गुरुवार, 16 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११५॥ -----

सत्ता ऐसी कुलछिनी, छाँड़े ना जो ईस । 
तासु गहन तब धरम जब, हो ना कोउ अधीस ।११५१। 
भावार्थ : -- सत्ता ऐसी कुलक्षणी है ऐसी कुलटा है ऐसी कुचालि ऐसी.....जिसने भगवान को भी नहीं छोड़ा ॥ इसका ग्रहण तभी पुण्य है, जब कोई शासक बनना न चाहता हो ॥ 

राजन कोष कर उर्बर, प्रजा उपजाउ खेत । 
सम सरूप जब उरारे, तबहि बर उपज देत ।११५२। 
भावार्थ : -- शासक के कर के धन का भंडार उर्वरक के सदृश्य होता है, जनता उपजाऊ क्षेत्र के सरिस होती है ॥ 
उर्वरक को जब समान स्वरुप में वितरण करेंगे तभी यह उन्नत उपज उपजाएगी ।। 

                                             
जगत प्रभुता जोग लिये, पाए बढ़ाई मान । 
मान तब कहाँ रह गया, लूटा होत बिहान ।११५३। 
भावार्थ : -- जगत का सारा महात्म्य सारा वैभव समस्त गौरव को जोड़ लिया, अतिशय बढ़ाई एवं सम्मान पाया । यह मान सम्मान तब कहाँ रह गया, जब अंत होते ही इसे लूट लिया जावेगा ॥ 

रसरी लमान मान है, सर्प के का लमान । 
बुराईहि के मान को, सुजन ऐसेउ जान ।११५४। 
भावार्थ : - रस्सी /जिह्वा की लम्बाई छोटी बड़ी उचित है किन्तु सर्प तो सर्प है, सर्प का भी क्या छोटा एवं क्या बड़ा । सज्जन बुराई के मान को भी सर्प के सदृश्य ही मानते हैं ॥ 

थोड़ै कारत रे मना, होत अधिकाधिकान । 
थोड़े थोड़े जल बढ़त, डूबि जात जलजान ।११५६। 
भावार्थ : -- रे मनमानस ! थोड़ा करते अधिकाधिक हो जाता है । थोड़ा थोड़ा जल बढ़ने से  जलयान भी डूब जाता है ॥ 

सेवक बिकता हाट मैं, लै लो लै लो मोल । 
कहे हरि का लेवेंगे, तुहरे असीर बोल ।११५७। 
भावार्थ : -- सेवक हटवार में बिक रहा है, ले लो मोल ले लो । जब हरि ने पूछा कहो क्या लोगे । तो हटबया (विक्रेता ) ने कहा भगवान केवल आपके आशीर्वचन ॥ 

 कलुख करम काल धन को, छिनु छिनु जोगे नैन । 
तिनको दुआरि जोग दिए, गया गेह का चैन ।११५८। 
भावार्थ : -- जो श्रम नहीं करना चाहते, प्रत्येक क्षण केवल पाप कर्म से उत्पन्न काले धन की ही प्रतीक्षा में रहते हैं । ऐसों को यदि द्वार का प्रहरी रखा, तो फिर घर का सुख-चैन गया समझो, 

अर्थात : -- "चोरों के कर-कमलों में घर की चौकीदारी मत सौंपों"

माँगे हाथ पसार नहि,  वासो को अपमान । 
नयबिद जा कोउ लेखे , खड़े तजे जो मान ।११५९। 
भावार्थ : -- हाथ पसार कर भीख माँगने के समान कोई अपमान नहीं है । कोई इन 'राजनीति' के सुसम्पन्न ज्ञाताओं को जाकर समझाए जो अपना सम्मान त्याग कर फिर भीख मांगने खड़े हो गए ॥ 

पुन कमाई के अवसरु , मिले जगत कठिनाए । 
जो तिन लहन बिलम करे, सो अभागे कहाए ।११६०।  
भावार्थ : -- संसार में पुण्य कमाने के अवसर कठिनाई से प्राप्त होते हैं । जो इन अवसरों को प्राप्त करने में विलम्ब करता है, वह भाग्यहीन कहलाता है ॥ 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...