छूटे को छूटे मिले, बंधे कौन उपाए ।
झूठे को झूठे मिले, साँच कहाँ जय पाए ।१२३१।
भावार्थ : -- छूटे को छुट्टे ही मिल गए, अब ये किस उपाय से बंधेंगे । झूठों को झूठे ही मिल गए, तुम्हारा सत्य कहाँ जय प्राप्त करेगा ।।
तनिक लँगोटी पाए के, दौरें खेलन फाग ।
जोगनु बोले भाग चल चोरनु बोले लाग ।१२३२।
भावार्थ : -- थोड़े से साधन ( स्वतंत्रता) प्राप्त क्या हुवे, विलासिता भोगने के लिए दौड़ लगाने लगे ॥ प्रहरियों को भगाते हैं, चोरों से चोरी करवाते हैं ॥
साँठि धरे न गाँठि धरे, बाक़ी सुने न कोइ ।
साँठि धर धन गाँठि धरे, को की सुनै न सोइ ।१२३३।
भावार्थ : -- लोगों ने समाज को ऐसा कलुषित कर दिया है कि यदि पास में धन न हो और संपत्ति भी न हो फिर उसकी कथा कोई नहीं सुनता । यदि धन के साथ संपत्ति हरि हो जाए फिर वह किसी की नहीं सुनता ॥
धन ही जगतगुरु हो जब, धन सन भाउ अभाउ ।
धन तुले सब तुलना तब, बिगड़े जात सुभाउ ।१२३४।
भावार्थ : -- जब धन ही जगत गुरु हो जाए, धन है तो भाव है धन नहीं है तो अभाव है अर्थात ज्ञान को कोई अर्थ न होते हुवे धन के काँटे में सभी तुलनाएं हों तब धर्म कोई हो, जनम कहीं हो उसका बिगड़ना तय है, ।। अर्थात लोगों का असत्य, सत्य सिद्ध हो जाएगा,अशुद्धता ही शुद्दता होगी, क्रूरता को दया कहेंगे, दान दान न होकर कुत्सित व्यापार होगा, असुर 'ईश्वर' कहलाया जाएगा ॥ जन्म या जात बिगड़ने का अर्थ है जातक को यह भी ज्ञात नहीं होगा कि उसके जन्मदाता कौन हैं ॥
जग एक भुर भुरइया है, पथ भूरे ना जोइ ।
चौंक चौंक चिन्हित करत, घर में पैठे सोइ ।१२३५।
भावार्थ : -- यह जग एक भूल भुलैया है, चार चरण ( सत्य, शौच, दया, दान) के चौंको को चिन्हित कर जो मार्ग नहीं भूलता, वही अपने लक्ष्य तक पहुंचता है ॥
मिले गुरु जोइ आँधरा, चेरे की दे फोर ।
ऐसो सदगुर हेलियो, अंधन देइ अँजोर ।१२३६।
भावार्थ : -- यदि अंधा अर्थात अज्ञानी गुरु मिल जाए तो वह शिष्य की आँखे फोड़ के अर्थात उसके अर्जित ज्ञान को भी नष्ट कर उसे अंधा अर्थात अज्ञानी बना देता है । ऐसा सज्जन गुरु ढूंढ़ना चाहिए जो अंधे अर्थात अज्ञानी के जीवन में ज्ञान का प्रकाश भर दे ॥
किए देस को भूत भवन, पञ्च भूति के भूत ।
बातें मैं न माने तो, भगा मार दो जूत ।१२३७।
भावार्थ : -- इन पाँच तत्व के भूतों ने सारे देश को गंदा घर बना दिया । यदि ये बातों से न माने तो इन्हें लात मार कर भगा दें ॥
पापधी पुन पतियाइ न, लम्पट भाए न प्रेम ।
अलाई घाम सुहाए न, निरहीक नेमि नेम ।१२३८।
भावार्थ : -- दुर्बुद्धि दुरात्मन् को कल्याण, सुकृति, धर्म विहित कर्म पर विश्वास नहीं होता । कामी लंपटों को प्रेम नहीं भाता वे दिन रात स्त्री को ही ढूंडते रहते हैं । आलसी को धूप नहीं भाती उसे सदैव अनुकू वातावरण चाहिए, लज्जरहित, उद्दंड, निर्दयी दोष प्रकट होने पर भी जो दोष न माने उसे नियम विधान के बंधन नही सुहाते ॥
एकाइ दहाइ सैकड़ा, सहस लख कोटि कोटि ।
सुख की चादरी तब जब, रखे छोटि सन छोटि ।१२३९।
भावार्थ : -- इकाई, दहाई, सैकड़ा, सहस्त्र, लाख, करोड़ीमल, एक कोड़ीमल दूजा रोड़ीमल । ये अंक सुख की है जब इस चादरी को छोटी से छोटी रखें ॥
टीका : -- किसी कू एक रुपया का हिसाब है, किसी कू सौ का किसी कू हजार किसी कू लाख का कोणा, किसी को तो अरबों खरबों का हिसाब नहीं, बरेंगे-घुसेंगे सारे शमशान मैं जाकर, फेर ये महला क्यूँ चुनवायो है.....
