भला कारत बुरा कहे, सो तो पीरा दाइ ।
बुरा करत भलाइ चहे, कँह तिन आसुरताइ ।१४५१।
भावार्थ : -- भला करते हुवे भी यदि कोई बुरा कहे तो वह कथन पीड़ादायी है । बुराई करे और भलाई की अपेक्षा रखे वह आसुरी स्वभाव कहा जाता है ॥
भला करत अपयस लहे, अगजग देउ कहाए ।
बुरा करे अरु जस चहे, सोइ असुर कहलाए ।१४५२।
भावार्थ : -- भला करे और अपयश भी ग्रहण किए संसार में वह देव कहलाए । बुरा भी किया और कीर्ति की भी चाह किए वही आसुर कहा गया ॥
ऊँचि पीठ आसीन अरु, मन माया भरमाए ।
कित बैठे ब्यास राज, अपनी पौथी ठाएँ ।१४५३।
भावार्थ : -- ऊंची आसंदी पर आसीत हैं औऱ चित्त में तो विलासिता की साधन स्वरूपा माया मेँ भ्रमित हैवहाँ नेता बैठे हुवे हैँ मंत्री बैठे हैँ, चुनाव घुसा बैठा है । हे व्यास महाराज ! धन्य हो आप कहाँ बैठे हैं कृपाकर अपनी पोथी उठा ले जाएं तो अच्छा होगा ॥
बेद बिहित पुरान कहित सद बचन के बिद्रोहि ।
माया कृत दोष गुन गहि, कलजुग के बिप्र होहि ।१४५४।
भावार्थ : -- बुद्ध प्रबुद्ध जन कह गए हैं कि जो वेद विहित पुराण कहित सद वचनो क विद्रोही होंगेः एवम माया रचित दोषो एवम गुणोँ के ग्राही होंगे वही कलयुग के विप्र होंगे । उनकी प्रेरणा से ही यह कलयुग घोर हो जाएगा । इसलिए सद्पात्र को ही दान देना चाहिए कुपात्र को दिया गया दान दुर्गति करता है ॥
निसदिन रसना रहे जब, आपुनि कुल के राग ।
लाग के घर भूत जगे, लगे गृहस मेँ आग ।१४५५।
भावार्थ : -- जब निसदिन जिह्वा पर अपने ही कुल का राग ( जैसे मेरी माता, मेरे पिता , मरइ दादी, मेरे भ्राता ) रहता है । तब घर में झगड़े के भूत जग जाते हैं और गृहस्थी में आग लग जाती है । जब अपनी समस्या केवल एक इन ला लगाने से आधी हो जाएं तो लगाने अपने बाप का क्या जाता है।
धर्मी कहे चरन न चरे, वा सो खल ना कोए।
गुन परिहार दोष बरे, खल सह धूरत होए ।१४५६।
भावार्थ : -- यदि कोई किसी धर्म विशेष का अनुयायी कहता हो और उस धर्म का अनुशरण नहीं करता हो उसके समान कोई दुष्ट नहीं है । यदि कोई ऐसे धर्म के गुन को छोड़ कर केवल उसके दोषों को ग्रहण करता हो वह दुष्ट के सह धूर्त्त भी है ॥
" केवल दान लो, कल्यान मत करो '
आपनि आँखि मूँदि के, दुज के देखे दोष ।
दूषन देखा आपुना, तू दोषो का पोष ।१४५७।
भावार्थ : -- अपनी आँखें मूँद के दूजों के दोष देखे । जब अपना दूषण देखने लगे तब यह पाया कि उन दोषों क पौषक तो तू ही है ॥
घोर कलयुग का अर्थ है : -- बाप बेटी को नहीं छोड़ेगा, बेटा माँ को नहीं छोडेगा, विचित्र प्रकार की संतति जन्म लेंगी शासन के नाम पर जंगल राज होगा, न्याय फुटकर दुकानो में बिकेगा.....
सूर्योदय हुवे बिना अँधेरे दूर नहीँ होते..,
जले औरों के बल वो दीपक सूर नहीँ होते.....
