संसार सागर सरिबर, सरिल सरबर सरीर ।
जो डूबा सो डूब गया, जो तैरा सो तीर ।१२११ ।
भावार्थ : - दुनिया मानिन्दे समंदर है, आब ये बदन जरी कार ।
आबोदोज़ हुवा वो दोज़ हुवा, तैरा वो लगा किनार ॥
नर नारायन रूप है, नारायनी है नारि ।
एक हरि के अधिकार मैं, एक हरि की अधिकारि ।१२१२।
भावार्थ : -- पुरुष एवं स्त्री के बिना इस संसार की कल्पना नहीं की जा सकती ॥ यदि नर भगवान का स्वरुप है तो नारी भगवती स्वरुप हैं । ( नारायणी को कृष्ण भगवान की सेना भी कहते हैं, माने की भगवान इधर भगवती उधर ) । एक भगवान के अधिकार में हैं तो एक भगवान की अधिकारी हैं ॥
कर पसारी के लीजिए, कहूँ मिलै जो ज्ञान ।
ज्ञान करम सुधारी कै, कारे दोष निदान ।१२१३।
भावार्थ : -- ज्ञान कहीं भी मिले, किसी से भी मिले उसे ग्रहण करना चाहिए हाथ पसार कर मिले तो भी संकोच नहीं करना चाहिए । कारण कि ज्ञान अपने कर्म को सुधार कर, निहित दोषों का निवारण करता है ॥
बिनु साधन बिनु पाँख के, पौरे गगन बिहंग ।
जिनके सूतक मह बँधी, रघुबर नाम पतंग ।१२१४।
भावार्थ : - जिनके सूत्र में राम नाम की पतंग बंधी हो, वह फिर बिना साधन के बिना पंख के बिहंग बन कर गगन में तैरता है ॥
प्रेमी सों प्रेमी मिले, प्रेमी में मिले प्रेम ।
अंभस्निधि अंभस् मिले, कलस मिले जूँ हेम ।१२१५।
भावार्थ : -- प्रेमी को ही प्रेमी मिलता है, प्रेम प्रेमी में ही मिलता है । जैसे समुद्र में मुक्तिका मिलती है एवं कलश में शीतलता मिलता है ॥
साधु साधु बन बन फिरे, बना साधु ना कोइ ।
असाधु असाधु सन घिरे, बने बन साधु सोइ ।१२१६।
भावार्थ : -- हे साधू !इस वन रूपी संसार में जहां गगनचुम्बी भवन वृक्ष सदृश्य एवं मानुष वन पशु सदृश्य हो गया है, कपट तापस ही फिर रहे हैं , वास्तव में साधु कोई नहीं है । हाँ यदि असाधु असाधु से घिर जाए तो वह एक कपट तापस अवश्य बन जाता है ॥
साँस हैं तोहि प्रान हैं, साँस नहि त सव मान ।
कैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिनु प्रान ।१२१७ ।
भावार्थ : -- कहते हैं कि साँस जब तक हैं तब तक देह में प्राण है, नहीं तो यह मृत के समान है । लोहार की धूँकनी मृत पशु के खाल से बनी होती है,फिर वो बिन प्राण के साँस कैसे लेती है ॥
लिखि कही परमारथ तस, कथा अमरता पाइ ।
मसि बही सुवारथ परत, लेखत कहत बिहाइ ।१२१८।
भावार्थ : -- यदि परमार्थ हेतु कोई कथा कही जाए अथवा लिखी जाए, वह अमरत्व को प्राप्त हो जाती है । यदि स्वार्थ हेतु मसि बहाई है उस कथा का अंत कहते -लिखते ही हो जाता है ॥
बक्ता बकत डूबी गए, कथा लगी ना पार ।
दरस घरिएँ श्रोता हरिएँ, बहि निस्कास दुआर ।१२१९।
भावार्थ : -- वक्ता बकते बकते इतना डूब गया कि कथा पार ही नहीं लगी । श्रोता क्या करता घड़ी देखा और धीरे से निर्गम द्वार की और बह गया ॥
मानुष भया बन गोचर, बन भए नगरी गाँउ ।
घन भवन तरु भए बोले घर घर कागा काउँ ।१२२०।
भावार्थ : -- वन ही नगर गाँव हैं, नगर गाँव वन बन गए मानुष वन में विचरने वाला प्राणी हो गया । सघन भवन वृक्ष हो गए हैं घर घर में दूरदर्शन रूपी कौंवे काऊँ काऊँ करने लगे हैं ॥
