----- ॥ मैं दानी हूँ,ज्ञानी नहीं हूँ ॥ -----
क्रुद्धहृष्टभीतार्तुलुब्धबालस्थविरमूढमत्तोन्मत्तवाक्यान्यनृतान्यपातकानि |
( एक शब्द में कितना बोलती है ये संस्कृत भाषा )
----- ॥ गौतमधर्मसूत्र ५ /२ ॥ -----
भावार्थ : -- दान तभी करना यथेष्ट है जब उसका अधिकार प्राप्त हो : -- भावावेश में, भयभीत होकर, रुग्णावस्था में, अल्पावस्था में, मदोन्मत्त अवस्था में, विक्षिप्त, अर्ध विक्षिप्त अथवा अमूढ़ अवस्था में दान देना निषेध है ॥
दान देवन जोग कौन, आप धातृ संधानि ।
मात,पिता पालक अन्य, देवन अनुमति दानि ।१३११।
भावार्थ : -- दान देने का अधिकारी कौन हो जो अपना पालन पोषण करने में आपही सक्षम हो । एवं जो मात-पिता पालक अभिभावक अथवा अन्य द्वारा देने हेतु अनुमति दी गई हो ॥
टीका : -- भारतीय संविधान के वयस्कता अधिनियम के अनुसार जो अवयस्क है किन्तु अपना पालन-पोषण करने में सक्षम है वह अपने पालक/अभिभावक की अनुमति से ही दान करना चाहिए । जो वयस्क हैं किन्तु अपना पालन-पोषण करने में असमर्थ हैं क्या उन्हें दान करना चाहिए ? (जब दान शब्द ही सम्मिलित हो उसका तात्पर्य है कोई भी दान ) क्या इन्हें संज्ञान है कि धन कैसे अर्जित किया जाता है ?
ब्यसन भोग बिलास मह, करे दान उपजोग ।
जो कुकरम करिता सो, देवन पात अजोग ।१३१२।
भावार्थ : -- जो प्राप्य दान का उपयोग व्यसन में करता हो भोग विलास में करता हो ( भोग बिलास : -- मूल्यवान वस्त्राभूषण , शीतल शीतल बातावरण , हाँ हवाई जहाज,पानी जहाज ,मणि खचित रथ, कनक अटारी, एवं उसक जैसे आश्रम आदि के भोग को विलासिता कहते हैं ) जो खोटे करम करता हो । खोटे करम करने का तात्पर्य है : --(धूर्तगिरी, चाटुकार, कोई लड़ाई-वडाई करने वाला, कुवैद्य, पणी, वंचक, चोर, हत्यारा,असद् व्यवसाय करने वाला ) वह दान देने के लिए अपात्र है ॥
'क्या कोई नेता-मंत्री इन दुर्गुणों से रहित है ?'
' स वै पुण्यतमो देश: सत्पात्रं यत्र लभ्यते '
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता॥ -----
अर्थात : - ' वह देश/स्थान पवित्र है तीर्थ है वासानुकूल है जहां ( दान हेतु ) सत्पात्र उपलब्ध हों '
टीका : -- एक दल पैसठ वर्ष में सुव्यवस्था स्थापित नहीं कर सका, दुसरा अल छह:वर्षों में स्थापित नहीं कर सका, आप और हम एक पल में इसे स्थापित कर सकते हैं ऐसी कुव्यवस्था का बहिष्कार करके......
