रहें, यह पारिस्थतिक संतुलन के लिए परम आवश्यक है ॥   









मंगलवार, 6 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४९ ॥ -----

जनहित हुँत मत दान लिए, बेच रहे मद राए । 
ऐसी मदमोहिनी रसन, कहु का नहि कहवाए ।१४९१। 
भावार्थ : -- जनता-जनार्दन का कल्याण हेतु बने हुवे राजा ने मत का दान ग्रहण किया ।  और मदिरा का धंधा करते हैँ । अब ऐसी मदोन्मत्त जिह्वा कहो तो क्या नहीं कहलवा दे ।

दीनन का झोपरा जिन, अटारा दिए दिखाए ।
अटारा झोपर आपुना, कर रँह सदा भुखाए ।१४९२।  
भावार्थ : -- जिन्हें दूसरों की विपन्नता, सम्पन्नता और अपनी सम्पन्नता, विपन्नता दिखतीं है ।  ऐसों की माया जनित क्षुधा कभी शान्त नहीं होती ॥

कोउ आपुनि जाग जगै, कोउ जगावै सूर । 
बाँगढू कहे जागा जग, बाँग दिए अरुनचूर ।१४९३। 
भावार्थ : -- कोई सूर्योदय से पूर्व स्वयं जागृत हो जाता है, कोई सूर्योदय होने पर जागृत होता है । मूर्ख कव्वे   कहते है, रुदथ/मुर्गे के बाँग देने से जग-जागरण होता है ॥

कुटिलता उसका है धरम , नेता जिसकी जात । 
लात पेट में मार के, करे पीठ में घात ।१४९४।   


जैसेउ जमोगनी घिउ, टेढ़े करज निकसात । 
पहाड़ नीचक ऊँट अस, लाए बिनु नाहिं आत ।१४९५ । 
भावार्थ : -- जैसे जमा हुवा घृत उंगली टेढ़ी करने से ही निकलता है वैसे ही  पहाङी के नीचे लाए बिना ऊँट भी नहीं आता ॥ 


कुंजरहु चिउँटी डीठे, बइठत उँची पीठ । 
दिरिस का कछु दोष नहीं, दोषित तेरी दीठ।१४९६ ।  
भावार्थ : -- ऊँचे आसनों पर बैठ कर हाथी भी चींटीं दिखाई देता है, अन्यथा तो कहाँ हाथी कहाँ तू ।  इसमें दृश्य का कोई दोष नहीं है, हमारी दृष्टी दूषित है ॥

जुगौना है कि जोगना, पुनि पुनि माँगन आए । 
कौड़ी के जो जोग नहि, झोरी भर भर दाए ।१४९७। 
भावार्थ : -- ये पालनहार है, रक्षक हैं, कि भिखारी हैँ रक्षित हैँ । ''जो वारंवार माँगने खड़े हो जाते हैं' । कौड़ी भर के योग्य नहीं है, और तुम इन्हेँ झोली भर भर कर दे रहे हो ॥  


झूठ कंठ की तीस है, साँच कुलीनस कूल । 
झूठ  बीए कंटक उगे,साँच बोए फलफूल ।१४९८ । 
भावार्थ : -- मिथ्या कंठ की प्यास है तो सत्य नदी किनारे का जल है । झूठ बोने से कंटक ही उपजेगे सत्य बौने से फलफूल ॥ 


गौरस गौत्सर्जन की महिमा कही न जाए ।
भिषज् जलावन सार घिउ, दूध मलाई दाय ।१४९९।  
भावार्थ : -- गौ रस और गाउँ उत्सृजन् की महिमा वर्णनातीत है । यह भिषज् ईंधन, मख्खन घृत, दूध मलाई जेसे बहुंत से उत्पाद देते हैं ॥

जुगित जोग जोरन सौंह, परिहासित संवाद ।
बिलौरे कथन सार सह, महि के मिले स्वाद ।१५००।
भावार्थ : -- हास परिहास युक्त वक्तव्य जेसे दुग्ध-योग एवं दिया गया योजन है । जिसके मंथन से कथन-सार के सह आमोद-प्रमोद की मही प्राप्त होती है ॥

शनिवार, 3 मई 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४८ ॥ -----,

सीवॉं कूँ सैनी रखै, सैनी कूँ सैनैस । 
सद्चरित दुहु नैंन रखे, होत सुरक्छित देस ।१४८१ ।  
भावार्थ : -- सीमा को सैनिक  रक्षे । सैनिक को सेनापति । दोनों के नैनों में सद्चरित्र बसा हो, तब कोई देश सुरक्षीत होता है ॥  

 सज्जन को सेवक मिले, सेवक कू सनमान । 
मानहु के त्याग सोंह, होत जगत कल्यान ।१४८२। 
भावार्थ : -- सज्जनता को ही सेवक मिलना चाहिए । सेवक को सम्मान मिलना चाहिए ॥ जो इस सम्मान का भी त्याग करे,  उस त्याग से ही समस्त जगत का कल्याण सम्भव है ॥  

