शनिवार, 22 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३६ ॥ -----

दुनिया दरस दरसनिया, लोचन दरपन आहि । 
जहँ दर्से छबि बाहरी, अंतर दरसत नाहि ।१३६१। 
भावार्थ : -- यह लोचन दर्पण के सदृश्य है, जिसमें दुनिया अपनी छवि देखरही है ॥ यहाँ दुनिया का केवल बाहरी स्वरुप दिखाई देता है,अंतर दिखाई नहीं देता ॥ 

अर्थात : -- "दर्पण को केवल बाहरी स्वरुप दिखाई देता है अंतर दिखाई नहीं देता " 

मैं सुषि कंठ रसनाधर, तुम जल की कल बूँद । 
मैं तिलछ धरा की तृषा, तुम रस सार समूंद ।१३६२। 
भावार्थ : -- मैं शुष्क कंठ, शुष्क जिह्वा, शुष्क अधर हूँ । तुम जल की मीठी बूँद हो ।  मैं व्याकुल धरा की प्यास हूँ तुम सागर का सार रस हो ॥ 

साँच सौच दय दान सह,अहिंसा धर्म जासु । 
सोइ अजात सत्रु सरूप, मित्रा भगत सब तासु ।१३६३। 
भावार्थ : -- सत्य, शौच दया एवं दान के सह अहिंसा जिसका धर्म है । वह अजातशत्रु है, प्रत्येक व्यक्ति उसका मित्र है प्रतीक व्यक्ति उसका भक्त हैं ॥ 

टिप्पणी : -- यदि भगवान शिव व युधिष्ठिर अजातशत्रु हैं, तो कामदेव एवं दुर्योधन कौन है ? 

सुवारथ हिन् सुभ सह हो, साँच संग संबंध । 
जथारथ छबि दर्पण कृत कारे कथा प्रबंध ।१३६४। 
भावाथ : -- निस्वार्थता कल्याण कारी उद्देश्य के सह यदि सत्य संयुक्त हो जाए तो प्रबंध कथा का दर्पण दृष्टा की यथार्थ छवि प्रदर्शित करने में समर्थ होता है । कारण कि यह मुखरित होता है ॥ 

स्वतंत्रता चिंघाडी, जगि द्रोह की ज्वाल । 
चमक उठी फिर अँधियारि, जले चिता में लाल ।१३६५-क। 

स्वत्व यहाँ मेरा कह मुखर हुवा जब मौन । 
सत्ता गर्जि क्या कहा,  बता कि है तू कौन ।१३६५-ख। 

फिर तमक कर बोली सब  यहाँ मेरे नियंत । 
रह भारत मेरा दास तू जीवन पर्यन्त ।१३६५-ग । 

जल जल भस्मी भूत हुए, कितने ही कर्पूर । 
बुझि कितनी दीप शिखाएँ, बुझा न मेरा सूर ।१३६५ -घ । 

रक्त के रज रंजन से, उतरी एक एक बिंदु । 
डूबा रक्तिम सूर उस, लवन बिंदु के सिंधु ।१३६५-ङ। 

मंत्रपटु शव साधन किए, मारे ऐसा मंत्र । 
कसी रही पग बेड़ियाँ, मिला नहीं स्वातंत्र ।१३६५-च। 

हे जन हे जगद्जीवन तू सिंहासन योग । 
व्यवस्था कब तक सहे, आह !तेरा वियोग ।१३६५-छ। 

रक्त-रज = सिंदूर 
रक्त-रंजन = मेहँदी 
रक्तिम = रक्तमय 
लवन बूंद = अश्रु 
मंत्रपटु = तंत्र-मंत्र जानने वाले, तांत्रिक, सेवड़े  
शव-साधन = श्मशान में पर शव पर बाथ कर मंत्र जगां की तंत्र शास्त्रोक्त क्रिया 
जगद्जीवन = जगत-जीवन रूप ईश्वर 

