कौड़ी कौड़ी जोग के, जोगे लाख करोड़ ।
काल कौरे लागा चल, बैठ काठ के घोड़ । १२९१-क ।
हिरनी हंस खांच जोइ रचि मनि मंजरि ठोर ।
तैने चौड़े फूँक के , ले गए सगे बटोर । १२९१-ख ।
भावार्थ : -- कौड़ी कौड़ी की प्रतीक्षा कर लाख करोड़ को तो जोड़ लिया । अब ये पापणी मीच घात लगाए बैठी है, चल तू काठ की चिता पर बैठ ॥
सोना-चाँदी खांच के मणियों की लड़ियाँ लगा के महला तो रच लियो । देख थारे सगे थाणे चौड़े माने की सब के सामने फूँक रहे हैं । फिर क्या ले गए थारो जोड़..... बटोर के ॥
सुबरन हेतु सबहि बिषय, धन धामन बर बाहि ।
अर्थाधारि अछूत हुँत, खादन अन्नहु नाहि ।१२९२- क ।
भावार्थ : -- अर्थ के आधार पर विभक्त चातुर वर्ण के स्वर्ण अर्थात उच्च एवं उच्चतम वर्ग हेतु भोग के सभी विषय हैं, सुन्दर अट्टालिकाएं है उत्तम-उत्तम वस्त्र हैं, द्रुत गति वाले वाहन हैं । किन्तु अत्यंज हेतु खाने को अन्न भी नहीं है । छी ! आक !! इन अछूतों को छुवेगा भी कौन ॥
अर्थाधारी छत्री हैं कि कोल्हू के बैल ।
बनि सरसौं कृत निकासै, शासक वासे तैल ।१२९२- क ।
भावार्थ : -- अर्थाधारित चातुर वर्ण में विभक्त यह क्षत्रिय अर्थात मध्यम वर्ग हैं कि कुहू के बेल हैं । यह शासक है की तेली है जो छोटे छोटे व्यापारियों को सरसों बना के उनका तेल निकाल रहा है रहा है ॥
को धन से अति दीन है, को है बहुतहि पीन ।
को माया के दास है, तुलसी राम अधीन ।१२९३ -क ।
भावार्थ : -- कोई धन से अत्यधिक दीन है, कोई बहुंत ही परिपुष्ट है ॥ कोई माया के दास हैं गोस्वामी तुलसी दास भगवान श्रीराम के अधीन हैं ॥
श्रुतिहि बित्त मैं भारती पहले रहे बहु पीन ।
न जान को कारन बस, सनै सनै भए दीन ।१२९३-ख ।
भावार्थ : - प्राग समय में भारतीय जन मानस पठान पठान चिंतन मनन में अत्यधिक परिपुष्ट थे । कालांतर में जाने किस कारन के वशीभूत होकर वह धीरे धीरे दरिद्र होते गए ॥ कांतार में संस्कृत भाषा भी उन्हें दुरूह लगने लगी ॥
रामायन श्री ग्रन्थ के, तुलसी किए अनुवाद ।
अवधी के उपजोग कर, भयउ सरल संवाद ।१२९४-क ।
भावार्थ : -- फिर गोस्वामी तुलसी दास ने रामायण के श्री ग्रन्थ का गुणानुवाद किया । और अवधी बोली का सुन्दर उपयोग कर उसके संवादों को सरल कर दिया ॥ अब वह श्री ग्रन्थ लोगों को सरलता पूर्वक समझ में आने लगा ॥
प्रभु राम के सकल चरित्र मानस मैं संजोए ।
तुलसी श्री हरि कीरतन, फिर तौ घर घर होए ।१२९४-ख।