सँमली है कि धवली है, है भारी कि सुडोल । 
पापा जी धणी हो तो देखे कौण कपोल ।१४८३। 
भावार्थ : --  पहले का समय और था जब बड़े-बूढ़े कुटुम देखा करते थे,उसकी विरदावली देखा करते थे, कुटुम के सत्कृत्य देखते थे,गोधन, भूधन देखते थे और कन्या को देखे बिना ही संबंध  स्वीकार कर लेते थे । फिर कन्या देखने वाला समय आया  । अब तो समय ही ऐसा दिखावे वाला आ गया जी, सवलाई है कि मलमलाई है कि माड़ी है कि ठाड्डी है । पापा जी धनी हो  तो छोरी के गाल कोई ना देखे, पैसा वसूल है तो जो है कबूल है॥ 

सौजन सुजनता से तो आग फूस  का बैर । 
रायाजी देस बहार, फिरता मारे पैर ।१४८४। 
भावार्थ : --  तेरे इस राजा जी का सज्जनता, उदारशय, भलमनसाही, भद्रता से तो आग और फूस जैसा वैर है औऱ देस छोड़ के बाहर पैर मारे फिर रहा हे ।

देसाधीस धँसाए दिए, जगां चोरि की लाग । 
अन्न रतन के भाउ किए, ल्गा आग मेँ आग ।१४८५। 
भावार्थ : -- देस को इन बने हुवे अधीशों ने डुबो दिया डाका-चोरी की इन्हें लत पडी हुई है ॥ अन्न को इन्होंने रत्नों के भाव कर दिया पकाने की आग में आग लगा दी । खादन महंगा हो तो सत्ता सस्ते मेँ मिलती है, क्यों ?

रचे सलौने स्याम के, मंदर मनि गच ढार । 
गरुअन तो भूखी मरे, बैठे प्रभो बहार ।१४८६। 
भावार्थ : --  मणियों से खचित कर श्याम सलौने के मन्दिर रचे जा रहे हैं ।किन्तु गौवें तो भूखी मर रही है, वहां भगवान  कहाँ हैँ वे तो उन मन्दिरोँ के बाहर बैठे हैं ॥ फिर पूजा किसकी ?

पास देस में छुरी धर जपत राम का नाम ।  
जमुना गए जमुना दास, गंगा गंगा राम ।१४८७। 
भावार्थ : -- पार्श्व देश में छुरी रखे हैं राम का नाम जपते, जमुना गए जमुना दास गंगा 'गंगाराम' ॥

बिधाता जब जनम जुगाए, गिनकर दय उर साँस । 
धरे जोगवना जब लग, सबकुछ तेरे पास ।१४८७। 
भावार्थ : -- जन्मदाता ने जब जन्म का संयोग किया, तब हृदय को गिन कर ही सांस दी थी। जब तक  यह संकलित रहेगी तब तक तेरे पास सबकुछ है, इसके  टूट जाने के पश्चात तेरे पास  कुछ नहीं होगा ॥

काया जोगन में रहै, आया ना कछु काम । 
माया वाकी एहि रही, रहे न माया राम ।१४८८। 
भावार्थ : -- जो केवल काया का पालन-पोषण करने में ही अनुरक्त रहा, किसी के कुछ काम नहीं आया । कल वे माया राम नहीं रहे..... हाँ उसकी माया यहीं रह गई ॥

जाका नाउहि काल है, वाका कवन भरोस । 
जीवन जोगन छाँड़ि के, रह अपने संतोस ।१४८९। 
भावार्थ : -- जिसका नाम ही काल है, समय है, मृत्यु है, कलुषता है, अवसर है,  उसका क्या भरोसा न जाने कब उससे भेंट हो जाए । एतएव जीवन-साधन का संचय क परित्याग कर, और अपने संतोष में ही रह ॥

सीधी सीधी बात है, उलटा वाका पौन ।
चाकर राज नीति करे, करे चाकरी कौन ।१४९०। 
भावार्थ : -- सीधी सी बात है इनके सारे पंखें उलटे है । यदि चाकर राजनीति करेगा तो चाकरी कौन करेगा, राजा/सुवामी करेगा ?  क्यों उद्योग जगत ?


शुक्रवार, 2 मई 2014

----- मिनिस्टर राजू १२८ -----

राजू : -- मास्टर जी ! आम खाना है..,

" चुब्बे गरिबहा कहीं का, तू आम खाएगा"

राजू : -- मास्टर जी ! अनार देखना है..,

" तू अनार देखेगा, टी.वी. वाला पड़ौसी है तेरे पास ?'

राजू : --  अच्छा तो इमली चख लूं, मास्टर जी !

' उसके चटखारे से तो एक सौ पच्चीस कऱोड हो गए, और केतना चखेगा" 

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...