तमोगुनिन के तमोभिद जिनके मन कू भाएँ ।
सघन तम ब्यापत रहे, तहाँ हन पैठ न पाए ।१३८१।
भावार्थ : -- जिस ह्रदय को तमो-गुण ( आलस्य,अज्ञान, क्रोध) के जुगनू प्रिय लगते हैं, वहाँ गहन तमस छाया रहता है वहाँ तमोहर पहुँच नहीं पाते ॥
कली तब लग कली रहे, जब लग पालउ बंध ।
पुहुप तबलग पुहुप रहे, जब लग रहे सुगंध ।१३८२।
भावार्थ : -- कोई काली अथवा कन्या तब तक कली अथवा कन्या रहती है जबतक उसका पल्लव बंधा होता है। पुष्प तब तक पुष्प रहता है जबतक उसमं सुगंध रहती है ॥
मूर्खा भया मतिबन्त कारे ज्ञान प्रसार ।
मतिबन्त भया मूरखा, कारे आप प्रचार ।१३८३।
भावार्थ : -- यदि मूर्ख बुद्धिमान हो जाए तो वह ज्ञान का ही प्रसार करेगा । और यदि बुद्धिमान मूर्ख हो जाए तो वह कुछ भी पडेगा लिखेगा नहीं, मूर्खता के साथ वह केवल अपना ही प्रचार करेगा ॥
सिँहासन के जोग धरन, करे राम के जाप ।
जोग पहे सब परिहाए, बिथुरावन जग पाप ।१३८४।
भावार्थ : -- सिंहासन प्राप्त करने की योगयता धारण करनी थी तो सबने राम के नाम का जाप किया राम !! हे राम !! कर करके ॥ योग्यता प्राप्त होते ही सब त्याग दिया क्यों ?क्योंकि संसार में अपने पापों का प्रसार कर सकें ॥
बैठे जोइ बिटप उपर , काटे तहँ की मूरि ।
मुख अहिंसा जाप करे, कर धर लमनी छूरि।१३८५।
भावार्थ : -- जिस वृक्षके ऊपर बैठे हो, उसी की जड़ें काट रहे हैं ॥ मुख में तो अहिंसा की जाप है हाथ में ये लम्बी छूरी है, यही है अहिंसा ?
बानी बायु एकै धरम , जो कहुँ लाग धराए ।
चाहे तो बिस्तार दे, चाहे देइ बुझाए ।१३८६।
भावार्थ : -- वाणी और वायु का स्वभाव एक जैसा है । कहीं आग लगी हो कहीं झगड़ा हो रहा हो । ये चाहे तो उसे विस्तारित कर सकते हैं, चाहे तो शांत कर सकते हैं ॥
एक कहाउत कही गई,धुनी धरे बहु थोड़ ।
चाहे केतक पीट लौ, गदहा बने न घोड़ ।१३८७।
भावार्थ : -- अल्पतम शब्दों के साथ एक कहावत कही गई है । " चाहे कितना ही पीट लो गधा घोड़ा नहीं बन सकता ॥ "
सकल भोग हमरेहि हुँत, जो कहि बनत प्रधान ।
सोइ दुआरि भिखारि बन, मँग रहे क्यूँ दान । १३८७ ।
भावार्थ : -- भई प्रधान मंत्री हैं, भोज आयोजित करेंगे सारे भोग इन्ही के लिए ही तो हैं जो प्रधान मंत्री बनते ही ऐसा कह रहे थे । अब वह कहाँ हैं, प्रधान मंत्री हैं तो भिखारी बन के द्वार पर क्यों खड़े हैं ?, दान क्यों मांग रहे हैं , मांग के भोगते हैं क्या ?
