शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२२ ॥ -----

नित प्रात मज्जन पूजन, रयन अल्पतर निंदु। 
चित चिंतन लग करम तन, जे सोधन पँच बिंदु ।१२२१। 
भावार्थ : -- रात्रि मन अल्पतर नींद ग्रहण कर, नित्य प्रात: स्नान,  अपने ईष्ट देव का पूजन, तत्पश्चात चित्त चिंतन,ध्यान,एवं मनन में लगे तन कर्मों में लगे रहे, यह शुद्धता के पांच बिंदु है, जो निर्धन हेतु भी सुलभ हैं, यदि जल उपलब्ध न हो तब केवल कर-चरण प्रक्षालित करें इतना भी उपलब्ध न हो केवल जल को छींट लें, यह भी उपलब्ध न हो तो वस्र झाड़ लें, जल जब उपलब्ध हो जाए तब स्नान करें ।        
                                       शेष शुद्धता तो धन की है, माया की है, धन एवं माया के उपयोग से शरीर शुद्ध हो जाएगा किन्तु अंतर मलिन हो जाएगा, अंतर मलिन होने से लिखा-पड़ा सब ठंडा हो जाएगा, प्रभु गरम हो जाएंगे, प्रभु थोड़े अधिक गरम हो गए तो वे फिर ऐसा ठंडा करेंगे, कि हिमालय को भी लाज आ जाए ॥

सुमन की सुहा डार पर, फलानुबन्धाहार। 
कर सोहत श्रमकार कर, धन की परहित कार ।१२२२। 

 सुमनस शाखे शोभनं, फलानुबन्धाहारं ॥ 
कर शोभतेश्रम कारिणम् ,  धन शोभते परहित करणं॥ 
भावार्थ : -- पुष्प की शोभा डाल पर ही होती है, फल की शोभा क्रमबद्ध फल देने एवं आहार होने में है । हाथ की शोभा श्रम कार्य करने में है, धन की शोभा परोपकार में ही है ॥

मनमोहिनी काया जब, प्राण हिन् होइ जाए । 
दाग कि जेरे ख़ाक दिए, बहोरि ना बहुराए ।१२२३। 
भावार्थ : -- यह काया बड़ी ही मन मोहिनी है किन्तु यह जब प्राण हिन् हो जाती है तब इसे चिता में जलाओं या सुपुर्दे-ख़ाक करो या जल समाधि दो, पेटी में बंद कर दफना दो, या अरब सागर में फेंक दो कुछ भी करो, फिर इसमें प्राण वापस आने के नहीं ॥

को जरे को जरा रहे, को जारन जोहारि । 
शवघर सायं एक एक कर, आहि सबहि के बारि ।१२२४। 
भावार्थ : -- कोई जल रहा है, कोई जला रहा है, कोई जलने की प्रतीक्षा कर रहा है । शवगृह में शयन करने हेतु एक एक करके सबकी ही बारी आएगी ।

उरिन अटारी उरारी, जीते जी के श्राम । 
अब सो कर जौ मरनि पर, आवै तेरे काम ।१२२५। 
भावार्थ : -- ये लम्बी चौड़ी अट्टालिकाएं  जीते जी की छाया हैं । अब वह करना आरम्भ कर, जो मृत्युपरांत तेरे काम आवें ॥

चिउँटी पग घुँघरु बाजे, सुनत सोइ साहेब । 
कहन किए न करन किए बस किए सेबक सुख सेब ।१२२६। 
भावार्थ : -- चुने हुवे नेता ही नहीं, नेता के कुत्ते भौंके  ( जनता )जनार्दन साहेब वो भी सुनते है, चीटियों के पग घुंघरू बाजे साहेब वो भी सुनते  है, उनकी कहानी सुनते है, कथाएं सुनते हैं और जाने क्या क्या सुनते हैं । और ये चुने हुवे सेवक, न कुछ सुनते हैं न कुछ समझते हैं, केवल सत्ता के राजसी सुखों का सेवन करते हैं ॥ 

अचोरन चैल देइ पुन , भूखन असन खवाए । 
पिपासु पयस प्याए पुन, मतिहिन् कू मति दाए ।१२२७ । 
भावार्थ : - निर्वस्त्र को वस्त्र दान करने का धर्म है, भूखे को भोजन खिलाने का धर्म है, प्यासे को पानी पिलाने का धर्म है । मतिहीन को मत देना अधर्म है, उसे मति देने का धर्म है । 

"मत, माँगने की विषय-वस्तु नहीं है"

सुभाउ चहे चारि चरन, चारि चरन  भगताउ । 
भगता मन भगवन चहे, भगवान भगता भाउ ।१२२८।  
भावार्थ : -- कोई भी धर्म हो वह ये चातुर्य आचरण चाहता है : -- सत्य, शौच ( शुद्धता, तप+त्याग)दया एवं दान । ये चार दम बन्दे चाहता है, 

मजहब चाहे चार दम, चार दम बन्दे चाहता है । 
 बन्दे खुदा को चाहते हैं खुदा बंदगी चाहता है  ॥ 

सिंगारिक  कबित अस जस,  गौरस की तासीर । 
जोरन देइ सार मिले तोरन मिलइ पनीर ।१२२९।
भावार्थ : -- श्रृंगार रस स युक्त काव्य की अनुभूति ऐसी होती है जैसे की गौरस का स्वभाव होता है । यदि उसे योग  दें तो मक्खन मिलता है, और वियोग दें तो पनीर मिलता है ॥ 

माँगन हुँत गुरु ज्ञान है, दायन कनिआ दान । 
भोगन हुँत निज कुकरमन, खादन फलफुल धान ।१२३०। 
भावार्थ : -- कन्या और दान देने के विषय है, माँगने के नहीं ( दहेज-उपहार, कन्या या मत आदि दिए जाते हैं  मांगे नहीं नहीं जाते) गुरु का ज्ञान माँगने का विषय है । लंगोटी का मिली लगे फाग खेलने, विषय भोग करने के लिए नहीं है अपितु अपने कुकर्म भोगने के लिए हैं, खाने के लिए फल, फूल, मूल, एवं अनाज है पशुओं को नहीं खाते, इन्हें खाकर फिर अहिंसा का भाषण नहीं पिलाते.....समझे.....

 लंगोटी पर फाग खेलना = थोड़ा साधन ( स्वतंत्रता) मिलते ही विलास की ओर दौड़ना



                            

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