शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२९॥ -----

कौड़ी कौड़ी जोग के, जोगे लाख करोड़ । 
काल कौरे लागा चल, बैठ काठ के घोड़ । १२९१-क । 

हिरनी हंस खांच जोइ रचि मनि मंजरि ठोर । 
तैने चौड़े फूँक के , ले गए सगे बटोर । १२९१-ख ।  

भावार्थ : -- कौड़ी कौड़ी की प्रतीक्षा कर लाख करोड़ को तो जोड़ लिया । अब ये पापणी मीच घात लगाए बैठी है, चल तू काठ की चिता पर बैठ ॥ 

सोना-चाँदी खांच के मणियों की लड़ियाँ लगा के महला तो रच लियो । देख थारे सगे थाणे चौड़े माने की सब के सामने फूँक रहे हैं । फिर क्या ले गए थारो जोड़..... बटोर के ॥ 

सुबरन हेतु सबहि बिषय, धन धामन बर बाहि । 
अर्थाधारि अछूत हुँत, खादन अन्नहु नाहि ।१२९२- क । 
भावार्थ : -- अर्थ के आधार पर विभक्त चातुर वर्ण के स्वर्ण अर्थात उच्च एवं उच्चतम वर्ग हेतु भोग के सभी विषय हैं, सुन्दर अट्टालिकाएं है उत्तम-उत्तम वस्त्र हैं, द्रुत गति वाले वाहन हैं ।  किन्तु अत्यंज हेतु खाने को अन्न भी नहीं है ।  छी ! आक !! इन अछूतों को छुवेगा भी कौन ॥ 

अर्थाधारी छत्री हैं कि कोल्हू के बैल । 
बनि सरसौं कृत निकासै, शासक वासे तैल ।१२९२- क । 
भावार्थ : -- अर्थाधारित चातुर वर्ण में विभक्त यह क्षत्रिय अर्थात मध्यम वर्ग हैं कि कुहू के बेल हैं । यह शासक है की तेली है जो छोटे छोटे व्यापारियों को सरसों बना के उनका तेल निकाल रहा है रहा है ॥ 

को धन से अति दीन है, को है बहुतहि पीन । 
को माया के दास है, तुलसी राम अधीन ।१२९३ -क । 
भावार्थ : -- कोई धन से अत्यधिक दीन है, कोई बहुंत ही परिपुष्ट है ॥ कोई माया के दास हैं गोस्वामी तुलसी दास भगवान श्रीराम के अधीन हैं ॥

श्रुतिहि बित्त मैं भारती पहले रहे बहु पीन । 
न जान को कारन बस, सनै सनै भए दीन ।१२९३-ख । 
भावार्थ : - प्राग समय में भारतीय जन मानस पठान पठान चिंतन मनन में अत्यधिक परिपुष्ट थे । कालांतर में जाने किस कारन के वशीभूत होकर वह धीरे धीरे दरिद्र होते गए ॥ कांतार में संस्कृत भाषा भी उन्हें दुरूह लगने लगी ॥

रामायन श्री ग्रन्थ के, तुलसी किए अनुवाद । 
अवधी के उपजोग कर, भयउ सरल संवाद ।१२९४-क । 
भावार्थ : -- फिर  गोस्वामी तुलसी दास ने रामायण के श्री ग्रन्थ का गुणानुवाद किया । और अवधी बोली का सुन्दर उपयोग कर उसके संवादों को सरल कर दिया ॥ अब वह श्री ग्रन्थ लोगों को सरलता पूर्वक समझ में आने लगा ॥

प्रभु राम के सकल चरित्र  मानस मैं संजोए । 
तुलसी श्री हरि कीरतन, फिर तौ घर घर होए ।१२९४-ख।   
भावार्थ : --  जब से गोस्वामी तुलसी दास ने प्रभु श्री राम चन्द्र जी के पावन चरित्र को मांस में संकलित किया । तब श्री हरि का भजन एवं कीर्तन घर घर होने लगा ॥ 

केतु पति के फेर फिरत  फेरे केतक साल । 
धरनि  के अस फेर फिरत, फिरे  नही कभु  काल ।१२९५। 
भ्वर्थ : -- सूर्य का परिभ्रमण करते हुवे पृथ्वी ने जाने कितने ही वर्ष परिवर्तित कर युग  परिवर्तित किया । किंतु  यह केवल एक  भ्रान्ति मात्र है पृथ्वी  के परिभर्मण करने से क्या कभी समय परिवर्तित होता है  ॥ 

सोई दिवस सोई रयन, सोई दोई पाख । 
निज फिरे बिनु किछु न फिरे, जतन करो चह लाख ।१२९५ । 
भावार्थ : -- दिवस भी वही है रयनी भी वही दो पक्ष भी वही हैं । परिवर्तन किसका होता है.....?  परिस्थिति का अवस्था अथवा आयु का ।  काल  का परिवर्तन परिस्थिति अवस्था अथवा आयु पर निर्भर है । जब तक स्वयं में सदपरिवर्तन नहीं होगा फिर चाहे कितना ही यत्न कर लो कुछ भी परिवर्तित नहीं होगा समय भी परिवर्तित नहीं होगा ॥ 

प्रत्येक व्यक्ति यदि स्वयं में सद परिवर्तन करे व्यवस्था स्वत: परिवर्तित हो जाएगी । अन्यथा जो है जैसा है जहां है उसे वही रहने दो ॥  

सुबारथ बसीभूत हो करे बहुंत ही पाप । 
तबहि को फेर फिरे जब, फेरे आपनि आप ।१२९६ । 

भावार्थ : -- स्वार्थों के वशीभूत होकर हम जाने कितने ही दुष्कर्म करते चले जाते हैं ॥ जब हम स्वयं में सद्परिवर्तन करेंगे तभी कुछ परिवर्तित होगा ॥ 

अन्यथा ढाक के वही तीन पात .....कौन कौन से है ये तीन पात.....ऐसे छद्म लोकतंत्र से तो राजतन्त्र ही अच्छा ही ॥
क्यों अच्छा है : -- 

>> उसमें बलात्कार नहीं होते थे, कहीं से साड़ी आ ही जाती थी ।  

>> उसमें राजा स्वयं युद्ध करता था ।  

>>  पारस्थितिक संतुलन का चिंतन करते  हुवे जान गणना के साथ जीव जंतुओं की भी गणना होती थी 

>> धन धन होता था काला पीला  नहीं था देश के भर नहीं जाता था । 

>> राजा स्वयं न्यायाधीश होता था, न्याय पक्षपातपूर्ण तो होता था किन्तु बिकाऊ नहीं होता था । यहन तो न्याय के साथ अन्याय भी बिकाऊ है । 

कामि कमिता फेर फिरे, फिरे न कद आचार । 
कछु फिरावनु सों पहिले, आपुनापा सुधार ।१२९७ । 
भावार्थ : -  कामी लम्पट दुष्ट दुराचारी को ही बदलते रहे ।एक  कदाचारी गया तो दूसरा आ गया, पर कदाचार नहीं गया ॥ कुछ परिवर्तन करने से पहले अपनेआप को सुधारे ॥ 

अन्यथा जो है, जहां है, जैसा है.....वैसा ही रहने दें..... 