भावार्थ : -- जब से गोस्वामी तुलसी दास ने प्रभु श्री राम चन्द्र जी के पावन चरित्र को मांस में संकलित किया । तब श्री हरि का भजन एवं कीर्तन घर घर होने लगा ॥
केतु पति के फेर फिरत फेरे केतक साल ।
धरनि के अस फेर फिरत, फिरे नही कभु काल ।१२९५।
भ्वर्थ : -- सूर्य का परिभ्रमण करते हुवे पृथ्वी ने जाने कितने ही वर्ष परिवर्तित कर युग परिवर्तित किया । किंतु यह केवल एक भ्रान्ति मात्र है पृथ्वी के परिभर्मण करने से क्या कभी समय परिवर्तित होता है ॥
सोई दिवस सोई रयन, सोई दोई पाख ।
निज फिरे बिनु किछु न फिरे, जतन करो चह लाख ।१२९५ ।
भावार्थ : -- दिवस भी वही है रयनी भी वही दो पक्ष भी वही हैं । परिवर्तन किसका होता है.....? परिस्थिति का अवस्था अथवा आयु का । काल का परिवर्तन परिस्थिति अवस्था अथवा आयु पर निर्भर है । जब तक स्वयं में सदपरिवर्तन नहीं होगा फिर चाहे कितना ही यत्न कर लो कुछ भी परिवर्तित नहीं होगा समय भी परिवर्तित नहीं होगा ॥
प्रत्येक व्यक्ति यदि स्वयं में सद परिवर्तन करे व्यवस्था स्वत: परिवर्तित हो जाएगी । अन्यथा जो है जैसा है जहां है उसे वही रहने दो ॥
सुबारथ बसीभूत हो करे बहुंत ही पाप ।
तबहि को फेर फिरे जब, फेरे आपनि आप ।१२९६ ।
भावार्थ : -- स्वार्थों के वशीभूत होकर हम जाने कितने ही दुष्कर्म करते चले जाते हैं ॥ जब हम स्वयं में सद्परिवर्तन करेंगे तभी कुछ परिवर्तित होगा ॥
अन्यथा ढाक के वही तीन पात .....कौन कौन से है ये तीन पात.....ऐसे छद्म लोकतंत्र से तो राजतन्त्र ही अच्छा ही ॥
क्यों अच्छा है : --
>> उसमें बलात्कार नहीं होते थे, कहीं से साड़ी आ ही जाती थी ।
>> उसमें राजा स्वयं युद्ध करता था ।
>> पारस्थितिक संतुलन का चिंतन करते हुवे जान गणना के साथ जीव जंतुओं की भी गणना होती थी
>> धन धन होता था काला पीला नहीं था देश के भर नहीं जाता था ।
>> राजा स्वयं न्यायाधीश होता था, न्याय पक्षपातपूर्ण तो होता था किन्तु बिकाऊ नहीं होता था । यहन तो न्याय के साथ अन्याय भी बिकाऊ है ।
कामि कमिता फेर फिरे, फिरे न कद आचार ।
कछु फिरावनु सों पहिले, आपुनापा सुधार ।१२९७ ।
भावार्थ : - कामी लम्पट दुष्ट दुराचारी को ही बदलते रहे ।एक कदाचारी गया तो दूसरा आ गया, पर कदाचार नहीं गया ॥ कुछ परिवर्तन करने से पहले अपनेआप को सुधारे ॥
अन्यथा जो है, जहां है, जैसा है.....वैसा ही रहने दें.....
मनमोहन को मत फेर मन के मनके फेर .....समझे..... दातार.....इन दातारों के आगे तो दानवीर कर्ण भी फेल है.....
