बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२८॥ -----

चित चेतस के चौंक हो , जो चिंतन चौपाल । 
पहिले बिरधनि ज्ञान के, बरगद की कर ढाल ।१२८१। 
भावार्थ : -- चैतन्य चित के चौंक में यदि चिंतन की चौपाल सजी हो । तब प्रथमतस बड़े-बूढ़ों के ज्ञान रूपी बरगद का आश्रय कर लेना चाहिए ॥

जैसेउ कानन श्रवनए , लोचन देखे जोइ । 
जैसेउ बाद बद बदन  , अंतर रेखे सोइ ।१२८२। 
भावार्थ : --  कान जैसा सुनेंगे, नेत्र जैसा देखेंगे,  मुख जिस भाँती बोलेगा, उक्ति करेगा, सिद्धांत अभियोग कहेगा यह अंतर वैसे भाव संजो लेगा ॥

जीवन एक बर्ती बरत, दीप के सोंह काए  । 
को जर जर उजराए जग, को जर जर अगिआए ।१२८३। 
भावार्थ : -- जीवन एक जलती वर्तिका है, शरीर एक दीपक है । कोई जल जल कर जगत में उजाला भर देता है, कोई जल जल कर उसमें आग लगा देता है ॥

धन्ना सेठ की तो बस, जिउते की जयकार । 
संत मुनि मरनान्तर, पूजित सकल सँसार ।१२८४। 
भावार्थ : -- धनवान की तो बस जीते जी की ही जय जय कार है । संत मुनीश्वरों को संसार मरणोपरांत भी पूजता है ॥ 

सावन के आँधर कू जूँ हरियर दीठाए । 
बिषई भोगि के दृग तूँ, चहुँदिसि भल दरसाए ।१२८४। 
भावार्थ : -- सावन के अंधे को जिस प्रकार हरा हरा ही दिखाई देता है । उसी प्रकार विषय-भोगी के दृग भी चारों दिशाओं में भला ही भला दर्शाते हैं ।


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