मनमोहन को मत फेर मन के मनके फेर .....समझे..... दातार.....इन दातारों के आगे तो दानवीर कर्ण भी फेल है..... 


बीच हाट पसारा धर, बेचे पंच  न्याय । 

जोर कमाई जोइ किए, कहँ धरे सोइ आए ।१५९८ । 
भवार्थ : -- हाट बीच पसारा पसार के न्यायधीश न्याय  बेच रहे हैं । जो भारी कमाई से जो धन प्राप्त हुवा है  कहो तो उसे कहाँ रखा है ॥ 

निज  निज सीवँ भीत रहे, अनुसासित जहँ  लोग । 
 पावहि सुखहि तहँ न होत, न भय न सोक न रोग ।१५९९ । 
भावार्थ : -- जहाँ का  जन -मानस अपनी अपनी सीमाओं के भीतर अनुशासित रहता हैं । वहां वह सदा सुखों को प्राप्त करता ही , उसे  वहां किसी भी प्रकार का  भय, शोक व् रोग नहीं होता ॥ 

काल दर्पन रूप अहै, मलिनए देस मलान । 
चेत अचेतन जगत के, बयस  ही छबि समान ।१६००। 
भावार्थ : - समय यदि अर्पण ही तो देश/स्थान उसपर मली हुई मलिनता है । जिसमें चराचर जगत की अवस्था छवि रूप में दर्शित होती है  ॥ 

छवि फिरने से दिन नहीं बहुरते, दिन बहुराने के लिए  समय रूपी दर्पण को फेरना होगा ॥ 















तज तप तन  हेतु ,   । 
सत पातक सोधन हेतु , दान हेतु कल्यान ।। 
भावार्थ : -- त्याग एवं तपस्या  स्वयं के हित हेतु है, दान परहित हेतु है । सत्य पातकों के परिष्करण हेतु है, ॥  


अजगित जोत लौ लगन जगाए , किरन बुझावत सूर । 
लहकन लस लवन जगाए

सुरमई  साँझ लिख सिख सजाए, केस रचन सैंदूर ।  
स्याम बरन घन केस बनाए, कल कलियन कर कूर ॥  

उडुगन ज्योतिर गगन जगाए, मयंक मंद मयूख । 
बियाकुल निदरा सपन जगाए, सयन मगन प्रत्यूख ॥ 

बिहग निज केतन बहुराए, बिथकत पंख बितान । 
बियत भूति जगलग छाए, भयउ बिगत दिनमान ॥ 


उदक पुरन परिपूरन जगाए, तरत तरंग   
रत रतनारतन जगाए 

जगन जोति नयन जगाए, किरन जगावत सूर ।
रति रति रति बंत रवन जगाए, भयो प्रभात सुदूर ॥

लावनी श्रीमन् रमन जगाए, रवनत मधुर नुपूर । 

इत ईँधन लगन लगाए, दिए तंदुल मधुधूर ।
पयसन चूलनन्हि चढ़ाए, दूलन पोबत पूर ॥ 


बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२८॥ -----

चित चेतस के चौंक हो , जो चिंतन चौपाल । 
पहिले बिरधनि ज्ञान के, बरगद की कर ढाल ।१२८१। 
भावार्थ : -- चैतन्य चित के चौंक में यदि चिंतन की चौपाल सजी हो । तब प्रथमतस बड़े-बूढ़ों के ज्ञान रूपी बरगद का आश्रय कर लेना चाहिए ॥

जैसेउ कानन श्रवनए , लोचन देखे जोइ । 
जैसेउ बाद बद बदन  , अंतर रेखे सोइ ।१२८२। 
भावार्थ : --  कान जैसा सुनेंगे, नेत्र जैसा देखेंगे,  मुख जिस भाँती बोलेगा, उक्ति करेगा, सिद्धांत अभियोग कहेगा यह अंतर वैसे भाव संजो लेगा ॥

जीवन एक बर्ती बरत, दीप के सोंह काए  । 
को जर जर उजराए जग, को जर जर अगिआए ।१२८३। 
भावार्थ : -- जीवन एक जलती वर्तिका है, शरीर एक दीपक है । कोई जल जल कर जगत में उजाला भर देता है, कोई जल जल कर उसमें आग लगा देता है ॥

धन्ना सेठ की तो बस, जिउते की जयकार । 
संत मुनि मरनान्तर, पूजित सकल सँसार ।१२८४। 
भावार्थ : -- धनवान की तो बस जीते जी की ही जय जय कार है । संत मुनीश्वरों को संसार मरणोपरांत भी पूजता है ॥ 

सावन के आँधर कू जूँ हरियर दीठाए । 
बिषई भोगि के दृग तूँ, चहुँदिसि भल दरसाए ।१२८४। 
भावार्थ : -- सावन के अंधे को जिस प्रकार हरा हरा ही दिखाई देता है । उसी प्रकार विषय-भोगी के दृग भी चारों दिशाओं में भला ही भला दर्शाते हैं ।


शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२७ ॥ -----

प्रभो गान बिनु गिरा नहि, भगत भगति बिनु भाउ । 
तज दान बिनु धन सुख नहि, सील बिनु बर सुभाउ ।१२७१। 
भावार्थ : -- ईश्वर की स्तुति बिना वाणी व्यर्थ है । भक्त की श्रद्धा न हो तो भक्ति व्यर्थ है । त्याग एवं दान बिना धन सुख नहीं देता, शालीनता रहित स्वभाव श्रेष्ठ नहीं होता ॥

