सोमवार, 31 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३ ८ ॥ -----

तमोगुनिन के तमोभिद जिनके मन कू भाएँ । 
सघन तम ब्यापत रहे, तहाँ हन पैठ न पाए ।१३८१। 
भावार्थ : -- जिस ह्रदय को तमो-गुण ( आलस्य,अज्ञान, क्रोध) के जुगनू प्रिय लगते हैं, वहाँ गहन तमस छाया रहता है वहाँ तमोहर पहुँच नहीं पाते ॥  

कली तब लग कली रहे, जब लग पालउ बंध । 
पुहुप तबलग पुहुप रहे, जब लग रहे सुगंध ।१३८२। 
भावार्थ : -- कोई काली अथवा कन्या तब तक कली अथवा कन्या रहती है जबतक उसका पल्लव बंधा होता है। पुष्प तब तक पुष्प रहता है जबतक उसमं सुगंध रहती है ॥ 


मूर्खा भया मतिबन्त कारे ज्ञान प्रसार । 
मतिबन्त भया मूरखा, कारे आप प्रचार ।१३८३। 
भावार्थ : -- यदि मूर्ख बुद्धिमान हो जाए तो वह ज्ञान का ही प्रसार करेगा । और यदि बुद्धिमान मूर्ख हो जाए तो वह कुछ भी पडेगा लिखेगा नहीं, मूर्खता के साथ वह केवल अपना ही प्रचार करेगा ॥ 

सिँहासन के जोग धरन, करे राम के जाप । 
जोग पहे सब परिहाए, बिथुरावन जग पाप ।१३८४। 
भावार्थ : -- सिंहासन प्राप्त करने की योगयता धारण करनी थी तो सबने राम के नाम का जाप किया राम !! हे राम !! कर करके ॥ योग्यता प्राप्त होते ही सब त्याग दिया क्यों ?क्योंकि संसार में अपने पापों का प्रसार कर सकें ॥ 

बैठे जोइ बिटप उपर , काटे तहँ की मूरि । 
मुख अहिंसा जाप करे, कर धर लमनी छूरि।१३८५। 
भावार्थ : -- जिस वृक्षके ऊपर बैठे हो, उसी की जड़ें काट रहे हैं ॥ मुख में तो अहिंसा की जाप है हाथ में ये लम्बी छूरी है, यही है अहिंसा ?

बानी बायु एकै धरम , जो कहुँ लाग धराए । 
चाहे तो बिस्तार दे, चाहे देइ बुझाए ।१३८६। 
भावार्थ : -- वाणी और वायु का स्वभाव एक जैसा है ।  कहीं आग लगी हो कहीं झगड़ा हो रहा हो । ये चाहे तो उसे विस्तारित कर सकते हैं, चाहे तो शांत कर सकते हैं ॥

एक कहाउत कही गई,धुनी धरे बहु थोड़ । 
चाहे केतक पीट लौ, गदहा बने न घोड़ ।१३८७। 
भावार्थ : -- अल्पतम शब्दों के साथ एक कहावत कही गई है । " चाहे कितना ही पीट लो गधा घोड़ा नहीं बन सकता ॥ "

सकल भोग हमरेहि हुँत, जो कहि बनत प्रधान । 
सोइ  दुआरि भिखारि बन, मँग रहे क्यूँ दान । १३८७ । 
भावार्थ : -- भई प्रधान मंत्री हैं, भोज आयोजित करेंगे सारे भोग इन्ही के लिए ही तो हैं जो प्रधान मंत्री बनते ही ऐसा कह रहे थे । अब वह कहाँ हैं, प्रधान मंत्री हैं तो भिखारी बन के द्वार पर क्यों खड़े हैं ?, दान क्यों मांग रहे हैं , मांग के भोगते हैं क्या ? 

"दान कल्याण हेतु होता है किसी के भोग विषयों की व्यवस्था हेतु नहीं"

गूँगे राग सुना रहे,बहिरे देवें कान । 
बिषयों के भोगी देखु, दाए दान के ज्ञान ।१३८८। 
भावार्थ : -- गूंगे बकता बने राग सुना रहे हैं बहरे श्रोता बन के सुन रहे हैं । उधर देखो विषयों के भोगी हैं भोग विलास में आकंठ डूबे हुवे हैं और दान का ज्ञान दे रहे हैं 

सत्य ऐसोई पवित हो, जस सुरसरि का नीर । 
ऐसा जीवन चरित्र हो, जैसिहु वाका तीर ।१३८९। 
भावार्थ : -- सत्य ऐसा पावन हो जैसा की गंगा का जल होता है उसमें कोई छल कपट न हो कोई स्वार्थ निहित न हो । और जीवन में चैत्र ऐसा हो जैसा उसका तट है जो स्वर्ग के सोपान पथ को वां किये हुवे मोक्ष-द्वार है ।।  

सत्य सब्द छाँड़ि कै जब, चारन करे निबास । 

पनज जल सों प्रकट रूप , देई निर्मल भास ।१३९०।  
भावार्थ : -- सत्य रूपी ईश्वर जब शब्दों को छोड़ कर आचरण में निवास करने लगता है । तब वह गंगा-जल के सदृश्य, प्रकट स्वरुप में अपनी पवित्रता का आभास देता है ॥ 


रविवार, 30 मार्च 2014

----- मिनिस्टर राजू १२६ -----

" राजू ! मैं अपने घर में इतना छोटा था कि मेरे  हिस्से में माँ आ गई"

राजू : -- मास्टर जी ! मन अपने घर मन इतना छोटा हूँ इतना छोटा हूँ कि मैं माँ के हिस्से में आ गया.….पिता जी ! दादी के हिस्से में आ गए ना इसी लिए : ( 

मंगलवार, 25 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३ ७ ॥ -----

भलाई दुबराई के, करत बुराई पोठ । 
मत धन ग्यान दान दिए, बारू ऐसोइ कोठ।१३७१। 
भावार्थ : -- जो भलाई को कृश करता हो बुराई को पुष्ट करता हो ॥  ऐसे मत के ऐसे धन के ऐसे ज्ञान के दान-कोष्ठ में आग लगा देनी चाहिए॥

