बुधवार, 30 अप्रैल 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४७॥ -----,

पाँखी लगाए देस नै, उडाए फिरैं बहार ।  
राखने रखे आप हुँत, रखे सचिव सम्भार ।१४७१। 
भावार्थ : -- पंख तो देश ने लगाए । जी मंत्रीजी उड़ते फ़िरते है देस के बाहार । जनार्दन ने टिकस दे के  आउर अपणी भूँ समपदा दे अपने हेतु रक्षक रखे थे । जो मंत्रियों की ही सुरक्षा में लगे रहते हैं, बन्द करो इनके लिए टिकस देना, । मंत्री मर-मुरा गए तो औऱ भतेरे सब पंखो वाले होना चाहते हैं ॥ 

"सुन रे मंत्री सुन रे नेता, मैं भी पंखो वाला होता" 

टिप्पणी : -- भारत का कोई भी राष्ट्रपति कोई भी प्रधानमन्त्री आतंकवादीयों के हाथों नहीं मरा, एक मरा तो वह अंगरक्षकों के द्वारा ही मरा, भूतों का क्या है वे तो मर कर भी नहीँ मरते..... 


देख भिखारि माँग रहा, कपट बेस कर जोट । 
मरजाद की रेख भीत, तू रह आपनि ओट ।१४७२। 
भावार्थ : -- देख यह जो भिखारी भिक्षा मांग रहा है वह कर जोड़ें हुवे हैं यह बाहरी  सजन्नता है  पर उसके अन्तर से वह दुष्ट हैं । तू जल सम्पदा, धन सम्पदा, प्राकृतिक सम्पदा, रूप सम्पदा, से युक्त है अत: तू मर्यादा के रेखा के भीतर अपने आवरणों में रह ॥ अन्यथा त्याग हेतु तैयार रह ॥   

सत्ता मत्ता में रहे, दस गुन सन दस सीस । 
भए बिलग तपबल के जब, बान लगे एक तीस ।१४७३। 
भावार्थ : -- सत्ता के  अहंकार में रहे वो भी दस सिरो के सह दस गुना । जब तप की शक्ति के एकतीस बान लगे तब अहङ्कार कहीं गया सिर कहीं गए,  देह कही ॥    

 मत दायन सुवारथ कर भई अएसी कुरीत । 
 गुंठनबती चढ़ी चिता  प्रीतम की कर प्रीत ।१४७४।  
भावार्थ : -- स्वार्थीयों के हाथ ने मत दान को ऐसा कुरीति में परिवर्तित कर दिया । जैसे इस देश में कभी घूँघट व सती की कुप्रथा थी । घुंघटवालियाँ कहती थीं मरूँ या जिऊँ मैं तो अपने प्रीतम के साथ ही बरूंगी ॥ अब दृश्य थोड़ा उलटा हो गया है वाली का स्थान वाला ने ले लिया है कहते हैं फूटूं या साबुत रहूं मैं तो मत देऊंगा ही ॥ 

दाता बोले मैं बड़ा, गाही मैं मैँ कार । 
जे जगत सोय बड़ा जो, सबका देवनहार ।१४७६। 
भावार्थ : -- दाता बोले मेन बड़ा, ग्रहिता मैं मैं करे । इस संसार में वाही बड़ा है जो सबका देने वाला है । जिसने यह सृष्टि रची है ॥

धरती धरती ररत रहि, घन घन लई सँचाए । 
अंत काल जब आएगा, धरती दिये मिलाए ।१४७७। 
भावार्थ : -- हाय प्रापार्टी ! हाय हाय प्रापार्टी !! रटते रहे और घनी घनी संचै कर ली । सांस पूरे होने पर जब काल आएगा तब पहले वह तुझे इसी प्रापार्टी में मिलाते हुवे ले जाएगा ॥ जैसे बाबूजी को ले गया था ॥

देखो धूप बरख रही, सागर नाथ न्हाए । 
धनबन घन बिहीन रहे, पाहन घन घन पाए ।१४७८। 
भावार्थ : -  देखो धूप बरस रही है सागर जी नहा रहे हैं। गगन घन से रहित है और पाहन गहनतम घन को प्राप्त है ॥

सेवा कूँ अभाव मिले, धर्मादा सँजोइ। 
साधू फ़िर परमारथ के, जोग कहाँ सौं होइ ।१४७९। 
भावार्थ : -- जहां सेवापन,  अभाव से जा मिले, एवम धर्म के निमित्त धन से  उसका  संचयी मिल जाए । हे सज्जनों फ़िर परमार्थ कहाँ से होगा ॥  

सेवक सेवा भाव लिए स्वामि सेबि सुभाउ । 
दोउ जग परमारथ किए, दूरय  होत अभाव ।१४८०। 
भावार्थ : -- जब सेवक सेवाभाव ग्रहण किये हो एवम स्वामी का स्वभाव उपासना योग्य हो  । फिर दोनों के सम्मीलित परमार्थ कृत्या से ही अभाव दूर होते हैँ ॥ 






