बिय पौध भया फुर दिया बिटप भया फर छाइ ।
बिरधा मैं भया रुखड़ा, दिया जलाउन काइ ।११२१ ।
भावार्थ : -- बीज अंकुरित होकर पौधा बना तो पुष्प दिया, जब विटप बना तब फल और छाया दिया । वृद्ध हुवा तो वह सुख गया और जलावन हेतु अपनी काया ही दे दी ॥ अब और क्या बचा लेने को.....
देहि गगन रहिला किरन, रैनि मेल मलिनाइ ।
जूँ जूँ मल कन अन्हाए, तूँ तूँ उजलत जाए ।११२३।
भावार्थ : -- देह गगन है किरण उबटन(बेसन) है । जो रैनी से मिलकर मलिन हो गई ॥ जैसे जैसे किरणों की उबटन मल कर ओस के कणों से गगन नहाए, वैसे वैसे उज्वलता प्राप्त होती गई ॥
लोहन लोहान सों कटे , धारा बिष बिष धार ।
बीर बीर सोंह निपटे, बिचार सोंह बिचार ।११२४।
भावार्थ : -- लोहा ही लोहे की काट है विष धार की काट विष धार ही है /धारावृष्टी की काट जलाधार ( कूप, बावली तालाब झील आदि ) है । वीर के साथ वीर निपटता है विचारों के साथ विचार निपटते हैं ॥
सूर कहत सो एकै है, चाँद कहत सो ऐक ।
सत्कृत के कर किरन नहि, उडुगन गगन अनेक ।११२५।
भावार्थ : --जिसे सूर्य कहते वह एक ही है, जिसे चाँद कहते हैं वह भी एक ही है ॥ जिसके करकमलों में सद्कार्यों की किरणे नहीं है, गगन में वे तारें अनेकोनेक हैं ॥
जपनी लिए मुख जाप किए, फेरी दे दे फेर ।
हरि ह्रदय बास बसे तू, हेरी दे दे हेर ।११२६।
भावार्थ : -- जप माला लिए मुख से जाप करता तू उसे फेरते हुवे फेरियाँ दे रहा है ॥ ईश्वर तेरे ह्रदय निवास में बसे ,हैं तू उसे ढूंढ़ता हेरियाँ दे रहा है ॥
मँगता फिरै गली गली, भर सहस स्वांग ।
धन मत वाकू दीजीए, जाकी पूरी माँग ।११२७।
भावार्थ : - सहस्रों स्वांग भर कर मंगाते गली गली फिर रहे हैं । इनको केवल कपडे-लत्ते, दाना-पानी देने चाहिए । परिमार्जित अर्जन एवं मत उसी को प्रदान कीजिए , जिसका मन पूर्णकामी होकर संतुष्ट हो गया हो ॥ यदि ऐसे मन का स्वामी न मिले तो मत दीजिए ॥
बिषयासक्ति को बस मैं, कारै जोगाचार ।
बिषया बिरक्ति होवती , बैरागी आधार ।११२८।
भावार्थ : - योग का आचरण विषयों के प्रति आसक्ति को नियंत्रित करता है । विषयों के प्रति विरक्ति वैराग्य पर आधारित होती है ॥ अर्थात योगी एवं वैरागी में अंतर है ॥ विषय भोग में अरुचि विरक्ति है, रूचि में नियंत्रण योग है ॥
जो कल थे सो अजहुँ नहि, जो हैं सो कल जाहिं ।
हैं सो का लेइ जहिं जब, थे सो ले गए नाहिं ।११२९।
भावार्थ : -- जो कल थे वो आज नहीं ,
जो आज हैं वे कल जाएंगे ।
जो थे वे कुछ ले गए नहीं
हैं वे क्या ले जाएँगे ॥
भरन भवन भाव भूति धरे, गरब करे मन माहिं ।
आए तो कछु लाए नहीं, बहुरत का ले जाहिं ।११३०।
भावार्थ : - दुन्या भर की दौलत रखे, ज़र दार सानगुमानी में ।
आए तो कुछ,लाए नहीं, जाएंगे जब क्या ले जाएंगे ॥
हरिअर आँचरी मुख करी, हरिअर चुनरी ढारि ।
घन भरि घघरी सिरु धरी, चरि डगरी पनहारि ॥
पगपरि झाँझरी घरि घरि, तरि तरि झन झन कारि ।