जड़ता सोंह चेतन लग, अदिस सोंह दिसमान । 
धरिनीहि सोंह गगन लग, प्रस्तर हो कल्यान ।१२७२। 
भावार्थ : -- कल्याण का प्रस्तारण जड़ से लेकर चेतन तक, निर्गुण से लेकर सगुण तक, धरती से लेकर अम्बर तक होना चाहिए ॥

भयो रे घर लाल भयो, प्रियजन थाल बजाएँ । 
और घरे की लालनी, के कर काल बिकाए ।१२७३। 
भावार्थ : -- बिरज मैं आनंद  भयो, लाल भयो पिलो भयो, प्रियजन थाली बजा बजा के कह रहे हैं । कल तेरो योइ लाल पिलो और घर की लालनी के हाथ बिकाओगो ॥ 

भाव भगति आधान जँह, दान मान सनमान । 
लेनइ देन बिधान तँह, हानि लाभ लब्धान ।१२७४। 
भावार्थ : - जहां दान एवं मान-सम्मान हो वहीँ भाव भक्ति सेवा श्रद्धा अधिष्ठित होते हैं । जहां लेई-देई का विधान हो वहाँ फिर लाभ-हानि एवं प्राप्तियों को देखा जाता है ॥ 

सात समंदर जल दियो, घोल दिआ कूँ नून । 
प्रभु प्रपंचन सोइ जान, ज्ञानि ध्यानि जु दून ।१२७४। 
भावार्थ : -- सात समुद्र में जल दिया फिर उसमें लवण घोल दिया क्यूँ । प्रभु का यह छल-प्रपंच वही जानता है जू दूना ज्ञानी-ध्यानी हो भैया हम तो नहीं जानते ॥ 

झूठा सब संसार है, तामे जीउ रमाए । 
पहिले त जन्माए क्यूँ, फिर क्यूँ मरनि पाए ।१२७५। 
भावार्थ : -- यह संसार ही झूठा है, और उसमें जीव रमा है ॥ पहले तो जन्म लेता ही क्यूँ है फिर मरता क्यूँ है  , हम तो नहीं जानते यह तो वही जानते हैं जो दुने ग्यानी ध्यानी एवं डेढ़ सयाने हैं ॥ 

सत्ता ऐसी सुन्दरी, मेना सनहु अतीत । 
सकल बिलासी संतनु , एक अकेर लइ जीत ।१२७५। 
भावार्थ : -- सत्ता ऐसी सुन्दरी है, अपछरा है, जो मनका से भी पार गई । इसने तो सारे विलासी ऋषि मुनियों को अकेले ही जीत लिया ॥ 

सीत रितु तप भीत लहा, तपित रितु भीत सीत । 
एहि काल जन मानस की, उलट भई सब रीत ।१२७६। 
भावार्थ : -- शीत ऋतु में ताप के लिए लालायित रहता है , ताप ऋतु में शीतलता  के लिए लालायित रहता है । अद्यावधि में जन मानस की सारी रीतियाँ उलटी हो गई हैं ॥ 

टीका : -- नेता-मंत्री लोगन को देखना, कपडे ऊपर कपडे पहनकर मस्तक के अब्बिन्दु (पसीना)पोंछते रहते हैं, यह मूर्खता नहीं तो क्या है ॥ 

काइ कलेबर कलस कर मति सम्मति कर तोए । 
जेतिक आतम सात किए, तेतिक सीतल होए  ।१२७७ । 
भावार्थ : -- काया की आकृति घड़ा कर लो एवं मस्तिष्क के विचारों को जल कर लो । उस जल को जितना आत्मसात करोगे वह उतना ही शीतल होगा ॥ 

टीका : -- 'इन  कपट भेसी संतो के उबलते जल को कौन पिएगा' 

साधौ सुख संतोख मह, लोभ करन बहु बाध । 
यह तो एकै माहि सुलभ, सो सुभ हो जो आध ।१२७८। 
भावार्थ : -- सज्जनों सुख संतोष करने में है लोभ लाललुप्ता में दुःख ही दुःख है । यह सुख कोई भी विषय हो, वास्तु हो एक में ही सुलभ है और यदि आधे में ही सुलभ हो  तो सुख कल्याणकर भी हो जाता है । 

सिच्छा गहि पर ज्ञान नहि, सिखा दिए बिनु ध्यान । 
कामि लोभि मद धरमहिन, अजहुँ का जुवबान ।१२७९। 
भावार्थ : --आज का युववंत शिक्षित है किन्तु ज्ञानी नहीं है,कारण कि इसने ध्यान दिए बिना ही सीखा है, केवल पेट के लिए सीखा है  । कामी है प्रेमी नहीं है, लोभी है त्यागी नहीं है, अहंकारी है, चैतन्य नहीं है, धर्म के चरणों से अर्थात शौच तप दया दान से हिन् है, क्योंकि किसी ने सिखाया ही नहीं ॥  यह वर्त्तमान है यही कल का भविष्य भी है एवं भूत भी ॥ 

तपस चरन तपसी कहत, धर्माचरन धर्मात्म । 
तजन चरन जटिला कहत, तृतनु कहत एकात्म ।१२८० । 
भावार्थ : - तप का आचरण करने वाले तपस्वी कहलाते हैं, धर्म का आचरण करने वाले धर्मात्मा कहलाते हैं । त्याग का आचरण करने वाले संन्यासी कहलाते हैं जो यह त्रिकाय हो वही आत्म स्वरुप ईश्वर कहलाते हैं जैसे : -- शिव जी , श्रीराम 

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२५॥ -----

हो जो लोकन आँधरा, तासु त जोत जगाए । 
पेट पेटारी धांधरा, कैसे नैन लगाए ।१२५१। 
भावार्थ : -- यदि दिखता न हो, कोई अंधा हो, ज्योत जगा कर उसका तो उपचार हो सकता है । किन्तु कोई धूर्त जो पेट की पिटारी का अंधा हो उसको नैन कैसे लगाएं ॥