जो डूबा सो डूब गया, जो तैरा सो तीर ।१२११ ।
भावार्थ : - दुनिया मानिन्दे समंदर है, आब ये बदन जरी कार ।
आबोदोज़ हुवा वो दोज़ हुवा, तैरा वो लगा किनार ॥
नर नारायन रूप है, नारायनी है नारि ।
एक हरि के अधिकार मैं, एक हरि की अधिकारि ।१२१२।
भावार्थ : -- पुरुष एवं स्त्री के बिना इस संसार की कल्पना नहीं की जा सकती ॥ यदि नर भगवान का स्वरुप है तो नारी भगवती स्वरुप हैं । ( नारायणी को कृष्ण भगवान की सेना भी कहते हैं, माने की भगवान इधर भगवती उधर ) । एक भगवान के अधिकार में हैं तो एक भगवान की अधिकारी हैं ॥
कर पसारी के लीजिए, कहूँ मिलै जो ज्ञान ।
ज्ञान करम सुधारी कै, कारे दोष निदान ।१२१३।
भावार्थ : -- ज्ञान कहीं भी मिले, किसी से भी मिले उसे ग्रहण करना चाहिए हाथ पसार कर मिले तो भी संकोच नहीं करना चाहिए । कारण कि ज्ञान अपने कर्म को सुधार कर, निहित दोषों का निवारण करता है ॥
बिनु साधन बिनु पाँख के, पौरे गगन बिहंग ।
जिनके सूतक मह बँधी, रघुबर नाम पतंग ।१२१४।
भावार्थ : - जिनके सूत्र में राम नाम की पतंग बंधी हो, वह फिर बिना साधन के बिना पंख के बिहंग बन कर गगन में तैरता है ॥
प्रेमी सों प्रेमी मिले, प्रेमी में मिले प्रेम ।
अंभस्निधि अंभस् मिले, कलस मिले जूँ हेम ।१२१५।
भावार्थ : -- प्रेमी को ही प्रेमी मिलता है, प्रेम प्रेमी में ही मिलता है । जैसे समुद्र में मुक्तिका मिलती है एवं कलश में शीतलता मिलता है ॥
साधु साधु बन बन फिरे, बना साधु ना कोइ ।
असाधु असाधु सन घिरे, बने बन साधु सोइ ।१२१६।
भावार्थ : -- हे साधू !इस वन रूपी संसार में जहां गगनचुम्बी भवन वृक्ष सदृश्य एवं मानुष वन पशु सदृश्य हो गया है, कपट तापस ही फिर रहे हैं , वास्तव में साधु कोई नहीं है । हाँ यदि असाधु असाधु से घिर जाए तो वह एक कपट तापस अवश्य बन जाता है ॥
साँस हैं तोहि प्रान हैं, साँस नहि त सव मान ।
कैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिनु प्रान ।१२१७ ।
भावार्थ : -- कहते हैं कि साँस जब तक हैं तब तक देह में प्राण है, नहीं तो यह मृत के समान है । लोहार की धूँकनी मृत पशु के खाल से बनी होती है,फिर वो बिन प्राण के साँस कैसे लेती है ॥
लिखि कही परमारथ तस, कथा अमरता पाइ ।
मसि बही सुवारथ परत, लेखत कहत बिहाइ ।१२१८।
भावार्थ : -- यदि परमार्थ हेतु कोई कथा कही जाए अथवा लिखी जाए, वह अमरत्व को प्राप्त हो जाती है । यदि स्वार्थ हेतु मसि बहाई है उस कथा का अंत कहते -लिखते ही हो जाता है ॥
बक्ता बकत डूबी गए, कथा लगी ना पार ।
दरस घरिएँ श्रोता हरिएँ, बहि निस्कास दुआर ।१२१९।
भावार्थ : -- वक्ता बकते बकते इतना डूब गया कि कथा पार ही नहीं लगी । श्रोता क्या करता घड़ी देखा और धीरे से निर्गम द्वार की और बह गया ॥
मानुष भया बन गोचर, बन भए नगरी गाँउ ।
घन भवन तरु भए बोले घर घर कागा काउँ ।१२२०।
भावार्थ : -- वन ही नगर गाँव हैं, नगर गाँव वन बन गए मानुष वन में विचरने वाला प्राणी हो गया । सघन भवन वृक्ष हो गए हैं घर घर में दूरदर्शन रूपी कौंवे काऊँ काऊँ करने लगे हैं ॥
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