शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२७ ॥ -----

प्रभो गान बिनु गिरा नहि, भगत भगति बिनु भाउ । 
तज दान बिनु धन सुख नहि, सील बिनु बर सुभाउ ।१२७१। 
भावार्थ : -- ईश्वर की स्तुति बिना वाणी व्यर्थ है । भक्त की श्रद्धा न हो तो भक्ति व्यर्थ है । त्याग एवं दान बिना धन सुख नहीं देता, शालीनता रहित स्वभाव श्रेष्ठ नहीं होता ॥

जड़ता सोंह चेतन लग, अदिस सोंह दिसमान । 
धरिनीहि सोंह गगन लग, प्रस्तर हो कल्यान ।१२७२। 
भावार्थ : -- कल्याण का प्रस्तारण जड़ से लेकर चेतन तक, निर्गुण से लेकर सगुण तक, धरती से लेकर अम्बर तक होना चाहिए ॥

भयो रे घर लाल भयो, प्रियजन थाल बजाएँ । 
और घरे की लालनी, के कर काल बिकाए ।१२७३। 
भावार्थ : -- बिरज मैं आनंद  भयो, लाल भयो पिलो भयो, प्रियजन थाली बजा बजा के कह रहे हैं । कल तेरो योइ लाल पिलो और घर की लालनी के हाथ बिकाओगो ॥ 

भाव भगति आधान जँह, दान मान सनमान । 
लेनइ देन बिधान तँह, हानि लाभ लब्धान ।१२७४। 
भावार्थ : - जहां दान एवं मान-सम्मान हो वहीँ भाव भक्ति सेवा श्रद्धा अधिष्ठित होते हैं । जहां लेई-देई का विधान हो वहाँ फिर लाभ-हानि एवं प्राप्तियों को देखा जाता है ॥ 

सात समंदर जल दियो, घोल दिआ कूँ नून । 
प्रभु प्रपंचन सोइ जान, ज्ञानि ध्यानि जु दून ।१२७४। 
भावार्थ : -- सात समुद्र में जल दिया फिर उसमें लवण घोल दिया क्यूँ । प्रभु का यह छल-प्रपंच वही जानता है जू दूना ज्ञानी-ध्यानी हो भैया हम तो नहीं जानते ॥ 

झूठा सब संसार है, तामे जीउ रमाए । 
पहिले त जन्माए क्यूँ, फिर क्यूँ मरनि पाए ।१२७५। 
भावार्थ : -- यह संसार ही झूठा है, और उसमें जीव रमा है ॥ पहले तो जन्म लेता ही क्यूँ है फिर मरता क्यूँ है  , हम तो नहीं जानते यह तो वही जानते हैं जो दुने ग्यानी ध्यानी एवं डेढ़ सयाने हैं ॥ 

सत्ता ऐसी सुन्दरी, मेना सनहु अतीत । 
सकल बिलासी संतनु , एक अकेर लइ जीत ।१२७५। 
भावार्थ : -- सत्ता ऐसी सुन्दरी है, अपछरा है, जो मनका से भी पार गई । इसने तो सारे विलासी ऋषि मुनियों को अकेले ही जीत लिया ॥ 

सीत रितु तप भीत लहा, तपित रितु भीत सीत । 
एहि काल जन मानस की, उलट भई सब रीत ।१२७६। 
भावार्थ : -- शीत ऋतु में ताप के लिए लालायित रहता है , ताप ऋतु में शीतलता  के लिए लालायित रहता है । अद्यावधि में जन मानस की सारी रीतियाँ उलटी हो गई हैं ॥ 

टीका : -- नेता-मंत्री लोगन को देखना, कपडे ऊपर कपडे पहनकर मस्तक के अब्बिन्दु (पसीना)पोंछते रहते हैं, यह मूर्खता नहीं तो क्या है ॥ 

काइ कलेबर कलस कर मति सम्मति कर तोए । 
जेतिक आतम सात किए, तेतिक सीतल होए  ।१२७७ । 
भावार्थ : -- काया की आकृति घड़ा कर लो एवं मस्तिष्क के विचारों को जल कर लो । उस जल को जितना आत्मसात करोगे वह उतना ही शीतल होगा ॥ 

टीका : -- 'इन  कपट भेसी संतो के उबलते जल को कौन पिएगा' 

साधौ सुख संतोख मह, लोभ करन बहु बाध । 
यह तो एकै माहि सुलभ, सो सुभ हो जो आध ।१२७८। 
भावार्थ : -- सज्जनों सुख संतोष करने में है लोभ लाललुप्ता में दुःख ही दुःख है । यह सुख कोई भी विषय हो, वास्तु हो एक में ही सुलभ है और यदि आधे में ही सुलभ हो  तो सुख कल्याणकर भी हो जाता है । 

सिच्छा गहि पर ज्ञान नहि, सिखा दिए बिनु ध्यान । 
कामि लोभि मद धरमहिन, अजहुँ का जुवबान ।१२७९। 
भावार्थ : --आज का युववंत शिक्षित है किन्तु ज्ञानी नहीं है,कारण कि इसने ध्यान दिए बिना ही सीखा है, केवल पेट के लिए सीखा है  । कामी है प्रेमी नहीं है, लोभी है त्यागी नहीं है, अहंकारी है, चैतन्य नहीं है, धर्म के चरणों से अर्थात शौच तप दया दान से हिन् है, क्योंकि किसी ने सिखाया ही नहीं ॥  यह वर्त्तमान है यही कल का भविष्य भी है एवं भूत भी ॥ 

तपस चरन तपसी कहत, धर्माचरन धर्मात्म । 
तजन चरन जटिला कहत, तृतनु कहत एकात्म ।१२८० । 
भावार्थ : - तप का आचरण करने वाले तपस्वी कहलाते हैं, धर्म का आचरण करने वाले धर्मात्मा कहलाते हैं । त्याग का आचरण करने वाले संन्यासी कहलाते हैं जो यह त्रिकाय हो वही आत्म स्वरुप ईश्वर कहलाते हैं जैसे : -- शिव जी , श्रीराम 

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