शनिवार, 26 अप्रैल 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४६॥ -----

आपनि जनम भुराए के, मनवा कहँ लग जाए ।
खड़ी है मीचक पापनि, अवाए जी लेवाए ।१४६१।
भावार्थ : -- अपना जन्म भुलाना  कर हे मन तू कहाँ तक जाएगा ।आए जीवन को ले जाने के लिए  आगे पापानि मृत्यु खडी है ॥

पाँच बछर चेत्यो नहि, खा खा पाली देह । 
नाथ के सुधि करयो नहि, आस करे अब नेह ।१४६१। 
भावार्थ : -- पांच बरस तक तो चेत नहीं आया, खा खा के देह पाल ली, परदेसी हो गई । नाथ की सुधि भी नहीं ली अच्छा है कि बीमार है तीरथ गया है, अब इस भैंस को प्रीत्तम का प्यार चाहिए ||


यहु चित्र चितइ रहे चकित, रमतु म्हारे देस | 
राजा मैला भेस मैं, सेवक राजा भेस | 1462 | 
भावार्थ : -- पर्यटक जब हमारे देश आते हैं तब यह चित्र देख कर दांग रह जाते हैं | कि राजा की वेशभूषा मैली है और सेवकों की भूषा राजसी है || 


उत महजिद इत देहरा, कचहरि सों गढ़बाए | 
बन्दे देस भरे पड़े, खुदा कहाँ सन लाए |1464| 
भावार्थ : -- और क्या देखते हैं ? उधर मस्जिद इधर मंदिर वो भी कचहरी से बनवाए हैं | यह देश बन्दों से तो भरा पड़ा है पर ये खुदा कहाँ से लाए ?

राजा है कि सेवक हैं, सेवक है कि भिखारि | 
माँगनी बैठा वाका, खुदा बाहर दुआरि |1465| 
भावार्थ : --  राजा है कि सेवक है,सेवक है कि भिखारी | 
                   मांग रहा इनका खुदा बैठा बाहर दुआरी || 

अकिल बिहिने नेता जी, नकटे निपट गवाँर | 
सत्ता माया बस परे, जित नै समुझै हार |1466| 
भावार्थ :-- इनके बेअक्ले नेत्ता जी घणे  ही नकटे बेसरम से उज्जट गंवार और जाहिल से है | ये सत्ता और माया के वशीभूत होके  बुराइयों की लड़ाइयों में जितने को हार समझते हैं ||  

सेवक के नाउ को तो बोले जी जी कार । 
अरु राउ नाउ आपने, राखए माँग उधार ।१४६७। 
भावार्थ : -- पर्यटक और क्या देखते हैं : -- सेवक जी तो अपने नाम के आगे जी पीछे जी लगाकर जी जी कार करवा रहे हैँ । और राजा बेचारे ने अपना नाम भी उधारी माँग कर रखा है ।। 

पाँच बछर लग सुती के, उठि उठि देवल धाए । 
वासो कुम्भकरन भला, छहहिं मास जग आए ।१४६८। 
भावार्थ : -- पांच वर्ष तक नींद में गाफ़िल रहे । फिर उठ उठ कर काबे-कासी जा रहे हैं ॥ इनसे तो कुम्भकरण ही अच्छा है जो छ: महीने में उठ आता है ॥   

बिधि बंधन नेम बिधान, जे हुँत संपदबान । 
जाके झोरी कछु नहीं, धरी रही सब कान ।१४६८। 
भावार्थ : -- यह विधि-विबंधन, नियम-विधान यह केवल धनसपद, जलसम्पद, रूपसम्पद वान के लिए है । जिसकी झोली में कोई सम्पदा ही नहीँ उसके सम्मुख समस्त मर्यादा धरी की धरी रह जाती हैं ॥   
 
देहर महजिद आस हो, मिल जुग भगत बनाए  । 
सासन साँति राख करे, दंड घर दंड़ दाए  ।१४६९ । 
भावार्थ : -- यदि मन्दिर-मस्जिद अति आवश्यक एवम उचित हो तब भक्तगण मिलजुल कर उसका निर्माण करें । शासन का यह कर्त्तव्य है कि वह शान्ति व्यवस्था एवम सुरक्षा का प्रबंध करे, न्यायालय का यह कर्त्तव्य है कि दूषित तत्त्वों दंड दे, न की मन्दिर मस्जिद बनवाए ॥  

राम नामी ओढ़ि लिये, रोल मचाये धाम । 
राज रचाया आपना, रोया सारा गाम ।१४७० । 
भावार्थ : -- रामनामी ओड के राम के धाम मेँ राणीगैल मचा दिया । इनका तो राज रच ग्या । गाम रोता रह गया । इब इस लँडूरे ने ले आए ॥ 


  



बुधवार, 23 अप्रैल 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४५॥ -----,

भला कारत बुरा कहे, सो तो पीरा दाइ । 
बुरा करत भलाइ चहे, कँह तिन आसुरताइ ।१४५१।
 भावार्थ : -- भला करते हुवे भी यदि कोई बुरा कहे तो वह कथन पीड़ादायी है । बुराई करे और भलाई की अपेक्षा रखे वह आसुरी स्वभाव कहा जाता है ॥