कतरन कतर ब्यूँत के, सूट सुई दे दान । 
गोले गोली देइ फिर कहत पंच परधान ।१३६६। 
भावार्थ : -- कैंची से काँट -छांट कर  फिर सुई धागे का दान किया फिर उसमें गोले गोली दिये  पता नहीं ये क्या कहलाया न्यायाधीश कि प्रधानमन्त्री, कपडे कि रोग्गी ॥ 

बैठ पथबारि पथिक कहे, छाया जग अँधियार । 
जग अँधियारा कठिन नहि, कठिनइ दीप जुगार ।१३६७-क। 

दीप धर कर पथिक कहे, छाया  जग अँधियार । 
दीप जुगाउन कठिन नहि, कठिन जुगाउन सार ।१३६७-ख। 

सार जुगार पथिक कहे, छाया जग अँधियार । 
सार जगाऊँ कठिन नहि, कठिन बरतिका घार ।१३६७-ग । 

बरति घारे पथिक कहे, छाया जग अँधियार । 
सब घारन तो घार दिए, अब अगनी दे बार ।१३६७-ङ । 

बारे दीप पथिक कहे, छाया जग उजियार । 
वो सम्मुख लख बीथि अब, अपने चरन पसार ।१३६७-च । 

टिप्पणी : -- दीपक बोले तो कम्प्लीट दीपक माने की जोग बाला जुगाड़ बाला नहीं , जुगाड़ से पड़ाव मिलिंग (लक्ष्य नहीं )  ,शिक्षा मिलिंग ( ज्ञान नहीं ) सत्ता मिलिंग (स्वतंत्रता नहीं ) 

प्रनयन रोख छनिक रहे, प्रनय रहे चिर थाइ । 
प्रनइन मन सुमिरन रहे, रोख देइ बिसराइ ।१३६८। 
भावार्थ : -- सदनुरागी, सदमित्र, सद्प्रार्थी, का क्रोध क्षणिक होता अहै उसका प्रेम उसका विश्वास  चिर-स्थायी होता है  । अत: मन में ऐसे सदअनुरागी, सदमित्र, सद्पार्थि के प्रेम कि स्मृति बनी रहे एवं उसका क्रोध विस्मृत रहे ॥ 

दान बिधान ए हेतु किए, हो जग जन कल्यान । 
तिन बिपरीत हेतु लहे, सो तो नाही दान ।१३६९। 
भावार्थ : -- दाताओं -ग्रहिताओं ने दान का विधान इस उद्देश्य से किया था कि जगत का, जीवन का, जीवन धन का कल्याण हो । यदि किसी दान का उद्देश्य इसके विपरीत है तो वह दान नहीं है वह लेन-देन है ॥

बैपार किए सो बानिए, बिप्र सो जो लए दान । 
छत्रिय जो देस रक्षा किए, सेवक छुद्रा समान ।१३७०। 
भावार्थ : -- जन्म से कोई वर्ण, वरण  नहीं करता कर्म से करता है । जिसने जीवन-रक्षण हेतु व्यापार किया वह वैश्य हैं बैश्य है कि भैस है, जो जगत के कल्याण हेतु दान लिया वह पंडित है कितना खंडित है । जो देश की सुरक्षा कर रहे हैं वे क्षत्रिय हैं वे ही सबसे अधिक भयभीत हैं,,जो देश की सेवा कर रहे हैं वे क्षुद्र हैं, पहले ही छुद्र हैं अधिक करोगे तो जल में तीर जाएंगे बाकी डूब जाएंगे ॥  







अबीरों-अबलक लाल गुलाल रंग रँगे तो होली है.., 
गुल पोशो-दामाँ अबके साल संग रँगे तो होली है.....

शहाबी शिंगरफ के पोशो रंग,   
जब हो बेपरदा रूखो-जमाल खुशरंग रँगे तो होली है .
शीशो-बाशा गुलगुले गाल खुदरंग रँगे तो होली है 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...