कटि धरि तगरी कह लरी, अरी हरि सोंह हारि ॥
सगरी सगरी सागरी, सरौ सिखर कर देइ ।
कमन कोदंड कर्तरि, करकरि करक निहारि ॥
देहि गगन रहिला किरन, रैनि मेल मलिनाइ ।
जूँ जूँ मल कन अन्हाए, तूँ तूँ उजलत जाए ।११२३।
भावार्थ : -- देह गगन है किरण उबटन(बेसन) है । जो रैनी से मिलकर मलिन हो गई ॥ जैसे जैसे किरणों की उबटन मल कर ओस के कणों से गगन नहाए, वैसे वैसे उज्वलता प्राप्त होती गई ॥
लोहन लोहान सों कटे , धारा बिष बिष धार ।
बीर बीर सोंह निपटे, बिचार सोंह बिचार ।११२४।
भावार्थ : -- लोहा ही लोहे की काट है विष धार की काट विष धार ही है /धारावृष्टी की काट जलाधार ( कूप, बावली तालाब झील आदि ) है । वीर के साथ वीर निपटता है विचारों के साथ विचार निपटते हैं ॥
सूर कहत सो एकै है, चाँद कहत सो ऐक ।
सत्कृत के कर किरन नहि, उडुगन गगन अनेक ।११२५।
भावार्थ : --जिसे सूर्य कहते वह एक ही है, जिसे चाँद कहते हैं वह भी एक ही है ॥ जिसके करकमलों में सद्कार्यों की किरणे नहीं है, गगन में वे तारें अनेकोनेक हैं ॥
जपनी लिए मुख जाप किए, फेरी दे दे फेर ।
हरि ह्रदय बास बसे तू, हेरी दे दे हेर ।११२६।
भावार्थ : -- जप माला लिए मुख से जाप करता तू उसे फेरते हुवे फेरियाँ दे रहा है ॥ ईश्वर तेरे ह्रदय निवास में बसे ,हैं तू उसे ढूंढ़ता हेरियाँ दे रहा है ॥
मँगता फिरै गली गली, भर सहस स्वांग ।
धन मत वाकू दीजीए, जाकी पूरी माँग ।११२७।
भावार्थ : - सहस्रों स्वांग भर कर मंगाते गली गली फिर रहे हैं । इनको केवल कपडे-लत्ते, दाना-पानी देने चाहिए । परिमार्जित अर्जन एवं मत उसी को प्रदान कीजिए , जिसका मन पूर्णकामी होकर संतुष्ट हो गया हो ॥ यदि ऐसे मन का स्वामी न मिले तो मत दीजिए ॥
बिषयासक्ति को बस मैं, कारै जोगाचार ।
बिषया बिरक्ति होवती , बैरागी आधार ।११२८।
भावार्थ : - योग का आचरण विषयों के प्रति आसक्ति को नियंत्रित करता है । विषयों के प्रति विरक्ति वैराग्य पर आधारित होती है ॥ अर्थात योगी एवं वैरागी में अंतर है ॥ विषय भोग में अरुचि विरक्ति है, रूचि में नियंत्रण योग है ॥
जो कल थे सो अजहुँ नहि, जो हैं सो कल जाहिं ।
हैं सो का लेइ जहिं जब, थे सो ले गए नाहिं ।११२९।
भावार्थ : -- जो कल थे वो आज नहीं ,
जो आज हैं वे कल जाएंगे ।
जो थे वे कुछ ले गए नहीं
हैं वे क्या ले जाएँगे ॥
भरन भवन भाव भूति धरे, गरब करे मन माहिं ।
आए तो कछु लाए नहीं, बहुरत का ले जाहिं ।११३०।
भावार्थ : - दुन्या भर की दौलत रखे, ज़र दार सानगुमानी में ।
आए तो कुछ,लाए नहीं, जाएंगे जब क्या ले जाएंगे ॥
हरिअर आँचरी मुख करी, हरिअर चुनरी ढारि ।
घन भरि घघरी सिरु धरी, चरि डगरी पनहारि ॥
पगपरि झाँझरी घरि घरि, तरि तरि झन झन कारि ।
कटि धरि तगरी कह लरी, अरी हरि सोंह हारि ॥
सगरी सगरी सागरी, सरौ सिखर कर देइ ।
कमन कोदंड कर्तरि, करकरि करक निहारि ॥
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