खाल उढ़ाए सिंग के, सियार सिंग न होए ।
नाम धरे नर्सिंग के, होए न कलिंग कोए।१४३१।
भावार्थ : -- सिंग की खाल उड़ा देने से सियार सिंग नहीं होता । नर्सिंग का नाम रख लेने भर से ही कोई चातुर्य नहीं होता ।।
उलटी खप्परी के सों, नेता के गति भाउ ।
राउ बन निज सेवक कह, सेवक बन कहि राउ ।१४३२।
भावार्थ : -- इन नेताओं के विचार मूर्खों के जैसे होते हैं । जब स्वामी बनकर नौकर रखना हो तो स्वयं को नौकर कहते हैं जब नौकर रखे जाते हैं तो स्वयं को राजा कहते हैं, अभी तो सब राजा हैं नौकर कोई नहीं हैं ।।
राउ ही नय निरधारे, करे जंभुरा काज ।
जनता होत राउ जहाँ, जनता के हो राज ।१४३४।
भावार्थ : -- राजा ही नीतियों का निर्धारण करता है, सेवक उसे लागू करता है । जहां लोकतंत्र होता है वहां जनता ही राजा होती है ॥ अब नीति निर्धारण कौन करे जो राजा हो ॥
पीठ पलन पौढ़ाइ रहि, पेटक मन भर खाए ।
उँगरी किये काज गिने, चरन गगन उरियाए ।१४३५।
भावार्थ : -- पीठ पलंग में बिछी रही, पेट ने मन भर खाया । उंगली किये कामों को गिनती रही करी कुछ नहीं । चरण गगन में उड़ते रहे । यह निकम्मेपन का स्वभाव है ॥
कवन सासन ब्यवस्था , हो को अभेदि कोट ।
छन भंगुरा ढूह करे, भ्र्ष्टाचारी बिमोट ।१४३६।
भावार्थ : -- भ्रष्टाचार ऐसा दीमक है जो किसी भी शासन व्यवस्था के अभेद्य किले को क्षण भंगुरी टीले में परिवर्तित करने की सामर्थ्य रखता है ॥
देही राखन बसन दिए, जीवन भोजन दाए ।
चितबन् आत्मन दिए का, जोई भीत समाए ।१४३७।
भावार्थ : -- देह की रक्षा हेतु उसे वस्त्र दिए, जीवन की रक्षा हेतु उसे भोजन दिया । चित्त मन बुद्धि आत्मन जो भीतर समाए हैं उन्हें क्या दिया ॥
जीवन साधन आपणौ धारे कोच कुचाहि ।
सब कुछ यहहि धरे रहीं, जस तन जीवन जाहि ।१४३८।
भावार्थ : - अपने जीवन के साधनों को सिमित एवं संकुचित रखना चाहिए । जब यह तन यह जीवन समाप्त हो जाएगा तब सब कुछ यहीं धरा रह जाएगा, और कोई दूसरा खाएगा, तेरे भाग में तेरा पाप आएगा ॥
इष्टिका चित् न्यास सोंह, खचइत भवन अवास ।
प्रेम प्रीत प्रतीति सोंह, रचइत श्रील निवास । १४३९।
भावार्थ : -- ईंट पत्थरों के विन्यास से केवल भवनों का आवासों को खचा जाता है । प्रेम प्रीति और प्रतीति से ही शोभायुक्त लक्ष्मीवान निवास की रचना होती है ॥
सत्य ईश अनुभूति हुँत, सौच हुँत सोधार्थ ।
दया अहिंसाचरन हुँत, दान हुँत परमार्थ ।१४४०।
भावार्थ : -- सत्य का उद्देश्य ईश्वर की अनुभूति करवाना है, शौच सुचिता पवित्रता का उद्देश्य शुद्ध करना है शोध करना है । दया अहिंसा के आचरण हेतु है । दान परमार्थ हेतु दिया जाता है किसी जीव की ह्त्या या कुकृत्य कारण हेतु नहीं ॥
नाम धरे नर्सिंग के, होए न कलिंग कोए।१४३१।