दीप बरत कुन कुन करत, गहन रहे अँधियार ।
होत सूर जब असहमत, भये जगत उजियार ।१४५८।
भावार्थ : -- दीपक के असहमत होने से अंधेरे नहीँ जाते इस हेतु सूर्य बनना पड़ता है । जब सूर्य अँधेरे से असहमत होता है तभी संसार उज्जवल होता है ॥ एक प्रबुद्ध ने खा रात विधाता का एक दोष है । किन्तु यदि रात नहीं होती तो हमें चाँद तारे दिखाई नहीं देते हमें गगन के विस्तार संज्ञान नहीँ होता, अर्थात अँधेरे का भी अपना महत्व है ॥
यह जन रूप जनार्दन, देवन बहुस उदार ।
आपुनि झोरी देख फिर, कोच उचित कर धार ।१४५९।
भावार्थ : -- यह जनता है जो ईश्वर स्वरूप है । यह देने में बहुंत ही उदार है ॥ पहले अपने गन अवगुण देखने चाहिए । फिर संकोच करते हुवे यथा उचित ही लेना चाहिए ॥ ऐसा नहीं की ये देते जाए तू घर भर ले ॥
काम जगे जो भाव सन, मिले नहीं भग्वान ।
ना तू तासु परच पहै , ना वो तोहे जान । १४६०।
भावार्थ : -- यदि श्रद्धा भक्ति सेवा के सह महत्वाकांक्षाएं जागृत हो जाएं तब भगवान नहीं मिलते । मिले भी तो न तुम उससे परिचित होगे न वो तुमसे ॥
बुरा करत भलाइ चहे, कँह तिन आसुरताइ ।१४५१।
भावार्थ : -- भला करते हुवे भी यदि कोई बुरा कहे तो वह कथन पीड़ादायी है । बुराई करे और भलाई की अपेक्षा रखे वह आसुरी स्वभाव कहा जाता है ॥
भला करत अपयस लहे, अगजग देउ कहाए ।
बुरा करे अरु जस चहे, सोइ असुर कहलाए ।१४५२।
भावार्थ : -- भला करे और अपयश भी ग्रहण किए संसार में वह देव कहलाए । बुरा भी किया और कीर्ति की भी चाह किए वही आसुर कहा गया ॥
ऊँचि पीठ आसीन अरु, मन माया भरमाए ।
कित बैठे ब्यास राज, अपनी पौथी ठाएँ ।१४५३।
भावार्थ : -- ऊंची आसंदी पर आसीत हैं औऱ चित्त में तो विलासिता की साधन स्वरूपा माया मेँ भ्रमित हैवहाँ नेता बैठे हुवे हैँ मंत्री बैठे हैँ, चुनाव घुसा बैठा है । हे व्यास महाराज ! धन्य हो आप कहाँ बैठे हैं कृपाकर अपनी पोथी उठा ले जाएं तो अच्छा होगा ॥
बेद बिहित पुरान कहित सद बचन के बिद्रोहि ।
माया कृत दोष गुन गहि, कलजुग के बिप्र होहि ।१४५४।
भावार्थ : -- बुद्ध प्रबुद्ध जन कह गए हैं कि जो वेद विहित पुराण कहित सद वचनो क विद्रोही होंगेः एवम माया रचित दोषो एवम गुणोँ के ग्राही होंगे वही कलयुग के विप्र होंगे । उनकी प्रेरणा से ही यह कलयुग घोर हो जाएगा । इसलिए सद्पात्र को ही दान देना चाहिए कुपात्र को दिया गया दान दुर्गति करता है ॥
निसदिन रसना रहे जब, आपुनि कुल के राग ।
लाग के घर भूत जगे, लगे गृहस मेँ आग ।१४५५।
भावार्थ : -- जब निसदिन जिह्वा पर अपने ही कुल का राग ( जैसे मेरी माता, मेरे पिता , मरइ दादी, मेरे भ्राता ) रहता है । तब घर में झगड़े के भूत जग जाते हैं और गृहस्थी में आग लग जाती है । जब अपनी समस्या केवल एक इन ला लगाने से आधी हो जाएं तो लगाने अपने बाप का क्या जाता है।
धर्मी कहे चरन न चरे, वा सो खल ना कोए।
गुन परिहार दोष बरे, खल सह धूरत होए ।१४५६।
भावार्थ : -- यदि कोई किसी धर्म विशेष का अनुयायी कहता हो और उस धर्म का अनुशरण नहीं करता हो उसके समान कोई दुष्ट नहीं है । यदि कोई ऐसे धर्म के गुन को छोड़ कर केवल उसके दोषों को ग्रहण करता हो वह दुष्ट के सह धूर्त्त भी है ॥
" केवल दान लो, कल्यान मत करो '
आपनि आँखि मूँदि के, दुज के देखे दोष ।
दूषन देखा आपुना, तू दोषो का पोष ।१४५७।
भावार्थ : -- अपनी आँखें मूँद के दूजों के दोष देखे । जब अपना दूषण देखने लगे तब यह पाया कि उन दोषों क पौषक तो तू ही है ॥
घोर कलयुग का अर्थ है : -- बाप बेटी को नहीं छोड़ेगा, बेटा माँ को नहीं छोडेगा, विचित्र प्रकार की संतति जन्म लेंगी शासन के नाम पर जंगल राज होगा, न्याय फुटकर दुकानो में बिकेगा.....
सूर्योदय हुवे बिना अँधेरे दूर नहीँ होते..,
जले औरों के बल वो दीपक सूर नहीँ होते.....
दीप बरत कुन कुन करत, गहन रहे अँधियार ।
होत सूर जब असहमत, भये जगत उजियार ।१४५८।
भावार्थ : -- दीपक के असहमत होने से अंधेरे नहीँ जाते इस हेतु सूर्य बनना पड़ता है । जब सूर्य अँधेरे से असहमत होता है तभी संसार उज्जवल होता है ॥ एक प्रबुद्ध ने खा रात विधाता का एक दोष है । किन्तु यदि रात नहीं होती तो हमें चाँद तारे दिखाई नहीं देते हमें गगन के विस्तार संज्ञान नहीँ होता, अर्थात अँधेरे का भी अपना महत्व है ॥
यह जन रूप जनार्दन, देवन बहुस उदार ।
आपुनि झोरी देख फिर, कोच उचित कर धार ।१४५९।
भावार्थ : -- यह जनता है जो ईश्वर स्वरूप है । यह देने में बहुंत ही उदार है ॥ पहले अपने गन अवगुण देखने चाहिए । फिर संकोच करते हुवे यथा उचित ही लेना चाहिए ॥ ऐसा नहीं की ये देते जाए तू घर भर ले ॥
काम जगे जो भाव सन, मिले नहीं भग्वान ।
ना तू तासु परच पहै , ना वो तोहे जान । १४६०।
भावार्थ : -- यदि श्रद्धा भक्ति सेवा के सह महत्वाकांक्षाएं जागृत हो जाएं तब भगवान नहीं मिलते । मिले भी तो न तुम उससे परिचित होगे न वो तुमसे ॥
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