भलाई दुबराई के, करत बुराई पोठ ।
मत धन ग्यान दान दिए, बारू ऐसोइ कोठ।१३७१।
भावार्थ : -- जो भलाई को कृश करता हो बुराई को पुष्ट करता हो ॥ ऐसे मत के ऐसे धन के ऐसे ज्ञान के दान-कोष्ठ में आग लगा देनी चाहिए॥
दान धर्म बिनु अर्थ गृह, गाहत दोष बिकार ।
न्यायोचित सदारजन, करत जगत उद्धार ।१३७२।
भावार्थ : - दान कर्म धर्मार्थ रहित अर्थ-युक्त घर मन दोषों एवं विकारों को ग्रहण कर लेता है ॥ न्याय सन्गत सदर्जन का दान-धर्म ही जगत का कल्याण करता है ॥ ऐसा अर्जन कदापि नहीं करना चाहिए जो प्राणी-जगत हतु कष्टमयी होकर आपदाओं का कारण बने ॥
जनता गहरी नीँद में, खर खर नाक बजाए ।
कोइ लगे जगावन में, कोइ सपन दरसाए ।१३७३।
भावार्थ : -- जनता गहरी नींद में है खर खर नाक बज रही है । कोई उसे जगाने में लगा है कुम्भकरन हे काए,इ पांच बछर मा उठथे तहां फेन उँह..... कोई सपने दिखा रहा है ॥
बिरंचि धूर्त जंतु कू, ए हुँत देइ सब आँख ।
जीउ लोक के जोख कर, राखे जग की राख ।१३७४।
भावार्थ : -- विधाता ने मनुष्य को सर्वेन्द्रियपति स्वरुप में इस हेतु रचा है कि वह प्राणि-जगत की रक्षा करते हुवे, समस्त संसार की सुरक्षा करे, इसलिए नहीं की वह भोग विलास में डूबा रहे ॥
अंस जनेऊ चिन्ह किए, धारे सिखंड सीस ।
बिरहमन भूति छाँड़ भए बनिये पीठाधीस ।१३७५।
भावार्थ : -- कंधे पर जनेऊ लटका लिया, सिर पर तिलंगी सजा ली । वाणिज्यक वृत्ति अपनाकर पीठाधीश बने बैठे ब्राह्मणों ने अपनी वृत्ति त्याग दी है ॥
अर्थात : -- "चिन्हों से कोई ब्राह्मण नहीं होता, वृत्ति एवं आचरण वरण करने से होता है"
साँच जुराउन जोग के, प्रहसन जोरन देइ ।
बिनोद के मट्ठा मिले, साँच सनेहन लेइ ।१३७६।
भावार्थ : -- सांच का जोड़ावन एकत्र कर उसे प्रहसन के जोरन से जोड़ दें । उसमें फिर हास-परिहास के छाछ के साथ सत्य के सार प्राप्त करें ॥
रहि मोरी भुइँ भूरिदा, सुबरन कन संदोहि ।
परसे ऐसो कुपारस, कारे सुबरन लोहि ।१२७७।
भावार्थ : -- मेरी भूमि बहुंत दानी थी, वह सोने के कण देने वाली गौ थी । उसे ऐसे कुपारसी ने स्पर्श किया कि सारे सोने के कण लोहा हो गए ॥
साँच असाँच फेर फिरे, काहे भया अधीर ।
साँच गहि सो छीर है, असाँच है सो नीर ।१२७८।
भावार्थ : - सत्य-असत्य के फेर में पड़ कर अधीर क्यों हो रहे हो । जो सत्य है वह क्षीर है जो असत्य है वह नीर है ॥
प्रियजन सोंह बिगार के, कछुहु नहीं लहनाए ।
जस बिगराई दूध में, सार नहीं गहियाए ।१२७९ ।
भावार्थ : -- प्रियजनों से बिगाड़ कर कुछ प्राप्त लाभ नहीं है । जैसे दूध को बिगाड़ने से उसमें फिर सार प्राप्त नहीं होता ।।
मुख में राम नाम रखे, खल जन सत्ता पाए ।
नग नद बन सब खेत खन, हिंसा अगन जराए ।१२८०।
भावार्थ : -- दुष्टों ने मुख में राम का नाम धारण किये सत्ता को ऐसे हड़पा कि हिंसा का आचरण करते सब कुछ भस्म कर दिया । अब न कहीं पर्वत ही दिखते हैं न ही नदी दिखती है , न कहीं वैन दिखाते है, न वन गोचर दिखते हैं , न कहीं खेत खंड ही दिखते हैं.....दिखते हैं तो बस इन्हें नोचते-खसोटते उद्योगपति ॥