दान धर्म बिनु अर्थ गृह, गाहत दोष बिकार । 
न्यायोचित सदारजन, करत जगत उद्धार ।१३७२। 
भावार्थ : - दान कर्म धर्मार्थ रहित अर्थ-युक्त घर मन दोषों एवं विकारों को ग्रहण कर लेता है ॥ न्याय सन्गत सदर्जन का दान-धर्म ही जगत का कल्याण करता है ॥ ऐसा अर्जन कदापि नहीं करना चाहिए जो प्राणी-जगत हतु कष्टमयी होकर आपदाओं का कारण बने ॥

जनता गहरी नीँद में, खर खर नाक बजाए । 
कोइ लगे जगावन में, कोइ सपन दरसाए ।१३७३। 
भावार्थ : -- जनता गहरी नींद में है खर खर नाक बज रही है । कोई उसे जगाने में लगा है कुम्भकरन हे काए,इ पांच बछर मा उठथे तहां फेन उँह..... कोई सपने दिखा रहा है ॥

बिरंचि धूर्त जंतु कू, ए हुँत देइ सब आँख । 
जीउ लोक के जोख कर, राखे जग की राख ।१३७४। 
भावार्थ : -- विधाता ने मनुष्य को सर्वेन्द्रियपति स्वरुप में इस हेतु रचा है कि वह प्राणि-जगत की रक्षा करते हुवे, समस्त संसार की सुरक्षा करे,  इसलिए नहीं की वह भोग विलास में डूबा रहे ॥

अंस जनेऊ चिन्ह किए, धारे सिखंड सीस । 
बिरहमन भूति छाँड़ भए बनिये पीठाधीस ।१३७५।
भावार्थ : -- कंधे पर जनेऊ लटका लिया, सिर पर तिलंगी सजा ली ।  वाणिज्यक वृत्ति अपनाकर पीठाधीश बने बैठे ब्राह्मणों ने अपनी वृत्ति त्याग दी है ॥

अर्थात : -- "चिन्हों से कोई ब्राह्मण नहीं होता, वृत्ति एवं आचरण वरण करने से होता है"

साँच जुराउन जोग के, प्रहसन जोरन देइ । 
बिनोद के मट्ठा मिले, साँच सनेहन लेइ ।१३७६। 
भावार्थ : -- सांच का जोड़ावन एकत्र कर उसे प्रहसन के जोरन से जोड़ दें । उसमें फिर हास-परिहास के छाछ के साथ सत्य के सार प्राप्त करें ॥ 

रहि मोरी भुइँ भूरिदा, सुबरन कन संदोहि । 
परसे ऐसो कुपारस, कारे सुबरन लोहि ।१२७७। 
भावार्थ : -- मेरी भूमि बहुंत दानी थी, वह सोने के कण देने वाली गौ थी । उसे ऐसे कुपारसी ने स्पर्श किया कि सारे सोने के कण लोहा हो गए ॥ 

साँच असाँच फेर फिरे, काहे भया अधीर । 
साँच गहि सो छीर है, असाँच है सो नीर ।१२७८। 
भावार्थ : - सत्य-असत्य के फेर में पड़ कर अधीर क्यों हो रहे हो । जो सत्य है वह क्षीर है जो असत्य है वह नीर है ॥ 

प्रियजन सोंह बिगार के, कछुहु नहीं लहनाए । 
जस बिगराई दूध में, सार नहीं गहियाए ।१२७९ । 
भावार्थ : -- प्रियजनों से बिगाड़ कर कुछ प्राप्त लाभ नहीं है । जैसे दूध को बिगाड़ने से उसमें फिर सार प्राप्त नहीं होता ।। 

मुख में राम नाम रखे, खल जन सत्ता पाए । 
नग नद बन सब खेत खन, हिंसा अगन जराए ।१२८०। 
भावार्थ : -- दुष्टों ने मुख में राम का नाम धारण किये सत्ता  को ऐसे हड़पा कि हिंसा का आचरण करते सब कुछ भस्म कर दिया । अब न कहीं पर्वत ही दिखते हैं न ही नदी दिखती है , न कहीं वैन दिखाते है, न वन गोचर दिखते हैं , न कहीं खेत खंड ही दिखते हैं.....दिखते हैं तो बस इन्हें नोचते-खसोटते उद्योगपति ॥ 






                

शनिवार, 22 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३६ ॥ -----

दुनिया दरस दरसनिया, लोचन दरपन आहि । 
जहँ दर्से छबि बाहरी, अंतर दरसत नाहि ।१३६१। 
भावार्थ : -- यह लोचन दर्पण के सदृश्य है, जिसमें दुनिया अपनी छवि देखरही है ॥ यहाँ दुनिया का केवल बाहरी स्वरुप दिखाई देता है,अंतर दिखाई नहीं देता ॥ 

अर्थात : -- "दर्पण को केवल बाहरी स्वरुप दिखाई देता है अंतर दिखाई नहीं देता " 

मैं सुषि कंठ रसनाधर, तुम जल की कल बूँद । 
मैं तिलछ धरा की तृषा, तुम रस सार समूंद ।१३६२। 
भावार्थ : -- मैं शुष्क कंठ, शुष्क जिह्वा, शुष्क अधर हूँ । तुम जल की मीठी बूँद हो ।  मैं व्याकुल धरा की प्यास हूँ तुम सागर का सार रस हो ॥ 

साँच सौच दय दान सह,अहिंसा धर्म जासु । 
सोइ अजात सत्रु सरूप, मित्रा भगत सब तासु ।१३६३। 
भावार्थ : -- सत्य, शौच दया एवं दान के सह अहिंसा जिसका धर्म है । वह अजातशत्रु है, प्रत्येक व्यक्ति उसका मित्र है प्रतीक व्यक्ति उसका भक्त हैं ॥ 

टिप्पणी : -- यदि भगवान शिव व युधिष्ठिर अजातशत्रु हैं, तो कामदेव एवं दुर्योधन कौन है ? 