हो मंतरी कि संतरी, सबका एक ही मंत्र । 
मर्दन मरन मारनी लग, दोहत रहु गनतंत्र ।१२५२। 
भावार्थ : -- मंत्री हो कि संत्री हो कि यंत्री हो सबका एक ही मंत्र है । जब तक गणतंत्र पूर्ण रूप से नष्ट न हो,जाए उसकी मृत्यु न हो जाए, उसकी अंत्येष्टि न हो जाए तब तक उसे दूहते रहो ॥

जोरे कलुषित कोइरे, छोरे पुन के हीर । 
प्रभुवन जोगन बिहुर कै , भगता जोगि सरीर।१२५३। 
भावार्थ : -- दोष रूपी पापों के काले कोयले को संग्रह कर लिया, पुण्य के हीरे को छोड़ दिया । प्रभु-जन की रक्षा भूल कर भक्त-सेवक अपनी ही शरीर की रक्षा में लगा है ॥

भू भू भवन भब्य रचे, लगाइ खन की लाट । 
मीच पापनी जाएगी ले ठाइ एकै खाट ।१२५४। 
भावार्थ : -- भूमि भूमि पर अधिष्ठानों की भव्य स्वरुप में रचना की, खण्डों के अम्बार लगा दिए । पापनी मृत्यु जब आएगी तब वह एकइ खाट में ले जाएगी ॥

तामा नहि लौहु नहि लौ, भगता माँगे सौन । 
एसिहुँ भुखिआ भजना कू, कानन देवे कौन ।१२५५। 
भावार्थ : -- घर में ताम्बा नहीं है, लोहा भी नहीं है, और भगत सोना मांग रहा है । हरिजन की छोड़ो ऐसे भूक्खड़ भजनों को हरि भी कान नहीं देते ॥

कर कलेवर ऐसो कर, ले नापितु दे दान । 
दान कर अभिमान न कर, करे जगत कल्यान ।१२५६। 
भावार्थ : -- हाथ की आकृति ऐसी कर लो कि वह दान ग्रहण न करे अपितु दान देवे । दान देकर अभिमान न करने पर वह दान समस्त संसार के लिए कल्याणकारी होता है ॥

 गात बन मन गुहा किये, भीत गहन अंधेर । 
जगत जाल जंजाल सन, बसाए हिंसक सेर ।१२५७। 
भावार्थ : -- शरीर को जंगल कर लिया मन को गुफा बना दिया । अंदर गहरा अन्धेरा छा रखा है । जिसमें संसार के प्रपंचों के इंद्रजाल के संग, हिंसक शेर को बसा लिया ॥

दुर्बादन बदने बदन, निकसे करकस राग । 
बादत मधुर मधुर बचन, छहो राग जहि जाग ।१२५८। 
भावार्थ : -- मुख केवल दुर्वादन कहता रहे तब उससे कराकस राग का निष्कासन होगा जो किसी को प्रिय नहीं है । मीठा मीठा बोलने पर वाणीं में छहो राग जागृत हो जाते हैं, जो शत्रु को भी वश में कर लेते हैं ॥

भेद करे ना सूर सस, भेद करे ना जोत । 
ज्ञान दान कल्यान अस हो बिकिरित चहुँ कोत ।१२५९। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार सूर्य, चन्द्र एवं दीपक की दीप्ती भेद नहीं करती वह सभी ओर विकिरित होती है । ज्ञान, दान एवं कल्याण का भी ऐसा ही स्वभाव होना चाहिए ॥

काम क्रोधमाद अरु लोभ तेरे अरि जे चार । 
और लगाई छाँड़ के, तिनते लग सौ बार ।१२६०। 
भावार्थ : -- काम, क्रोध मद और लोभ यही तेरे चार शत्रु हैं । और सारे बैर भूल कर इनसे बैर बाँधना चाहिए ॥ 







गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२४ ॥ -----

साख लिए फलफूल रहा, भया जगत सन मूल । 
तब तरुबर का होइ जब, गया मूल को भूल ।१२४१। 
भावार्थ : -- जगत में फलाफूला शाख हुई मूल से ही तो हुई । तब तरुवर का क्या होगा जब वह मूल कू ही भूल जाए ॥

'मूल यदि मीट्टी की नहीं सुनेगा, तो तना उसकी नहीं सुनेगा फिर शाखाएं तने की नहीं सुनेगी, शाखाओं की पत्र नहीं सुनेगा, पत्र की पुष्प नहीं सुनेगा, पुष्प की फल कहाँ से सुनेगा वो तो फूक मारते ही सिधा जाएगा,

को तो गावै आपनी, को भगवान की गाए । 
कोउ कोउ जन न जाने, किन की बकते जाए ।१२४२। 
भावार्थ : -- कोई तो अपनी ही कथा कहता रहता है कोई जनार्दन की कहता है । कोई कोई जन जाने किसकी कथा बकते जाते हैं ॥ 

एक अचरज देख्या भइ , गदहा के सिर सिंग । 
अपना 'पन' दरसाए फिर, मारे ऊँची डिंग ।१२४३। 
भावार्थ : -- एक अचरज देख्या भई, गधे के सिर पे सिंग । पैले अपना गधापन दिखाया फिर ऊँच्ची ऊँच्ची डिंग हाँके ॥ 

मील मील कि मालिकनी, खा गइ सब नदि खेत । 
गरीब जिनावर भुख मुए, फाँके कलुखित रेत ।१२४४। 
भावार्थ : -- ये मीलों की मालकीनी खा गई नदियों कू, खेतों कू ॥ बिचारे गरीब जानवर भूखे मरते इनकी 'फलाई ऐश 'खा रहे हैं ॥ 

अनुरति बिनु अनुराग नहिं, बिरती बिनु बैराग । 
लवनाई बिनु लाग नहि, अगिलाई बिनु आग ।१२४५। 
भावार्थ : -- आसक्ति बिना अनुराग नहीं होता, विरक्ति बिना वैराग्य नहीं होता । सुंदरता ( तन,मन, और धन भी ) बिना आसक्ति नहीं जगती, लगाए बिना आग नहीं लगती॥ 

माई बहु इतराइ पुत, नाउ धरि लखि निबास । 
बरे कलुख पापाचरन, किए तँह दनुपत बास ।१२४६। 
भावार्थ : -- माई ने तो बड़े इतरा का सपूत का नाम 'लक्ष्मीनिवास' रखा था (किसी की माता ने 'मोहन' रखा, किसी किसी की माई ने तो 'भगवान' ही रख दिया )। किन्तु सपूतों ने कलुषता को वरन कर पाप  आचरण को धारण किया । अब उनका शरीर दनुपत वासी हो गया ॥ 

