शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२० ॥ -----

बिय पौध भया फुर दिया बिटप भया फर छाइ । 
बिरधा मैं भया रुखड़ा, दिया जलाउन काइ ।११२१ । 
भावार्थ : -- बीज अंकुरित होकर पौधा बना तो पुष्प दिया, जब विटप बना तब फल और छाया दिया । वृद्ध हुवा तो वह सुख गया और जलावन हेतु अपनी काया ही दे दी ॥ अब और क्या बचा लेने को.....

देहि गगन रहिला किरन, रैनि मेल मलिनाइ । 
जूँ जूँ मल कन अन्हाए, तूँ तूँ उजलत जाए ।११२३। 
भावार्थ : -- देह गगन है किरण उबटन(बेसन) है । जो रैनी से मिलकर मलिन हो गई ॥ जैसे जैसे किरणों की उबटन मल कर ओस के कणों से गगन नहाए,  वैसे वैसे उज्वलता प्राप्त होती गई ॥ 

लोहन लोहान सों कटे , धारा बिष बिष धार । 
बीर बीर सोंह निपटे, बिचार सोंह बिचार ।११२४। 
भावार्थ : -- लोहा ही लोहे की काट है विष धार की काट विष धार ही है /धारावृष्टी की काट जलाधार ( कूप, बावली तालाब झील आदि ) है । वीर के साथ वीर निपटता है विचारों के साथ विचार निपटते हैं ॥ 

सूर कहत सो एकै है, चाँद कहत सो ऐक । 
सत्कृत के कर किरन नहि, उडुगन गगन अनेक ।११२५। 
भावार्थ : --जिसे सूर्य कहते वह एक ही है, जिसे चाँद कहते हैं वह भी एक ही है ॥ जिसके करकमलों में सद्कार्यों की किरणे नहीं है, गगन में वे तारें अनेकोनेक हैं ॥ 

जपनी लिए मुख जाप किए, फेरी दे दे फेर । 
हरि ह्रदय बास बसे तू, हेरी दे दे हेर ।११२६। 
भावार्थ : -- जप माला लिए मुख से जाप करता तू उसे फेरते हुवे फेरियाँ दे रहा है ॥ ईश्वर तेरे ह्रदय  निवास में बसे ,हैं तू उसे ढूंढ़ता हेरियाँ दे रहा है ॥ 

मँगता फिरै गली गली, भर सहस स्वांग । 
धन मत वाकू दीजीए, जाकी पूरी माँग ।११२७।  
भावार्थ : - सहस्रों स्वांग भर कर मंगाते गली गली फिर रहे हैं । इनको केवल कपडे-लत्ते, दाना-पानी देने चाहिए । परिमार्जित अर्जन एवं मत उसी को प्रदान कीजिए , जिसका मन पूर्णकामी होकर संतुष्ट हो गया हो ॥ यदि ऐसे मन का स्वामी न मिले तो मत दीजिए ॥ 

बिषयासक्ति को बस मैं, कारै जोगाचार । 
बिषया बिरक्ति होवती , बैरागी आधार ।११२८। 
भावार्थ : - योग का आचरण विषयों के प्रति आसक्ति को नियंत्रित करता है । विषयों के प्रति विरक्ति वैराग्य पर आधारित होती है ॥ अर्थात योगी एवं वैरागी में अंतर है ॥ विषय भोग में अरुचि विरक्ति है, रूचि में नियंत्रण योग है ॥ 

जो कल थे सो अजहुँ नहि, जो हैं सो कल जाहिं । 
हैं सो का लेइ जहिं जब, थे सो ले गए नाहिं ।११२९। 
भावार्थ : -- जो कल थे वो आज नहीं , 
                 जो आज हैं वे कल जाएंगे । 
                जो थे वे कुछ ले गए नहीं 
                 हैं वे क्या ले जाएँगे ॥ 
भरन भवन भाव भूति धरे, गरब करे मन माहिं । 
आए तो कछु लाए नहीं, बहुरत का ले जाहिं ।११३०। 
भावार्थ : - दुन्या भर की दौलत रखे, ज़र दार सानगुमानी में । 
                आए तो कुछ,लाए नहीं, जाएंगे जब क्या ले जाएंगे ॥ 

हरिअर आँचरी मुख करी, हरिअर चुनरी ढारि । 
घन भरि घघरी सिरु धरी, चरि डगरी पनहारि ॥ 

पगपरि झाँझरी घरि घरि, तरि तरि झन झन कारि । 
कटि धरि तगरी कह लरी, अरी हरि सोंह हारि ॥ 

सगरी सगरी सागरी, सरौ सिखर कर देइ । 
कमन कोदंड कर्तरि, करकरि करक निहारि ॥ 



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