सुवारथ हिन् सुभ सह हो, साँच संग संबंध । 
जथारथ छबि दर्पण कृत कारे कथा प्रबंध ।१३६४। 
भावाथ : -- निस्वार्थता कल्याण कारी उद्देश्य के सह यदि सत्य संयुक्त हो जाए तो प्रबंध कथा का दर्पण दृष्टा की यथार्थ छवि प्रदर्शित करने में समर्थ होता है । कारण कि यह मुखरित होता है ॥ 

स्वतंत्रता चिंघाडी, जगि द्रोह की ज्वाल । 
चमक उठी फिर अँधियारि, जले चिता में लाल ।१३६५-क। 

स्वत्व यहाँ मेरा कह मुखर हुवा जब मौन । 
सत्ता गर्जि क्या कहा,  बता कि है तू कौन ।१३६५-ख। 

फिर तमक कर बोली सब  यहाँ मेरे नियंत । 
रह भारत मेरा दास तू जीवन पर्यन्त ।१३६५-ग । 

जल जल भस्मी भूत हुए, कितने ही कर्पूर । 
बुझि कितनी दीप शिखाएँ, बुझा न मेरा सूर ।१३६५ -घ । 

रक्त के रज रंजन से, उतरी एक एक बिंदु । 
डूबा रक्तिम सूर उस, लवन बिंदु के सिंधु ।१३६५-ङ। 

मंत्रपटु शव साधन किए, मारे ऐसा मंत्र । 
कसी रही पग बेड़ियाँ, मिला नहीं स्वातंत्र ।१३६५-च। 

हे जन हे जगद्जीवन तू सिंहासन योग । 
व्यवस्था कब तक सहे, आह !तेरा वियोग ।१३६५-छ। 

रक्त-रज = सिंदूर 
रक्त-रंजन = मेहँदी 
रक्तिम = रक्तमय 
लवन बूंद = अश्रु 
मंत्रपटु = तंत्र-मंत्र जानने वाले, तांत्रिक, सेवड़े  
शव-साधन = श्मशान में पर शव पर बाथ कर मंत्र जगां की तंत्र शास्त्रोक्त क्रिया 
जगद्जीवन = जगत-जीवन रूप ईश्वर 

कतरन कतर ब्यूँत के, सूट सुई दे दान । 
गोले गोली देइ फिर कहत पंच परधान ।१३६६। 
भावार्थ : -- कैंची से काँट -छांट कर  फिर सुई धागे का दान किया फिर उसमें गोले गोली दिये  पता नहीं ये क्या कहलाया न्यायाधीश कि प्रधानमन्त्री, कपडे कि रोग्गी ॥ 

बैठ पथबारि पथिक कहे, छाया जग अँधियार । 
जग अँधियारा कठिन नहि, कठिनइ दीप जुगार ।१३६७-क। 

दीप धर कर पथिक कहे, छाया  जग अँधियार । 
दीप जुगाउन कठिन नहि, कठिन जुगाउन सार ।१३६७-ख। 

सार जुगार पथिक कहे, छाया जग अँधियार । 
सार जगाऊँ कठिन नहि, कठिन बरतिका घार ।१३६७-ग । 

बरति घारे पथिक कहे, छाया जग अँधियार । 
सब घारन तो घार दिए, अब अगनी दे बार ।१३६७-ङ । 

बारे दीप पथिक कहे, छाया जग उजियार । 
वो सम्मुख लख बीथि अब, अपने चरन पसार ।१३६७-च । 

टिप्पणी : -- दीपक बोले तो कम्प्लीट दीपक माने की जोग बाला जुगाड़ बाला नहीं , जुगाड़ से पड़ाव मिलिंग (लक्ष्य नहीं )  ,शिक्षा मिलिंग ( ज्ञान नहीं ) सत्ता मिलिंग (स्वतंत्रता नहीं ) 

प्रनयन रोख छनिक रहे, प्रनय रहे चिर थाइ । 
प्रनइन मन सुमिरन रहे, रोख देइ बिसराइ ।१३६८। 
भावार्थ : -- सदनुरागी, सदमित्र, सद्प्रार्थी, का क्रोध क्षणिक होता अहै उसका प्रेम उसका विश्वास  चिर-स्थायी होता है  । अत: मन में ऐसे सदअनुरागी, सदमित्र, सद्पार्थि के प्रेम कि स्मृति बनी रहे एवं उसका क्रोध विस्मृत रहे ॥ 

दान बिधान ए हेतु किए, हो जग जन कल्यान । 
तिन बिपरीत हेतु लहे, सो तो नाही दान ।१३६९। 
भावार्थ : -- दाताओं -ग्रहिताओं ने दान का विधान इस उद्देश्य से किया था कि जगत का, जीवन का, जीवन धन का कल्याण हो । यदि किसी दान का उद्देश्य इसके विपरीत है तो वह दान नहीं है वह लेन-देन है ॥

बैपार किए सो बानिए, बिप्र सो जो लए दान । 
छत्रिय जो देस रक्षा किए, सेवक छुद्रा समान ।१३७०। 
भावार्थ : -- जन्म से कोई वर्ण, वरण  नहीं करता कर्म से करता है । जिसने जीवन-रक्षण हेतु व्यापार किया वह वैश्य हैं बैश्य है कि भैस है, जो जगत के कल्याण हेतु दान लिया वह पंडित है कितना खंडित है । जो देश की सुरक्षा कर रहे हैं वे क्षत्रिय हैं वे ही सबसे अधिक भयभीत हैं,,जो देश की सेवा कर रहे हैं वे क्षुद्र हैं, पहले ही छुद्र हैं अधिक करोगे तो जल में तीर जाएंगे बाकी डूब जाएंगे ॥  







अबीरों-अबलक लाल गुलाल रंग रँगे तो होली है.., 
गुल पोशो-दामाँ अबके साल संग रँगे तो होली है.....