भला करत अपयस लहे, अगजग देउ कहाए । 
बुरा करे अरु जस चहे, सोइ असुर कहलाए ।१४५२। 
भावार्थ : -- भला करे और अपयश भी ग्रहण किए संसार में वह देव कहलाए । बुरा भी किया और कीर्ति की भी चाह किए वही आसुर कहा गया  ॥

ऊँचि पीठ आसीन अरु, मन माया भरमाए  । 
कित बैठे ब्यास राज, अपनी पौथी ठाएँ ।१४५३।  
भावार्थ : -- ऊंची आसंदी पर आसीत हैं औऱ चित्त में तो विलासिता की साधन स्वरूपा माया मेँ भ्रमित हैवहाँ नेता बैठे हुवे हैँ मंत्री बैठे हैँ, चुनाव घुसा बैठा है । हे व्यास महाराज ! धन्य हो  आप कहाँ बैठे हैं कृपाकर अपनी पोथी उठा ले जाएं तो अच्छा होगा ॥ 

बेद बिहित पुरान कहित सद बचन के बिद्रोहि । 
माया कृत दोष गुन गहि, कलजुग के बिप्र होहि ।१४५४। 
भावार्थ : -- बुद्ध प्रबुद्ध जन कह गए हैं कि जो वेद विहित पुराण कहित सद वचनो क विद्रोही होंगेः एवम माया रचित दोषो एवम गुणोँ के ग्राही होंगे वही कलयुग के विप्र होंगे । उनकी प्रेरणा से ही यह कलयुग घोर हो जाएगा । इसलिए सद्पात्र को ही दान देना चाहिए कुपात्र को दिया गया दान दुर्गति करता है ॥

निसदिन रसना रहे जब, आपुनि कुल के राग । 
लाग के घर भूत जगे, लगे गृहस मेँ आग ।१४५५। 
भावार्थ : -- जब निसदिन जिह्वा पर अपने ही कुल का राग ( जैसे मेरी माता, मेरे पिता , मरइ दादी, मेरे भ्राता ) रहता है ।  तब घर में झगड़े के भूत जग जाते हैं और गृहस्थी में आग लग जाती है । जब अपनी समस्या केवल एक इन ला लगाने से आधी हो जाएं तो लगाने अपने बाप का क्या जाता है।

धर्मी कहे चरन न चरे, वा सो खल ना कोए। 
गुन परिहार दोष बरे, खल सह धूरत होए ।१४५६। 
भावार्थ : -- यदि कोई किसी धर्म विशेष का अनुयायी कहता हो  और उस धर्म का अनुशरण नहीं करता हो उसके समान कोई दुष्ट नहीं है । यदि कोई ऐसे धर्म के गुन को छोड़ कर केवल उसके दोषों को ग्रहण करता हो वह दुष्ट के सह धूर्त्त भी है ॥

" केवल दान लो, कल्यान मत करो '

आपनि आँखि मूँदि के, दुज के देखे दोष ।
दूषन देखा आपुना, तू दोषो का पोष ।१४५७।
भावार्थ : -- अपनी आँखें मूँद के दूजों के दोष देखे । जब अपना दूषण देखने लगे तब यह पाया कि उन दोषों क पौषक तो तू ही है ॥

घोर कलयुग का अर्थ है : -- बाप बेटी को नहीं छोड़ेगा, बेटा माँ को नहीं छोडेगा, विचित्र प्रकार की संतति जन्म लेंगी शासन के नाम पर जंगल राज होगा, न्याय फुटकर दुकानो में बिकेगा.....

सूर्योदय हुवे बिना अँधेरे दूर नहीँ होते..,
जले औरों के बल वो दीपक सूर नहीँ होते.....

दीप बरत कुन कुन करत, गहन रहे अँधियार ।
होत सूर जब असहमत, भये जगत उजियार ।१४५८।

भावार्थ : -- दीपक के असहमत होने से अंधेरे नहीँ जाते इस हेतु सूर्य बनना पड़ता है । जब सूर्य अँधेरे से असहमत होता है तभी संसार उज्जवल होता है ॥ एक प्रबुद्ध ने खा रात विधाता का एक दोष है । किन्तु यदि रात नहीं होती तो हमें चाँद तारे दिखाई नहीं देते हमें गगन के विस्तार संज्ञान  नहीँ होता, अर्थात अँधेरे का भी अपना महत्व है ॥

यह जन रूप जनार्दन, देवन बहुस उदार । 
आपुनि झोरी देख फिर, कोच उचित कर धार ।१४५९। 
भावार्थ : -- यह जनता है जो ईश्वर  स्वरूप है । यह देने में बहुंत ही उदार है ॥ पहले अपने गन अवगुण देखने चाहिए । फिर संकोच करते हुवे यथा उचित ही लेना चाहिए ॥ ऐसा नहीं की ये देते जाए तू घर भर ले ॥

काम जगे जो भाव सन, मिले नहीं भग्वान ।
ना तू तासु परच पहै , ना वो तोहे जान  । १४६०।
भावार्थ : -- यदि श्रद्धा भक्ति सेवा के सह महत्वाकांक्षाएं जागृत हो जाएं तब भगवान नहीं मिलते । मिले भी तो न तुम उससे परिचित होगे न वो तुमसे ॥

