मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२१॥ -----

संसार सागर सरिबर, सरिल सरबर सरीर । 
जो डूबा सो डूब गया, जो तैरा सो तीर ।१२११ । 
भावार्थ : - दुनिया मानिन्दे समंदर है, आब ये बदन जरी कार । 
                आबोदोज़ हुवा वो दोज़ हुवा, तैरा वो लगा किनार ॥ 

नर नारायन रूप है, नारायनी है नारि । 
एक हरि के अधिकार मैं, एक हरि की अधिकारि ।१२१२। 
भावार्थ : -- पुरुष एवं स्त्री के बिना इस संसार की कल्पना नहीं की जा सकती ॥ यदि नर भगवान का स्वरुप है तो नारी भगवती स्वरुप हैं । ( नारायणी को कृष्ण भगवान की सेना भी कहते हैं, माने की भगवान इधर भगवती उधर )  । एक भगवान के अधिकार में हैं तो एक भगवान की अधिकारी हैं ॥ 

कर पसारी के लीजिए, कहूँ मिलै जो ज्ञान । 
ज्ञान करम सुधारी कै, कारे दोष निदान ।१२१३। 
भावार्थ : -- ज्ञान कहीं भी मिले, किसी से भी मिले उसे ग्रहण करना चाहिए  हाथ पसार कर मिले तो भी  संकोच नहीं करना चाहिए । कारण कि  ज्ञान अपने कर्म को सुधार कर, निहित दोषों का निवारण करता है ॥ 

बिनु साधन बिनु पाँख के, पौरे गगन बिहंग । 
जिनके सूतक मह बँधी, रघुबर नाम पतंग ।१२१४। 
भावार्थ : - जिनके सूत्र में राम नाम की पतंग बंधी हो, वह फिर बिना साधन के बिना पंख के बिहंग बन कर गगन में तैरता है ॥ 

प्रेमी सों प्रेमी मिले, प्रेमी में मिले प्रेम । 
अंभस्निधि अंभस् मिले, कलस मिले जूँ हेम ।१२१५।
भावार्थ : --  प्रेमी को ही प्रेमी मिलता है, प्रेम प्रेमी में ही मिलता है । जैसे समुद्र में मुक्तिका मिलती है एवं कलश में शीतलता मिलता है ॥ 

साधु साधु बन बन फिरे, बना साधु ना कोइ । 
असाधु असाधु सन घिरे, बने बन साधु सोइ ।१२१६। 
भावार्थ : -- हे साधू !इस वन रूपी संसार में जहां गगनचुम्बी भवन वृक्ष सदृश्य एवं मानुष वन पशु सदृश्य हो गया है, कपट तापस ही फिर रहे हैं , वास्तव में साधु कोई नहीं है । हाँ यदि असाधु असाधु से घिर जाए तो वह एक कपट तापस अवश्य बन जाता है ॥ 

साँस  हैं तोहि प्रान हैं, साँस नहि त सव मान । 
कैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिनु प्रान ।१२१७ । 
भावार्थ : -- कहते हैं कि साँस जब तक हैं तब तक देह में प्राण है, नहीं तो यह मृत के समान है । लोहार की धूँकनी मृत पशु के खाल से बनी होती है,फिर वो बिन प्राण के साँस कैसे लेती है ॥ 

लिखि कही परमारथ तस, कथा अमरता पाइ । 
मसि बही सुवारथ परत, लेखत कहत बिहाइ ।१२१८। 
भावार्थ : -- यदि परमार्थ हेतु कोई कथा कही जाए अथवा लिखी जाए, वह अमरत्व को प्राप्त हो जाती है । यदि  स्वार्थ हेतु मसि बहाई है उस कथा का अंत कहते -लिखते ही हो जाता है ॥ 

बक्ता बकत डूबी गए, कथा लगी ना  पार । 
दरस घरिएँ श्रोता हरिएँ, बहि निस्कास दुआर ।१२१९। 
भावार्थ : -- वक्ता बकते बकते इतना डूब गया कि कथा पार ही नहीं लगी । श्रोता क्या करता घड़ी देखा और धीरे से निर्गम द्वार की और बह गया ॥ 

मानुष भया बन गोचर, बन भए नगरी गाँउ । 
घन भवन तरु भए बोले घर घर कागा काउँ ।१२२०। 
भावार्थ : -- वन ही नगर गाँव हैं, नगर गाँव वन बन गए मानुष वन में विचरने वाला प्राणी हो गया । सघन भवन वृक्ष हो गए हैं घर घर में दूरदर्शन रूपी कौंवे काऊँ काऊँ करने लगे हैं ॥ 


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