शनिवार, 1 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३०॥ -----

तज तप अहहिं परहित हुँत, दान अबर कल्यान । 
सत पात परिष्कृति हुँत, दया हहि जिउन दान ।१३०१।  
भावार्थ : -- त्याग एवं तप पर हित के लिए है, दान दूजे का कल्याण के लिए है । सत्य भूल दोष  को शोधन के लिए है और दया जीवन दान करने के लिए है ॥ 

कलुखित करमनु छाँड़ के, करौ करम उजराए । 
काइ एक दीपक न जान, कब ठंडी हो जाए ।१३०२। 
भावार्थ : -- दोषपूर्ण कर्मों का त्याग कर हमें ऐसे सत्कृत ही करने चाहिए क्योंक मरणोपरांत यह ही साथ जाते हैं । यह काया,  दीपक के समान है और दीपक का कोई भरोसा है एक फूँक मारी और ठंडा हुवा ॥ 

सोई ससि सूर समान जोई  जग उजराए  । 
घरहु न उजराई सके, बुझा दीप कहलाए ।१३०३ । 
भावार्थ : -- शशि एवं सूर्य के सदृश्य वही है जो समस्त संसार को उज्जवल कर दे । जो घर को ही उज्जवल न कर सके वह तो बुझा हुवा दीया है ॥ 

मरे हुए की मरनी का, मरे बैठ का रोए । 
पहिलेहि मृतक देख के, रो रो नैन सुखोए ।१३०४। 
भावार्थ : -- जो मर चुका है उसकी मृत्यु कैसी । ऐसी मरनी पर बैठ कर रोना कैसा ॥ इस मृतक को देख पहले ही रो रो के नैन सुख गए हैं ॥ 


अर्थात : - 'मूर्खों को समझाना मरे का रोना ही है' 

दावानल चिंगारी सम, क्रोध कोप चिंगार । 
यह मुख मोरी सरिस जब, निकास तँह सन गार ।१३०५। 

भावार्थ : -- मुख का क्रोध कपो व छनिहाड़ दावानल की चिंगारी क सदृश्य होती है । यह मुख तब नाले के सरिस हो जाता है जब इसमं से गारे के समान गालियां निकलती हैं ॥ 

जँह ऊपर निरमल नीर तँह नीचै अहि बहु कीच । 
जिन भू ऊपर कीच है, निरमल जल तँह नीच ।१३०६। 
भावार्थ : -- जो जल ऊपर से स्वच्छ एवं निर्मल दिखाई देता है उसके नीचे अत्यधिक कीचड़ भरा होता है ॥ जिस भूमि के ऊपर कीचड़ दिखाई देता है उसकी तह में  निर्मल जल का सोता मिलता है ॥ 

दान दरसे न दीन धनि, जनम न धर्म न जात ।  
यह दरस केवल करम, कहुँ जग साँची बात ।१३०७। 
भावार्थ : -- दानशीलता धनी -निर्धन जन्म( जन्म स्थान, विधान,आधान ) जाति-धर्म नहीं देखती  । यह केवल कर्म को देखती है और यह संसार का यथार्थ वचन है ॥ 

दृष्टांत  : -- कसाई लोग दान की महिमा को नहीं जानते, दान के धन्धे को भी नहीं जानते ॥ यदि वह अपनी वधशाला के स्थान पर गौशाला खोल दें तो जितना वे मांस विक्रय में कमाते हैं उससे अधिक तो केवल दान में कमा लेंगे,  दान ही किसी को प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति बनाता है, ॥ 

टीका : -- जब दान जाति-धर्म को नहीं देखता तो 'मतदान' काहे देखता है"

चारि जिउ के हत कारत,  धन सम्पद तौ जोइ । 
एक जिवान देई दान, सो कल्यान न होइ ।१३०८। 
भावार्थ : -- चार जीवों ह्त्या कर धन सम्पदा तो जोड़ ली  । फिर उसी सम्पदा से एक जीवन की रक्षा हेतु दान देने चले, ऐसा दान कल्याणकारी नहीं होगा ॥ ऐसा दान अति कल्याणकर है जिसकी विषय-वस्तु चार जीवों को वरदान देकर अर्जित की गई हो ॥ 

दृष्टांत : -- कृषि उद्योग 

धरनि ऐसी चरखी जो , भँवर रहे दिनु रैन । 
जे पल बिपल घरी पहर, सबही वाकी दैन ।१३०९। 
भावार्थ : -- धरती  एक ऐसी चरखी है । जो दिनरात भ्रमर रही है ॥ यह पल-विपल घड़ी पहर सब उसी भ्रमण की ही दें हैं, क्या समय भी उसी की देन है ? यदि हम ग्रह मंडल की परिधि से बहिर्गमन करेते हैं  तो क्या समय से परे हो जाएंगे ? नहीं । क्यों ? क्योंकि विश्व का मानक समय अधूरा है यह केवल पृथ्वी की ही घूर्णन गति पर आधारित है, भारतीय शास्त्र इससे कहीं आगे हैं ॥ 

लिखे लेख इतिहास नै, देस काल बै कूल । 
कोउ बचन अनुकूल है, कोउ बचन प्रतिकूल ।१३१०। 
भावार्थ : -- इतिहास ने जितने लेख लिखे  देश, काल एवं परिस्थितियों के तट पर लिख । अत:विदयमान का दश काल एवं परिस्थितियों के लिए कोई कथन अनुकूल है अर्थात सह,काल एवं परिस्थितयां वही हैं  किन्तु कुछ बातों के लिए यह परिवर्तित हो चुकी हैं, अत:वे बातें प्रतिकूल हैं ॥  




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...