रविवार, 13 अप्रैल 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४२ ॥ -----

वासो को ना आँधरा, दिन मह दीप जराए । 
अरु सार जुगावन हेतु, धरनी दोहत जाए ।१४२१। 
भावार्थ : -- उस अंधे के जैसा कोई अंधा नहीं जो दिन में भी अंधका में रहता है और प्रकाश हेतु दीप जलाता है । औ उसके सार संयोजन हेतु पृथ्वी का निरंतर दोहन कर रहा है ॥ 

मुट्ठी भर अँधेरों की खातिर,   
चरागों की बेशुमारी देखिए.....

दूषन तन सँकोच बसन, अरु आभूषन दंड । 
पछिताउ मन लाज नयन, श्रृंगि कनक मनि षंड ।१४२२। 
भावार्थ : --  दोष अथवा अपराध यदि देह है तो संकोच ही उसका आवरण है । दंड उसके आभूषण है मन में पश्चाताप और नयन में लज्जा श्रृंगी कनक अर्थात आभूषण बनाने वाला स्वर्ण एवं रत्न समूह हैं ॥ 

अर्थाधार के सुबरन, चारै चरन त्याग । 
दानै दया प्रान मान, करत सकल अनुराग ।१४२३। 
भावार्थ : -- आर्थिक आधार पर जो स्वर्ण है अर्थात श्रेष्ठ वर्ग है उन्हें  त्याग का आचरण करना चाहिए दान दे तो सबके प्रति अनुराग रखते हुवे दया का दान करे प्राण-दान करें और अपने सम्मान का दान करें । 
                                                   कारण की इनका दिया हुवा दान इन्हीं  के वर्ग को ग्राह्य होगा और ग्रहिता की विषय वासनाओं और भोग विषयों के साधनों की ही व्यवस्था करेगा । त्याग साधारण मनुष्य से लेकर जीव-जंतुओं से लेकर सुक्ष-जीवों से लेकर निष्प्राण कण तक को प्राप्त होगा जो इनके लिए वरदान होगा इसे ही योगदान कहते हैं, 
                                                  मध्यम वर्ग एवं निम्न वर्ग को दान के साथ त्याग करना चाहिए, निम्न वर्ग को प्राण दया का दान करना चाहिए । सभी को बुराइयों का त्याग करना चाहिए ॥ 

उत्थान हुँत अवसरु दिए मिले सो कोइ कोई । 
कल्याण हुँत सत्कृत किए, सरबस लाहन होइ ।१४२४। 
भावार्थ : -- यदि किसी के उत्थान  हेतु  दिया गया अवसर किसी किसी को ही प्राप्त होता है, और लाभान्वित कोई नहीं होता । किन्तु कल्याण हेतु किये गए सत्कार्यों से सभी लाभान्वित होते हैं और बहूँतों को अवसर प्राप्त होते हैं ॥ लोचा यह है ? कि कल्याण हेतु किए गए परमार्थ कार्यों में मत नहीं मिलते ? 

गर्भ गहे रज जिउ मिले, जिउ सोंह मिले देह । 
मानस मात्र रूप मिले, भव सागर तू खेह ।१४२५ । 
भावार्थ : --  गर्भ ग्रहण करने से ही किसी रज को जीवन प्राप्त होता है । और जीवन प्राप्त होने स ही देह प्राप्त होती है । जब यह देहाकृति मनुष्य जाति की मिले तब उससे संसार रूपी सागर से तर जाना चाहिए ॥ 

भव सागर देही खेह जीवन खेवनहार ।  
देह रहे न खेह रहे, रहत चिन्ह करुवार ।१४२६ । 
भावारतीह : -- सागर रूपी इस संसार में जीवन रूपी खेवन हार है सागर मन जिस प्रकार नाव स्थिर नहीं रहती वह पार गमन हतु अग्रसर रहती है उसी प्रकार यह देह नहीं रहती  केवल उसके सुकृत्य कुकृत्य के चिन्ह रह जाते हैं ॥ 

ग्रहिता के निज जीवन भली भाँती ले जोग । 
दाता तेरो दान का, होए ना दुरुपयोग ।१४२७। 
भावार्थ : -- हे दाता ! तू दान देने से पहले ग्रहिता के निज जीवन को भली भाँती देख परख ले । कहीं तेरे दिए दान का ग्रहिता द्वारा दुरुपयोग न हो ॥ 

देखे सरबस जात जब सुबुद्धि अरधहि साधि । 
अरध छाँड़ पूरन धाए, पूरन मिले  न आधि ।१४२८।  
भावार्थ : -- सुबुद्धिगण जब सर्वस्व जाता हुवा देखते हैं तो आधे की रक्षा में लग जाते  हैं । मूर्ख लोग आधा को छोड़ कर पूरे के ये दौड़ लगाते हैं परिणाम यह होता है कि पूरा भी नहीं मिलता, जो आधा है वह भी चला जाता है ॥ 

घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध । 
गदने तो गदहा लगे, उरै त लागै गिद्ध ।१४२९ । 
भावार्थ : -- घर में यदि सिद्ध पुरुष भी हो तो वह चौकीदार लगता है । और बाहर गाँव चौकीदार भी दूसरे गाँव में सिद्ध पुरुष कहलाता है ॥ क्योंकि वह जब बोलता है तो पूरा गधा लगता है और उड़ता है तो गिद्ध ॥ 

बारह गाँव का चौधरी तेरह गांव नौराए । 
उड़ता उड़ता आए वह उड़ता उड़ता जाए ।१४३० । 
भावार्थ : -- भई बारह गावों का प्रधान है तेरह गाँव तो जाएगा ही । पैदल थोड़े आएगा -जाएगा, उड़ता-उड़ता आएगा उड़ता-उड़ता जाएगा । अपने पैसे के पंखों से थोड़े न, हमारे पैसे के पंखों से, देखा है कभी उड़ता हुवा नौकर भैया तू स्वयं ही अपने बर्तन माँज,नौकर-चाकर छोड़,तेल के भाव देख कितना महंगा हो गया,पैसे पेड़ पे थोड़े उगते हैं जो तोड़ा और नौकरों को दे दिए उड़ने के लिए ॥   





भगवन मन सुमिरन करत कारें सद कृतकार । 



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