प्रियतम प्रेम दान दे, प्रियतमा प्रीति दान ।
नेह बढ़े उरोमल हो, आँख दान असुआँन ।१३१३।
( संत रसखान के पद से अभप्रेरित )
भावार्थ : -- हे प्रीतम तू प्रेम का दान कर, हे प्रियतमा तू प्रीति का दान कर । नयन तू आँसुओं का दान कर कि जिससे स्नेह में वृद्धि हो एवं हृदय निर्मल हो जाए ॥
दाता अरु ग्रहीता जस, दिनमल के दुइ पाख ।
एक भाव मन एक मुख तेइँ, एक दिरिस सोंह लाख ।१३१४।
भावार्थ : --दाता और ग्रहीता जैसे एक मास के दो पक्ष हैं दोनों के सम्मिलन से ही मास की रचना होती है । दाता तभी दाता है जब गृहीता दान ग्रहण करे, ग्रहीता तभी ग्रहीता है जब कोई दे । इनको एक भाव से एक एक ही विचार कर एक ही दृष्टि से देखना चाहिए ॥ अर्थात जो योग्यता लेवनहार की है देवनहार की भी वही योग्यता होनी चाहिए ॥
श्रम कारन सनमान है , श्रम सन घर की कान ।
श्रम सन स्वाभिमान है, श्रम जुग फिर कर दान ।१३१४।
भावार्थ : -- सम्मान उद्यम करने में ही है, श्रम से ही घर की लाज है, घर चलता है । श्रम से ही स्वाभिमान का अस्तित्व है पहले श्रम में योजित हो, दुनिया के रंग-ढंग देख, आँटे-दाल का भाव पता कर, फिर कुछ दान कर.....समझे अठरिया ॥
जँह रवन न्यूनतम हो, भाव अरथ अधिकान ।
अस कहाउत कबित भनित, गहत परम अस्थान ।१३१५।
भावार्थ : -- जहां न्यूनतम शब्द हों, भाव एवं अर्थ अत्यधिक हो । ऐसी कहावत, कविता, कथन, उक्ति, सूक्ति परम पद को प्राप्त होती हैं ॥ परम पदिक कहावत, उक्ति, कविता कब होती है जब भाषा समृद्ध हो, भाषा समृद्ध कब होती है जब उसका व्याकरण समृद्ध हो, व्याकरण समृद्ध कब होता है, जब उसके स्वर व्यंजन सुव्यवस्थित हों ॥
टिप्पणी : -- वैदिक संस्कृत अभी तक की सबसे समृद्ध भाषा है तत्पश्चात (क्रमवार से) संस्कृत, संस्कृत मिश्रित हिंदी, अरबी-फ़ारसी-उर्दू तत्पश्चात आँग्ल भाषा की समृद्धि है.....
दाण करणों तबहि भलो, घराँ होए जब दाम ।
घराँ दाम कब हुवा जी, कराँ होए जब काम ।१३१६।
भावार्थ : -- दान करना तब ही उत्तम है जब घर में दान के विषय हो । ये दान के विषय कब होते है जी? जब हाथ में काम-काज हो ॥
मानस सुख ए बिषय निहित, पाहे मानस गात ।
सुख पर सुख अनुभूत जब, पाहे ऊंची जात ।१३१७।
भावार्थ : -- हे मनुष्य ! यदि तुम दुःखित हो तब सुख मात्र इसी विषय में निहित है कि तुमने मानव का शरीर पाया है । अत: इस शरीर को परमार्थ में लगा कर जीवन को सफल किया जा सकता है ॥ और चूँकि जाति जन्म से प्राप्त होती है यह कर्म से प्राप्त नहीं होती । यदि तुम्हारा जन्म उच्च जाति में हुवा है तब यह कारण सुख के ऊपर सुख की अनुभूति कराता है । ऐसी अवस्था में परमार्थ करना तुम्हारा कर्त्तव्य हो जाता है ॥
धन से सुख की प्राप्ति नहीं होती अपितु दुःख की ही प्राप्ति होती है, क्योंकि धन में मलिनता होती है जो दुखों का कारण बनती है । इसे दान द्वारा शुद्ध किया जा सकता है, और इससे सुख प्राप्त किया जा सकता है । विलासिता की साधन स्वरूपा माया से तो दुःख के सह पाप ही संकलित होते हैं । माया त्याग की विषय-वास्तु है दान की नहीं ॥
अंतस देहि यंत्री है, बाहरी देहि यन्त्र ।
अंतर देहि तंत्री है, बाहरी देहि तंत्र ।१२१८।