रविवार, 20 अप्रैल 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४४॥ -----

बाहरि भू को अरु भेस, भित बिपरीत अगास । 
तिनपर बिंग बचन कहत, करे जगत परिहास ।१४४१।  
भावार्थ : -- बाहर की भूमि कुछ और ही वेश में है अंतर में कोई दुसरा ही आकाश  हैं । ऐसों के ऊपर ही कटाक्ष करते हुवे दुनिया हंसती है ।

अर्थात : -- आप यदि कोई संत-फंत नहीं हैं किसी गुरु के फुरु नहीं हैं, कोई राजा नहीं है, एक साधारण सा बाजा हैं । और यदि आप अंग्रेज के रंगरेज भी नहीं हैं तो ऐसा वेश वरण कीजिए जैसे सभी वरण करते हैं ॥

धर्म सों भए भव मोचन , अरु भगवन के लाह । 
करे जोई उपार्जन, वह धरमन फल नाह ।१४४२। 
भावार्थ : --  इस संसारमें धर्म मोक्ष प्राप्ति का एवं ईश्वर की प्राप्ति का साधन है । धर्म उपार्जन का साधन नहीं है उपार्जन करने से धर्म फलीभूत नहीं होता ॥

जनम लेइ जो जगत मैं, तेतक बिषयन लाह । 
जेतक मह जथेष्ठ हो, जीवन के निर्वाह ।१४४३। 
भावार्थ : -- जब इस जगत में जन्म हो ही गया है, इस संसार में आ ही गए हैं  तो उतने विषयों की कामना करनी चाहिए जीवन-निर्वाह के लिए जितना पर्याप्य हो ।  क्योंकि वापस जाना भी है ||

जैसे सागर सों मिले जल के सकल प्रबाह । 
ग्यान में लयलीन हो, तैसे मनोग्रही लाह ।१४४४। 
भावार्थ : --  जल के समस्त प्रवाह जैसे सागर में समाहित हो जाते हैं । वैसे ही मन की कामनाए उसका लौलुपता आदि विकारों को ज्ञान के सिंधु में समा जाना चाहिए ॥

जल सों प्रान के अधार, जल सों  बुझत प्यास । 
जल सों सौच रूप गंध, जल सों बिय बिन्यास ।१४४५। 
भावार्थ : -- प्राण जल पर ही आधारित होते हैं । जल से ही तृषा क्षयित होती है । जल से ही सुचिता का सौम्य है जल से रूप का स्वरूप है जल से ही सुगंध का अस्तित्व है, संसार के समस्त बीजों का आधार जल ही है ॥

जल बिहिन अस्थान में, हो जल के उद्गार । 
सरिबर कर निर्मान तहाँ, धारे दानाधार ।१४४६। 
भावार्थ : -- जो स्थान जलवियुक्त हो और वहां यदि कोई जल का स्त्रोत हो तब उस स्थान पर सरोवर का निर्माण कर जलदान के अतिशय पुण्य की प्राप्ति के सह दान का आधार निर्मित होता है । कारण कि दान जीवन धन से ही संयोजित कर्म है ॥

जागे द्युति  अगनी सों, सो तो दीपक होए । 
जाकी दीप्ति आप सों, द्यवन कह सब कोए ।१४४७।  
भावार्थ : - जो अग्नि के द्वारा प्रदीप्त होता है वह दीपक कहलाता है । जो स्वयं में ही दैदीप्यमान हो उसे सूर्यदेव कहते हैं ॥

मुष्टिका भर तमस हरे, सोइ दीप निस्तेज । 
जोइ अगजग लग उजरे, गहे सूर के तेज ।१४४८। 
भावार्थ : -- जो केवल मुट्ठी भर अन्धकार का ही हरण करने में समर्थ हो वह दीपक के सदृश्य निस्तेज है । जो समस्त संसार को दैदीप्यमान करता हो वही सूर्य के तेज से युक्त है ॥ 

जगर मगर दीपक करे , हरे न जग अँधियार । 
अरु जब नभ केतु उतरे, भरे सकल उजियार ।१४४९। 
भावार्थ : -- दीपक जगर मगर करते रहते हैं । जगत का अंधियारा तो फिर भी नही जाता ॥ जैसे ही  सूर्य का उदय होता है वह सारे जगत में उजाला भर देता है ॥

साँच को जब झूठ कहे, सो तो पीरा दाए । 
झूठ कह कहि साँच चहे, सोई धूत सुभाए ।१४५०। 
भावार्थ : -- सत्य को जब कोई असत्य कहे तो वह पीड़ा दायक होता है । असत्य कथन और सत्य कथ्य की अपेक्षा वह धूर्तता है ॥

----- ॥ दोहा-दशम १४४॥ -----

बाहर भू अरु भेस भरि भित बिपरीत अकास । 
तापर बिंग बचन कहत, करे जगत परिहास ।१४४१। 
भावार्थ : -- यदि बाहर की भूमि रूपी तन  ने कोई और भेष भरा होता है और अंतर  में कोई और आकाश होता है । यह संसार उसका परिहास कर उसपर व्यंग करता है । अत: अर्थात यदि आप सामान्य हैं कोई संत-फंत किसी गुरु के फूरु नई हैं कोई 