जगत सेठ जिन जग कहे, कोउ करम के नाहि । 
वाके जस केतनिकेत, घर घर रूरत आहि ।१२४७। 
भावार्थ : -- जिन सेठों को जगत 'जगत सेठ' कहते हैं, वे किसी काम के नहीं । उनके जैसे अनेको अनेक सेठ हुवे,एवं घर घर में रुलते फिरे ॥ 

धनार्जन तबही धरम, जब हो दानाधान । 
जो दूजन बरदान दे,लखी सोइ बरदान ।१२४८। 
भावार्थ : -- 'धन अर्जन का धर्म तभी है जब वह दान स्थापन हेतु हो' लक्ष्मी तभी वरदान है जब वह दूसरों को वरदान दे अभिशाप न दे' अभिशापित धन का न दान करना चाहिए न दान ग्रहण करना चाहिए । 

दान धरमन कारन जब, निकसे चरन दुआर । 
पहिले भूखन असन दे, तिसित कंठ जल घार ।१२४९ । 
भावार्थ : -- दान धर्म के कार्य वश जब चरण घर से बहिर्गमन करें तब पहले ( स्वयं के पदुम हस्त से )प्यासे कंठ में जलार्पण कर भूखे 'जीव' को भोजन से तृप्त करें ॥ 

दिन भया कि रैनी भई, जून लोचन दरसाए । 
सत असत का भरम भेद, अंतर ज्ञान बताए ।१२५० । 
भावार्थ : -- दिन हुवा की रैन हुई यह आँखें ही दर्शाती हैं । उसी प्रकार अंतर-ज्ञान ,सत्य-असत्य के भ्रम एवं उसके भेद  का बोध कराता है ॥ 




पूस रथ हेमन हिमबर, बिदा कियो हेमंत ॥ 
आयो राज बसंत सखि, छायो राज बसंत ।। 

नौ पत फल नवल द्रुमदल भइ रितु अति रतिबंत । 
आयो राज बसंत सखि, छायो राज बसंत ।। 

पील नील नव नारंजी , केसरियो हरि कंत । 
आयो राज बसंत मन भायो राज बसंत ॥ 

नारद सारद सेष श्रुति सुर मुनि संत महंत । 
गायो राग बसंत सखि छायो राग बसंत ।। 

सारंगी संग सिंगार, रुर सुर सात सुबंत । 
गायो राग बसंत सखि छायो राग बसंत ॥ 

कास कोनिका कैसिका , कल बीना के तंत । 
गायो राग बसंत सखि छायो राग बसंत  ॥ 
                                               क्रमश: 





बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

----- मिनिस्टर राजू १२४ -----

"  राजू ! क्या हुवा, तुम्हारा मुँह क्यूँ लटका है ? "

राजू : -- मास्टर जी ! उस सत्ता धारी पार्टी न डाँट दिया :(

" ओए क्यूँ डाँट दिया"

राजू : --  सवा सौ साल की डोकरी हो गई है, और कहती है मुझे डोकरी मत कह.....खा खा के मोटी काली पूतना  हो गई है और कहती है मुझे मोटी मत कह.....और मास्टर जी!.....अति तो तब हो गई जब कहने लगी मुझे आँटी तो बिलकुल मत कह.....

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२३॥ -----

छूटे को छूटे मिले, बंधे कौन उपाए ।
झूठे को झूठे मिले, साँच कहाँ जय पाए ।१२३१। 
भावार्थ : -- छूटे को छुट्टे  ही मिल गए, अब ये किस उपाय से बंधेंगे । झूठों को झूठे ही मिल गए, तुम्हारा सत्य कहाँ जय प्राप्त करेगा ।।

तनिक लँगोटी पाए के, दौरें खेलन फाग । 
जोगनु बोले भाग चल चोरनु बोले लाग ।१२३२। 
भावार्थ : -- थोड़े से साधन ( स्वतंत्रता) प्राप्त क्या हुवे,  विलासिता भोगने के लिए दौड़ लगाने लगे ॥ प्रहरियों को भगाते हैं, चोरों से चोरी करवाते हैं ॥   

साँठि धरे न गाँठि धरे, बाक़ी सुने न कोइ । 
साँठि धर धन गाँठि धरे, को की सुनै न सोइ ।१२३३। 
भावार्थ : -- लोगों ने समाज को ऐसा कलुषित कर दिया है कि यदि पास में धन न हो और संपत्ति भी न हो फिर उसकी कथा कोई नहीं सुनता । यदि धन के साथ  संपत्ति हरि हो जाए फिर वह किसी की नहीं सुनता ॥

धन ही जगतगुरु हो जब, धन सन भाउ अभाउ । 
धन तुले सब तुलना तब, बिगड़े जात सुभाउ ।१२३४। 
भावार्थ : -- जब धन ही जगत गुरु हो जाए, धन है तो भाव है धन नहीं है तो अभाव है अर्थात ज्ञान को कोई अर्थ न होते हुवे धन के काँटे में सभी तुलनाएं हों तब धर्म कोई हो, जनम कहीं हो उसका बिगड़ना तय है, ।। अर्थात लोगों का असत्य, सत्य सिद्ध हो जाएगा,अशुद्धता ही शुद्दता होगी, क्रूरता को दया कहेंगे, दान दान न होकर कुत्सित व्यापार होगा, असुर 'ईश्वर' कहलाया जाएगा ॥ जन्म या जात बिगड़ने का अर्थ है जातक को यह भी ज्ञात नहीं होगा कि उसके जन्मदाता कौन हैं ॥

जग एक भुर भुरइया हैपथ भूरे ना जोइ । 
चौंक चौंक चिन्हित करतघर में पैठे सोइ ।१२३५। 
भावार्थ : -- यह जग एक भूल भुलैया है, चार चरण ( सत्य, शौच, दया, दान) के चौंको को चिन्हित कर जो मार्ग नहीं भूलता,  वही अपने लक्ष्य तक पहुंचता है ॥