बीच हाट पसारा धर, बेचे पंच न्याय ।
जोर कमाई जोइ किए, कहँ धरे सोइ आए ।१५९८ ।
भवार्थ : -- हाट बीच पसारा पसार के न्यायधीश न्याय बेच रहे हैं । जो भारी कमाई से जो धन प्राप्त हुवा है कहो तो उसे कहाँ रखा है ॥
निज निज सीवँ भीत रहे, अनुसासित जहँ लोग ।
पावहि सुखहि तहँ न होत, न भय न सोक न रोग ।१५९९ ।
भावार्थ : -- जहाँ का जन -मानस अपनी अपनी सीमाओं के भीतर अनुशासित रहता हैं । वहां वह सदा सुखों को प्राप्त करता ही , उसे वहां किसी भी प्रकार का भय, शोक व् रोग नहीं होता ॥
काल दर्पन रूप अहै, मलिनए देस मलान ।
चेत अचेतन जगत के, बयस ही छबि समान ।१६००।
भावार्थ : - समय यदि अर्पण ही तो देश/स्थान उसपर मली हुई मलिनता है । जिसमें चराचर जगत की अवस्था छवि रूप में दर्शित होती है ॥
छवि फिरने से दिन नहीं बहुरते, दिन बहुराने के लिए समय रूपी दर्पण को फेरना होगा ॥
तज तप तन हेतु , ।
सत पातक सोधन हेतु , दान हेतु कल्यान ।।
भावार्थ : -- त्याग एवं तपस्या स्वयं के हित हेतु है, दान परहित हेतु है । सत्य पातकों के परिष्करण हेतु है, ॥
अजगित जोत लौ लगन जगाए , किरन बुझावत सूर ।
लहकन लस लवन जगाए
सुरमई साँझ लिख सिख सजाए, केस रचन सैंदूर ।
स्याम बरन घन केस बनाए, कल कलियन कर कूर ॥
उडुगन ज्योतिर गगन जगाए, मयंक मंद मयूख ।
बियाकुल निदरा सपन जगाए, सयन मगन प्रत्यूख ॥
बिहग निज केतन बहुराए, बिथकत पंख बितान ।
बियत भूति जगलग छाए, भयउ बिगत दिनमान ॥
उदक पुरन परिपूरन जगाए, तरत तरंग
रत रतनारतन जगाए
जगन जोति नयन जगाए, किरन जगावत सूर ।
रति रति रति बंत रवन जगाए, भयो प्रभात सुदूर ॥
लावनी श्रीमन् रमन जगाए, रवनत मधुर नुपूर ।
इत ईँधन लगन लगाए, दिए तंदुल मधुधूर ।
पयसन चूलनन्हि चढ़ाए, दूलन पोबत पूर ॥
काल कौरे लागा चल, बैठ काठ के घोड़ । १२९१-क ।
हिरनी हंस खांच जोइ रचि मनि मंजरि ठोर ।
तैने चौड़े फूँक के , ले गए सगे बटोर । १२९१-ख ।
भावार्थ : -- कौड़ी कौड़ी की प्रतीक्षा कर लाख करोड़ को तो जोड़ लिया । अब ये पापणी मीच घात लगाए बैठी है, चल तू काठ की चिता पर बैठ ॥
सोना-चाँदी खांच के मणियों की लड़ियाँ लगा के महला तो रच लियो । देख थारे सगे थाणे चौड़े माने की सब के सामने फूँक रहे हैं । फिर क्या ले गए थारो जोड़..... बटोर के ॥
सुबरन हेतु सबहि बिषय, धन धामन बर बाहि ।
अर्थाधारि अछूत हुँत, खादन अन्नहु नाहि ।१२९२- क ।
भावार्थ : -- अर्थ के आधार पर विभक्त चातुर वर्ण के स्वर्ण अर्थात उच्च एवं उच्चतम वर्ग हेतु भोग के सभी विषय हैं, सुन्दर अट्टालिकाएं है उत्तम-उत्तम वस्त्र हैं, द्रुत गति वाले वाहन हैं । किन्तु अत्यंज हेतु खाने को अन्न भी नहीं है । छी ! आक !! इन अछूतों को छुवेगा भी कौन ॥
अर्थाधारी छत्री हैं कि कोल्हू के बैल ।
बनि सरसौं कृत निकासै, शासक वासे तैल ।१२९२- क ।
भावार्थ : -- अर्थाधारित चातुर वर्ण में विभक्त यह क्षत्रिय अर्थात मध्यम वर्ग हैं कि कुहू के बेल हैं । यह शासक है की तेली है जो छोटे छोटे व्यापारियों को सरसों बना के उनका तेल निकाल रहा है रहा है ॥
को धन से अति दीन है, को है बहुतहि पीन ।
को माया के दास है, तुलसी राम अधीन ।१२९३ -क ।
भावार्थ : -- कोई धन से अत्यधिक दीन है, कोई बहुंत ही परिपुष्ट है ॥ कोई माया के दास हैं गोस्वामी तुलसी दास भगवान श्रीराम के अधीन हैं ॥
