भरी धरा उष्मा बसन, उपरन ऊर्मी माल ।
ऊमरिया मह अधोयन, पतनत ऊषक काल ।१३९१ ।
भावार्थ : -- धरती ने ग्रीष्मऋतु के वस्त्र आभारित किये जिसके आँचल में सिंधु तरंगित है । यह आँचल निशा काल में ऊपर उठता है दिवस काल में पुन:उनके चरणों में अवनत हो जाता है ॥
मनभावन अनुभूति के, दूज नाउ संतोख ।
दुःख आरत पीर क्लेष, जे नयनन के दोष ।१३९२।
भावार्थ : -- मन को भाने वाली अनुभूतियाँ अर्थात सुख का दुसरा नाम संतोष है । दुःख,आर्त, पीड़ा, कष्ट यह एक दृष्टि-दोष है, ऊपर देखो तो दुःख ही दुःख है, नीचे देखो तो सुख ही सुख है ॥
हिमालय के श्रृंग सिखर, सागर सेतु बँधान ।
पनज नदि का निर्मल जर, भारत की पहचान ।१३९३।
भावार्थ : -- हिमालय पर्वत के श्रृंग से शिखर, सागर पर बंधा सेतु, गंगा नदी का पवित्र जल भारत देश की पहचान हैं ॥
स्पष्टीकरण : -- "इनमें दो प्राकृतिक एवं एक पाशविक सह मानविय कृति है"किसी देश के पास है कोई पशुओं द्वारा निर्मित कृति ?
बागीसा कि सरित जब, रह अपनी मरजाद ।
श्रोता बकता बिच तबहि , बँधे सेतु संवाद ।१३९४।
भावार्थ : -- वाणी की सरिता जब अपनी मर्यादा में रहती है । श्रोता एवं वक्ता के मध्य संवाद का सेतु तभी बंधनीय है ।।
हे कर कंत भासवंत, भासन ऐसो भास ।
तपन आपनि गहन रहे, भू भर पुंज प्रकास ।१३९५ ।
भावार्थ : -- हे केतु कांत हे भास्वंत यदि तुम्हे भासित होना है तो इस भांति भासित हो । ताप स्वयं में गृहीत रहे, भूमि प्रकाश के पुंज से भर जाए ।
हे संत हे भास्वंत, भासन ऐसो भास ।
कंटक सुमन गहे रहे, पवन लहे जस बास ।१३९६।
भावार्थ : -- हे सज्जन ! हे वाणी के कान्त ! तुम्हे व्याख्यान ऐसा करना चाहिए । जैसे कंटक सुमन ग्रहण करता है और सुंगंध वायु को प्राप्त होती है ॥
सब्द सहार देइ कहे, सो तो नाही दान ।
आपनी कीरति आप मुख कहत होइ कल्यान ।१३९ ७ ।
भावार्थ : -- जो शब्दों के सहारे मुखरित होता हो वह दान नहीं है । जो दान अपनी कीर्ति अपने मुख करता हो वही कल्याण कारी है ॥
कल्यान फिर ऐसा हो, सब काहू करि हेतु ।
सगुन अगुन चेताचेत, अग जग लग हो जेत ।१३९ ८।
भावार्थ : -- कल्याण फिर ऐसा हो जो समस्त संसार में जीअतने भी दृश्य-अदृश्य हैं,जड़-चतन हैं वह सबका ही हित करे ॥
दूज लेखे पोछन ते, होत नहीं बड़ रेख ।
रेख तबहि बड़ होत है, जब लेखे बड़ लेख ।१३९९ ।
भावार्थ : -- बड़ी लिखने से ही लकीर बड़ी होती है, दूसरों की पोछने से अपनी छोटी लकीर बड़ी नहीं हो जाती ॥
भलजन के करुबर कथन, जस अगहन की बारि ।
खलजन के सुमधुर बचन, वाकी धारा सारि ।१४००।
भावार्थ : -- भले मानुष के कडुवे कथन मार्ग शीर्ष माह की वर्षा के समान होते हैं । दुष्टजनों के मधुर वचन उसकी धरा वृष्टि के समान होते हैं ॥