शहाबी शिंगरफ के पोशो रंग,   
जब हो बेपरदा रूखो-जमाल खुशरंग रँगे तो होली है .
शीशो-बाशा गुलगुले गाल खुदरंग रँगे तो होली है 

सोमवार, 17 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३५ ॥ -----

जाके बढे महत लिजो, ऐसे झगड़े मोल ।
बिजई पावन मैं जोइ, हो तिल्ली के तोल ।१३५१। 
 ----- ॥ जोनाथन कोजोल ॥ -----
भावार्थ : -- "ऐसे झगड़े मोल लेने चाहिए जो महत्व में बहुंत बड़े हों, किन्तु जितने में बहुंत छोटे हों"

मूर्खा सों सुधि दरसन, जोइ करत अभिलाखि । 
सुधि बुद्धि मंत के सों, सोइ मूरखा लाखि ।१३५२। 
----- ।। क्विंटिलियन ॥ -----
भावार्थ : -- "जो व्यक्ति मूर्खों के  सामने विद्वान लगने की कामना करते हैं, वे विद्वान के सामने मूर्ख लगते है॥"

ब्याहि जिउन को चाहिए, बाँधे जोग जुगाए । 
एक जब गान सुनाए तो, दुज कर ताल बजाए ।१३५३। 
              ----- ॥ जोमर्रे ॥ ----- 
भावार्थ : -- वैवाहिक जीवन में युगलबंदी होनी चाहिए जब एक गाना गाए तो दुसरा ताली बजाए ॥"


धन सोंह सौ ग्रन्थ मिले,  मिले नहीं पर ज्ञान । 
वा सोंह आभरन मिले, मिले न रूप निधान ।१३५४।  

----- ॥ अज्ञात ॥ ----- 
भावार्थ : -- धन से सौ सौ ग्रन्थ प्राप्त हो सकते हैं किन्तु ज्ञान नहीं । उससे आभरण तो प्राप्त हो सकते हैं किन्तु रुप का खजाना नहीं ॥ 

दीर्घ सूत्री अल्प मति, चाटुक आतुर चारि । 
बर राऊ तिनके सोंह, गुपुत मंत्र ना कारि ।१३५५। 
 ----- ॥ वेदव्यास ॥ -----
भावार्थ : -- एक श्रेष्ठ राजा को अल्प बुद्धि वाले, दीर्घसूत्री, शीघ्रता करने वाले, और चाटुकारों से गुप्त मंत्रणा नहीं करनी चाहिए ॥   

टीका : -- "प्रश्न यह है कि यहां राजा कौन है "

रतन पारखी परिखअहिं, सोन कसे जब सान । 
धैर धरम मित आरू नारि, समउ बिपरीत आन ।१३५६। 
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : -- गोस्वामी तुलसी दास कहते हैं : -- रत्न की परीक्षा पारखी  करता है स्वरण कि परिक्षा कसौटी पर कस कर की जाती है । धैर्य, धर्म, मित्र और नारी कि परिक्षा विपरीत समय में ही होतीं है ॥

अगनी हुँते बाताली, तस प्रेम हुँत बियोग ।
घटियन को दिए बुझा किए बढ़िया को बल सील ।१३५७ ।
                 ----- ॥ बूसे ॥ -----
भावार्थ : -- जैसे अग्नी हेतु आंधी है, वैसे ही प्रेम के लिए विरह है । जो तुच्छ को बुझा देती है, और उत्कृष्ट को भड़का देती है ॥

अपनी प्रभूत भूति पर, प्रभुता करत बिहाए ।
दुजन अभाव पूरन हुँत, दिए सो दान कहाए ।१३५८।
----- ॥ दान की महिमा नामक पुस्तक से साभार ॥ -----
भावार्थ : -- दान का परिभाषा : -- अपने अधिकृत पदार्थ पर से अपना स्वत्त्व समाप्त कर, किसी अन्य के अभावॉं की पुर्ति हेतु दिया गया देय, दान कहलाता है.….

टीका : -- मत देते हुवे पैसठ वर्ष से अधिक हो गए अभावों की पूर्ति हुई ? भाषा सिख लेने से पेट नहीं भरता, घर नहीं बनते, इन दल पतियों को अँगरेजी सिखाने और  इन्हेँ अँगरेज़ बनाने के लिए भारत की आधी से अधिक धरती खुद गई, नदीयाँ आधी सोख ली गई, पर्वतों के शिखर मुंड दिए गए.…. फिर भी इन्हें अंग्रेजी नहीं आई, न ये अंग्रेज बने.….

करमन कारी करत जब, देस माहि अपकार । 
तेहि भारी पातक के सासक लागनहार ।१३५९। 
 ----- ॥ महर्षि वेदव्यास ॥ -----
भावार्थ : --  राष्ट्र में यदि प्रशासन अन्यायपूर्ण व्यवहार करता हो, तब उस गम्भीर दोष का आरोपी शासन ही होता है ॥ 

नेम अभाव अंतरतम , चित  मैं जब गहनाए । 
नेम भाव तब  बाहरी, हम नहि राखन पाए ।१३६० । 
 ----- ॥ विलियम शेख ॥ -----
भावार्थ : --  "जब अंतरतम  में गहरी अव्यवस्था होती है, तब हम बहिर्-जगत व्यवस्थित नहीं रख  पाते ॥"


गुरुवार, 13 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३३ ॥ -----

धर्म धानी पथ नीति नय, राज राज ररियाए । 
सेवा भाउ सुसुप्त कर , सत्ता भाव जगाए ।१३३१ । 
भावार्थ : -- राज-धर्म, राज-धानी, राज-पथ, राजनीति, राजनयिक आदि शब्दों द्वारा राज-राज रटन सेवा भाव को सुसुप्त कर सत्ता भाव (अर्थात अपना शासन चलाना, अपने ही नियम मनवाने, उपभोग करना आदि ) को जागृत कर देती है ॥ यदि राज की रटन हो तो वह राम जैसे राज्य में हो ॥ 

प्रेमी बिकता हाट में, ले लो प्रेम के मोल । 
जुग बँधन मुखसन बोले, मीठे मीठे बोल ।१३३२।
भावार्थ : -- प्रेमी हाट में बिक रहा है , प्रेम के मोल ले लो । यदि गाँठ से बाँध दो तो यह मीठे मीठे बोल बोलेगा ॥
 
बरन बचन बानी बँधे, बानी मुख के नाद । 
अनुसासन के निबंधन, जीवन की मर्याद ।१३३३। 
भावार्थ : -- शब्द- वक्तव्य वाणी से बंधे हैं, वाणी मुख की ध्वनि से बंधी है । जीवन की सारी मर्यादाएं सारी सीमाएं अनुशासन से बंधी रहती है रेखाओं से नहीं ॥ 