मिले गुरु जोइ आँधरा, चेरे की दे फोर । 
ऐसो सदगुर हेलियो, अंधन देइ अँजोर ।१२३६।
भावार्थ : -- यदि अंधा अर्थात अज्ञानी गुरु मिल जाए तो वह शिष्य की आँखे फोड़ के अर्थात उसके अर्जित ज्ञान को भी नष्ट कर उसे अंधा अर्थात अज्ञानी बना देता है । ऐसा सज्जन गुरु ढूंढ़ना चाहिए जो अंधे अर्थात अज्ञानी के जीवन में ज्ञान का प्रकाश भर दे ॥

किए देस को भूत भवन, पञ्च भूति के भूत । 
बातें मैं न माने तो, भगा मार दो जूत ।१२३७। 
भावार्थ : -- इन पाँच तत्व  के भूतों ने सारे देश को गंदा घर बना दिया । यदि ये बातों से न माने तो इन्हें लात मार कर भगा दें ॥

पापधी पुन पतियाइ न, लम्पट भाए न प्रेम । 
अलाई घाम सुहाए न,  निरहीक नेमि नेम ।१२३८। 
भावार्थ : -- दुर्बुद्धि दुरात्मन् को कल्याण, सुकृति, धर्म विहित कर्म पर विश्वास  नहीं होता । कामी लंपटों को प्रेम नहीं भाता वे दिन रात स्त्री को ही ढूंडते रहते हैं । आलसी को धूप नहीं भाती उसे सदैव अनुकू वातावरण चाहिए, लज्जरहित, उद्दंड, निर्दयी दोष प्रकट होने पर भी जो दोष न माने उसे नियम विधान के बंधन  नही सुहाते ॥

एकाइ दहाइ सैकड़ा, सहस लख कोटि कोटि । 
सुख की चादरी तब जब, रखे छोटि सन छोटि ।१२३९। 
भावार्थ : -- इकाई, दहाई, सैकड़ा, सहस्त्र, लाख, करोड़ीमल, एक कोड़ीमल दूजा रोड़ीमल । ये अंक सुख की है जब इस चादरी को छोटी से छोटी रखें ॥

टीका : -- किसी कू एक रुपया का हिसाब है, किसी कू सौ का किसी कू हजार किसी कू लाख का कोणा, किसी को तो अरबों खरबों का हिसाब नहीं, बरेंगे-घुसेंगे सारे शमशान मैं जाकर, फेर ये महला क्यूँ चुनवायो है.....

चिद् घन मैं सब देह हैं, चिद् घन देह अहाहि । 
अन दरसी कहि न जाहिं, जो दरसी रहि नाहि ।१२४०। 
भावार्थ : -- परमात्म स्वरुप आकाश में ही समस्त देहधारी हैं, देह धारी के अंतर में ही आकाश है । जो नर्गुण स्वरुप में अदृश्य है वही अनश्वर अंतर आत्म है जो सगुन विग्रह है वह नश्वर है ॥

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२२ ॥ -----

नित प्रात मज्जन पूजन, रयन अल्पतर निंदु। 
चित चिंतन लग करम तन, जे सोधन पँच बिंदु ।१२२१। 
भावार्थ : -- रात्रि मन अल्पतर नींद ग्रहण कर, नित्य प्रात: स्नान,  अपने ईष्ट देव का पूजन, तत्पश्चात चित्त चिंतन,ध्यान,एवं मनन में लगे तन कर्मों में लगे रहे, यह शुद्धता के पांच बिंदु है, जो निर्धन हेतु भी सुलभ हैं, यदि जल उपलब्ध न हो तब केवल कर-चरण प्रक्षालित करें इतना भी उपलब्ध न हो केवल जल को छींट लें, यह भी उपलब्ध न हो तो वस्र झाड़ लें, जल जब उपलब्ध हो जाए तब स्नान करें ।        
                                       शेष शुद्धता तो धन की है, माया की है, धन एवं माया के उपयोग से शरीर शुद्ध हो जाएगा किन्तु अंतर मलिन हो जाएगा, अंतर मलिन होने से लिखा-पड़ा सब ठंडा हो जाएगा, प्रभु गरम हो जाएंगे, प्रभु थोड़े अधिक गरम हो गए तो वे फिर ऐसा ठंडा करेंगे, कि हिमालय को भी लाज आ जाए ॥

सुमन की सुहा डार पर, फलानुबन्धाहार। 
कर सोहत श्रमकार कर, धन की परहित कार ।१२२२। 

 सुमनस शाखे शोभनं, फलानुबन्धाहारं ॥ 
कर शोभतेश्रम कारिणम् ,  धन शोभते परहित करणं॥ 
भावार्थ : -- पुष्प की शोभा डाल पर ही होती है, फल की शोभा क्रमबद्ध फल देने एवं आहार होने में है । हाथ की शोभा श्रम कार्य करने में है, धन की शोभा परोपकार में ही है ॥

मनमोहिनी काया जब, प्राण हिन् होइ जाए । 
दाग कि जेरे ख़ाक दिए, बहोरि ना बहुराए ।१२२३। 
भावार्थ : -- यह काया बड़ी ही मन मोहिनी है किन्तु यह जब प्राण हिन् हो जाती है तब इसे चिता में जलाओं या सुपुर्दे-ख़ाक करो या जल समाधि दो, पेटी में बंद कर दफना दो, या अरब सागर में फेंक दो कुछ भी करो, फिर इसमें प्राण वापस आने के नहीं ॥

को जरे को जरा रहे, को जारन जोहारि । 
शवघर सायं एक एक कर, आहि सबहि के बारि ।१२२४। 
भावार्थ : -- कोई जल रहा है, कोई जला रहा है, कोई जलने की प्रतीक्षा कर रहा है । शवगृह में शयन करने हेतु एक एक करके सबकी ही बारी आएगी ।

उरिन अटारी उरारी, जीते जी के श्राम । 
अब सो कर जौ मरनि पर, आवै तेरे काम ।१२२५। 
भावार्थ : -- ये लम्बी चौड़ी अट्टालिकाएं  जीते जी की छाया हैं । अब वह करना आरम्भ कर, जो मृत्युपरांत तेरे काम आवें ॥

