धर्म धानी पथ नीति नय, राज राज ररियाए ।
सेवा भाउ सुसुप्त कर , सत्ता भाव जगाए ।१३३१ ।
भावार्थ : -- राज-धर्म, राज-धानी, राज-पथ, राजनीति, राजनयिक आदि शब्दों द्वारा राज-राज रटन सेवा भाव को सुसुप्त कर सत्ता भाव (अर्थात अपना शासन चलाना, अपने ही नियम मनवाने, उपभोग करना आदि ) को जागृत कर देती है ॥ यदि राज की रटन हो तो वह राम जैसे राज्य में हो ॥
प्रेमी बिकता हाट में, ले लो प्रेम के मोल ।
जुग बँधन मुखसन बोले, मीठे मीठे बोल ।१३३२।
भावार्थ : -- प्रेमी हाट में बिक रहा है , प्रेम के मोल ले लो । यदि गाँठ से बाँध दो तो यह मीठे मीठे बोल बोलेगा ॥
बरन बचन बानी बँधे, बानी मुख के नाद ।
अनुसासन के निबंधन, जीवन की मर्याद ।१३३३।
भावार्थ : -- शब्द- वक्तव्य वाणी से बंधे हैं, वाणी मुख की ध्वनि से बंधी है । जीवन की सारी मर्यादाएं सारी सीमाएं अनुशासन से बंधी रहती है रेखाओं से नहीं ॥
छन छन में बाद्य बसे, कन कन में संगीत ।
साँस साँस में सुर बसे, प्रान प्रान में गीत ।१३३४।
भावार्थ : -- सृष्टि के रचयिता ने क्षण क्षण में वाद्य यंत्रों को एवं कण कण में संगीत को बसाया । सांस साँस में स्वर एवं प्राणि-प्राणि में गीत का अधिवास किया, मनुष्य ने उसका निरूपण किया आविष्कार नहीं ॥
मैं बिय मैं बिय कहत कर, चाहे केत प्रचार ।
मूठी आबध अंकुरे, करत खेत प्रस्तार ।१३३५।
भावार्थ : -- मैं बीज हूँ मैं बीज हूँ कह कह कर बीज अपना कितना ही प्रचार करे, जब तक वह मुठियों में बंद होकर खेत में प्रस्तारित नहीं होगा और मिटटी में विलीन नहीं होगा तब तक उसका अंकुरन नहीं होगा ॥
अर्थात : -- "सेवा प्रस्तारित करने से फल दायी होती है, प्रचारित करने से नहीं"
जोइ सर कलहंस तरे, सोइ मानसर मान ।
सोइ सर कलहंस तरे, जोइ मान सर मान ।१३३६।
भावार्थ : -- जिस सरोवर में राजहंस विचरण करते हों वह सरोवर मान सरोवर समान है । हंस उसी सरोवर में विचरण करते हैं जो मान सरोवर के समान है ॥
मानसरोवर = हिमालय में स्थित एक पवित्र झील
जोइ भूमि श्री हरि बसे, सोइ तीर्थ स्थान ।
सोइ भूमि श्रीहरि बसे, जोइ तीर्थ स्थान ।१३३७ ।
भावार्थ : -- वह भूमि तीर्थ स्थान होते हुवे पुण्यस्थली है जहां ईश्वर का निवास हो । ईश्वर वहीँ निवास करते हैं जो तीर्थ स्थली होते हुवे पुण्यस्थली है ॥
जिन घर दान देन किये, तहाँ लेन ना जाएँ ।
लेन देन के भाउ मह, देन धरम बिस्माए ।१३३८।
भावार्थ : -- जिस घर /स्थान /देस में दान दिया हो, वहाँ कुछ लेने नहीं जाना चाहिए । कारण कि लेन-देन के भाव में दान का पुण्य धूमिल हो जाता है ॥
जग मैं तेरो गुरु कौन, जो देवे सद्ज्ञान ।
जाके संग लगन बँधे, भर्ग भवानी मान ।१३३९।
भावार्थ : -- संसार में तुम्हारे गुरु कौन है ? जिसने तुम्हे सद्ज्ञान दिया हो । यदि उसके साथ लगन बंधे हो तो ? फिर वो भवानी-शंकर के समान हैं ॥
पाप पुन सन कन कन हो, धरा सूप पछिनाए ।
गरुबर देह धरी रही, हरुबर फूँक उराए।१३४०।
भावार्थ : -- अपने पाप एवं पुण्य कर्मों के साथ जब कण कण हुवे तब धरा के सूप में पछने गए । जिसकी देह भरी थी वह यही रहे, जिसकी देह हलकी थी वही उड़े ॥