छन छन में बाद्य बसे, कन कन में संगीत । 
साँस साँस में सुर बसे, प्रान प्रान में गीत ।१३३४। 
भावार्थ : -- सृष्टि के रचयिता ने क्षण क्षण में वाद्य यंत्रों को एवं कण कण में संगीत को बसाया । सांस साँस में स्वर एवं प्राणि-प्राणि में गीत का अधिवास किया, मनुष्य ने उसका निरूपण किया आविष्कार नहीं ॥ 

मैं बिय मैं बिय कहत कर, चाहे केत प्रचार । 
मूठी आबध अंकुरे, करत खेत प्रस्तार ।१३३५। 
भावार्थ : --  मैं बीज हूँ मैं बीज हूँ कह कह कर बीज अपना कितना ही प्रचार करे, जब तक वह मुठियों में बंद होकर खेत में प्रस्तारित नहीं होगा और मिटटी में विलीन नहीं होगा तब तक उसका अंकुरन  नहीं होगा ॥ 

अर्थात : -- "सेवा प्रस्तारित करने से फल दायी होती है, प्रचारित करने से नहीं"

जोइ सर कलहंस तरे, सोइ मानसर मान । 
सोइ सर कलहंस तरे, जोइ मान सर मान ।१३३६। 
भावार्थ : -- जिस सरोवर में राजहंस विचरण करते हों वह सरोवर मान सरोवर समान है । हंस उसी सरोवर में विचरण करते हैं जो मान सरोवर के समान है ॥ 

मानसरोवर = हिमालय में स्थित एक पवित्र झील 

जोइ भूमि श्री हरि बसे, सोइ तीर्थ स्थान । 
सोइ भूमि श्रीहरि बसे, जोइ तीर्थ स्थान ।१३३७ । 
भावार्थ : -- वह भूमि तीर्थ स्थान होते हुवे पुण्यस्थली है जहां ईश्वर का निवास हो । ईश्वर वहीँ निवास करते हैं जो तीर्थ स्थली होते हुवे पुण्यस्थली है ॥ 

जिन घर दान देन किये, तहाँ लेन ना जाएँ । 
लेन देन के भाउ मह, देन धरम बिस्माए ।१३३८। 
भावार्थ : -- जिस घर /स्थान /देस में दान दिया हो, वहाँ कुछ लेने नहीं जाना चाहिए । कारण कि लेन-देन के भाव में दान का पुण्य धूमिल हो जाता है ॥ 

जग मैं तेरो गुरु कौन, जो देवे सद्ज्ञान । 
जाके संग लगन बँधे, भर्ग भवानी मान ।१३३९। 
भावार्थ : -- संसार में तुम्हारे गुरु कौन है ? जिसने तुम्हे सद्ज्ञान दिया हो । यदि उसके साथ लगन बंधे हो तो ? फिर वो भवानी-शंकर के समान हैं ॥ 

पाप पुन सन कन कन हो, धरा सूप पछिनाए । 
गरुबर देह धरी रही, हरुबर फूँक उराए।१३४०। 
भावार्थ : -- अपने पाप एवं पुण्य कर्मों के साथ जब कण कण हुवे तब धरा के सूप में पछने गए । जिसकी देह भरी थी वह यही रहे, जिसकी देह हलकी थी वही उड़े ॥ 

बुधवार, 12 मार्च 2014

----- मिनिस्टर राजू १२५ -----

राजू : -- मास्टर जी ! इ बिपक्छ के अजहूँ लग जो एकै परधान मंत्री बने, उहू खटिया भोग रहे हैं..,भगवान् उठा काहे नहीं लेता ?

" जिसकी आवश्यकता बिपक्छ को नहीं है, उसका भगवान भी क्या करेगा....."

रविवार, 9 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३२॥ -----

जीवात्म निज कृति रीति, घट घट भीत बिराज । 
अरु घट धृत कृत रीत तस, जस धृत देस समाज ।१३२१। 
भावार्थ : -- जीवात्म अपनी रचनानुसार अपनी रीति अनुसार अपने स्वभाव अनुसार प्रत्येक शरीर में विराजमान है । यह शरीर वही कृति वही रीति अपनाता है जो उस देश-समाज ने धारण कि होती हैं जिसमें कि वह जन्म लेता है ॥

अर्थात : -- यदि परमात्मा भी किसी शरीर को अंगीकार कर जन्म लेता है या अवतरित होता है । तब उसके भी शरीर को जिसे वह अंगीकार करता है उस देश/स्थान उसके सामाजिक आचार-विचार के अनुसार ही चलना पड़ता है जिसमें कि वह जन्म लेता है ॥ यदि हम कहें ईश्वर को भोजन की क्या आवश्यकता है, ईश्वर को नहीं उस शरीर को है जिसे उसने अंगीकार किया हुवा है ॥

लोभ लबध सन लाहना, धन गह मलिन सुभाउ । 
दान करन परिसोधत, निर्मल हो सुख दाए ।१३२२। 
भावार्थ : -- लोभ के कारण लब्धियों के कारण लाभ के कारण धन मलिनता ग्रहण करता है । दानकरण क्रिया द्वारा परिष्कृत करने से वह धन निर्मल होकर सुख दायक हो जाता है ॥

चहुँ कोत छल छंद छाए, ए काल बयस ए देस । 
घट घट में रावन बसे, भरे राम के भेस ।१३२३।  
भावार्थ : -- इस समय इस देश की परिस्थितियां ऐसी है, कि चारों दिशाओं में छलकपट ही छाया है । देह देह में रावण का वास है भेष उसने प्रभु श्रीराम का भरा है ॥

अनभलखल के पान पूजिते । बरासनी भए धूर्त चरिते ॥ 
आगिन धरि हरि राम कहानी। कहि दनुपत सिय दए सो दानी ॥ 
दुष्टों के दुर्जनों के हाथो पूजित व्यास पीठाधीश भी धूर्त चरित्र धारण करने वाले हो गए हैं । वे सम्मुख तो हरि की  राम कहानी रखे रहते हैं और कहते हैं राक्षसों का स्वामी रावण जैसा कुपात्र भी माँगने क्यों आ जाए, जो उसे सीता दे दे असली दानी तो वही है ॥ वाह रे पीठाधीश, गीस अउ का ॥

