सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२५॥ -----

हो जो लोकन आँधरा, तासु त जोत जगाए । 
पेट पेटारी धांधरा, कैसे नैन लगाए ।१२५१। 
भावार्थ : -- यदि दिखता न हो, कोई अंधा हो, ज्योत जगा कर उसका तो उपचार हो सकता है । किन्तु कोई धूर्त जो पेट की पिटारी का अंधा हो उसको नैन कैसे लगाएं ॥

हो मंतरी कि संतरी, सबका एक ही मंत्र । 
मर्दन मरन मारनी लग, दोहत रहु गनतंत्र ।१२५२। 
भावार्थ : -- मंत्री हो कि संत्री हो कि यंत्री हो सबका एक ही मंत्र है । जब तक गणतंत्र पूर्ण रूप से नष्ट न हो,जाए उसकी मृत्यु न हो जाए, उसकी अंत्येष्टि न हो जाए तब तक उसे दूहते रहो ॥

जोरे कलुषित कोइरे, छोरे पुन के हीर । 
प्रभुवन जोगन बिहुर कै , भगता जोगि सरीर।१२५३। 
भावार्थ : -- दोष रूपी पापों के काले कोयले को संग्रह कर लिया, पुण्य के हीरे को छोड़ दिया । प्रभु-जन की रक्षा भूल कर भक्त-सेवक अपनी ही शरीर की रक्षा में लगा है ॥

भू भू भवन भब्य रचे, लगाइ खन की लाट । 
मीच पापनी जाएगी ले ठाइ एकै खाट ।१२५४। 
भावार्थ : -- भूमि भूमि पर अधिष्ठानों की भव्य स्वरुप में रचना की, खण्डों के अम्बार लगा दिए । पापनी मृत्यु जब आएगी तब वह एकइ खाट में ले जाएगी ॥

तामा नहि लौहु नहि लौ, भगता माँगे सौन । 
एसिहुँ भुखिआ भजना कू, कानन देवे कौन ।१२५५। 
भावार्थ : -- घर में ताम्बा नहीं है, लोहा भी नहीं है, और भगत सोना मांग रहा है । हरिजन की छोड़ो ऐसे भूक्खड़ भजनों को हरि भी कान नहीं देते ॥

कर कलेवर ऐसो कर, ले नापितु दे दान । 
दान कर अभिमान न कर, करे जगत कल्यान ।१२५६। 
भावार्थ : -- हाथ की आकृति ऐसी कर लो कि वह दान ग्रहण न करे अपितु दान देवे । दान देकर अभिमान न करने पर वह दान समस्त संसार के लिए कल्याणकारी होता है ॥

 गात बन मन गुहा किये, भीत गहन अंधेर । 
जगत जाल जंजाल सन, बसाए हिंसक सेर ।१२५७। 
भावार्थ : -- शरीर को जंगल कर लिया मन को गुफा बना दिया । अंदर गहरा अन्धेरा छा रखा है । जिसमें संसार के प्रपंचों के इंद्रजाल के संग, हिंसक शेर को बसा लिया ॥

दुर्बादन बदने बदन, निकसे करकस राग । 
बादत मधुर मधुर बचन, छहो राग जहि जाग ।१२५८। 
भावार्थ : -- मुख केवल दुर्वादन कहता रहे तब उससे कराकस राग का निष्कासन होगा जो किसी को प्रिय नहीं है । मीठा मीठा बोलने पर वाणीं में छहो राग जागृत हो जाते हैं, जो शत्रु को भी वश में कर लेते हैं ॥

भेद करे ना सूर सस, भेद करे ना जोत । 
ज्ञान दान कल्यान अस हो बिकिरित चहुँ कोत ।१२५९। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार सूर्य, चन्द्र एवं दीपक की दीप्ती भेद नहीं करती वह सभी ओर विकिरित होती है । ज्ञान, दान एवं कल्याण का भी ऐसा ही स्वभाव होना चाहिए ॥

काम क्रोधमाद अरु लोभ तेरे अरि जे चार । 
और लगाई छाँड़ के, तिनते लग सौ बार ।१२६०। 
भावार्थ : -- काम, क्रोध मद और लोभ यही तेरे चार शत्रु हैं । और सारे बैर भूल कर इनसे बैर बाँधना चाहिए ॥ 







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