श्रुतिहि बित्त मैं भारती पहले रहे बहु पीन ।
न जान को कारन बस, सनै सनै भए दीन ।१२९३-ख ।
भावार्थ : - प्राग समय में भारतीय जन मानस पठान पठान चिंतन मनन में अत्यधिक परिपुष्ट थे । कालांतर में जाने किस कारन के वशीभूत होकर वह धीरे धीरे दरिद्र होते गए ॥ कांतार में संस्कृत भाषा भी उन्हें दुरूह लगने लगी ॥
रामायन श्री ग्रन्थ के, तुलसी किए अनुवाद ।
अवधी के उपजोग कर, भयउ सरल संवाद ।१२९४-क ।
भावार्थ : -- फिर गोस्वामी तुलसी दास ने रामायण के श्री ग्रन्थ का गुणानुवाद किया । और अवधी बोली का सुन्दर उपयोग कर उसके संवादों को सरल कर दिया ॥ अब वह श्री ग्रन्थ लोगों को सरलता पूर्वक समझ में आने लगा ॥
प्रभु राम के सकल चरित्र मानस मैं संजोए ।
तुलसी श्री हरि कीरतन, फिर तौ घर घर होए ।१२९४-ख।
भावार्थ : -- जब से गोस्वामी तुलसी दास ने प्रभु श्री राम चन्द्र जी के पावन चरित्र को मांस में संकलित किया । तब श्री हरि का भजन एवं कीर्तन घर घर होने लगा ॥
केतु पति के फेर फिरत फेरे केतक साल ।
धरनि के अस फेर फिरत, फिरे नही कभु काल ।१२९५।
भ्वर्थ : -- सूर्य का परिभ्रमण करते हुवे पृथ्वी ने जाने कितने ही वर्ष परिवर्तित कर युग परिवर्तित किया । किंतु यह केवल एक भ्रान्ति मात्र है पृथ्वी के परिभर्मण करने से क्या कभी समय परिवर्तित होता है ॥
सोई दिवस सोई रयन, सोई दोई पाख ।
निज फिरे बिनु किछु न फिरे, जतन करो चह लाख ।१२९५ ।
भावार्थ : -- दिवस भी वही है रयनी भी वही दो पक्ष भी वही हैं । परिवर्तन किसका होता है.....? परिस्थिति का अवस्था अथवा आयु का । काल का परिवर्तन परिस्थिति अवस्था अथवा आयु पर निर्भर है । जब तक स्वयं में सदपरिवर्तन नहीं होगा फिर चाहे कितना ही यत्न कर लो कुछ भी परिवर्तित नहीं होगा समय भी परिवर्तित नहीं होगा ॥
प्रत्येक व्यक्ति यदि स्वयं में सद परिवर्तन करे व्यवस्था स्वत: परिवर्तित हो जाएगी । अन्यथा जो है जैसा है जहां है उसे वही रहने दो ॥
सुबारथ बसीभूत हो करे बहुंत ही पाप ।
तबहि को फेर फिरे जब, फेरे आपनि आप ।१२९६ ।
भावार्थ : -- स्वार्थों के वशीभूत होकर हम जाने कितने ही दुष्कर्म करते चले जाते हैं ॥ जब हम स्वयं में सद्परिवर्तन करेंगे तभी कुछ परिवर्तित होगा ॥
अन्यथा ढाक के वही तीन पात .....कौन कौन से है ये तीन पात.....ऐसे छद्म लोकतंत्र से तो राजतन्त्र ही अच्छा ही ॥
क्यों अच्छा है : --
>> उसमें बलात्कार नहीं होते थे, कहीं से साड़ी आ ही जाती थी ।
>> उसमें राजा स्वयं युद्ध करता था ।
>> पारस्थितिक संतुलन का चिंतन करते हुवे जान गणना के साथ जीव जंतुओं की भी गणना होती थी
>> धन धन होता था काला पीला नहीं था देश के भर नहीं जाता था ।
>> राजा स्वयं न्यायाधीश होता था, न्याय पक्षपातपूर्ण तो होता था किन्तु बिकाऊ नहीं होता था । यहन तो न्याय के साथ अन्याय भी बिकाऊ है ।
कामि कमिता फेर फिरे, फिरे न कद आचार ।
कछु फिरावनु सों पहिले, आपुनापा सुधार ।१२९७ ।
भावार्थ : - कामी लम्पट दुष्ट दुराचारी को ही बदलते रहे ।एक कदाचारी गया तो दूसरा आ गया, पर कदाचार नहीं गया ॥ कुछ परिवर्तन करने से पहले अपनेआप को सुधारे ॥
अन्यथा जो है, जहां है, जैसा है.....वैसा ही रहने दें.....