बिषयन सन कहु भए कवन, भाउ सोन भय खाह ।
सौमुह कंचन कामिनि, जनि जैसेउ लखाह ।१३२४। 

कोड़ी को सम्भार रखें, जोड़ी को दए छोड़ । 
करन लगे सब अधम रति, करत परस्पर होड़ ।१३२५। 
भावार्थ :- कौड़ी को सम्भाल कर रखते हैं जोड़ी को छोड़ देते हैं । समय ऐसा चल रहा है कि सब स्वार्थ की प्रीति करने लगे हैं इस बात की होड़ लगी है कि कौन कितना अधिक स्वार्थी है ॥ 

मन जोगन को न धावैं, धन जोगन सब धाए । 
तेरी धाए धरी रही, जब सव भवन पठाए ।१३२६। 
भावार्थ : -- धन जोड़ने के लिए सभी दौड़ लेते हैं, किन्तु मन जोड़ने कोई नहीं दौड़ता । ये तेरी दौड़  तब धरी रह जाती है जब तू शव मंदिर भज दिया जाता है ॥ 

अग जग लग बनीज भरे, सबहि एक सोंह ऐक । 

बणितब बस्तु बिबेकि जो ,बानिज सोइ प्रबेक ।१३२७ । 
भावार्थ : -- यह संसार बानियों से भरा पड़ा है, सभी बणिये एक से एक है । जो पाणितव्य-वस्तु का विवेकी है वास्तव में बाणिया वही है और श्रेष्ठ भी वही है, शेष सभी कच्चे-कच्चे से सुगले-सुगले बाणिया हैं ॥ 

जँह सुमिरन मैं हो मगन, भजमन भगवन नाम । 
भाब भगति में हो लगन, तँह धन के काम ।१३३८। 


भावार्थ : --जहाँ स्मरण में मन निमग्न हो और भगवान् के नाम का भजन हो । जहां श्रद्धा, भक्ति, सेवा, प्रेम में निमग्न हो वहाँ (प्रचार हेतु ) धन का क्या काम है ॥  

रचे पद पत पदासीन, सुन्दर सुन्दर ठाम । 
जन जन हो जँह अधिपते, तँह तिनके का काम ।१३३९। 
भावार्थ : -- पदों पर आसीन होकर पदों की रचना की राष्ट्र के पति की रचना की सुन्दर सुन्दर अट्टालिकाओं की रचना की । जहां जनता ही अधिपति हो वहाँ इनका क्या काम है ॥ 

साम दम दंड अरु भेद, जय के चारि उपाए। 
जो लड़ सिंहासन चढ़े, सो तो राउ कहाए ।१३४०। 
भावार्थ : -- शांति, दमन, दंड या भय, भेद, मर्म,रहस्य राज धर्म में ( सेवा धर्म में नहीं, सेवा में जय-विजय कैसी, किससे ) विजय के ये चार उपाय बताए गए हैं । जो लड़-मर के सिंहासन पर चढ़ता है वह तो राजा कहलाता है । राजा तो राजतंत्र में होता है, लोकतंत्र में कहाँ होता है, जब नहीं होता तो लड़ते क्यूँ है ॥ 







बुधवार, 5 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३१ ॥ -----

                          ----- ॥ मैं दानी हूँ,ज्ञानी नहीं हूँ ॥ -----
क्रुद्धहृष्टभीतार्तुलुब्धबालस्थविरमूढमत्तोन्मत्तवाक्यान्यनृतान्यपातकानि | 
 ( एक शब्द में कितना बोलती है ये संस्कृत भाषा )  
----- ॥ गौतमधर्मसूत्र ५ /२ ॥ -----

भावार्थ : -- दान तभी करना यथेष्ट है जब उसका अधिकार प्राप्त हो : -- भावावेश में, भयभीत होकर, रुग्णावस्था में, अल्पावस्था में, मदोन्मत्त अवस्था में, विक्षिप्त, अर्ध विक्षिप्त अथवा अमूढ़ अवस्था में दान देना निषेध है ॥ 

 दान देवन जोग कौन, आप धातृ संधानि । 
मात,पिता पालक अन्य, देवन अनुमति दानि ।१३११। 
भावार्थ : -- दान देने का अधिकारी कौन हो जो अपना पालन पोषण करने में आपही सक्षम हो । एवं जो मात-पिता पालक अभिभावक अथवा अन्य द्वारा देने हेतु अनुमति दी गई हो ॥ 

टीका : -- भारतीय संविधान के वयस्कता अधिनियम के अनुसार जो अवयस्क है किन्तु अपना पालन-पोषण करने में सक्षम है वह अपने पालक/अभिभावक की अनुमति से ही दान करना चाहिए । जो वयस्क हैं किन्तु अपना पालन-पोषण करने में असमर्थ हैं क्या उन्हें दान करना चाहिए ? (जब दान शब्द ही सम्मिलित हो उसका तात्पर्य है कोई भी दान ) क्या इन्हें संज्ञान है कि धन कैसे अर्जित किया जाता है ? 

ब्यसन भोग बिलास मह, करे दान उपजोग । 
जो कुकरम करिता सो, देवन पात अजोग ।१३१२। 
भावार्थ : -- जो प्राप्य दान का उपयोग व्यसन में करता हो भोग विलास में  करता हो ( भोग बिलास  : -- मूल्यवान वस्त्राभूषण , शीतल शीतल बातावरण , हाँ हवाई जहाज,पानी जहाज ,मणि खचित रथ, कनक अटारी, एवं उसक जैसे आश्रम आदि के भोग को विलासिता कहते हैं ) जो खोटे करम करता हो । खोटे करम करने का तात्पर्य है : --(धूर्तगिरी, चाटुकार, कोई लड़ाई-वडाई करने वाला, कुवैद्य, पणी, वंचक, चोर, हत्यारा,असद् व्यवसाय करने वाला ) वह दान देने के लिए अपात्र है ॥ 

'क्या कोई नेता-मंत्री इन दुर्गुणों से रहित है ?'

