सक्षमता अरु अक्षमता एक दासी एक कंत ।
जग भली भाँति चले तब जब हो दोनहु गुनवंत ।१४११ ।
भावार्थ : -- सक्षमता और अक्षमता में एक दासी है और एक स्वामी है ॥ यह जगत तभी भली प्रकार से चलता है जब दोनों ही गुणवंत होते हैं । अन्यथा चलता तो है किन्तु धक्के दे दे के ॥
घात लगाए बैठा जिउ लूटन काल अकाल ।
गाँठ लगाई धुनी की, फँसा बरन के जाल ।१४१२।
भावार्थ : -- अकाल मृत्यु ,जीवन लूटने के लिए घात लगाए बैठी है । वह शब्दों की गाँठ लगाए वर्णों के जाल में ही फँसती है ॥
कंठ जो काल फाँस गह, बानी करे गुहार ।
जो कंठ बानी न लहे, वाका को रखबार ।१४४३।
भावार्थ : -- यदि कंठ को काल के फांस ने गृहीत कर लिया हो तो वाणी रक्षा के लिए आह्वान करती है । यदि किसी के कंठ में वाणी ही न हो तो ऐसे प्राणी की रक्षक कौन हो ॥
धरे थाल खाए मनभर, सो तो बिषै सुवाद ।
भाग गहे कर अलपतर, वाका नाउ प्रसाद ।१४४४।
भावार्थ : -- थालों में सजा के मन भर जो खाया वह प्रसाद नहीं विषयों का भोग है । अपने भाग्य जितना ही और अल्पतम खाए हुवे को प्रसाद कहते हैं ।
निर्जल उतरू होत जल पौन हिन का पौन ।
निर्जन उतरू होत जन कोलाहल का मौन ।१४४५ ।
भावार्थ : -- निर्जल का उत्तर जल होता है निर्वात का उत्तर वात होती है । निर्जन का उत्तर जन होता है, और कोलाहल का उत्तर मौन होता है शब्द नहीं ॥
काल कलुखित करम करे, मारे यह जग लात
करे कार कल्यान कर, पूछे धरमन जाति ।१४४६।
भावार्थ : -- कुकरम करने से, कलुषित कर्म करने से यह जग भर्तस्ना ही करता है । और यदि कोई कल्याण कारी कर्म करे तब वह उसकी जाति पूछता है उसका धर्म पूछता है ॥
अर्थात : -- "कल्याण कारी कृत्य ही धर्म एवं जातियों का उत्थान करते हैं अवसर नहीं" और अहिंसा सब धर्मों का धर्म है.....
जग संचालन भार जो, अंधन के कर दाह ।
सकल भुइँ बन घर उपबन, देइ सिंधु अवगाह ।१४४७।
भावार्थ : -- यदि संसार के संचालन का कार्यभार किसी विवेकहीन को प्रदाय किया तो वह इस पृथ्वी को, उसके वनों, को घरों को, समस्त देश को सिंधु में डूबो देगा ॥
'तो उतना ही दूहो जितना की आवश्यकता हो,
साँच सौच दय अरु दान, साँचा धरम कहाए ।
तिनते जो निरपेख रह, सोई नेम दुराए ।१४४८।
भावार्थ : -- सत्य, शौच (शुद्धता,पवित्रता, सुचिता ) दया, और दान, वास्तविक धर्म कहलाता है । इससे जो निरपेक्ष रहे ऐसे नियम, ऐसे नियंत्रण से दूर ही रहना चाहिए अर्थात उसका पालन नहीं करना चाहिए ॥
तन ढापन जस हैं बसन, बुद्धि ढाँप तस ज्ञान ।
उदर हुँत जस अन भोजन , जिग्यासा भोजन जान ।१४४९ ।
भावाथ : -- शरीर का आवरण जैसे वस्त्र हैं वैसे ही बुद्धि का आवरण ज्ञान है । उदर का भोजन जैसे अन्न है वैसे ही मुमुक्षु का भोजन मुमुक्षा है ॥
लिखा जहँ यहँ निषेध है, दरिदता का प्रबेस ।
सोइ माया दास बास, अरु धनिमन् के देस ।१४५०।
भावार्थ : -- जहां पर लिखा है 'यहां दरिद्रता का प्रवेश निषेध है ' वह विलासिता की साधन स्वरूपा माया के दासों की वसति है और कुबेर के भाई-बंधुओं का देश है ॥
