बाहरि भू को अरु भेस, भित बिपरीत अगास ।
तिनपर बिंग बचन कहत, करे जगत परिहास ।१४४१।
भावार्थ : -- बाहर की भूमि कुछ और ही वेश में है अंतर में कोई दुसरा ही आकाश हैं । ऐसों के ऊपर ही कटाक्ष करते हुवे दुनिया हंसती है ।
अर्थात : -- आप यदि कोई संत-फंत नहीं हैं किसी गुरु के फुरु नहीं हैं, कोई राजा नहीं है, एक साधारण सा बाजा हैं । और यदि आप अंग्रेज के रंगरेज भी नहीं हैं तो ऐसा वेश वरण कीजिए जैसे सभी वरण करते हैं ॥
धर्म सों भए भव मोचन , अरु भगवन के लाह ।
करे जोई उपार्जन, वह धरमन फल नाह ।१४४२।
भावार्थ : -- इस संसारमें धर्म मोक्ष प्राप्ति का एवं ईश्वर की प्राप्ति का साधन है । धर्म उपार्जन का साधन नहीं है उपार्जन करने से धर्म फलीभूत नहीं होता ॥
जनम लेइ जो जगत मैं, तेतक बिषयन लाह ।
जेतक मह जथेष्ठ हो, जीवन के निर्वाह ।१४४३।
भावार्थ : -- जब इस जगत में जन्म हो ही गया है, इस संसार में आ ही गए हैं तो उतने विषयों की कामना करनी चाहिए जीवन-निर्वाह के लिए जितना पर्याप्य हो । क्योंकि वापस जाना भी है ||
जैसे सागर सों मिले जल के सकल प्रबाह ।
ग्यान में लयलीन हो, तैसे मनोग्रही लाह ।१४४४।
भावार्थ : -- जल के समस्त प्रवाह जैसे सागर में समाहित हो जाते हैं । वैसे ही मन की कामनाए उसका लौलुपता आदि विकारों को ज्ञान के सिंधु में समा जाना चाहिए ॥
जल सों प्रान के अधार, जल सों बुझत प्यास ।
जल सों सौच रूप गंध, जल सों बिय बिन्यास ।१४४५।
भावार्थ : -- प्राण जल पर ही आधारित होते हैं । जल से ही तृषा क्षयित होती है । जल से ही सुचिता का सौम्य है जल से रूप का स्वरूप है जल से ही सुगंध का अस्तित्व है, संसार के समस्त बीजों का आधार जल ही है ॥
जल बिहिन अस्थान में, हो जल के उद्गार ।
सरिबर कर निर्मान तहाँ, धारे दानाधार ।१४४६।
भावार्थ : -- जो स्थान जलवियुक्त हो और वहां यदि कोई जल का स्त्रोत हो तब उस स्थान पर सरोवर का निर्माण कर जलदान के अतिशय पुण्य की प्राप्ति के सह दान का आधार निर्मित होता है । कारण कि दान जीवन धन से ही संयोजित कर्म है ॥
जागे द्युति अगनी सों, सो तो दीपक होए ।
जाकी दीप्ति आप सों, द्यवन कह सब कोए ।१४४७।
भावार्थ : - जो अग्नि के द्वारा प्रदीप्त होता है वह दीपक कहलाता है । जो स्वयं में ही दैदीप्यमान हो उसे सूर्यदेव कहते हैं ॥
मुष्टिका भर तमस हरे, सोइ दीप निस्तेज ।
जोइ अगजग लग उजरे, गहे सूर के तेज ।१४४८।
भावार्थ : -- जो केवल मुट्ठी भर अन्धकार का ही हरण करने में समर्थ हो वह दीपक के सदृश्य निस्तेज है । जो समस्त संसार को दैदीप्यमान करता हो वही सूर्य के तेज से युक्त है ॥
जगर मगर दीपक करे , हरे न जग अँधियार ।
अरु जब नभ केतु उतरे, भरे सकल उजियार ।१४४९।
भावार्थ : -- दीपक जगर मगर करते रहते हैं । जगत का अंधियारा तो फिर भी नही जाता ॥ जैसे ही सूर्य का उदय होता है वह सारे जगत में उजाला भर देता है ॥
साँच को जब झूठ कहे, सो तो पीरा दाए ।
झूठ कह कहि साँच चहे, सोई धूत सुभाए ।१४५०।
भावार्थ : -- सत्य को जब कोई असत्य कहे तो वह पीड़ा दायक होता है । असत्य कथन और सत्य कथ्य की अपेक्षा वह धूर्तता है ॥