ऊमरिया मह अधोयन, पतनत ऊषक काल ।१३९१ ।
भावार्थ : -- धरती ने ग्रीष्मऋतु के वस्त्र आभारित किये जिसके आँचल में सिंधु तरंगित है । यह आँचल निशा काल में ऊपर उठता है दिवस काल में पुन:उनके चरणों में अवनत हो जाता है ॥
मनभावन अनुभूति के, दूज नाउ संतोख ।
दुःख आरत पीर क्लेष, जे नयनन के दोष ।१३९२।
भावार्थ : -- मन को भाने वाली अनुभूतियाँ अर्थात सुख का दुसरा नाम संतोष है । दुःख,आर्त, पीड़ा, कष्ट यह एक दृष्टि-दोष है, ऊपर देखो तो दुःख ही दुःख है, नीचे देखो तो सुख ही सुख है ॥
हिमालय के श्रृंग सिखर, सागर सेतु बँधान ।
पनज नदि का निर्मल जर, भारत की पहचान ।१३९३।
भावार्थ : -- हिमालय पर्वत के श्रृंग से शिखर, सागर पर बंधा सेतु, गंगा नदी का पवित्र जल भारत देश की पहचान हैं ॥
स्पष्टीकरण : -- "इनमें दो प्राकृतिक एवं एक पाशविक सह मानविय कृति है"किसी देश के पास है कोई पशुओं द्वारा निर्मित कृति ?
बागीसा कि सरित जब, रह अपनी मरजाद ।
श्रोता बकता बिच तबहि , बँधे सेतु संवाद ।१३९४।
भावार्थ : -- वाणी की सरिता जब अपनी मर्यादा में रहती है । श्रोता एवं वक्ता के मध्य संवाद का सेतु तभी बंधनीय है ।।
हे कर कंत भासवंत, भासन ऐसो भास ।
तपन आपनि गहन रहे, भू भर पुंज प्रकास ।१३९५ ।
भावार्थ : -- हे केतु कांत हे भास्वंत यदि तुम्हे भासित होना है तो इस भांति भासित हो । ताप स्वयं में गृहीत रहे, भूमि प्रकाश के पुंज से भर जाए ।
हे संत हे भास्वंत, भासन ऐसो भास ।
कंटक सुमन गहे रहे, पवन लहे जस बास ।१३९६।
भावार्थ : -- हे सज्जन ! हे वाणी के कान्त ! तुम्हे व्याख्यान ऐसा करना चाहिए । जैसे कंटक सुमन ग्रहण करता है और सुंगंध वायु को प्राप्त होती है ॥
सब्द सहार देइ कहे, सो तो नाही दान ।
आपनी कीरति आप मुख कहत होइ कल्यान ।१३९ ७ ।
भावार्थ : -- जो शब्दों के सहारे मुखरित होता हो वह दान नहीं है । जो दान अपनी कीर्ति अपने मुख करता हो वही कल्याण कारी है ॥
कल्यान फिर ऐसा हो, सब काहू करि हेतु ।
सगुन अगुन चेताचेत, अग जग लग हो जेत ।१३९ ८।
भावार्थ : -- कल्याण फिर ऐसा हो जो समस्त संसार में जीअतने भी दृश्य-अदृश्य हैं,जड़-चतन हैं वह सबका ही हित करे ॥
दूज लेखे पोछन ते, होत नहीं बड़ रेख ।
रेख तबहि बड़ होत है, जब लेखे बड़ लेख ।१३९९ ।
भावार्थ : -- बड़ी लिखने से ही लकीर बड़ी होती है, दूसरों की पोछने से अपनी छोटी लकीर बड़ी नहीं हो जाती ॥
भलजन के करुबर कथन, जस अगहन की बारि ।
खलजन के सुमधुर बचन, वाकी धारा सारि ।१४००।
भावार्थ : -- भले मानुष के कडुवे कथन मार्ग शीर्ष माह की वर्षा के समान होते हैं । दुष्टजनों के मधुर वचन उसकी धरा वृष्टि के समान होते हैं ॥
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