भावार्थ : -- यदि बाहरी देह एक यन्त्र है, तो मृत्यु एवं जन्म के मध्य स्थित आत्मा उसकी संचालक है, यंत्री है । यदि बाहरी देही एक तंत्र है तो अनतरात्मा ही उसकी संचालक है, तंत्री है ॥
बयसाधीन रह जबलग, बसि अंतर भाव देह ।
स्वाधीन तब होत जब, पैहहिं बयस बिदेह ।१३१९।
भावार्थ : -- अंतरात्मा जब तक जन्म एवं मृत्यु के मध्य स्थितवाली होती है तब तक यह अवस्था के अधीन होती है । शरीर हिन् की स्थिति की प्राप्ति पर यह अवस्था से भी विमुक्त हो जाती है ॥
अंजन माँगे आँधरा, गंजा कंघी तेल।
सत्ता के सुख भोगने, खेलें चुनाउ खेल।१३२०।
भावार्थ : -- आँख का अंधा सिंगार कू अंजन मांगे, जोती बढ़ानी है । सिर का गंजा कंघी और तेल माँगे, भाई अंधे को आँख दो, गंजे को टोप दो। बुद्धिहीन को बुद्धि दो, 'मत' मत दो । सत्ता के सुख भोगने के लिए ये अंधे और गंजे चुनाव-चुनाव खेल रहे हैं, तो जिसके पास जो नहीं है वही दो जय गणेश देवा ।।
क्रुद्धहृष्टभीतार्तुलुब्धबालस्थविरमूढमत्तोन्मत्तवाक्यान्यनृतान्यपातकानि |
( एक शब्द में कितना बोलती है ये संस्कृत भाषा )
----- ॥ गौतमधर्मसूत्र ५ /२ ॥ -----
भावार्थ : -- दान तभी करना यथेष्ट है जब उसका अधिकार प्राप्त हो : -- भावावेश में, भयभीत होकर, रुग्णावस्था में, अल्पावस्था में, मदोन्मत्त अवस्था में, विक्षिप्त, अर्ध विक्षिप्त अथवा अमूढ़ अवस्था में दान देना निषेध है ॥
दान देवन जोग कौन, आप धातृ संधानि ।
मात,पिता पालक अन्य, देवन अनुमति दानि ।१३११।
भावार्थ : -- दान देने का अधिकारी कौन हो जो अपना पालन पोषण करने में आपही सक्षम हो । एवं जो मात-पिता पालक अभिभावक अथवा अन्य द्वारा देने हेतु अनुमति दी गई हो ॥
टीका : -- भारतीय संविधान के वयस्कता अधिनियम के अनुसार जो अवयस्क है किन्तु अपना पालन-पोषण करने में सक्षम है वह अपने पालक/अभिभावक की अनुमति से ही दान करना चाहिए । जो वयस्क हैं किन्तु अपना पालन-पोषण करने में असमर्थ हैं क्या उन्हें दान करना चाहिए ? (जब दान शब्द ही सम्मिलित हो उसका तात्पर्य है कोई भी दान ) क्या इन्हें संज्ञान है कि धन कैसे अर्जित किया जाता है ?
ब्यसन भोग बिलास मह, करे दान उपजोग ।
जो कुकरम करिता सो, देवन पात अजोग ।१३१२।
भावार्थ : -- जो प्राप्य दान का उपयोग व्यसन में करता हो भोग विलास में करता हो ( भोग बिलास : -- मूल्यवान वस्त्राभूषण , शीतल शीतल बातावरण , हाँ हवाई जहाज,पानी जहाज ,मणि खचित रथ, कनक अटारी, एवं उसक जैसे आश्रम आदि के भोग को विलासिता कहते हैं ) जो खोटे करम करता हो । खोटे करम करने का तात्पर्य है : --(धूर्तगिरी, चाटुकार, कोई लड़ाई-वडाई करने वाला, कुवैद्य, पणी, वंचक, चोर, हत्यारा,असद् व्यवसाय करने वाला ) वह दान देने के लिए अपात्र है ॥
'क्या कोई नेता-मंत्री इन दुर्गुणों से रहित है ?'
' स वै पुण्यतमो देश: सत्पात्रं यत्र लभ्यते '
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता॥ -----
अर्थात : - ' वह देश/स्थान पवित्र है तीर्थ है वासानुकूल है जहां ( दान हेतु ) सत्पात्र उपलब्ध हों '
टीका : -- एक दल पैसठ वर्ष में सुव्यवस्था स्थापित नहीं कर सका, दुसरा अल छह:वर्षों में स्थापित नहीं कर सका, आप और हम एक पल में इसे स्थापित कर सकते हैं ऐसी कुव्यवस्था का बहिष्कार करके......