तिनपर बिंग बचन कहत, करे जगत परिहास ।१४४१।
भावार्थ : -- बाहर की भूमि कुछ और ही वेश में है अंतर में कोई दुसरा ही आकाश हैं । ऐसों के ऊपर ही कटाक्ष करते हुवे दुनिया हंसती है ।
अर्थात : -- आप यदि कोई संत-फंत नहीं हैं किसी गुरु के फुरु नहीं हैं, कोई राजा नहीं है, एक साधारण सा बाजा हैं । और यदि आप अंग्रेज के रंगरेज भी नहीं हैं तो ऐसा वेश वरण कीजिए जैसे सभी वरण करते हैं ॥
धर्म सों भए भव मोचन , अरु भगवन के लाह ।
करे जोई उपार्जन, वह धरमन फल नाह ।१४४२।
भावार्थ : -- इस संसारमें धर्म मोक्ष प्राप्ति का एवं ईश्वर की प्राप्ति का साधन है । धर्म उपार्जन का साधन नहीं है उपार्जन करने से धर्म फलीभूत नहीं होता ॥
जनम लेइ जो जगत मैं, तेतक बिषयन लाह ।
जेतक मह जथेष्ठ हो, जीवन के निर्वाह ।१४४३।
भावार्थ : -- जब इस जगत में जन्म हो ही गया है, इस संसार में आ ही गए हैं तो उतने विषयों की कामना करनी चाहिए जीवन-निर्वाह के लिए जितना पर्याप्य हो । क्योंकि वापस जाना भी है ||
जैसे सागर सों मिले जल के सकल प्रबाह ।
ग्यान में लयलीन हो, तैसे मनोग्रही लाह ।१४४४।
भावार्थ : -- जल के समस्त प्रवाह जैसे सागर में समाहित हो जाते हैं । वैसे ही मन की कामनाए उसका लौलुपता आदि विकारों को ज्ञान के सिंधु में समा जाना चाहिए ॥
जल सों प्रान के अधार, जल सों बुझत प्यास ।
जल सों सौच रूप गंध, जल सों बिय बिन्यास ।१४४५।
भावार्थ : -- प्राण जल पर ही आधारित होते हैं । जल से ही तृषा क्षयित होती है । जल से ही सुचिता का सौम्य है जल से रूप का स्वरूप है जल से ही सुगंध का अस्तित्व है, संसार के समस्त बीजों का आधार जल ही है ॥
जल बिहिन अस्थान में, हो जल के उद्गार ।
सरिबर कर निर्मान तहाँ, धारे दानाधार ।१४४६।
भावार्थ : -- जो स्थान जलवियुक्त हो और वहां यदि कोई जल का स्त्रोत हो तब उस स्थान पर सरोवर का निर्माण कर जलदान के अतिशय पुण्य की प्राप्ति के सह दान का आधार निर्मित होता है । कारण कि दान जीवन धन से ही संयोजित कर्म है ॥
जागे द्युति अगनी सों, सो तो दीपक होए ।
जाकी दीप्ति आप सों, द्यवन कह सब कोए ।१४४७।
भावार्थ : - जो अग्नि के द्वारा प्रदीप्त होता है वह दीपक कहलाता है । जो स्वयं में ही दैदीप्यमान हो उसे सूर्यदेव कहते हैं ॥
मुष्टिका भर तमस हरे, सोइ दीप निस्तेज ।
जोइ अगजग लग उजरे, गहे सूर के तेज ।१४४८।
भावार्थ : -- जो केवल मुट्ठी भर अन्धकार का ही हरण करने में समर्थ हो वह दीपक के सदृश्य निस्तेज है । जो समस्त संसार को दैदीप्यमान करता हो वही सूर्य के तेज से युक्त है ॥
जगर मगर दीपक करे , हरे न जग अँधियार ।
अरु जब नभ केतु उतरे, भरे सकल उजियार ।१४४९।
भावार्थ : -- दीपक जगर मगर करते रहते हैं । जगत का अंधियारा तो फिर भी नही जाता ॥ जैसे ही सूर्य का उदय होता है वह सारे जगत में उजाला भर देता है ॥
साँच को जब झूठ कहे, सो तो पीरा दाए ।
झूठ कह कहि साँच चहे, सोई धूत सुभाए ।१४५०।
भावार्थ : -- सत्य को जब कोई असत्य कहे तो वह पीड़ा दायक होता है । असत्य कथन और सत्य कथ्य की अपेक्षा वह धूर्तता है ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें