रविवार, 9 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३२॥ -----

जीवात्म निज कृति रीति, घट घट भीत बिराज । 
अरु घट धृत कृत रीत तस, जस धृत देस समाज ।१३२१। 
भावार्थ : -- जीवात्म अपनी रचनानुसार अपनी रीति अनुसार अपने स्वभाव अनुसार प्रत्येक शरीर में विराजमान है । यह शरीर वही कृति वही रीति अपनाता है जो उस देश-समाज ने धारण कि होती हैं जिसमें कि वह जन्म लेता है ॥

अर्थात : -- यदि परमात्मा भी किसी शरीर को अंगीकार कर जन्म लेता है या अवतरित होता है । तब उसके भी शरीर को जिसे वह अंगीकार करता है उस देश/स्थान उसके सामाजिक आचार-विचार के अनुसार ही चलना पड़ता है जिसमें कि वह जन्म लेता है ॥ यदि हम कहें ईश्वर को भोजन की क्या आवश्यकता है, ईश्वर को नहीं उस शरीर को है जिसे उसने अंगीकार किया हुवा है ॥

लोभ लबध सन लाहना, धन गह मलिन सुभाउ । 
दान करन परिसोधत, निर्मल हो सुख दाए ।१३२२। 
भावार्थ : -- लोभ के कारण लब्धियों के कारण लाभ के कारण धन मलिनता ग्रहण करता है । दानकरण क्रिया द्वारा परिष्कृत करने से वह धन निर्मल होकर सुख दायक हो जाता है ॥

चहुँ कोत छल छंद छाए, ए काल बयस ए देस । 
घट घट में रावन बसे, भरे राम के भेस ।१३२३।  
भावार्थ : -- इस समय इस देश की परिस्थितियां ऐसी है, कि चारों दिशाओं में छलकपट ही छाया है । देह देह में रावण का वास है भेष उसने प्रभु श्रीराम का भरा है ॥

अनभलखल के पान पूजिते । बरासनी भए धूर्त चरिते ॥ 
आगिन धरि हरि राम कहानी। कहि दनुपत सिय दए सो दानी ॥ 
दुष्टों के दुर्जनों के हाथो पूजित व्यास पीठाधीश भी धूर्त चरित्र धारण करने वाले हो गए हैं । वे सम्मुख तो हरि की  राम कहानी रखे रहते हैं और कहते हैं राक्षसों का स्वामी रावण जैसा कुपात्र भी माँगने क्यों आ जाए, जो उसे सीता दे दे असली दानी तो वही है ॥ वाह रे पीठाधीश, गीस अउ का ॥

बिषयन सन कहु भए कवन, भाउ सोन भय खाह ।
सौमुह कंचन कामिनि, जनि जैसेउ लखाह ।१३२४। 

कोड़ी को सम्भार रखें, जोड़ी को दए छोड़ । 
करन लगे सब अधम रति, करत परस्पर होड़ ।१३२५। 
भावार्थ :- कौड़ी को सम्भाल कर रखते हैं जोड़ी को छोड़ देते हैं । समय ऐसा चल रहा है कि सब स्वार्थ की प्रीति करने लगे हैं इस बात की होड़ लगी है कि कौन कितना अधिक स्वार्थी है ॥ 

मन जोगन को न धावैं, धन जोगन सब धाए । 
तेरी धाए धरी रही, जब सव भवन पठाए ।१३२६। 
भावार्थ : -- धन जोड़ने के लिए सभी दौड़ लेते हैं, किन्तु मन जोड़ने कोई नहीं दौड़ता । ये तेरी दौड़  तब धरी रह जाती है जब तू शव मंदिर भज दिया जाता है ॥ 

अग जग लग बनीज भरे, सबहि एक सोंह ऐक । 

बणितब बस्तु बिबेकि जो ,बानिज सोइ प्रबेक ।१३२७ । 
भावार्थ : -- यह संसार बानियों से भरा पड़ा है, सभी बणिये एक से एक है । जो पाणितव्य-वस्तु का विवेकी है वास्तव में बाणिया वही है और श्रेष्ठ भी वही है, शेष सभी कच्चे-कच्चे से सुगले-सुगले बाणिया हैं ॥ 

जँह सुमिरन मैं हो मगन, भजमन भगवन नाम । 
भाब भगति में हो लगन, तँह धन के काम ।१३३८। 


भावार्थ : --जहाँ स्मरण में मन निमग्न हो और भगवान् के नाम का भजन हो । जहां श्रद्धा, भक्ति, सेवा, प्रेम में निमग्न हो वहाँ (प्रचार हेतु ) धन का क्या काम है ॥  

रचे पद पत पदासीन, सुन्दर सुन्दर ठाम । 
जन जन हो जँह अधिपते, तँह तिनके का काम ।१३३९। 
भावार्थ : -- पदों पर आसीन होकर पदों की रचना की राष्ट्र के पति की रचना की सुन्दर सुन्दर अट्टालिकाओं की रचना की । जहां जनता ही अधिपति हो वहाँ इनका क्या काम है ॥ 

साम दम दंड अरु भेद, जय के चारि उपाए। 
जो लड़ सिंहासन चढ़े, सो तो राउ कहाए ।१३४०। 
भावार्थ : -- शांति, दमन, दंड या भय, भेद, मर्म,रहस्य राज धर्म में ( सेवा धर्म में नहीं, सेवा में जय-विजय कैसी, किससे ) विजय के ये चार उपाय बताए गए हैं । जो लड़-मर के सिंहासन पर चढ़ता है वह तो राजा कहलाता है । राजा तो राजतंत्र में होता है, लोकतंत्र में कहाँ होता है, जब नहीं होता तो लड़ते क्यूँ है ॥ 







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