जग भली भाँति चले तब जब हो दोनहु गुनवंत ।१४११ ।
भावार्थ : -- सक्षमता और अक्षमता में एक दासी है और एक स्वामी है ॥ यह जगत तभी भली प्रकार से चलता है जब दोनों ही गुणवंत होते हैं । अन्यथा चलता तो है किन्तु धक्के दे दे के ॥
घात लगाए बैठा जिउ लूटन काल अकाल ।
गाँठ लगाई धुनी की, फँसा बरन के जाल ।१४१२।
भावार्थ : -- अकाल मृत्यु ,जीवन लूटने के लिए घात लगाए बैठी है । वह शब्दों की गाँठ लगाए वर्णों के जाल में ही फँसती है ॥
कंठ जो काल फाँस गह, बानी करे गुहार ।
जो कंठ बानी न लहे, वाका को रखबार ।१४४३।
भावार्थ : -- यदि कंठ को काल के फांस ने गृहीत कर लिया हो तो वाणी रक्षा के लिए आह्वान करती है । यदि किसी के कंठ में वाणी ही न हो तो ऐसे प्राणी की रक्षक कौन हो ॥
धरे थाल खाए मनभर, सो तो बिषै सुवाद ।
भाग गहे कर अलपतर, वाका नाउ प्रसाद ।१४४४।
भावार्थ : -- थालों में सजा के मन भर जो खाया वह प्रसाद नहीं विषयों का भोग है । अपने भाग्य जितना ही और अल्पतम खाए हुवे को प्रसाद कहते हैं ।
निर्जल उतरू होत जल पौन हिन का पौन ।
निर्जन उतरू होत जन कोलाहल का मौन ।१४४५ ।
भावार्थ : -- निर्जल का उत्तर जल होता है निर्वात का उत्तर वात होती है । निर्जन का उत्तर जन होता है, और कोलाहल का उत्तर मौन होता है शब्द नहीं ॥
काल कलुखित करम करे, मारे यह जग लात
करे कार कल्यान कर, पूछे धरमन जाति ।१४४६।
भावार्थ : -- कुकरम करने से, कलुषित कर्म करने से यह जग भर्तस्ना ही करता है । और यदि कोई कल्याण कारी कर्म करे तब वह उसकी जाति पूछता है उसका धर्म पूछता है ॥
अर्थात : -- "कल्याण कारी कृत्य ही धर्म एवं जातियों का उत्थान करते हैं अवसर नहीं" और अहिंसा सब धर्मों का धर्म है.....
जग संचालन भार जो, अंधन के कर दाह ।
सकल भुइँ बन घर उपबन, देइ सिंधु अवगाह ।१४४७।
भावार्थ : -- यदि संसार के संचालन का कार्यभार किसी विवेकहीन को प्रदाय किया तो वह इस पृथ्वी को, उसके वनों, को घरों को, समस्त देश को सिंधु में डूबो देगा ॥
'तो उतना ही दूहो जितना की आवश्यकता हो,
साँच सौच दय अरु दान, साँचा धरम कहाए ।
तिनते जो निरपेख रह, सोई नेम दुराए ।१४४८।
भावार्थ : -- सत्य, शौच (शुद्धता,पवित्रता, सुचिता ) दया, और दान, वास्तविक धर्म कहलाता है । इससे जो निरपेक्ष रहे ऐसे नियम, ऐसे नियंत्रण से दूर ही रहना चाहिए अर्थात उसका पालन नहीं करना चाहिए ॥
तन ढापन जस हैं बसन, बुद्धि ढाँप तस ज्ञान ।
उदर हुँत जस अन भोजन , जिग्यासा भोजन जान ।१४४९ ।
भावाथ : -- शरीर का आवरण जैसे वस्त्र हैं वैसे ही बुद्धि का आवरण ज्ञान है । उदर का भोजन जैसे अन्न है वैसे ही मुमुक्षु का भोजन मुमुक्षा है ॥
लिखा जहँ यहँ निषेध है, दरिदता का प्रबेस ।
सोइ माया दास बास, अरु धनिमन् के देस ।१४५०।
भावार्थ : -- जहां पर लिखा है 'यहां दरिद्रता का प्रवेश निषेध है ' वह विलासिता की साधन स्वरूपा माया के दासों की वसति है और कुबेर के भाई-बंधुओं का देश है ॥
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