पोथी सौमुख धार कै, श्री मन कथा सुनाए ।
जनार्दन की छाँड़ कै, आपनी गाए जाए ।११९१।
भावार्थ - एक लाम्बी पोथी आग्गै धर ली, महाराज कथा सुनावै हैं । जनार्दन की तो छोड़ दी, अपनी गाइ जावै है ॥
चारु चुनरिया दुलन की, चढ़े रंग सो दून ।
पाए लावन लालिमा, मिले हरदि जूँ चून ।११९२।
भावार्थ : -- दुहन की सुन्दर चुनरी है, जिसपर दुगुना रंग चढ़ा है । जैसे हल्दी चूने के संग मिल कर सुन्दर लालिमा देती है उसी प्रकार यह दुलहन के कर्पूरी रंग के संग मिलकर लावण्यता प्रदान कर रही है ।
किसान भया बनिहारी, दान भया बैपार ।
सुधारें ब्यवस्था तब सुधारत ब्यबहार ।११९३।
भावार्थ : -- जब किसान बँधवा श्रमिक हो जाए, और दान व्यापार बन जाए । तब व्यवहार का सुधारीकरण करते हुवे व्यवस्था में सुधार करनी चाहिए ॥
तेरे दानै पंख सन, उरिने गगन बिहंग ।
उठल्लूहु का चूल्हा, चेले चेली संग ।११९४।
भावार्थ : -- तुम्हारे दान किए पंखों से , अपने चेलो चमेलों के साथ ये परिंदे गगन में उठल्लू का चूल्हा जैसे बिना मतलब के उड़ते फिर रहे हैं ॥
टीका : -- "मतदान यदि दायित्व हैतब इन्हें मत देने वाले इसका उत्तर दें कि ये हमारे दिए कर का दुरूपयोग क्यों कर रहे हैं"
बिआ बिअ सो एकै मूठि, अरु जा सोया खाट ।
निसदिन देखे बावरा, सुपक उपज की बाट ।११९५।
भावार्थ : -- खेत इतना बड़ा, बीज तो बोया एक मुट्ठी और जा कार खाट में पसर गयो । जाते जाते बनिहारी से कह गयो बढ़िया पकी उपज से कोठो भर जाणो चाहिए, अब बावरा निसदिन बाट देखे ॥
मायादास कह को प्रभु, कौन मूरति अकाल ।
सकल देव सुरताए जब दिए अकाल एक गाल ।११९६।
भावार्थ : -- विषय विलास की साधन स्वरूपा माया का दास कह रह है प्रभु कौन, परमात्मा कौन है ॥ जब गाल पर अभावों का एक थप्पड़ पड़ा, तब सारे भगवान स्मरण हो आए ॥
हे जननी तू भगत जन, के दाता कै बीर ।
तेरे दीपक दीपिका, बने गगन के हीर ।११९७।
भावार्थ : -- हे माता तू या तो भक्त को जन्म दे या फिर दाता या वीर को जन्म दे(इन भिखारियों को मत जन) । तेरे कुल का दीपक तेरी कुल की ज्योति फिर गगन के सूर्य बने ॥
भाव लगे कुकरमन मैं, भगती लाहन लाहि ।
तिनकी सेवा पूरनन , लगी सुवारथ माहि ।११९८।
भावार्थ : -- जिनके भाव कुकर्मों में लगे हैं एवं भक्ति लब्ध-लाभ अर्जित करने में लगी हैं । उनकी सेवा सुश्रुता स्वार्थ पूर्ण करने में ही लगी रहती है ॥
गंगा तो गंगा रही, जल नित नवल नयाए ।
दुनिया तो दुनिया रही, नउ नउ जिउ जन्माए ।११९९।
भावार्थ : -- गंगा तो गंगा है वही पुऱानी, किन्तु उसका जल नित्य ही नया रहा । दुनिया तो दुनिया रही वही पूरानी, जीव नए नए जन्म लेते रहे ॥
हरी भरी धरनि की जो, जोग रखे बनराए ।
मरजादा भित नदपत रहे, नदि मग ना बिसराए । १२००।
भावार्थ : -- यदि हरी भरी इस धरती की रक्षा वृक्ष करेंगे तब समुद्र मर्यादा में रहेगा एवं नदी मार्ग नहीं भूलेगी॥
