गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२४ ॥ -----

साख लिए फलफूल रहा, भया जगत सन मूल । 
तब तरुबर का होइ जब, गया मूल को भूल ।१२४१। 
भावार्थ : -- जगत में फलाफूला शाख हुई मूल से ही तो हुई । तब तरुवर का क्या होगा जब वह मूल कू ही भूल जाए ॥

'मूल यदि मीट्टी की नहीं सुनेगा, तो तना उसकी नहीं सुनेगा फिर शाखाएं तने की नहीं सुनेगी, शाखाओं की पत्र नहीं सुनेगा, पत्र की पुष्प नहीं सुनेगा, पुष्प की फल कहाँ से सुनेगा वो तो फूक मारते ही सिधा जाएगा,

को तो गावै आपनी, को भगवान की गाए । 
कोउ कोउ जन न जाने, किन की बकते जाए ।१२४२। 
भावार्थ : -- कोई तो अपनी ही कथा कहता रहता है कोई जनार्दन की कहता है । कोई कोई जन जाने किसकी कथा बकते जाते हैं ॥ 

एक अचरज देख्या भइ , गदहा के सिर सिंग । 
अपना 'पन' दरसाए फिर, मारे ऊँची डिंग ।१२४३। 
भावार्थ : -- एक अचरज देख्या भई, गधे के सिर पे सिंग । पैले अपना गधापन दिखाया फिर ऊँच्ची ऊँच्ची डिंग हाँके ॥ 

मील मील कि मालिकनी, खा गइ सब नदि खेत । 
गरीब जिनावर भुख मुए, फाँके कलुखित रेत ।१२४४। 
भावार्थ : -- ये मीलों की मालकीनी खा गई नदियों कू, खेतों कू ॥ बिचारे गरीब जानवर भूखे मरते इनकी 'फलाई ऐश 'खा रहे हैं ॥ 

अनुरति बिनु अनुराग नहिं, बिरती बिनु बैराग । 
लवनाई बिनु लाग नहि, अगिलाई बिनु आग ।१२४५। 
भावार्थ : -- आसक्ति बिना अनुराग नहीं होता, विरक्ति बिना वैराग्य नहीं होता । सुंदरता ( तन,मन, और धन भी ) बिना आसक्ति नहीं जगती, लगाए बिना आग नहीं लगती॥ 

माई बहु इतराइ पुत, नाउ धरि लखि निबास । 
बरे कलुख पापाचरन, किए तँह दनुपत बास ।१२४६। 
भावार्थ : -- माई ने तो बड़े इतरा का सपूत का नाम 'लक्ष्मीनिवास' रखा था (किसी की माता ने 'मोहन' रखा, किसी किसी की माई ने तो 'भगवान' ही रख दिया )। किन्तु सपूतों ने कलुषता को वरन कर पाप  आचरण को धारण किया । अब उनका शरीर दनुपत वासी हो गया ॥ 

जगत सेठ जिन जग कहे, कोउ करम के नाहि । 
वाके जस केतनिकेत, घर घर रूरत आहि ।१२४७। 
भावार्थ : -- जिन सेठों को जगत 'जगत सेठ' कहते हैं, वे किसी काम के नहीं । उनके जैसे अनेको अनेक सेठ हुवे,एवं घर घर में रुलते फिरे ॥ 

धनार्जन तबही धरम, जब हो दानाधान । 
जो दूजन बरदान दे,लखी सोइ बरदान ।१२४८। 
भावार्थ : -- 'धन अर्जन का धर्म तभी है जब वह दान स्थापन हेतु हो' लक्ष्मी तभी वरदान है जब वह दूसरों को वरदान दे अभिशाप न दे' अभिशापित धन का न दान करना चाहिए न दान ग्रहण करना चाहिए । 

दान धरमन कारन जब, निकसे चरन दुआर । 
पहिले भूखन असन दे, तिसित कंठ जल घार ।१२४९ । 
भावार्थ : -- दान धर्म के कार्य वश जब चरण घर से बहिर्गमन करें तब पहले ( स्वयं के पदुम हस्त से )प्यासे कंठ में जलार्पण कर भूखे 'जीव' को भोजन से तृप्त करें ॥ 

दिन भया कि रैनी भई, जून लोचन दरसाए । 
सत असत का भरम भेद, अंतर ज्ञान बताए ।१२५० । 
भावार्थ : -- दिन हुवा की रैन हुई यह आँखें ही दर्शाती हैं । उसी प्रकार अंतर-ज्ञान ,सत्य-असत्य के भ्रम एवं उसके भेद  का बोध कराता है ॥ 




पूस रथ हेमन हिमबर, बिदा कियो हेमंत ॥ 
आयो राज बसंत सखि, छायो राज बसंत ।। 

नौ पत फल नवल द्रुमदल भइ रितु अति रतिबंत । 
आयो राज बसंत सखि, छायो राज बसंत ।। 

पील नील नव नारंजी , केसरियो हरि कंत । 
आयो राज बसंत मन भायो राज बसंत ॥ 

नारद सारद सेष श्रुति सुर मुनि संत महंत । 
गायो राग बसंत सखि छायो राग बसंत ।। 

सारंगी संग सिंगार, रुर सुर सात सुबंत । 
गायो राग बसंत सखि छायो राग बसंत ॥ 

कास कोनिका कैसिका , कल बीना के तंत । 
गायो राग बसंत सखि छायो राग बसंत  ॥ 
                                               क्रमश: 





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