मत धन ग्यान दान दिए, बारू ऐसोइ कोठ।१३७१।
भावार्थ : -- जो भलाई को कृश करता हो बुराई को पुष्ट करता हो ॥ ऐसे मत के ऐसे धन के ऐसे ज्ञान के दान-कोष्ठ में आग लगा देनी चाहिए॥
दान धर्म बिनु अर्थ गृह, गाहत दोष बिकार ।
न्यायोचित सदारजन, करत जगत उद्धार ।१३७२।
भावार्थ : - दान कर्म धर्मार्थ रहित अर्थ-युक्त घर मन दोषों एवं विकारों को ग्रहण कर लेता है ॥ न्याय सन्गत सदर्जन का दान-धर्म ही जगत का कल्याण करता है ॥ ऐसा अर्जन कदापि नहीं करना चाहिए जो प्राणी-जगत हतु कष्टमयी होकर आपदाओं का कारण बने ॥
जनता गहरी नीँद में, खर खर नाक बजाए ।
कोइ लगे जगावन में, कोइ सपन दरसाए ।१३७३।
भावार्थ : -- जनता गहरी नींद में है खर खर नाक बज रही है । कोई उसे जगाने में लगा है कुम्भकरन हे काए,इ पांच बछर मा उठथे तहां फेन उँह..... कोई सपने दिखा रहा है ॥
बिरंचि धूर्त जंतु कू, ए हुँत देइ सब आँख ।
जीउ लोक के जोख कर, राखे जग की राख ।१३७४।
भावार्थ : -- विधाता ने मनुष्य को सर्वेन्द्रियपति स्वरुप में इस हेतु रचा है कि वह प्राणि-जगत की रक्षा करते हुवे, समस्त संसार की सुरक्षा करे, इसलिए नहीं की वह भोग विलास में डूबा रहे ॥
अंस जनेऊ चिन्ह किए, धारे सिखंड सीस ।
बिरहमन भूति छाँड़ भए बनिये पीठाधीस ।१३७५।
भावार्थ : -- कंधे पर जनेऊ लटका लिया, सिर पर तिलंगी सजा ली । वाणिज्यक वृत्ति अपनाकर पीठाधीश बने बैठे ब्राह्मणों ने अपनी वृत्ति त्याग दी है ॥
अर्थात : -- "चिन्हों से कोई ब्राह्मण नहीं होता, वृत्ति एवं आचरण वरण करने से होता है"
साँच जुराउन जोग के, प्रहसन जोरन देइ ।
बिनोद के मट्ठा मिले, साँच सनेहन लेइ ।१३७६।
भावार्थ : -- सांच का जोड़ावन एकत्र कर उसे प्रहसन के जोरन से जोड़ दें । उसमें फिर हास-परिहास के छाछ के साथ सत्य के सार प्राप्त करें ॥
रहि मोरी भुइँ भूरिदा, सुबरन कन संदोहि ।
परसे ऐसो कुपारस, कारे सुबरन लोहि ।१२७७।
भावार्थ : -- मेरी भूमि बहुंत दानी थी, वह सोने के कण देने वाली गौ थी । उसे ऐसे कुपारसी ने स्पर्श किया कि सारे सोने के कण लोहा हो गए ॥
साँच असाँच फेर फिरे, काहे भया अधीर ।
साँच गहि सो छीर है, असाँच है सो नीर ।१२७८।
भावार्थ : - सत्य-असत्य के फेर में पड़ कर अधीर क्यों हो रहे हो । जो सत्य है वह क्षीर है जो असत्य है वह नीर है ॥
प्रियजन सोंह बिगार के, कछुहु नहीं लहनाए ।
जस बिगराई दूध में, सार नहीं गहियाए ।१२७९ ।
भावार्थ : -- प्रियजनों से बिगाड़ कर कुछ प्राप्त लाभ नहीं है । जैसे दूध को बिगाड़ने से उसमें फिर सार प्राप्त नहीं होता ।।
मुख में राम नाम रखे, खल जन सत्ता पाए ।
नग नद बन सब खेत खन, हिंसा अगन जराए ।१२८०।
भावार्थ : -- दुष्टों ने मुख में राम का नाम धारण किये सत्ता को ऐसे हड़पा कि हिंसा का आचरण करते सब कुछ भस्म कर दिया । अब न कहीं पर्वत ही दिखते हैं न ही नदी दिखती है , न कहीं वैन दिखाते है, न वन गोचर दिखते हैं , न कहीं खेत खंड ही दिखते हैं.....दिखते हैं तो बस इन्हें नोचते-खसोटते उद्योगपति ॥
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