सोमवार, 31 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३ ८ ॥ -----

तमोगुनिन के तमोभिद जिनके मन कू भाएँ । 
सघन तम ब्यापत रहे, तहाँ हन पैठ न पाए ।१३८१। 
भावार्थ : -- जिस ह्रदय को तमो-गुण ( आलस्य,अज्ञान, क्रोध) के जुगनू प्रिय लगते हैं, वहाँ गहन तमस छाया रहता है वहाँ तमोहर पहुँच नहीं पाते ॥  

कली तब लग कली रहे, जब लग पालउ बंध । 
पुहुप तबलग पुहुप रहे, जब लग रहे सुगंध ।१३८२। 
भावार्थ : -- कोई काली अथवा कन्या तब तक कली अथवा कन्या रहती है जबतक उसका पल्लव बंधा होता है। पुष्प तब तक पुष्प रहता है जबतक उसमं सुगंध रहती है ॥ 


मूर्खा भया मतिबन्त कारे ज्ञान प्रसार । 
मतिबन्त भया मूरखा, कारे आप प्रचार ।१३८३। 
भावार्थ : -- यदि मूर्ख बुद्धिमान हो जाए तो वह ज्ञान का ही प्रसार करेगा । और यदि बुद्धिमान मूर्ख हो जाए तो वह कुछ भी पडेगा लिखेगा नहीं, मूर्खता के साथ वह केवल अपना ही प्रचार करेगा ॥ 

सिँहासन के जोग धरन, करे राम के जाप । 
जोग पहे सब परिहाए, बिथुरावन जग पाप ।१३८४। 
भावार्थ : -- सिंहासन प्राप्त करने की योगयता धारण करनी थी तो सबने राम के नाम का जाप किया राम !! हे राम !! कर करके ॥ योग्यता प्राप्त होते ही सब त्याग दिया क्यों ?क्योंकि संसार में अपने पापों का प्रसार कर सकें ॥ 

बैठे जोइ बिटप उपर , काटे तहँ की मूरि । 
मुख अहिंसा जाप करे, कर धर लमनी छूरि।१३८५। 
भावार्थ : -- जिस वृक्षके ऊपर बैठे हो, उसी की जड़ें काट रहे हैं ॥ मुख में तो अहिंसा की जाप है हाथ में ये लम्बी छूरी है, यही है अहिंसा ?

बानी बायु एकै धरम , जो कहुँ लाग धराए । 
चाहे तो बिस्तार दे, चाहे देइ बुझाए ।१३८६। 
भावार्थ : -- वाणी और वायु का स्वभाव एक जैसा है ।  कहीं आग लगी हो कहीं झगड़ा हो रहा हो । ये चाहे तो उसे विस्तारित कर सकते हैं, चाहे तो शांत कर सकते हैं ॥

एक कहाउत कही गई,धुनी धरे बहु थोड़ । 
चाहे केतक पीट लौ, गदहा बने न घोड़ ।१३८७। 
भावार्थ : -- अल्पतम शब्दों के साथ एक कहावत कही गई है । " चाहे कितना ही पीट लो गधा घोड़ा नहीं बन सकता ॥ "

सकल भोग हमरेहि हुँत, जो कहि बनत प्रधान । 
सोइ  दुआरि भिखारि बन, मँग रहे क्यूँ दान । १३८७ । 
भावार्थ : -- भई प्रधान मंत्री हैं, भोज आयोजित करेंगे सारे भोग इन्ही के लिए ही तो हैं जो प्रधान मंत्री बनते ही ऐसा कह रहे थे । अब वह कहाँ हैं, प्रधान मंत्री हैं तो भिखारी बन के द्वार पर क्यों खड़े हैं ?, दान क्यों मांग रहे हैं , मांग के भोगते हैं क्या ? 

"दान कल्याण हेतु होता है किसी के भोग विषयों की व्यवस्था हेतु नहीं"

गूँगे राग सुना रहे,बहिरे देवें कान । 
बिषयों के भोगी देखु, दाए दान के ज्ञान ।१३८८। 
भावार्थ : -- गूंगे बकता बने राग सुना रहे हैं बहरे श्रोता बन के सुन रहे हैं । उधर देखो विषयों के भोगी हैं भोग विलास में आकंठ डूबे हुवे हैं और दान का ज्ञान दे रहे हैं 

सत्य ऐसोई पवित हो, जस सुरसरि का नीर । 
ऐसा जीवन चरित्र हो, जैसिहु वाका तीर ।१३८९। 
भावार्थ : -- सत्य ऐसा पावन हो जैसा की गंगा का जल होता है उसमें कोई छल कपट न हो कोई स्वार्थ निहित न हो । और जीवन में चैत्र ऐसा हो जैसा उसका तट है जो स्वर्ग के सोपान पथ को वां किये हुवे मोक्ष-द्वार है ।।  

सत्य सब्द छाँड़ि कै जब, चारन करे निबास । 

पनज जल सों प्रकट रूप , देई निर्मल भास ।१३९०।  
भावार्थ : -- सत्य रूपी ईश्वर जब शब्दों को छोड़ कर आचरण में निवास करने लगता है । तब वह गंगा-जल के सदृश्य, प्रकट स्वरुप में अपनी पवित्रता का आभास देता है ॥ 


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