जनार्दन की छाँड़ कै, आपनी गाए जाए ।११९१।
भावार्थ - एक लाम्बी पोथी आग्गै धर ली, महाराज कथा सुनावै हैं । जनार्दन की तो छोड़ दी, अपनी गाइ जावै है ॥
चारु चुनरिया दुलन की, चढ़े रंग सो दून ।
पाए लावन लालिमा, मिले हरदि जूँ चून ।११९२।
भावार्थ : -- दुहन की सुन्दर चुनरी है, जिसपर दुगुना रंग चढ़ा है । जैसे हल्दी चूने के संग मिल कर सुन्दर लालिमा देती है उसी प्रकार यह दुलहन के कर्पूरी रंग के संग मिलकर लावण्यता प्रदान कर रही है ।
किसान भया बनिहारी, दान भया बैपार ।
सुधारें ब्यवस्था तब सुधारत ब्यबहार ।११९३।
भावार्थ : -- जब किसान बँधवा श्रमिक हो जाए, और दान व्यापार बन जाए । तब व्यवहार का सुधारीकरण करते हुवे व्यवस्था में सुधार करनी चाहिए ॥
तेरे दानै पंख सन, उरिने गगन बिहंग ।
उठल्लूहु का चूल्हा, चेले चेली संग ।११९४।
भावार्थ : -- तुम्हारे दान किए पंखों से , अपने चेलो चमेलों के साथ ये परिंदे गगन में उठल्लू का चूल्हा जैसे बिना मतलब के उड़ते फिर रहे हैं ॥
टीका : -- "मतदान यदि दायित्व हैतब इन्हें मत देने वाले इसका उत्तर दें कि ये हमारे दिए कर का दुरूपयोग क्यों कर रहे हैं"
बिआ बिअ सो एकै मूठि, अरु जा सोया खाट ।
निसदिन देखे बावरा, सुपक उपज की बाट ।११९५।
भावार्थ : -- खेत इतना बड़ा, बीज तो बोया एक मुट्ठी और जा कार खाट में पसर गयो । जाते जाते बनिहारी से कह गयो बढ़िया पकी उपज से कोठो भर जाणो चाहिए, अब बावरा निसदिन बाट देखे ॥
मायादास कह को प्रभु, कौन मूरति अकाल ।
सकल देव सुरताए जब दिए अकाल एक गाल ।११९६।
भावार्थ : -- विषय विलास की साधन स्वरूपा माया का दास कह रह है प्रभु कौन, परमात्मा कौन है ॥ जब गाल पर अभावों का एक थप्पड़ पड़ा, तब सारे भगवान स्मरण हो आए ॥
हे जननी तू भगत जन, के दाता कै बीर ।
तेरे दीपक दीपिका, बने गगन के हीर ।११९७।
भावार्थ : -- हे माता तू या तो भक्त को जन्म दे या फिर दाता या वीर को जन्म दे(इन भिखारियों को मत जन) । तेरे कुल का दीपक तेरी कुल की ज्योति फिर गगन के सूर्य बने ॥
भाव लगे कुकरमन मैं, भगती लाहन लाहि ।
तिनकी सेवा पूरनन , लगी सुवारथ माहि ।११९८।
भावार्थ : -- जिनके भाव कुकर्मों में लगे हैं एवं भक्ति लब्ध-लाभ अर्जित करने में लगी हैं । उनकी सेवा सुश्रुता स्वार्थ पूर्ण करने में ही लगी रहती है ॥
गंगा तो गंगा रही, जल नित नवल नयाए ।
दुनिया तो दुनिया रही, नउ नउ जिउ जन्माए ।११९९।
भावार्थ : -- गंगा तो गंगा है वही पुऱानी, किन्तु उसका जल नित्य ही नया रहा । दुनिया तो दुनिया रही वही पूरानी, जीव नए नए जन्म लेते रहे ॥
हरी भरी धरनि की जो, जोग रखे बनराए ।
मरजादा भित नदपत रहे, नदि मग ना बिसराए । १२००।
भावार्थ : -- यदि हरी भरी इस धरती की रक्षा वृक्ष करेंगे तब समुद्र मर्यादा में रहेगा एवं नदी मार्ग नहीं भूलेगी॥
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