गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४१॥ -----

सक्षमता अरु अक्षमता एक दासी एक कंत । 
जग भली भाँति चले तब जब हो दोनहु गुनवंत ।१४११ । 
भावार्थ : -- सक्षमता और अक्षमता में एक दासी है और एक स्वामी है ॥ यह जगत तभी भली प्रकार से चलता है जब दोनों ही गुणवंत होते हैं । अन्यथा चलता तो है किन्तु धक्के दे दे के ॥ 

घात लगाए बैठा जिउ लूटन काल अकाल । 
गाँठ लगाई धुनी की, फँसा बरन के जाल ।१४१२। 
भावार्थ : -- अकाल मृत्यु ,जीवन लूटने के लिए घात लगाए बैठी है । वह शब्दों  की गाँठ लगाए वर्णों के जाल में ही फँसती है ॥ 

कंठ जो काल फाँस गह, बानी करे गुहार । 
जो कंठ बानी न लहे, वाका को रखबार ।१४४३। 
भावार्थ : -- यदि कंठ को काल के फांस ने गृहीत कर लिया हो तो वाणी रक्षा के लिए आह्वान करती है । यदि किसी के कंठ में वाणी ही न हो तो ऐसे प्राणी की रक्षक कौन हो ॥ 

धरे थाल खाए मनभर, सो तो बिषै सुवाद । 
भाग गहे कर अलपतर, वाका नाउ प्रसाद ।१४४४। 
भावार्थ : -- थालों में सजा के  मन भर जो खाया वह प्रसाद नहीं विषयों का भोग है । अपने भाग्य जितना ही और अल्पतम खाए हुवे को प्रसाद कहते हैं  । 

निर्जल उतरू होत जल पौन हिन का पौन । 
निर्जन उतरू होत जन कोलाहल का मौन ।१४४५ । 
भावार्थ : -- निर्जल का उत्तर जल होता है निर्वात का उत्तर वात होती है । निर्जन का उत्तर जन होता है, और कोलाहल का उत्तर मौन होता है शब्द नहीं ॥ 

काल कलुखित करम करे, मारे यह जग लात 
करे कार कल्यान कर, पूछे धरमन जाति ।१४४६। 
भावार्थ : --  कुकरम करने से, कलुषित कर्म करने से यह जग भर्तस्ना ही करता है । और यदि कोई कल्याण कारी कर्म करे तब वह उसकी जाति पूछता है उसका धर्म पूछता है ॥ 

अर्थात : -- "कल्याण कारी कृत्य ही धर्म एवं जातियों का उत्थान करते हैं अवसर नहीं" और अहिंसा सब धर्मों का धर्म है.....

जग संचालन भार जो, अंधन के कर  दाह । 
सकल भुइँ बन घर उपबन, देइ सिंधु अवगाह ।१४४७। 
भावार्थ : -- यदि संसार के संचालन का कार्यभार किसी विवेकहीन को प्रदाय किया तो वह इस पृथ्वी को, उसके वनों, को घरों को, समस्त देश को सिंधु में डूबो देगा ॥ 

'तो उतना ही दूहो जितना की आवश्यकता हो, 

साँच सौच दय अरु दान, साँचा धरम कहाए । 
तिनते  जो  निरपेख रह, सोई नेम दुराए ।१४४८। 
भावार्थ : -- सत्य, शौच (शुद्धता,पवित्रता, सुचिता )  दया, और दान, वास्तविक धर्म कहलाता है । इससे जो निरपेक्ष रहे ऐसे नियम, ऐसे नियंत्रण से दूर ही रहना चाहिए  अर्थात उसका पालन  नहीं करना चाहिए ॥ 

तन ढापन जस हैं बसन, बुद्धि ढाँप तस ज्ञान । 
उदर हुँत जस अन भोजन , जिग्यासा भोजन जान ।१४४९ । 
भावाथ : -- शरीर का आवरण जैसे वस्त्र हैं वैसे ही बुद्धि का आवरण ज्ञान है ।  उदर का भोजन जैसे अन्न है वैसे ही मुमुक्षु  का भोजन मुमुक्षा है ॥ 

लिखा जहँ यहँ निषेध है, दरिदता का प्रबेस । 
सोइ माया दास बास, अरु धनिमन् के देस ।१४५०। 
भावार्थ : -- जहां पर लिखा है 'यहां दरिद्रता का प्रवेश निषेध है ' वह विलासिता की साधन स्वरूपा माया के दासों की वसति है और कुबेर के भाई-बंधुओं का देश है ॥ 

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