सत्ता ऐसी कुलछिनी, छाँड़े ना जो ईस ।
तासु गहन तब धरम जब, हो ना कोउ अधीस ।११५१।
भावार्थ : -- सत्ता ऐसी कुलक्षणी है ऐसी कुलटा है ऐसी कुचालि ऐसी.....जिसने भगवान को भी नहीं छोड़ा ॥ इसका ग्रहण तभी पुण्य है, जब कोई शासक बनना न चाहता हो ॥
राजन कोष कर उर्बर, प्रजा उपजाउ खेत ।
सम सरूप जब उरारे, तबहि बर उपज देत ।११५२।
भावार्थ : -- शासक के कर के धन का भंडार उर्वरक के सदृश्य होता है, जनता उपजाऊ क्षेत्र के सरिस होती है ॥
उर्वरक को जब समान स्वरुप में वितरण करेंगे तभी यह उन्नत उपज उपजाएगी ।।
जगत प्रभुता जोग लिये, पाए बढ़ाई मान ।
मान तब कहाँ रह गया, लूटा होत बिहान ।११५३।
भावार्थ : -- जगत का सारा महात्म्य सारा वैभव समस्त गौरव को जोड़ लिया, अतिशय बढ़ाई एवं सम्मान पाया । यह मान सम्मान तब कहाँ रह गया, जब अंत होते ही इसे लूट लिया जावेगा ॥
रसरी लमान मान है, सर्प के का लमान ।
बुराईहि के मान को, सुजन ऐसेउ जान ।११५४।
भावार्थ : - रस्सी /जिह्वा की लम्बाई छोटी बड़ी उचित है किन्तु सर्प तो सर्प है, सर्प का भी क्या छोटा एवं क्या बड़ा । सज्जन बुराई के मान को भी सर्प के सदृश्य ही मानते हैं ॥
थोड़ै कारत रे मना, होत अधिकाधिकान ।
थोड़े थोड़े जल बढ़त, डूबि जात जलजान ।११५६।
भावार्थ : -- रे मनमानस ! थोड़ा करते अधिकाधिक हो जाता है । थोड़ा थोड़ा जल बढ़ने से जलयान भी डूब जाता है ॥
सेवक बिकता हाट मैं, लै लो लै लो मोल ।
कहे हरि का लेवेंगे, तुहरे असीर बोल ।११५७।
भावार्थ : -- सेवक हटवार में बिक रहा है, ले लो मोल ले लो । जब हरि ने पूछा कहो क्या लोगे । तो हटबया (विक्रेता ) ने कहा भगवान केवल आपके आशीर्वचन ॥
कलुख करम काल धन को, छिनु छिनु जोगे नैन ।
तिनको दुआरि जोग दिए, गया गेह का चैन ।११५८।
भावार्थ : -- जो श्रम नहीं करना चाहते, प्रत्येक क्षण केवल पाप कर्म से उत्पन्न काले धन की ही प्रतीक्षा में रहते हैं । ऐसों को यदि द्वार का प्रहरी रखा, तो फिर घर का सुख-चैन गया समझो,
अर्थात : -- "चोरों के कर-कमलों में घर की चौकीदारी मत सौंपों"
माँगे हाथ पसार नहि, वासो को अपमान ।
नयबिद जा कोउ लेखे , खड़े तजे जो मान ।११५९।
भावार्थ : -- हाथ पसार कर भीख माँगने के समान कोई अपमान नहीं है । कोई इन 'राजनीति' के सुसम्पन्न ज्ञाताओं को जाकर समझाए जो अपना सम्मान त्याग कर फिर भीख मांगने खड़े हो गए ॥
पुन कमाई के अवसरु , मिले जगत कठिनाए ।
जो तिन लहन बिलम करे, सो अभागे कहाए ।११६०।
भावार्थ : -- संसार में पुण्य कमाने के अवसर कठिनाई से प्राप्त होते हैं । जो इन अवसरों को प्राप्त करने में विलम्ब करता है, वह भाग्यहीन कहलाता है ॥