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४३ ॥ -----

खाल उढ़ाए सिंग के, सियार सिंग न होए । 
नाम धरे नर्सिंग के, होए न कलिंग कोए।१४३१।  
भावार्थ : -- सिंग की खाल उड़ा देने से सियार सिंग नहीं होता । नर्सिंग का नाम रख लेने भर से ही कोई चातुर्य नहीं होता ।। 

उलटी खप्परी के सों, नेता के गति भाउ । 
राउ बन निज सेवक कह, सेवक बन कहि राउ ।१४३२। 
भावार्थ : -- इन नेताओं के विचार मूर्खों के जैसे होते हैं ।  जब स्वामी बनकर नौकर रखना हो तो स्वयं को नौकर कहते हैं जब नौकर रखे जाते हैं तो स्वयं को राजा कहते हैं, अभी तो सब राजा हैं नौकर कोई नहीं हैं ।। 

राउ ही नय निरधारे, करे जंभुरा काज । 
जनता होत राउ जहाँ, जनता के हो राज ।१४३४। 
भावार्थ : -- राजा ही नीतियों का निर्धारण करता है, सेवक उसे लागू  करता है । जहां लोकतंत्र होता है वहां जनता ही राजा होती है ॥ अब नीति निर्धारण कौन करे जो राजा हो ॥ 

पीठ पलन पौढ़ाइ रहि, पेटक मन भर खाए । 
उँगरी किये काज गिने, चरन गगन उरियाए ।१४३५। 
भावार्थ : -- पीठ पलंग में बिछी रही, पेट ने मन भर खाया । उंगली किये कामों को गिनती रही करी कुछ नहीं । चरण गगन में उड़ते रहे । यह निकम्मेपन का स्वभाव है ॥ 

कवन सासन ब्यवस्था , हो को अभेदि कोट । 
छन भंगुरा ढूह करे, भ्र्ष्टाचारी बिमोट ।१४३६। 
भावार्थ : -- भ्रष्टाचार ऐसा दीमक है जो किसी भी शासन व्यवस्था के अभेद्य किले को क्षण भंगुरी टीले में परिवर्तित करने की सामर्थ्य रखता है ॥ 

देही राखन बसन दिए, जीवन भोजन दाए । 
चितबन् आत्मन दिए का, जोई भीत समाए ।१४३७। 
भावार्थ : -- देह की रक्षा हेतु उसे वस्त्र दिए, जीवन की रक्षा हेतु उसे  भोजन दिया । चित्त मन बुद्धि आत्मन जो भीतर समाए हैं उन्हें क्या दिया ॥   

जीवन साधन आपणौ धारे कोच कुचाहि  । 
सब कुछ यहहि धरे रहीं, जस तन जीवन जाहि ।१४३८। 
भावार्थ : - अपने जीवन के साधनों को सिमित एवं संकुचित रखना चाहिए । जब यह तन यह जीवन समाप्त हो जाएगा तब सब कुछ यहीं धरा रह जाएगा, और कोई दूसरा खाएगा, तेरे भाग में तेरा पाप आएगा  ॥ 

इष्टिका चित् न्यास सोंह, खचइत भवन अवास । 
प्रेम प्रीत प्रतीति सोंह, रचइत श्रील निवास । १४३९। 
भावार्थ : -- ईंट पत्थरों के विन्यास से केवल भवनों का आवासों को खचा जाता है । प्रेम प्रीति और प्रतीति से ही शोभायुक्त लक्ष्मीवान निवास की रचना होती है ॥ 

सत्य ईश अनुभूति हुँत, सौच हुँत सोधार्थ । 
दया अहिंसाचरन हुँत, दान हुँत  परमार्थ ।१४४०। 
भावार्थ : -- सत्य का उद्देश्य  ईश्वर की अनुभूति करवाना है, शौच सुचिता पवित्रता का उद्देश्य शुद्ध करना है शोध करना है । दया अहिंसा के आचरण हेतु है । दान परमार्थ हेतु दिया जाता है किसी जीव की ह्त्या या कुकृत्य कारण हेतु नहीं ॥



सोमवार, 14 अप्रैल 2014

----- मिनिस्टर राजू १२८ -----

"अरे राजू ! तुम ये कर क्या रहे हो ? "

राजू : -- मास्टर जी ! "एक्टिंग"

"एक्टिंग" और  तू ?

राजू : -- मास्टर जी ! अख्खा मुम्बई दो इच लोगों को जानता है एक उस ढक्कन को एक अप्पन को,

" तू उस ढक्कन को एक्टिंग सीखा दे फिर अख्खा मुंबई तेरेइच को जानेगा"

रविवार, 13 अप्रैल 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४२ ॥ -----

वासो को ना आँधरा, दिन मह दीप जराए । 
अरु सार जुगावन हेतु, धरनी दोहत जाए ।१४२१। 
भावार्थ : -- उस अंधे के जैसा कोई अंधा नहीं जो दिन में भी अंधका में रहता है और प्रकाश हेतु दीप जलाता है । औ उसके सार संयोजन हेतु पृथ्वी का निरंतर दोहन कर रहा है ॥ 

मुट्ठी भर अँधेरों की खातिर,   
चरागों की बेशुमारी देखिए.....

दूषन तन सँकोच बसन, अरु आभूषन दंड । 
पछिताउ मन लाज नयन, श्रृंगि कनक मनि षंड ।१४२२। 
भावार्थ : --  दोष अथवा अपराध यदि देह है तो संकोच ही उसका आवरण है । दंड उसके आभूषण है मन में पश्चाताप और नयन में लज्जा श्रृंगी कनक अर्थात आभूषण बनाने वाला स्वर्ण एवं रत्न समूह हैं ॥ 

अर्थाधार के सुबरन, चारै चरन त्याग । 
दानै दया प्रान मान, करत सकल अनुराग ।१४२३। 
भावार्थ : -- आर्थिक आधार पर जो स्वर्ण है अर्थात श्रेष्ठ वर्ग है उन्हें  त्याग का आचरण करना चाहिए दान दे तो सबके प्रति अनुराग रखते हुवे दया का दान करे प्राण-दान करें और अपने सम्मान का दान करें । 
                                                   कारण की इनका दिया हुवा दान इन्हीं  के वर्ग को ग्राह्य होगा और ग्रहिता की विषय वासनाओं और भोग विषयों के साधनों की ही व्यवस्था करेगा । त्याग साधारण मनुष्य से लेकर जीव-जंतुओं से लेकर सुक्ष-जीवों से लेकर निष्प्राण कण तक को प्राप्त होगा जो इनके लिए वरदान होगा इसे ही योगदान कहते हैं, 
                                                  मध्यम वर्ग एवं निम्न वर्ग को दान के साथ त्याग करना चाहिए, निम्न वर्ग को प्राण दया का दान करना चाहिए । सभी को बुराइयों का त्याग करना चाहिए ॥ 

उत्थान हुँत अवसरु दिए मिले सो कोइ कोई । 
कल्याण हुँत सत्कृत किए, सरबस लाहन होइ ।१४२४। 
भावार्थ : -- यदि किसी के उत्थान  हेतु  दिया गया अवसर किसी किसी को ही प्राप्त होता है, और लाभान्वित कोई नहीं होता । किन्तु कल्याण हेतु किये गए सत्कार्यों से सभी लाभान्वित होते हैं और बहूँतों को अवसर प्राप्त होते हैं ॥ लोचा यह है ? कि कल्याण हेतु किए गए परमार्थ कार्यों में मत नहीं मिलते ? 

गर्भ गहे रज जिउ मिले, जिउ सोंह मिले देह । 
मानस मात्र रूप मिले, भव सागर तू खेह ।१४२५ । 
भावार्थ : --  गर्भ ग्रहण करने से ही किसी रज को जीवन प्राप्त होता है । और जीवन प्राप्त होने स ही देह प्राप्त होती है । जब यह देहाकृति मनुष्य जाति की मिले तब उससे संसार रूपी सागर से तर जाना चाहिए ॥ 

भव सागर देही खेह जीवन खेवनहार ।  
देह रहे न खेह रहे, रहत चिन्ह करुवार ।१४२६ । 
भावारतीह : -- सागर रूपी इस संसार में जीवन रूपी खेवन हार है सागर मन जिस प्रकार नाव स्थिर नहीं रहती वह पार गमन हतु अग्रसर रहती है उसी प्रकार यह देह नहीं रहती  केवल उसके सुकृत्य कुकृत्य के चिन्ह रह जाते हैं ॥ 

ग्रहिता के निज जीवन भली भाँती ले जोग । 
दाता तेरो दान का, होए ना दुरुपयोग ।१४२७। 
भावार्थ : -- हे दाता ! तू दान देने से पहले ग्रहिता के निज जीवन को भली भाँती देख परख ले । कहीं तेरे दिए दान का ग्रहिता द्वारा दुरुपयोग न हो ॥ 

देखे सरबस जात जब सुबुद्धि अरधहि साधि । 
अरध छाँड़ पूरन धाए, पूरन मिले  न आधि ।१४२८।  
भावार्थ : -- सुबुद्धिगण जब सर्वस्व जाता हुवा देखते हैं तो आधे की रक्षा में लग जाते  हैं । मूर्ख लोग आधा को छोड़ कर पूरे के ये दौड़ लगाते हैं परिणाम यह होता है कि पूरा भी नहीं मिलता, जो आधा है वह भी चला जाता है ॥ 

घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध । 
गदने तो गदहा लगे, उरै त लागै गिद्ध ।१४२९ । 
भावार्थ : -- घर में यदि सिद्ध पुरुष भी हो तो वह चौकीदार लगता है । और बाहर गाँव चौकीदार भी दूसरे गाँव में सिद्ध पुरुष कहलाता है ॥ क्योंकि वह जब बोलता है तो पूरा गधा लगता है और उड़ता है तो गिद्ध ॥ 