प्रियतम प्रेम दान दे, प्रियतमा प्रीति दान ।
नेह बढ़े उरोमल हो, आँख दान असुआँन ।१३१३।
( संत रसखान के पद से अभप्रेरित )
भावार्थ : -- हे प्रीतम तू प्रेम का दान कर, हे प्रियतमा तू प्रीति का दान कर । नयन तू आँसुओं का दान कर कि जिससे स्नेह में वृद्धि हो एवं हृदय निर्मल हो जाए ॥
दाता अरु ग्रहीता जस, दिनमल के दुइ पाख ।
एक भाव मन एक मुख तेइँ, एक दिरिस सोंह लाख ।१३१४।
भावार्थ : --दाता और ग्रहीता जैसे एक मास के दो पक्ष हैं दोनों के सम्मिलन से ही मास की रचना होती है । दाता तभी दाता है जब गृहीता दान ग्रहण करे, ग्रहीता तभी ग्रहीता है जब कोई दे । इनको एक भाव से एक एक ही विचार कर एक ही दृष्टि से देखना चाहिए ॥ अर्थात जो योग्यता लेवनहार की है देवनहार की भी वही योग्यता होनी चाहिए ॥
श्रम कारन सनमान है , श्रम सन घर की कान ।
श्रम सन स्वाभिमान है, श्रम जुग फिर कर दान ।१३१४।
भावार्थ : -- सम्मान उद्यम करने में ही है, श्रम से ही घर की लाज है, घर चलता है । श्रम से ही स्वाभिमान का अस्तित्व है पहले श्रम में योजित हो, दुनिया के रंग-ढंग देख, आँटे-दाल का भाव पता कर, फिर कुछ दान कर.....समझे अठरिया ॥
जँह रवन न्यूनतम हो, भाव अरथ अधिकान ।
अस कहाउत कबित भनित, गहत परम अस्थान ।१३१५।
भावार्थ : -- जहां न्यूनतम शब्द हों, भाव एवं अर्थ अत्यधिक हो । ऐसी कहावत, कविता, कथन, उक्ति, सूक्ति परम पद को प्राप्त होती हैं ॥ परम पदिक कहावत, उक्ति, कविता कब होती है जब भाषा समृद्ध हो, भाषा समृद्ध कब होती है जब उसका व्याकरण समृद्ध हो, व्याकरण समृद्ध कब होता है, जब उसके स्वर व्यंजन सुव्यवस्थित हों ॥
टिप्पणी : -- वैदिक संस्कृत अभी तक की सबसे समृद्ध भाषा है तत्पश्चात (क्रमवार से) संस्कृत, संस्कृत मिश्रित हिंदी, अरबी-फ़ारसी-उर्दू तत्पश्चात आँग्ल भाषा की समृद्धि है.....
दाण करणों तबहि भलो, घराँ होए जब दाम ।
घराँ दाम कब हुवा जी, कराँ होए जब काम ।१३१६।
भावार्थ : -- दान करना तब ही उत्तम है जब घर में दान के विषय हो । ये दान के विषय कब होते है जी? जब हाथ में काम-काज हो ॥
मानस सुख ए बिषय निहित, पाहे मानस गात ।
सुख पर सुख अनुभूत जब, पाहे ऊंची जात ।१३१७।
भावार्थ : -- हे मनुष्य ! यदि तुम दुःखित हो तब सुख मात्र इसी विषय में निहित है कि तुमने मानव का शरीर पाया है । अत: इस शरीर को परमार्थ में लगा कर जीवन को सफल किया जा सकता है ॥ और चूँकि जाति जन्म से प्राप्त होती है यह कर्म से प्राप्त नहीं होती । यदि तुम्हारा जन्म उच्च जाति में हुवा है तब यह कारण सुख के ऊपर सुख की अनुभूति कराता है । ऐसी अवस्था में परमार्थ करना तुम्हारा कर्त्तव्य हो जाता है ॥
धन से सुख की प्राप्ति नहीं होती अपितु दुःख की ही प्राप्ति होती है, क्योंकि धन में मलिनता होती है जो दुखों का कारण बनती है । इसे दान द्वारा शुद्ध किया जा सकता है, और इससे सुख प्राप्त किया जा सकता है । विलासिता की साधन स्वरूपा माया से तो दुःख के सह पाप ही संकलित होते हैं । माया त्याग की विषय-वास्तु है दान की नहीं ॥
अंतस देहि यंत्री है, बाहरी देहि यन्त्र ।
अंतर देहि तंत्री है, बाहरी देहि तंत्र ।१२१८।
भावार्थ : -- यदि बाहरी देह एक यन्त्र है, तो मृत्यु एवं जन्म के मध्य स्थित आत्मा उसकी संचालक है, यंत्री है । यदि बाहरी देही एक तंत्र है तो अनतरात्मा ही उसकी संचालक है, तंत्री है ॥
बयसाधीन रह जबलग, बसि अंतर भाव देह ।
स्वाधीन तब होत जब, पैहहिं बयस बिदेह ।१३१९।
भावार्थ : -- अंतरात्मा जब तक जन्म एवं मृत्यु के मध्य स्थितवाली होती है तब तक यह अवस्था के अधीन होती है । शरीर हिन् की स्थिति की प्राप्ति पर यह अवस्था से भी विमुक्त हो जाती है ॥
अंजन माँगे आँधरा, गंजा कंघी तेल।
सत्ता के सुख भोगने, खेलें चुनाउ खेल।१३२०।
भावार्थ : -- आँख का अंधा सिंगार कू अंजन मांगे, जोती बढ़ानी है । सिर का गंजा कंघी और तेल माँगे, भाई अंधे को आँख दो, गंजे को टोप दो। बुद्धिहीन को बुद्धि दो, 'मत' मत दो । सत्ता के सुख भोगने के लिए ये अंधे और गंजे चुनाव-चुनाव खेल रहे हैं, तो जिसके पास जो नहीं है वही दो जय गणेश देवा ।।
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