सेवा भाउ सुसुप्त कर , सत्ता भाव जगाए ।१३३१ ।
भावार्थ : -- राज-धर्म, राज-धानी, राज-पथ, राजनीति, राजनयिक आदि शब्दों द्वारा राज-राज रटन सेवा भाव को सुसुप्त कर सत्ता भाव (अर्थात अपना शासन चलाना, अपने ही नियम मनवाने, उपभोग करना आदि ) को जागृत कर देती है ॥ यदि राज की रटन हो तो वह राम जैसे राज्य में हो ॥
प्रेमी बिकता हाट में, ले लो प्रेम के मोल ।
जुग बँधन मुखसन बोले, मीठे मीठे बोल ।१३३२।
भावार्थ : -- प्रेमी हाट में बिक रहा है , प्रेम के मोल ले लो । यदि गाँठ से बाँध दो तो यह मीठे मीठे बोल बोलेगा ॥
बरन बचन बानी बँधे, बानी मुख के नाद ।
अनुसासन के निबंधन, जीवन की मर्याद ।१३३३।
भावार्थ : -- शब्द- वक्तव्य वाणी से बंधे हैं, वाणी मुख की ध्वनि से बंधी है । जीवन की सारी मर्यादाएं सारी सीमाएं अनुशासन से बंधी रहती है रेखाओं से नहीं ॥
छन छन में बाद्य बसे, कन कन में संगीत ।
साँस साँस में सुर बसे, प्रान प्रान में गीत ।१३३४।
भावार्थ : -- सृष्टि के रचयिता ने क्षण क्षण में वाद्य यंत्रों को एवं कण कण में संगीत को बसाया । सांस साँस में स्वर एवं प्राणि-प्राणि में गीत का अधिवास किया, मनुष्य ने उसका निरूपण किया आविष्कार नहीं ॥
मैं बिय मैं बिय कहत कर, चाहे केत प्रचार ।
मूठी आबध अंकुरे, करत खेत प्रस्तार ।१३३५।
भावार्थ : -- मैं बीज हूँ मैं बीज हूँ कह कह कर बीज अपना कितना ही प्रचार करे, जब तक वह मुठियों में बंद होकर खेत में प्रस्तारित नहीं होगा और मिटटी में विलीन नहीं होगा तब तक उसका अंकुरन नहीं होगा ॥
अर्थात : -- "सेवा प्रस्तारित करने से फल दायी होती है, प्रचारित करने से नहीं"
जोइ सर कलहंस तरे, सोइ मानसर मान ।
सोइ सर कलहंस तरे, जोइ मान सर मान ।१३३६।
भावार्थ : -- जिस सरोवर में राजहंस विचरण करते हों वह सरोवर मान सरोवर समान है । हंस उसी सरोवर में विचरण करते हैं जो मान सरोवर के समान है ॥
मानसरोवर = हिमालय में स्थित एक पवित्र झील
जोइ भूमि श्री हरि बसे, सोइ तीर्थ स्थान ।
सोइ भूमि श्रीहरि बसे, जोइ तीर्थ स्थान ।१३३७ ।
भावार्थ : -- वह भूमि तीर्थ स्थान होते हुवे पुण्यस्थली है जहां ईश्वर का निवास हो । ईश्वर वहीँ निवास करते हैं जो तीर्थ स्थली होते हुवे पुण्यस्थली है ॥
जिन घर दान देन किये, तहाँ लेन ना जाएँ ।
लेन देन के भाउ मह, देन धरम बिस्माए ।१३३८।
भावार्थ : -- जिस घर /स्थान /देस में दान दिया हो, वहाँ कुछ लेने नहीं जाना चाहिए । कारण कि लेन-देन के भाव में दान का पुण्य धूमिल हो जाता है ॥
जग मैं तेरो गुरु कौन, जो देवे सद्ज्ञान ।
जाके संग लगन बँधे, भर्ग भवानी मान ।१३३९।
भावार्थ : -- संसार में तुम्हारे गुरु कौन है ? जिसने तुम्हे सद्ज्ञान दिया हो । यदि उसके साथ लगन बंधे हो तो ? फिर वो भवानी-शंकर के समान हैं ॥
पाप पुन सन कन कन हो, धरा सूप पछिनाए ।
गरुबर देह धरी रही, हरुबर फूँक उराए।१३४०।
भावार्थ : -- अपने पाप एवं पुण्य कर्मों के साथ जब कण कण हुवे तब धरा के सूप में पछने गए । जिसकी देह भरी थी वह यही रहे, जिसकी देह हलकी थी वही उड़े ॥
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