भावार्थ : -- सिंग की खाल उड़ा देने से सियार सिंग नहीं होता । नर्सिंग का नाम रख लेने भर से ही कोई चातुर्य नहीं होता ।।
उलटी खप्परी के सों, नेता के गति भाउ ।
राउ बन निज सेवक कह, सेवक बन कहि राउ ।१४३२।
भावार्थ : -- इन नेताओं के विचार मूर्खों के जैसे होते हैं । जब स्वामी बनकर नौकर रखना हो तो स्वयं को नौकर कहते हैं जब नौकर रखे जाते हैं तो स्वयं को राजा कहते हैं, अभी तो सब राजा हैं नौकर कोई नहीं हैं ।।
राउ ही नय निरधारे, करे जंभुरा काज ।
जनता होत राउ जहाँ, जनता के हो राज ।१४३४।
भावार्थ : -- राजा ही नीतियों का निर्धारण करता है, सेवक उसे लागू करता है । जहां लोकतंत्र होता है वहां जनता ही राजा होती है ॥ अब नीति निर्धारण कौन करे जो राजा हो ॥
पीठ पलन पौढ़ाइ रहि, पेटक मन भर खाए ।
उँगरी किये काज गिने, चरन गगन उरियाए ।१४३५।
भावार्थ : -- पीठ पलंग में बिछी रही, पेट ने मन भर खाया । उंगली किये कामों को गिनती रही करी कुछ नहीं । चरण गगन में उड़ते रहे । यह निकम्मेपन का स्वभाव है ॥
कवन सासन ब्यवस्था , हो को अभेदि कोट ।
छन भंगुरा ढूह करे, भ्र्ष्टाचारी बिमोट ।१४३६।
भावार्थ : -- भ्रष्टाचार ऐसा दीमक है जो किसी भी शासन व्यवस्था के अभेद्य किले को क्षण भंगुरी टीले में परिवर्तित करने की सामर्थ्य रखता है ॥
देही राखन बसन दिए, जीवन भोजन दाए ।
चितबन् आत्मन दिए का, जोई भीत समाए ।१४३७।
भावार्थ : -- देह की रक्षा हेतु उसे वस्त्र दिए, जीवन की रक्षा हेतु उसे भोजन दिया । चित्त मन बुद्धि आत्मन जो भीतर समाए हैं उन्हें क्या दिया ॥
जीवन साधन आपणौ धारे कोच कुचाहि ।
सब कुछ यहहि धरे रहीं, जस तन जीवन जाहि ।१४३८।
भावार्थ : - अपने जीवन के साधनों को सिमित एवं संकुचित रखना चाहिए । जब यह तन यह जीवन समाप्त हो जाएगा तब सब कुछ यहीं धरा रह जाएगा, और कोई दूसरा खाएगा, तेरे भाग में तेरा पाप आएगा ॥
इष्टिका चित् न्यास सोंह, खचइत भवन अवास ।
प्रेम प्रीत प्रतीति सोंह, रचइत श्रील निवास । १४३९।
भावार्थ : -- ईंट पत्थरों के विन्यास से केवल भवनों का आवासों को खचा जाता है । प्रेम प्रीति और प्रतीति से ही शोभायुक्त लक्ष्मीवान निवास की रचना होती है ॥
सत्य ईश अनुभूति हुँत, सौच हुँत सोधार्थ ।
दया अहिंसाचरन हुँत, दान हुँत परमार्थ ।१४४०।
भावार्थ : -- सत्य का उद्देश्य ईश्वर की अनुभूति करवाना है, शौच सुचिता पवित्रता का उद्देश्य शुद्ध करना है शोध करना है । दया अहिंसा के आचरण हेतु है । दान परमार्थ हेतु दिया जाता है किसी जीव की ह्त्या या कुकृत्य कारण हेतु नहीं ॥
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंएक नज़र :- हालात-ए-बयाँ: ''कोई न सुनता उनको है, 'अभी' जो बे-सहारे हैं''