सोमवार, 17 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३५ ॥ -----

जाके बढे महत लिजो, ऐसे झगड़े मोल ।
बिजई पावन मैं जोइ, हो तिल्ली के तोल ।१३५१। 
 ----- ॥ जोनाथन कोजोल ॥ -----
भावार्थ : -- "ऐसे झगड़े मोल लेने चाहिए जो महत्व में बहुंत बड़े हों, किन्तु जितने में बहुंत छोटे हों"

मूर्खा सों सुधि दरसन, जोइ करत अभिलाखि । 
सुधि बुद्धि मंत के सों, सोइ मूरखा लाखि ।१३५२। 
----- ।। क्विंटिलियन ॥ -----
भावार्थ : -- "जो व्यक्ति मूर्खों के  सामने विद्वान लगने की कामना करते हैं, वे विद्वान के सामने मूर्ख लगते है॥"

ब्याहि जिउन को चाहिए, बाँधे जोग जुगाए । 
एक जब गान सुनाए तो, दुज कर ताल बजाए ।१३५३। 
              ----- ॥ जोमर्रे ॥ ----- 
भावार्थ : -- वैवाहिक जीवन में युगलबंदी होनी चाहिए जब एक गाना गाए तो दुसरा ताली बजाए ॥"


धन सोंह सौ ग्रन्थ मिले,  मिले नहीं पर ज्ञान । 
वा सोंह आभरन मिले, मिले न रूप निधान ।१३५४।  

----- ॥ अज्ञात ॥ ----- 
भावार्थ : -- धन से सौ सौ ग्रन्थ प्राप्त हो सकते हैं किन्तु ज्ञान नहीं । उससे आभरण तो प्राप्त हो सकते हैं किन्तु रुप का खजाना नहीं ॥ 

दीर्घ सूत्री अल्प मति, चाटुक आतुर चारि । 
बर राऊ तिनके सोंह, गुपुत मंत्र ना कारि ।१३५५। 
 ----- ॥ वेदव्यास ॥ -----
भावार्थ : -- एक श्रेष्ठ राजा को अल्प बुद्धि वाले, दीर्घसूत्री, शीघ्रता करने वाले, और चाटुकारों से गुप्त मंत्रणा नहीं करनी चाहिए ॥   

टीका : -- "प्रश्न यह है कि यहां राजा कौन है "

रतन पारखी परिखअहिं, सोन कसे जब सान । 
धैर धरम मित आरू नारि, समउ बिपरीत आन ।१३५६। 
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : -- गोस्वामी तुलसी दास कहते हैं : -- रत्न की परीक्षा पारखी  करता है स्वरण कि परिक्षा कसौटी पर कस कर की जाती है । धैर्य, धर्म, मित्र और नारी कि परिक्षा विपरीत समय में ही होतीं है ॥

अगनी हुँते बाताली, तस प्रेम हुँत बियोग ।
घटियन को दिए बुझा किए बढ़िया को बल सील ।१३५७ ।
                 ----- ॥ बूसे ॥ -----
भावार्थ : -- जैसे अग्नी हेतु आंधी है, वैसे ही प्रेम के लिए विरह है । जो तुच्छ को बुझा देती है, और उत्कृष्ट को भड़का देती है ॥

अपनी प्रभूत भूति पर, प्रभुता करत बिहाए ।
दुजन अभाव पूरन हुँत, दिए सो दान कहाए ।१३५८।
----- ॥ दान की महिमा नामक पुस्तक से साभार ॥ -----
भावार्थ : -- दान का परिभाषा : -- अपने अधिकृत पदार्थ पर से अपना स्वत्त्व समाप्त कर, किसी अन्य के अभावॉं की पुर्ति हेतु दिया गया देय, दान कहलाता है.….

टीका : -- मत देते हुवे पैसठ वर्ष से अधिक हो गए अभावों की पूर्ति हुई ? भाषा सिख लेने से पेट नहीं भरता, घर नहीं बनते, इन दल पतियों को अँगरेजी सिखाने और  इन्हेँ अँगरेज़ बनाने के लिए भारत की आधी से अधिक धरती खुद गई, नदीयाँ आधी सोख ली गई, पर्वतों के शिखर मुंड दिए गए.…. फिर भी इन्हें अंग्रेजी नहीं आई, न ये अंग्रेज बने.….

करमन कारी करत जब, देस माहि अपकार । 
तेहि भारी पातक के सासक लागनहार ।१३५९। 
 ----- ॥ महर्षि वेदव्यास ॥ -----
भावार्थ : --  राष्ट्र में यदि प्रशासन अन्यायपूर्ण व्यवहार करता हो, तब उस गम्भीर दोष का आरोपी शासन ही होता है ॥ 

नेम अभाव अंतरतम , चित  मैं जब गहनाए । 
नेम भाव तब  बाहरी, हम नहि राखन पाए ।१३६० । 
 ----- ॥ विलियम शेख ॥ -----
भावार्थ : --  "जब अंतरतम  में गहरी अव्यवस्था होती है, तब हम बहिर्-जगत व्यवस्थित नहीं रख  पाते ॥"


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