बारह गाँव का चौधरी तेरह गांव नौराए । 
उड़ता उड़ता आए वह उड़ता उड़ता जाए ।१४३० । 
भावार्थ : -- भई बारह गावों का प्रधान है तेरह गाँव तो जाएगा ही । पैदल थोड़े आएगा -जाएगा, उड़ता-उड़ता आएगा उड़ता-उड़ता जाएगा । अपने पैसे के पंखों से थोड़े न, हमारे पैसे के पंखों से, देखा है कभी उड़ता हुवा नौकर भैया तू स्वयं ही अपने बर्तन माँज,नौकर-चाकर छोड़,तेल के भाव देख कितना महंगा हो गया,पैसे पेड़ पे थोड़े उगते हैं जो तोड़ा और नौकरों को दे दिए उड़ने के लिए ॥   





भगवन मन सुमिरन करत कारें सद कृतकार । 



गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

----- ॥ दोहा-दशम १४१॥ -----

सक्षमता अरु अक्षमता एक दासी एक कंत । 
जग भली भाँति चले तब जब हो दोनहु गुनवंत ।१४११ । 
भावार्थ : -- सक्षमता और अक्षमता में एक दासी है और एक स्वामी है ॥ यह जगत तभी भली प्रकार से चलता है जब दोनों ही गुणवंत होते हैं । अन्यथा चलता तो है किन्तु धक्के दे दे के ॥ 

घात लगाए बैठा जिउ लूटन काल अकाल । 
गाँठ लगाई धुनी की, फँसा बरन के जाल ।१४१२। 
भावार्थ : -- अकाल मृत्यु ,जीवन लूटने के लिए घात लगाए बैठी है । वह शब्दों  की गाँठ लगाए वर्णों के जाल में ही फँसती है ॥ 

कंठ जो काल फाँस गह, बानी करे गुहार । 
जो कंठ बानी न लहे, वाका को रखबार ।१४४३। 
भावार्थ : -- यदि कंठ को काल के फांस ने गृहीत कर लिया हो तो वाणी रक्षा के लिए आह्वान करती है । यदि किसी के कंठ में वाणी ही न हो तो ऐसे प्राणी की रक्षक कौन हो ॥ 

धरे थाल खाए मनभर, सो तो बिषै सुवाद । 
भाग गहे कर अलपतर, वाका नाउ प्रसाद ।१४४४। 
भावार्थ : -- थालों में सजा के  मन भर जो खाया वह प्रसाद नहीं विषयों का भोग है । अपने भाग्य जितना ही और अल्पतम खाए हुवे को प्रसाद कहते हैं  । 

निर्जल उतरू होत जल पौन हिन का पौन । 
निर्जन उतरू होत जन कोलाहल का मौन ।१४४५ । 
भावार्थ : -- निर्जल का उत्तर जल होता है निर्वात का उत्तर वात होती है । निर्जन का उत्तर जन होता है, और कोलाहल का उत्तर मौन होता है शब्द नहीं ॥ 

काल कलुखित करम करे, मारे यह जग लात 
करे कार कल्यान कर, पूछे धरमन जाति ।१४४६। 
भावार्थ : --  कुकरम करने से, कलुषित कर्म करने से यह जग भर्तस्ना ही करता है । और यदि कोई कल्याण कारी कर्म करे तब वह उसकी जाति पूछता है उसका धर्म पूछता है ॥ 

अर्थात : -- "कल्याण कारी कृत्य ही धर्म एवं जातियों का उत्थान करते हैं अवसर नहीं" और अहिंसा सब धर्मों का धर्म है.....

जग संचालन भार जो, अंधन के कर  दाह । 
सकल भुइँ बन घर उपबन, देइ सिंधु अवगाह ।१४४७। 
भावार्थ : -- यदि संसार के संचालन का कार्यभार किसी विवेकहीन को प्रदाय किया तो वह इस पृथ्वी को, उसके वनों, को घरों को, समस्त देश को सिंधु में डूबो देगा ॥ 

'तो उतना ही दूहो जितना की आवश्यकता हो, 

साँच सौच दय अरु दान, साँचा धरम कहाए । 
तिनते  जो  निरपेख रह, सोई नेम दुराए ।१४४८। 
भावार्थ : -- सत्य, शौच (शुद्धता,पवित्रता, सुचिता )  दया, और दान, वास्तविक धर्म कहलाता है । इससे जो निरपेक्ष रहे ऐसे नियम, ऐसे नियंत्रण से दूर ही रहना चाहिए  अर्थात उसका पालन  नहीं करना चाहिए ॥ 

तन ढापन जस हैं बसन, बुद्धि ढाँप तस ज्ञान । 
उदर हुँत जस अन भोजन , जिग्यासा भोजन जान ।१४४९ । 
भावाथ : -- शरीर का आवरण जैसे वस्त्र हैं वैसे ही बुद्धि का आवरण ज्ञान है ।  उदर का भोजन जैसे अन्न है वैसे ही मुमुक्षु  का भोजन मुमुक्षा है ॥ 