चिउँटी पग घुँघरु बाजे, सुनत सोइ साहेब । 
कहन किए न करन किए बस किए सेबक सुख सेब ।१२२६। 
भावार्थ : -- चुने हुवे नेता ही नहीं, नेता के कुत्ते भौंके  ( जनता )जनार्दन साहेब वो भी सुनते है, चीटियों के पग घुंघरू बाजे साहेब वो भी सुनते  है, उनकी कहानी सुनते है, कथाएं सुनते हैं और जाने क्या क्या सुनते हैं । और ये चुने हुवे सेवक, न कुछ सुनते हैं न कुछ समझते हैं, केवल सत्ता के राजसी सुखों का सेवन करते हैं ॥ 

अचोरन चैल देइ पुन , भूखन असन खवाए । 
पिपासु पयस प्याए पुन, मतिहिन् कू मति दाए ।१२२७ । 
भावार्थ : - निर्वस्त्र को वस्त्र दान करने का धर्म है, भूखे को भोजन खिलाने का धर्म है, प्यासे को पानी पिलाने का धर्म है । मतिहीन को मत देना अधर्म है, उसे मति देने का धर्म है । 

"मत, माँगने की विषय-वस्तु नहीं है"

सुभाउ चहे चारि चरन, चारि चरन  भगताउ । 
भगता मन भगवन चहे, भगवान भगता भाउ ।१२२८।  
भावार्थ : -- कोई भी धर्म हो वह ये चातुर्य आचरण चाहता है : -- सत्य, शौच ( शुद्धता, तप+त्याग)दया एवं दान । ये चार दम बन्दे चाहता है, 

मजहब चाहे चार दम, चार दम बन्दे चाहता है । 
 बन्दे खुदा को चाहते हैं खुदा बंदगी चाहता है  ॥ 

सिंगारिक  कबित अस जस,  गौरस की तासीर । 
जोरन देइ सार मिले तोरन मिलइ पनीर ।१२२९।
भावार्थ : -- श्रृंगार रस स युक्त काव्य की अनुभूति ऐसी होती है जैसे की गौरस का स्वभाव होता है । यदि उसे योग  दें तो मक्खन मिलता है, और वियोग दें तो पनीर मिलता है ॥ 

माँगन हुँत गुरु ज्ञान है, दायन कनिआ दान । 
भोगन हुँत निज कुकरमन, खादन फलफुल धान ।१२३०। 
भावार्थ : -- कन्या और दान देने के विषय है, माँगने के नहीं ( दहेज-उपहार, कन्या या मत आदि दिए जाते हैं  मांगे नहीं नहीं जाते) गुरु का ज्ञान माँगने का विषय है । लंगोटी का मिली लगे फाग खेलने, विषय भोग करने के लिए नहीं है अपितु अपने कुकर्म भोगने के लिए हैं, खाने के लिए फल, फूल, मूल, एवं अनाज है पशुओं को नहीं खाते, इन्हें खाकर फिर अहिंसा का भाषण नहीं पिलाते.....समझे.....

 लंगोटी पर फाग खेलना = थोड़ा साधन ( स्वतंत्रता) मिलते ही विलास की ओर दौड़ना



                            

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२१॥ -----

संसार सागर सरिबर, सरिल सरबर सरीर । 
जो डूबा सो डूब गया, जो तैरा सो तीर ।१२११ । 
भावार्थ : - दुनिया मानिन्दे समंदर है, आब ये बदन जरी कार । 
                आबोदोज़ हुवा वो दोज़ हुवा, तैरा वो लगा किनार ॥ 

नर नारायन रूप है, नारायनी है नारि । 
एक हरि के अधिकार मैं, एक हरि की अधिकारि ।१२१२। 
भावार्थ : -- पुरुष एवं स्त्री के बिना इस संसार की कल्पना नहीं की जा सकती ॥ यदि नर भगवान का स्वरुप है तो नारी भगवती स्वरुप हैं । ( नारायणी को कृष्ण भगवान की सेना भी कहते हैं, माने की भगवान इधर भगवती उधर )  । एक भगवान के अधिकार में हैं तो एक भगवान की अधिकारी हैं ॥ 

कर पसारी के लीजिए, कहूँ मिलै जो ज्ञान । 
ज्ञान करम सुधारी कै, कारे दोष निदान ।१२१३। 
भावार्थ : -- ज्ञान कहीं भी मिले, किसी से भी मिले उसे ग्रहण करना चाहिए  हाथ पसार कर मिले तो भी  संकोच नहीं करना चाहिए । कारण कि  ज्ञान अपने कर्म को सुधार कर, निहित दोषों का निवारण करता है ॥ 

बिनु साधन बिनु पाँख के, पौरे गगन बिहंग । 
जिनके सूतक मह बँधी, रघुबर नाम पतंग ।१२१४। 
भावार्थ : - जिनके सूत्र में राम नाम की पतंग बंधी हो, वह फिर बिना साधन के बिना पंख के बिहंग बन कर गगन में तैरता है ॥ 

प्रेमी सों प्रेमी मिले, प्रेमी में मिले प्रेम । 
अंभस्निधि अंभस् मिले, कलस मिले जूँ हेम ।१२१५।
भावार्थ : --  प्रेमी को ही प्रेमी मिलता है, प्रेम प्रेमी में ही मिलता है । जैसे समुद्र में मुक्तिका मिलती है एवं कलश में शीतलता मिलता है ॥ 

साधु साधु बन बन फिरे, बना साधु ना कोइ । 
असाधु असाधु सन घिरे, बने बन साधु सोइ ।१२१६। 
भावार्थ : -- हे साधू !इस वन रूपी संसार में जहां गगनचुम्बी भवन वृक्ष सदृश्य एवं मानुष वन पशु सदृश्य हो गया है, कपट तापस ही फिर रहे हैं , वास्तव में साधु कोई नहीं है । हाँ यदि असाधु असाधु से घिर जाए तो वह एक कपट तापस अवश्य बन जाता है ॥ 

साँस  हैं तोहि प्रान हैं, साँस नहि त सव मान । 
कैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिनु प्रान ।१२१७ । 
भावार्थ : -- कहते हैं कि साँस जब तक हैं तब तक देह में प्राण है, नहीं तो यह मृत के समान है । लोहार की धूँकनी मृत पशु के खाल से बनी होती है,फिर वो बिन प्राण के साँस कैसे लेती है ॥ 

लिखि कही परमारथ तस, कथा अमरता पाइ । 
मसि बही सुवारथ परत, लेखत कहत बिहाइ ।१२१८। 
भावार्थ : -- यदि परमार्थ हेतु कोई कथा कही जाए अथवा लिखी जाए, वह अमरत्व को प्राप्त हो जाती है । यदि  स्वार्थ हेतु मसि बहाई है उस कथा का अंत कहते -लिखते ही हो जाता है ॥ 