' स वै पुण्यतमो देश: सत्पात्रं यत्र लभ्यते ' 
  ----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता॥ -----
अर्थात : - ' वह देश/स्थान पवित्र है तीर्थ है वासानुकूल है जहां ( दान हेतु ) सत्पात्र उपलब्ध हों '

टीका : -- एक दल पैसठ वर्ष में सुव्यवस्था स्थापित नहीं कर सका, दुसरा अल छह:वर्षों में स्थापित नहीं कर सका, आप और हम एक पल में  इसे स्थापित कर सकते हैं ऐसी कुव्यवस्था का बहिष्कार करके......

प्रियतम प्रेम दान दे, प्रियतमा प्रीति दान ।  
नेह बढ़े उरोमल हो, आँख दान असुआँन ।१३१३। 
( संत रसखान के पद से अभप्रेरित ) 
भावार्थ : -- हे प्रीतम तू प्रेम का दान कर, हे प्रियतमा तू प्रीति का दान कर । नयन तू आँसुओं का दान कर कि जिससे स्नेह में वृद्धि हो एवं हृदय निर्मल हो जाए ॥

दाता अरु ग्रहीता जस, दिनमल के दुइ पाख । 
एक भाव मन एक मुख तेइँ, एक दिरिस सोंह लाख ।१३१४। 
भावार्थ : --दाता और ग्रहीता जैसे एक मास के दो पक्ष हैं दोनों के सम्मिलन से ही मास की रचना होती है । दाता तभी दाता है जब गृहीता दान ग्रहण करे, ग्रहीता तभी ग्रहीता है जब कोई दे । इनको एक भाव से एक एक ही विचार कर एक ही दृष्टि से देखना चाहिए ॥ अर्थात जो योग्यता लेवनहार की है देवनहार की भी वही योग्यता होनी चाहिए ॥

श्रम कारन सनमान है , श्रम सन घर की कान । 
श्रम सन स्वाभिमान है, श्रम जुग फिर कर दान ।१३१४। 
भावार्थ : -- सम्मान उद्यम करने में ही है, श्रम से ही घर की लाज है, घर चलता है । श्रम से ही स्वाभिमान का अस्तित्व है पहले  श्रम में योजित हो, दुनिया के रंग-ढंग देख, आँटे-दाल का भाव पता कर, फिर कुछ दान कर.....समझे अठरिया ॥

जँह रवन न्यूनतम हो, भाव अरथ अधिकान । 
अस कहाउत कबित भनित, गहत परम अस्थान ।१३१५। 
भावार्थ : -- जहां  न्यूनतम शब्द हों, भाव एवं अर्थ अत्यधिक हो । ऐसी कहावत, कविता, कथन, उक्ति, सूक्ति परम पद को प्राप्त होती हैं ॥ परम पदिक कहावत, उक्ति, कविता कब होती है जब भाषा समृद्ध हो, भाषा समृद्ध कब होती है जब उसका व्याकरण समृद्ध हो, व्याकरण समृद्ध कब होता है, जब उसके स्वर व्यंजन सुव्यवस्थित हों ॥

टिप्पणी : -- वैदिक संस्कृत अभी तक की सबसे समृद्ध भाषा है तत्पश्चात (क्रमवार से) संस्कृत, संस्कृत मिश्रित हिंदी, अरबी-फ़ारसी-उर्दू तत्पश्चात आँग्ल भाषा की समृद्धि है.....

दाण करणों तबहि भलो, घराँ होए जब दाम । 
घराँ दाम कब हुवा जी, कराँ होए जब काम ।१३१६। 
भावार्थ : -- दान करना तब ही उत्तम है जब घर में दान के विषय हो । ये दान के विषय कब होते है जी? जब हाथ में काम-काज हो ॥

मानस सुख ए बिषय निहित, पाहे मानस गात । 
सुख पर सुख अनुभूत जब, पाहे ऊंची जात ।१३१७। 
भावार्थ : -- हे मनुष्य ! यदि तुम दुःखित हो तब सुख मात्र इसी विषय में निहित है कि तुमने मानव का शरीर पाया है । अत: इस शरीर को परमार्थ में  लगा कर जीवन को सफल किया जा सकता है ॥ और चूँकि जाति जन्म से प्राप्त होती है यह कर्म से प्राप्त नहीं होती । यदि तुम्हारा जन्म उच्च जाति में हुवा है तब यह कारण सुख के ऊपर सुख की अनुभूति कराता है । ऐसी अवस्था में परमार्थ करना तुम्हारा कर्त्तव्य हो जाता है ॥

                                            धन से सुख की प्राप्ति नहीं होती अपितु दुःख की ही प्राप्ति होती है, क्योंकि धन में मलिनता होती है जो दुखों का कारण बनती है । इसे दान द्वारा शुद्ध किया जा सकता है, और इससे सुख प्राप्त किया जा सकता है । विलासिता की साधन स्वरूपा माया से तो दुःख के सह पाप ही संकलित होते हैं । माया त्याग की विषय-वास्तु है दान की नहीं ॥

अंतस देहि यंत्री है, बाहरी देहि यन्त्र । 
अंतर देहि तंत्री है, बाहरी देहि तंत्र ।१२१८। 
भावार्थ : -- यदि बाहरी देह एक यन्त्र है, तो मृत्यु एवं जन्म के मध्य स्थित आत्मा उसकी संचालक है, यंत्री है । यदि बाहरी देही एक तंत्र है तो अनतरात्मा ही उसकी संचालक है, तंत्री है ॥

बयसाधीन रह जबलग, बसि अंतर भाव देह । 
स्वाधीन तब होत जब, पैहहिं बयस बिदेह ।१३१९। 
भावार्थ : --  अंतरात्मा जब तक जन्म एवं मृत्यु के मध्य स्थितवाली होती है तब तक यह अवस्था के अधीन होती है ।  शरीर हिन् की स्थिति की प्राप्ति पर यह अवस्था से भी विमुक्त हो जाती है ॥