मनमोहन को मत फेर मन के मनके फेर .....समझे..... दातार.....इन दातारों के आगे तो दानवीर कर्ण भी फेल है.....
बीच हाट पसारा धर, बेचे पंच न्याय ।
जोर कमाई जोइ किए, कहँ धरे सोइ आए ।१५९८ ।
भवार्थ : -- हाट बीच पसारा पसार के न्यायधीश न्याय बेच रहे हैं । जो भारी कमाई से जो धन प्राप्त हुवा है कहो तो उसे कहाँ रखा है ॥
निज निज सीवँ भीत रहे, अनुसासित जहँ लोग ।
पावहि सुखहि तहँ न होत, न भय न सोक न रोग ।१५९९ ।
भावार्थ : -- जहाँ का जन -मानस अपनी अपनी सीमाओं के भीतर अनुशासित रहता हैं । वहां वह सदा सुखों को प्राप्त करता ही , उसे वहां किसी भी प्रकार का भय, शोक व् रोग नहीं होता ॥
काल दर्पन रूप अहै, मलिनए देस मलान ।
चेत अचेतन जगत के, बयस ही छबि समान ।१६००।
भावार्थ : - समय यदि अर्पण ही तो देश/स्थान उसपर मली हुई मलिनता है । जिसमें चराचर जगत की अवस्था छवि रूप में दर्शित होती है ॥
छवि फिरने से दिन नहीं बहुरते, दिन बहुराने के लिए समय रूपी दर्पण को फेरना होगा ॥
तज तप तन हेतु , ।
सत पातक सोधन हेतु , दान हेतु कल्यान ।।
भावार्थ : -- त्याग एवं तपस्या स्वयं के हित हेतु है, दान परहित हेतु है । सत्य पातकों के परिष्करण हेतु है, ॥
अजगित जोत लौ लगन जगाए , किरन बुझावत सूर ।
लहकन लस लवन जगाए
सुरमई साँझ लिख सिख सजाए, केस रचन सैंदूर ।
स्याम बरन घन केस बनाए, कल कलियन कर कूर ॥
उडुगन ज्योतिर गगन जगाए, मयंक मंद मयूख ।
बियाकुल निदरा सपन जगाए, सयन मगन प्रत्यूख ॥
बिहग निज केतन बहुराए, बिथकत पंख बितान ।
बियत भूति जगलग छाए, भयउ बिगत दिनमान ॥
उदक पुरन परिपूरन जगाए, तरत तरंग
रत रतनारतन जगाए
जगन जोति नयन जगाए, किरन जगावत सूर ।
रति रति रति बंत रवन जगाए, भयो प्रभात सुदूर ॥
लावनी श्रीमन् रमन जगाए, रवनत मधुर नुपूर ।
इत ईँधन लगन लगाए, दिए तंदुल मधुधूर ।
पयसन चूलनन्हि चढ़ाए, दूलन पोबत पूर ॥