"दान कल्याण हेतु होता है किसी के भोग विषयों की व्यवस्था हेतु नहीं"
गूँगे राग सुना रहे,बहिरे देवें कान ।
बिषयों के भोगी देखु, दाए दान के ज्ञान ।१३८८।
भावार्थ : -- गूंगे बकता बने राग सुना रहे हैं बहरे श्रोता बन के सुन रहे हैं । उधर देखो विषयों के भोगी हैं भोग विलास में आकंठ डूबे हुवे हैं और दान का ज्ञान दे रहे हैं
सत्य ऐसोई पवित हो, जस सुरसरि का नीर ।
ऐसा जीवन चरित्र हो, जैसिहु वाका तीर ।१३८९।
भावार्थ : -- सत्य ऐसा पावन हो जैसा की गंगा का जल होता है उसमें कोई छल कपट न हो कोई स्वार्थ निहित न हो । और जीवन में चैत्र ऐसा हो जैसा उसका तट है जो स्वर्ग के सोपान पथ को वां किये हुवे मोक्ष-द्वार है ।।
सत्य सब्द छाँड़ि कै जब, चारन करे निबास ।
पनज जल सों प्रकट रूप , देई निर्मल भास ।१३९०।
भावार्थ : -- सत्य रूपी ईश्वर जब शब्दों को छोड़ कर आचरण में निवास करने लगता है । तब वह गंगा-जल के सदृश्य, प्रकट स्वरुप में अपनी पवित्रता का आभास देता है ॥
सघन तम ब्यापत रहे, तहाँ हन पैठ न पाए ।१३८१।
भावार्थ : -- जिस ह्रदय को तमो-गुण ( आलस्य,अज्ञान, क्रोध) के जुगनू प्रिय लगते हैं, वहाँ गहन तमस छाया रहता है वहाँ तमोहर पहुँच नहीं पाते ॥
कली तब लग कली रहे, जब लग पालउ बंध ।
पुहुप तबलग पुहुप रहे, जब लग रहे सुगंध ।१३८२।
भावार्थ : -- कोई काली अथवा कन्या तब तक कली अथवा कन्या रहती है जबतक उसका पल्लव बंधा होता है। पुष्प तब तक पुष्प रहता है जबतक उसमं सुगंध रहती है ॥
मूर्खा भया मतिबन्त कारे ज्ञान प्रसार ।
मतिबन्त भया मूरखा, कारे आप प्रचार ।१३८३।
भावार्थ : -- यदि मूर्ख बुद्धिमान हो जाए तो वह ज्ञान का ही प्रसार करेगा । और यदि बुद्धिमान मूर्ख हो जाए तो वह कुछ भी पडेगा लिखेगा नहीं, मूर्खता के साथ वह केवल अपना ही प्रचार करेगा ॥
सिँहासन के जोग धरन, करे राम के जाप ।
जोग पहे सब परिहाए, बिथुरावन जग पाप ।१३८४।
भावार्थ : -- सिंहासन प्राप्त करने की योगयता धारण करनी थी तो सबने राम के नाम का जाप किया राम !! हे राम !! कर करके ॥ योग्यता प्राप्त होते ही सब त्याग दिया क्यों ?क्योंकि संसार में अपने पापों का प्रसार कर सकें ॥
बैठे जोइ बिटप उपर , काटे तहँ की मूरि ।
मुख अहिंसा जाप करे, कर धर लमनी छूरि।१३८५।
भावार्थ : -- जिस वृक्षके ऊपर बैठे हो, उसी की जड़ें काट रहे हैं ॥ मुख में तो अहिंसा की जाप है हाथ में ये लम्बी छूरी है, यही है अहिंसा ?
बानी बायु एकै धरम , जो कहुँ लाग धराए ।
चाहे तो बिस्तार दे, चाहे देइ बुझाए ।१३८६।
भावार्थ : -- वाणी और वायु का स्वभाव एक जैसा है । कहीं आग लगी हो कहीं झगड़ा हो रहा हो । ये चाहे तो उसे विस्तारित कर सकते हैं, चाहे तो शांत कर सकते हैं ॥
एक कहाउत कही गई,धुनी धरे बहु थोड़ ।
चाहे केतक पीट लौ, गदहा बने न घोड़ ।१३८७।
भावार्थ : -- अल्पतम शब्दों के साथ एक कहावत कही गई है । " चाहे कितना ही पीट लो गधा घोड़ा नहीं बन सकता ॥ "
सकल भोग हमरेहि हुँत, जो कहि बनत प्रधान ।
सोइ दुआरि भिखारि बन, मँग रहे क्यूँ दान । १३८७ ।
भावार्थ : -- भई प्रधान मंत्री हैं, भोज आयोजित करेंगे सारे भोग इन्ही के लिए ही तो हैं जो प्रधान मंत्री बनते ही ऐसा कह रहे थे । अब वह कहाँ हैं, प्रधान मंत्री हैं तो भिखारी बन के द्वार पर क्यों खड़े हैं ?, दान क्यों मांग रहे हैं , मांग के भोगते हैं क्या ?
"दान कल्याण हेतु होता है किसी के भोग विषयों की व्यवस्था हेतु नहीं"
गूँगे राग सुना रहे,बहिरे देवें कान ।
बिषयों के भोगी देखु, दाए दान के ज्ञान ।१३८८।
भावार्थ : -- गूंगे बकता बने राग सुना रहे हैं बहरे श्रोता बन के सुन रहे हैं । उधर देखो विषयों के भोगी हैं भोग विलास में आकंठ डूबे हुवे हैं और दान का ज्ञान दे रहे हैं
सत्य ऐसोई पवित हो, जस सुरसरि का नीर ।
ऐसा जीवन चरित्र हो, जैसिहु वाका तीर ।१३८९।
भावार्थ : -- सत्य ऐसा पावन हो जैसा की गंगा का जल होता है उसमें कोई छल कपट न हो कोई स्वार्थ निहित न हो । और जीवन में चैत्र ऐसा हो जैसा उसका तट है जो स्वर्ग के सोपान पथ को वां किये हुवे मोक्ष-द्वार है ।।
सत्य सब्द छाँड़ि कै जब, चारन करे निबास ।
पनज जल सों प्रकट रूप , देई निर्मल भास ।१३९०।
भावार्थ : -- सत्य रूपी ईश्वर जब शब्दों को छोड़ कर आचरण में निवास करने लगता है । तब वह गंगा-जल के सदृश्य, प्रकट स्वरुप में अपनी पवित्रता का आभास देता है ॥
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