अंजन माँगे आँधरा, गंजा कंघी तेल। 
सत्ता के सुख भोगने, खेलें चुनाउ खेल।१३२०।  
भावार्थ : -- आँख का अंधा सिंगार कू अंजन मांगे, जोती बढ़ानी है  । सिर का गंजा कंघी और तेल माँगे, भाई अंधे को आँख दो, गंजे को टोप दो। बुद्धिहीन को बुद्धि दो, 'मत' मत दो । सत्ता के सुख भोगने के लिए ये अंधे और गंजे चुनाव-चुनाव खेल रहे हैं, तो जिसके पास जो नहीं है वही दो जय गणेश देवा ।।


शनिवार, 1 मार्च 2014

----- ॥ दोहा-दशम १३०॥ -----

तज तप अहहिं परहित हुँत, दान अबर कल्यान । 
सत पात परिष्कृति हुँत, दया हहि जिउन दान ।१३०१।  
भावार्थ : -- त्याग एवं तप पर हित के लिए है, दान दूजे का कल्याण के लिए है । सत्य भूल दोष  को शोधन के लिए है और दया जीवन दान करने के लिए है ॥ 

कलुखित करमनु छाँड़ के, करौ करम उजराए । 
काइ एक दीपक न जान, कब ठंडी हो जाए ।१३०२। 
भावार्थ : -- दोषपूर्ण कर्मों का त्याग कर हमें ऐसे सत्कृत ही करने चाहिए क्योंक मरणोपरांत यह ही साथ जाते हैं । यह काया,  दीपक के समान है और दीपक का कोई भरोसा है एक फूँक मारी और ठंडा हुवा ॥ 

सोई ससि सूर समान जोई  जग उजराए  । 
घरहु न उजराई सके, बुझा दीप कहलाए ।१३०३ । 
भावार्थ : -- शशि एवं सूर्य के सदृश्य वही है जो समस्त संसार को उज्जवल कर दे । जो घर को ही उज्जवल न कर सके वह तो बुझा हुवा दीया है ॥ 

मरे हुए की मरनी का, मरे बैठ का रोए । 
पहिलेहि मृतक देख के, रो रो नैन सुखोए ।१३०४। 
भावार्थ : -- जो मर चुका है उसकी मृत्यु कैसी । ऐसी मरनी पर बैठ कर रोना कैसा ॥ इस मृतक को देख पहले ही रो रो के नैन सुख गए हैं ॥ 


अर्थात : - 'मूर्खों को समझाना मरे का रोना ही है' 

दावानल चिंगारी सम, क्रोध कोप चिंगार । 
यह मुख मोरी सरिस जब, निकास तँह सन गार ।१३०५। 

भावार्थ : -- मुख का क्रोध कपो व छनिहाड़ दावानल की चिंगारी क सदृश्य होती है । यह मुख तब नाले के सरिस हो जाता है जब इसमं से गारे के समान गालियां निकलती हैं ॥ 

जँह ऊपर निरमल नीर तँह नीचै अहि बहु कीच । 
जिन भू ऊपर कीच है, निरमल जल तँह नीच ।१३०६। 
भावार्थ : -- जो जल ऊपर से स्वच्छ एवं निर्मल दिखाई देता है उसके नीचे अत्यधिक कीचड़ भरा होता है ॥ जिस भूमि के ऊपर कीचड़ दिखाई देता है उसकी तह में  निर्मल जल का सोता मिलता है ॥ 

दान दरसे न दीन धनि, जनम न धर्म न जात ।  
यह दरस केवल करम, कहुँ जग साँची बात ।१३०७। 
भावार्थ : -- दानशीलता धनी -निर्धन जन्म( जन्म स्थान, विधान,आधान ) जाति-धर्म नहीं देखती  । यह केवल कर्म को देखती है और यह संसार का यथार्थ वचन है ॥ 

दृष्टांत  : -- कसाई लोग दान की महिमा को नहीं जानते, दान के धन्धे को भी नहीं जानते ॥ यदि वह अपनी वधशाला के स्थान पर गौशाला खोल दें तो जितना वे मांस विक्रय में कमाते हैं उससे अधिक तो केवल दान में कमा लेंगे,  दान ही किसी को प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति बनाता है, ॥ 

टीका : -- जब दान जाति-धर्म को नहीं देखता तो 'मतदान' काहे देखता है"

चारि जिउ के हत कारत,  धन सम्पद तौ जोइ । 
एक जिवान देई दान, सो कल्यान न होइ ।१३०८। 
भावार्थ : -- चार जीवों ह्त्या कर धन सम्पदा तो जोड़ ली  । फिर उसी सम्पदा से एक जीवन की रक्षा हेतु दान देने चले, ऐसा दान कल्याणकारी नहीं होगा ॥ ऐसा दान अति कल्याणकर है जिसकी विषय-वस्तु चार जीवों को वरदान देकर अर्जित की गई हो ॥ 

दृष्टांत : -- कृषि उद्योग 

धरनि ऐसी चरखी जो , भँवर रहे दिनु रैन । 
जे पल बिपल घरी पहर, सबही वाकी दैन ।१३०९। 
भावार्थ : -- धरती  एक ऐसी चरखी है । जो दिनरात भ्रमर रही है ॥ यह पल-विपल घड़ी पहर सब उसी भ्रमण की ही दें हैं, क्या समय भी उसी की देन है ? यदि हम ग्रह मंडल की परिधि से बहिर्गमन करेते हैं  तो क्या समय से परे हो जाएंगे ? नहीं । क्यों ? क्योंकि विश्व का मानक समय अधूरा है यह केवल पृथ्वी की ही घूर्णन गति पर आधारित है, भारतीय शास्त्र इससे कहीं आगे हैं ॥ 

लिखे लेख इतिहास नै, देस काल बै कूल । 
कोउ बचन अनुकूल है, कोउ बचन प्रतिकूल ।१३१०। 
भावार्थ : -- इतिहास ने जितने लेख लिखे  देश, काल एवं परिस्थितियों के तट पर लिख । अत:विदयमान का दश काल एवं परिस्थितियों के लिए कोई कथन अनुकूल है अर्थात सह,काल एवं परिस्थितयां वही हैं  किन्तु कुछ बातों के लिए यह परिवर्तित हो चुकी हैं, अत:वे बातें प्रतिकूल हैं ॥  




----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...