तासु गहन तब धरम जब, हो ना कोउ अधीस ।११५१।
भावार्थ : -- सत्ता ऐसी कुलक्षणी है ऐसी कुलटा है ऐसी कुचालि ऐसी.....जिसने भगवान को भी नहीं छोड़ा ॥ इसका ग्रहण तभी पुण्य है, जब कोई शासक बनना न चाहता हो ॥
राजन कोष कर उर्बर, प्रजा उपजाउ खेत ।
सम सरूप जब उरारे, तबहि बर उपज देत ।११५२।
भावार्थ : -- शासक के कर के धन का भंडार उर्वरक के सदृश्य होता है, जनता उपजाऊ क्षेत्र के सरिस होती है ॥
उर्वरक को जब समान स्वरुप में वितरण करेंगे तभी यह उन्नत उपज उपजाएगी ।।
जगत प्रभुता जोग लिये, पाए बढ़ाई मान ।
मान तब कहाँ रह गया, लूटा होत बिहान ।११५३।
भावार्थ : -- जगत का सारा महात्म्य सारा वैभव समस्त गौरव को जोड़ लिया, अतिशय बढ़ाई एवं सम्मान पाया । यह मान सम्मान तब कहाँ रह गया, जब अंत होते ही इसे लूट लिया जावेगा ॥
रसरी लमान मान है, सर्प के का लमान ।
बुराईहि के मान को, सुजन ऐसेउ जान ।११५४।
भावार्थ : - रस्सी /जिह्वा की लम्बाई छोटी बड़ी उचित है किन्तु सर्प तो सर्प है, सर्प का भी क्या छोटा एवं क्या बड़ा । सज्जन बुराई के मान को भी सर्प के सदृश्य ही मानते हैं ॥
थोड़ै कारत रे मना, होत अधिकाधिकान ।
थोड़े थोड़े जल बढ़त, डूबि जात जलजान ।११५६।
भावार्थ : -- रे मनमानस ! थोड़ा करते अधिकाधिक हो जाता है । थोड़ा थोड़ा जल बढ़ने से जलयान भी डूब जाता है ॥
सेवक बिकता हाट मैं, लै लो लै लो मोल ।
कहे हरि का लेवेंगे, तुहरे असीर बोल ।११५७।
भावार्थ : -- सेवक हटवार में बिक रहा है, ले लो मोल ले लो । जब हरि ने पूछा कहो क्या लोगे । तो हटबया (विक्रेता ) ने कहा भगवान केवल आपके आशीर्वचन ॥
कलुख करम काल धन को, छिनु छिनु जोगे नैन ।
तिनको दुआरि जोग दिए, गया गेह का चैन ।११५८।
भावार्थ : -- जो श्रम नहीं करना चाहते, प्रत्येक क्षण केवल पाप कर्म से उत्पन्न काले धन की ही प्रतीक्षा में रहते हैं । ऐसों को यदि द्वार का प्रहरी रखा, तो फिर घर का सुख-चैन गया समझो,
अर्थात : -- "चोरों के कर-कमलों में घर की चौकीदारी मत सौंपों"
माँगे हाथ पसार नहि, वासो को अपमान ।
नयबिद जा कोउ लेखे , खड़े तजे जो मान ।११५९।
भावार्थ : -- हाथ पसार कर भीख माँगने के समान कोई अपमान नहीं है । कोई इन 'राजनीति' के सुसम्पन्न ज्ञाताओं को जाकर समझाए जो अपना सम्मान त्याग कर फिर भीख मांगने खड़े हो गए ॥
पुन कमाई के अवसरु , मिले जगत कठिनाए ।
जो तिन लहन बिलम करे, सो अभागे कहाए ।११६०।
भावार्थ : -- संसार में पुण्य कमाने के अवसर कठिनाई से प्राप्त होते हैं । जो इन अवसरों को प्राप्त करने में विलम्ब करता है, वह भाग्यहीन कहलाता है ॥
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