चिद् घन मैं सब देह हैं, चिद् घन देह अहाहि ।
अन दरसी कहि न जाहिं, जो दरसी रहि नाहि ।१२४०।
भावार्थ : -- परमात्म स्वरुप आकाश में ही समस्त देहधारी हैं, देह धारी के अंतर में ही आकाश है । जो नर्गुण स्वरुप में अदृश्य है वही अनश्वर अंतर आत्म है जो सगुन विग्रह है वह नश्वर है ॥
झूठे को झूठे मिले, साँच कहाँ जय पाए ।१२३१।
भावार्थ : -- छूटे को छुट्टे ही मिल गए, अब ये किस उपाय से बंधेंगे । झूठों को झूठे ही मिल गए, तुम्हारा सत्य कहाँ जय प्राप्त करेगा ।।
तनिक लँगोटी पाए के, दौरें खेलन फाग ।
जोगनु बोले भाग चल चोरनु बोले लाग ।१२३२।
भावार्थ : -- थोड़े से साधन ( स्वतंत्रता) प्राप्त क्या हुवे, विलासिता भोगने के लिए दौड़ लगाने लगे ॥ प्रहरियों को भगाते हैं, चोरों से चोरी करवाते हैं ॥
साँठि धरे न गाँठि धरे, बाक़ी सुने न कोइ ।
साँठि धर धन गाँठि धरे, को की सुनै न सोइ ।१२३३।
भावार्थ : -- लोगों ने समाज को ऐसा कलुषित कर दिया है कि यदि पास में धन न हो और संपत्ति भी न हो फिर उसकी कथा कोई नहीं सुनता । यदि धन के साथ संपत्ति हरि हो जाए फिर वह किसी की नहीं सुनता ॥
धन ही जगतगुरु हो जब, धन सन भाउ अभाउ ।
धन तुले सब तुलना तब, बिगड़े जात सुभाउ ।१२३४।
भावार्थ : -- जब धन ही जगत गुरु हो जाए, धन है तो भाव है धन नहीं है तो अभाव है अर्थात ज्ञान को कोई अर्थ न होते हुवे धन के काँटे में सभी तुलनाएं हों तब धर्म कोई हो, जनम कहीं हो उसका बिगड़ना तय है, ।। अर्थात लोगों का असत्य, सत्य सिद्ध हो जाएगा,अशुद्धता ही शुद्दता होगी, क्रूरता को दया कहेंगे, दान दान न होकर कुत्सित व्यापार होगा, असुर 'ईश्वर' कहलाया जाएगा ॥ जन्म या जात बिगड़ने का अर्थ है जातक को यह भी ज्ञात नहीं होगा कि उसके जन्मदाता कौन हैं ॥
जग एक भुर भुरइया है, पथ भूरे ना जोइ ।
चौंक चौंक चिन्हित करत, घर में पैठे सोइ ।१२३५।
भावार्थ : -- यह जग एक भूल भुलैया है, चार चरण ( सत्य, शौच, दया, दान) के चौंको को चिन्हित कर जो मार्ग नहीं भूलता, वही अपने लक्ष्य तक पहुंचता है ॥
मिले गुरु जोइ आँधरा, चेरे की दे फोर ।
ऐसो सदगुर हेलियो, अंधन देइ अँजोर ।१२३६।
भावार्थ : -- यदि अंधा अर्थात अज्ञानी गुरु मिल जाए तो वह शिष्य की आँखे फोड़ के अर्थात उसके अर्जित ज्ञान को भी नष्ट कर उसे अंधा अर्थात अज्ञानी बना देता है । ऐसा सज्जन गुरु ढूंढ़ना चाहिए जो अंधे अर्थात अज्ञानी के जीवन में ज्ञान का प्रकाश भर दे ॥
किए देस को भूत भवन, पञ्च भूति के भूत ।
बातें मैं न माने तो, भगा मार दो जूत ।१२३७।
भावार्थ : -- इन पाँच तत्व के भूतों ने सारे देश को गंदा घर बना दिया । यदि ये बातों से न माने तो इन्हें लात मार कर भगा दें ॥
पापधी पुन पतियाइ न, लम्पट भाए न प्रेम ।
अलाई घाम सुहाए न, निरहीक नेमि नेम ।१२३८।
भावार्थ : -- दुर्बुद्धि दुरात्मन् को कल्याण, सुकृति, धर्म विहित कर्म पर विश्वास नहीं होता । कामी लंपटों को प्रेम नहीं भाता वे दिन रात स्त्री को ही ढूंडते रहते हैं । आलसी को धूप नहीं भाती उसे सदैव अनुकू वातावरण चाहिए, लज्जरहित, उद्दंड, निर्दयी दोष प्रकट होने पर भी जो दोष न माने उसे नियम विधान के बंधन नही सुहाते ॥
एकाइ दहाइ सैकड़ा, सहस लख कोटि कोटि ।
सुख की चादरी तब जब, रखे छोटि सन छोटि ।१२३९।
भावार्थ : -- इकाई, दहाई, सैकड़ा, सहस्त्र, लाख, करोड़ीमल, एक कोड़ीमल दूजा रोड़ीमल । ये अंक सुख की है जब इस चादरी को छोटी से छोटी रखें ॥
टीका : -- किसी कू एक रुपया का हिसाब है, किसी कू सौ का किसी कू हजार किसी कू लाख का कोणा, किसी को तो अरबों खरबों का हिसाब नहीं, बरेंगे-घुसेंगे सारे शमशान मैं जाकर, फेर ये महला क्यूँ चुनवायो है.....
चिद् घन मैं सब देह हैं, चिद् घन देह अहाहि ।
अन दरसी कहि न जाहिं, जो दरसी रहि नाहि ।१२४०।
भावार्थ : -- परमात्म स्वरुप आकाश में ही समस्त देहधारी हैं, देह धारी के अंतर में ही आकाश है । जो नर्गुण स्वरुप में अदृश्य है वही अनश्वर अंतर आत्म है जो सगुन विग्रह है वह नश्वर है ॥
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