शनिवार, 26 अप्रैल 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४६॥ -----

आपनि जनम भुराए के, मनवा कहँ लग जाए ।
खड़ी है मीचक पापनि, अवाए जी लेवाए ।१४६१।
भावार्थ : -- अपना जन्म भुलाना  कर हे मन तू कहाँ तक जाएगा ।आए जीवन को ले जाने के लिए  आगे पापानि मृत्यु खडी है ॥

पाँच बछर चेत्यो नहि, खा खा पाली देह । 
नाथ के सुधि करयो नहि, आस करे अब नेह ।१४६१। 
भावार्थ : -- पांच बरस तक तो चेत नहीं आया, खा खा के देह पाल ली, परदेसी हो गई । नाथ की सुधि भी नहीं ली अच्छा है कि बीमार है तीरथ गया है, अब इस भैंस को प्रीत्तम का प्यार चाहिए ||


यहु चित्र चितइ रहे चकित, रमतु म्हारे देस | 
राजा मैला भेस मैं, सेवक राजा भेस | 1462 | 
भावार्थ : -- पर्यटक जब हमारे देश आते हैं तब यह चित्र देख कर दांग रह जाते हैं | कि राजा की वेशभूषा मैली है और सेवकों की भूषा राजसी है || 


उत महजिद इत देहरा, कचहरि सों गढ़बाए | 
बन्दे देस भरे पड़े, खुदा कहाँ सन लाए |1464| 
भावार्थ : -- और क्या देखते हैं ? उधर मस्जिद इधर मंदिर वो भी कचहरी से बनवाए हैं | यह देश बन्दों से तो भरा पड़ा है पर ये खुदा कहाँ से लाए ?

राजा है कि सेवक हैं, सेवक है कि भिखारि | 
माँगनी बैठा वाका, खुदा बाहर दुआरि |1465| 
भावार्थ : --  राजा है कि सेवक है,सेवक है कि भिखारी | 
                   मांग रहा इनका खुदा बैठा बाहर दुआरी || 

अकिल बिहिने नेता जी, नकटे निपट गवाँर | 
सत्ता माया बस परे, जित नै समुझै हार |1466| 
भावार्थ :-- इनके बेअक्ले नेत्ता जी घणे  ही नकटे बेसरम से उज्जट गंवार और जाहिल से है | ये सत्ता और माया के वशीभूत होके  बुराइयों की लड़ाइयों में जितने को हार समझते हैं ||  

सेवक के नाउ को तो बोले जी जी कार । 
अरु राउ नाउ आपने, राखए माँग उधार ।१४६७। 
भावार्थ : -- पर्यटक और क्या देखते हैं : -- सेवक जी तो अपने नाम के आगे जी पीछे जी लगाकर जी जी कार करवा रहे हैँ । और राजा बेचारे ने अपना नाम भी उधारी माँग कर रखा है ।। 

पाँच बछर लग सुती के, उठि उठि देवल धाए । 
वासो कुम्भकरन भला, छहहिं मास जग आए ।१४६८। 
भावार्थ : -- पांच वर्ष तक नींद में गाफ़िल रहे । फिर उठ उठ कर काबे-कासी जा रहे हैं ॥ इनसे तो कुम्भकरण ही अच्छा है जो छ: महीने में उठ आता है ॥   

बिधि बंधन नेम बिधान, जे हुँत संपदबान । 
जाके झोरी कछु नहीं, धरी रही सब कान ।१४६८। 
भावार्थ : -- यह विधि-विबंधन, नियम-विधान यह केवल धनसपद, जलसम्पद, रूपसम्पद वान के लिए है । जिसकी झोली में कोई सम्पदा ही नहीँ उसके सम्मुख समस्त मर्यादा धरी की धरी रह जाती हैं ॥   
 
देहर महजिद आस हो, मिल जुग भगत बनाए  । 
सासन साँति राख करे, दंड घर दंड़ दाए  ।१४६९ । 
भावार्थ : -- यदि मन्दिर-मस्जिद अति आवश्यक एवम उचित हो तब भक्तगण मिलजुल कर उसका निर्माण करें । शासन का यह कर्त्तव्य है कि वह शान्ति व्यवस्था एवम सुरक्षा का प्रबंध करे, न्यायालय का यह कर्त्तव्य है कि दूषित तत्त्वों दंड दे, न की मन्दिर मस्जिद बनवाए ॥  

राम नामी ओढ़ि लिये, रोल मचाये धाम । 
राज रचाया आपना, रोया सारा गाम ।१४७० । 
भावार्थ : -- रामनामी ओड के राम के धाम मेँ राणीगैल मचा दिया । इनका तो राज रच ग्या । गाम रोता रह गया । इब इस लँडूरे ने ले आए ॥ 


  



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