लिखा जहँ यहँ निषेध है, दरिदता का प्रबेस । 
सोइ माया दास बास, अरु धनिमन् के देस ।१४५०। 
भावार्थ : -- जहां पर लिखा है 'यहां दरिद्रता का प्रवेश निषेध है ' वह विलासिता की साधन स्वरूपा माया के दासों की वसति है और कुबेर के भाई-बंधुओं का देश है ॥ 

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३९ ॥ -----

भरी धरा उष्मा बसन, उपरन ऊर्मी माल । 
ऊमरिया मह अधोयन, पतनत ऊषक काल ।१३९१ । 
भावार्थ : -- धरती ने ग्रीष्मऋतु के वस्त्र आभारित किये जिसके आँचल में सिंधु तरंगित है । यह आँचल निशा काल में ऊपर उठता है दिवस काल में पुन:उनके चरणों में अवनत हो जाता है ॥ 

मनभावन अनुभूति के, दूज नाउ संतोख । 
दुःख आरत पीर क्लेष, जे नयनन के दोष ।१३९२। 
भावार्थ : -- मन को भाने वाली अनुभूतियाँ अर्थात सुख का दुसरा नाम संतोष है । दुःख,आर्त, पीड़ा, कष्ट यह एक दृष्टि-दोष है, ऊपर देखो तो दुःख ही दुःख है, नीचे देखो तो सुख ही सुख है ॥  

हिमालय के श्रृंग सिखर, सागर सेतु बँधान । 
पनज नदि का निर्मल जर, भारत की पहचान ।१३९३। 
भावार्थ : -- हिमालय पर्वत के श्रृंग से शिखर, सागर पर बंधा सेतु, गंगा नदी का पवित्र जल भारत देश की पहचान हैं ॥ 

स्पष्टीकरण : -- "इनमें दो प्राकृतिक एवं एक पाशविक सह मानविय कृति है"किसी देश के पास है कोई पशुओं द्वारा निर्मित कृति ? 

बागीसा कि सरित जब, रह अपनी मरजाद । 
श्रोता बकता बिच तबहि , बँधे सेतु संवाद ।१३९४। 
भावार्थ : -- वाणी की सरिता जब अपनी मर्यादा में रहती है । श्रोता एवं वक्ता के मध्य संवाद का सेतु तभी बंधनीय है ।। 

हे कर कंत भासवंत, भासन ऐसो भास । 
तपन आपनि गहन रहे,  भू भर पुंज प्रकास ।१३९५ । 
भावार्थ : -- हे केतु कांत हे  भास्वंत यदि तुम्हे भासित होना है तो इस भांति भासित हो । ताप स्वयं में गृहीत रहे, भूमि प्रकाश के पुंज से भर जाए । 

हे संत हे भास्वंत, भासन ऐसो भास । 
कंटक सुमन गहे रहे, पवन लहे जस बास ।१३९६। 
भावार्थ : -- हे सज्जन ! हे वाणी के कान्त ! तुम्हे व्याख्यान ऐसा करना चाहिए । जैसे कंटक सुमन ग्रहण करता है और सुंगंध वायु को प्राप्त होती है ॥ 


सब्द सहार देइ कहे, सो तो नाही दान । 
आपनी कीरति आप मुख कहत होइ कल्यान ।१३९ ७ । 
भावार्थ : -- जो शब्दों के सहारे मुखरित होता हो वह दान नहीं है । जो दान अपनी कीर्ति अपने मुख करता हो वही कल्याण कारी है ॥ 

कल्यान फिर ऐसा हो, सब काहू करि हेतु । 
सगुन अगुन चेताचेत, अग जग लग हो जेत ।१३९ ८। 
भावार्थ : -- कल्याण फिर ऐसा हो जो समस्त संसार में जीअतने भी दृश्य-अदृश्य हैं,जड़-चतन हैं वह सबका ही हित करे ॥ 

दूज लेखे पोछन ते, होत  नहीं बड़ रेख । 
रेख तबहि बड़ होत है, जब लेखे बड़ लेख ।१३९९ ।  
भावार्थ : -- बड़ी लिखने से ही लकीर बड़ी होती है, दूसरों की पोछने से अपनी छोटी लकीर बड़ी नहीं हो जाती ॥

भलजन के करुबर कथन, जस अगहन की बारि ।
खलजन के सुमधुर बचन, वाकी धारा सारि ।१४००।
भावार्थ : -- भले मानुष के कडुवे कथन मार्ग शीर्ष माह की वर्षा के समान होते हैं । दुष्टजनों के मधुर वचन उसकी धरा वृष्टि के समान होते हैं ॥ 
     

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

----- मिनिस्टर राजू १२७ -----

राजू : -- : (

" राजू ये कैसा मुँह बना रखा है हुवा क्या ? "

राजू : -- मास्टर जी! उसने मुझे मारा

" ओय ! किसने ?

राजू : --  मास्टर जी ! उसी पत्रकारिता ने जो झांसी की रानी भी नहीं है, मर्दानी भी नहीं है, फिर भी मर्द बनी फिर रही है, अब जो मर्द न उसे क्या कहेंगे, जो कहेंगे वही कह दिया

 "ओय अब तू माया और सत्ता को कुछ मन्या कह दियो, वो तेरे को फोड़ देंगी"  

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...