बक्ता बकत डूबी गए, कथा लगी ना  पार । 
दरस घरिएँ श्रोता हरिएँ, बहि निस्कास दुआर ।१२१९। 
भावार्थ : -- वक्ता बकते बकते इतना डूब गया कि कथा पार ही नहीं लगी । श्रोता क्या करता घड़ी देखा और धीरे से निर्गम द्वार की और बह गया ॥ 

मानुष भया बन गोचर, बन भए नगरी गाँउ । 
घन भवन तरु भए बोले घर घर कागा काउँ ।१२२०। 
भावार्थ : -- वन ही नगर गाँव हैं, नगर गाँव वन बन गए मानुष वन में विचरने वाला प्राणी हो गया । सघन भवन वृक्ष हो गए हैं घर घर में दूरदर्शन रूपी कौंवे काऊँ काऊँ करने लगे हैं ॥ 


शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १२० ॥ -----

बिय पौध भया फुर दिया बिटप भया फर छाइ । 
बिरधा मैं भया रुखड़ा, दिया जलाउन काइ ।११२१ । 
भावार्थ : -- बीज अंकुरित होकर पौधा बना तो पुष्प दिया, जब विटप बना तब फल और छाया दिया । वृद्ध हुवा तो वह सुख गया और जलावन हेतु अपनी काया ही दे दी ॥ अब और क्या बचा लेने को.....

देहि गगन रहिला किरन, रैनि मेल मलिनाइ । 
जूँ जूँ मल कन अन्हाए, तूँ तूँ उजलत जाए ।११२३। 
भावार्थ : -- देह गगन है किरण उबटन(बेसन) है । जो रैनी से मिलकर मलिन हो गई ॥ जैसे जैसे किरणों की उबटन मल कर ओस के कणों से गगन नहाए,  वैसे वैसे उज्वलता प्राप्त होती गई ॥ 

लोहन लोहान सों कटे , धारा बिष बिष धार । 
बीर बीर सोंह निपटे, बिचार सोंह बिचार ।११२४। 
भावार्थ : -- लोहा ही लोहे की काट है विष धार की काट विष धार ही है /धारावृष्टी की काट जलाधार ( कूप, बावली तालाब झील आदि ) है । वीर के साथ वीर निपटता है विचारों के साथ विचार निपटते हैं ॥ 

सूर कहत सो एकै है, चाँद कहत सो ऐक । 
सत्कृत के कर किरन नहि, उडुगन गगन अनेक ।११२५। 
भावार्थ : --जिसे सूर्य कहते वह एक ही है, जिसे चाँद कहते हैं वह भी एक ही है ॥ जिसके करकमलों में सद्कार्यों की किरणे नहीं है, गगन में वे तारें अनेकोनेक हैं ॥ 

जपनी लिए मुख जाप किए, फेरी दे दे फेर । 
हरि ह्रदय बास बसे तू, हेरी दे दे हेर ।११२६। 
भावार्थ : -- जप माला लिए मुख से जाप करता तू उसे फेरते हुवे फेरियाँ दे रहा है ॥ ईश्वर तेरे ह्रदय  निवास में बसे ,हैं तू उसे ढूंढ़ता हेरियाँ दे रहा है ॥ 

मँगता फिरै गली गली, भर सहस स्वांग । 
धन मत वाकू दीजीए, जाकी पूरी माँग ।११२७।  
भावार्थ : - सहस्रों स्वांग भर कर मंगाते गली गली फिर रहे हैं । इनको केवल कपडे-लत्ते, दाना-पानी देने चाहिए । परिमार्जित अर्जन एवं मत उसी को प्रदान कीजिए , जिसका मन पूर्णकामी होकर संतुष्ट हो गया हो ॥ यदि ऐसे मन का स्वामी न मिले तो मत दीजिए ॥ 

बिषयासक्ति को बस मैं, कारै जोगाचार । 
बिषया बिरक्ति होवती , बैरागी आधार ।११२८। 
भावार्थ : - योग का आचरण विषयों के प्रति आसक्ति को नियंत्रित करता है । विषयों के प्रति विरक्ति वैराग्य पर आधारित होती है ॥ अर्थात योगी एवं वैरागी में अंतर है ॥ विषय भोग में अरुचि विरक्ति है, रूचि में नियंत्रण योग है ॥ 

जो कल थे सो अजहुँ नहि, जो हैं सो कल जाहिं । 
हैं सो का लेइ जहिं जब, थे सो ले गए नाहिं ।११२९। 
भावार्थ : -- जो कल थे वो आज नहीं , 
                 जो आज हैं वे कल जाएंगे । 
                जो थे वे कुछ ले गए नहीं 
                 हैं वे क्या ले जाएँगे ॥ 
भरन भवन भाव भूति धरे, गरब करे मन माहिं । 
आए तो कछु लाए नहीं, बहुरत का ले जाहिं ।११३०। 
भावार्थ : - दुन्या भर की दौलत रखे, ज़र दार सानगुमानी में । 
                आए तो कुछ,लाए नहीं, जाएंगे जब क्या ले जाएंगे ॥ 

हरिअर आँचरी मुख करी, हरिअर चुनरी ढारि । 
घन भरि घघरी सिरु धरी, चरि डगरी पनहारि ॥ 

पगपरि झाँझरी घरि घरि, तरि तरि झन झन कारि । 
कटि धरि तगरी कह लरी, अरी हरि सोंह हारि ॥ 

सगरी सगरी सागरी, सरौ सिखर कर देइ । 
कमन कोदंड कर्तरि, करकरि करक निहारि ॥ 



----- मिनिस्टर राजू १२३ -----

राजू : -- मास्टर जी ! यो दिल्ली बाले जनार्दन के तिरया चरितर का बर्णन भी बर्णनातीत है..,

 'वो कैंयाँ'

राजू : -- मास्टर जी ! वो ऐयाँ कि बेसक ऐसी कि तैसी हो जाए, पण यो 'ऍसी-वैसी' रखणो कोणी छोडै.....भई जो है, जैसी है.....है तो.....कितणी महंगाई हैं, जैसी भी नहीं रही तो.....  

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...