बुधवार, 30 अप्रैल 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४७॥ -----,

पाँखी लगाए देस नै, उडाए फिरैं बहार ।  
राखने रखे आप हुँत, रखे सचिव सम्भार ।१४७१। 
भावार्थ : -- पंख तो देश ने लगाए । जी मंत्रीजी उड़ते फ़िरते है देस के बाहार । जनार्दन ने टिकस दे के  आउर अपणी भूँ समपदा दे अपने हेतु रक्षक रखे थे । जो मंत्रियों की ही सुरक्षा में लगे रहते हैं, बन्द करो इनके लिए टिकस देना, । मंत्री मर-मुरा गए तो औऱ भतेरे सब पंखो वाले होना चाहते हैं ॥ 

"सुन रे मंत्री सुन रे नेता, मैं भी पंखो वाला होता" 

टिप्पणी : -- भारत का कोई भी राष्ट्रपति कोई भी प्रधानमन्त्री आतंकवादीयों के हाथों नहीं मरा, एक मरा तो वह अंगरक्षकों के द्वारा ही मरा, भूतों का क्या है वे तो मर कर भी नहीँ मरते..... 


देख भिखारि माँग रहा, कपट बेस कर जोट । 
मरजाद की रेख भीत, तू रह आपनि ओट ।१४७२। 
भावार्थ : -- देख यह जो भिखारी भिक्षा मांग रहा है वह कर जोड़ें हुवे हैं यह बाहरी  सजन्नता है  पर उसके अन्तर से वह दुष्ट हैं । तू जल सम्पदा, धन सम्पदा, प्राकृतिक सम्पदा, रूप सम्पदा, से युक्त है अत: तू मर्यादा के रेखा के भीतर अपने आवरणों में रह ॥ अन्यथा त्याग हेतु तैयार रह ॥   

सत्ता मत्ता में रहे, दस गुन सन दस सीस । 
भए बिलग तपबल के जब, बान लगे एक तीस ।१४७३। 
भावार्थ : -- सत्ता के  अहंकार में रहे वो भी दस सिरो के सह दस गुना । जब तप की शक्ति के एकतीस बान लगे तब अहङ्कार कहीं गया सिर कहीं गए,  देह कही ॥    

 मत दायन सुवारथ कर भई अएसी कुरीत । 
 गुंठनबती चढ़ी चिता  प्रीतम की कर प्रीत ।१४७४।  
भावार्थ : -- स्वार्थीयों के हाथ ने मत दान को ऐसा कुरीति में परिवर्तित कर दिया । जैसे इस देश में कभी घूँघट व सती की कुप्रथा थी । घुंघटवालियाँ कहती थीं मरूँ या जिऊँ मैं तो अपने प्रीतम के साथ ही बरूंगी ॥ अब दृश्य थोड़ा उलटा हो गया है वाली का स्थान वाला ने ले लिया है कहते हैं फूटूं या साबुत रहूं मैं तो मत देऊंगा ही ॥ 

दाता बोले मैं बड़ा, गाही मैं मैँ कार । 
जे जगत सोय बड़ा जो, सबका देवनहार ।१४७६। 
भावार्थ : -- दाता बोले मेन बड़ा, ग्रहिता मैं मैं करे । इस संसार में वाही बड़ा है जो सबका देने वाला है । जिसने यह सृष्टि रची है ॥

धरती धरती ररत रहि, घन घन लई सँचाए । 
अंत काल जब आएगा, धरती दिये मिलाए ।१४७७। 
भावार्थ : -- हाय प्रापार्टी ! हाय हाय प्रापार्टी !! रटते रहे और घनी घनी संचै कर ली । सांस पूरे होने पर जब काल आएगा तब पहले वह तुझे इसी प्रापार्टी में मिलाते हुवे ले जाएगा ॥ जैसे बाबूजी को ले गया था ॥

देखो धूप बरख रही, सागर नाथ न्हाए । 
धनबन घन बिहीन रहे, पाहन घन घन पाए ।१४७८। 
भावार्थ : -  देखो धूप बरस रही है सागर जी नहा रहे हैं। गगन घन से रहित है और पाहन गहनतम घन को प्राप्त है ॥

सेवा कूँ अभाव मिले, धर्मादा सँजोइ। 
साधू फ़िर परमारथ के, जोग कहाँ सौं होइ ।१४७९। 
भावार्थ : -- जहां सेवापन,  अभाव से जा मिले, एवम धर्म के निमित्त धन से  उसका  संचयी मिल जाए । हे सज्जनों फ़िर परमार्थ कहाँ से होगा ॥  

सेवक सेवा भाव लिए स्वामि सेबि सुभाउ । 
दोउ जग परमारथ किए, दूरय  होत अभाव ।१४८०। 
भावार्थ : -- जब सेवक सेवाभाव ग्रहण किये हो एवम स्वामी का स्वभाव उपासना योग्य हो  । फिर दोनों के सम्मीलित परमार्थ कृत्या से ही अभाव दूर होते हैँ ॥ 






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