दरिया मानिंद दुनिया, सतहे-आब जहाज़ ।
मंजिल साहिले-अल्ला, रहे बंदा निवाज़ ।११३१।
भावार्थ : -- ये दुनिया दरिया के मानिंद है यह जिस्म जहाज है जो आबे-सतह पर है । जिसकी मंजिल अल्लाह का कनारा है । मेरे निवाज़,राह में ये रूह है ॥
चरे समंदर पाउ अस, प्रीतिहि के बरताउ ।
आगिन दरिया पार किए, चढ़े लाकरी नाउ।११३२।
भावार्थ : -- प्रेम का व्यवहार ऐसा है कि, समनदर को पांवों से चलकर पार करना पड़ता है, और आग के दरिया को लकड़ी की नाव से ॥
महजिद महला मुहल्ला, मीनारो सह कार ।
कहँ गए मलिके-मुअज्जम, कँह गए वो दरबार ।११३३।
भावार्थ : -- जिन मुगलों की सल्तनत हिंदुस्तान में हज़ार बरसों तक रही । उन की निशानियाँ ये मस्जिद ये महल ये मुहल्ला ये अजीमो-शानो-शहकार मीनार के शहंशाह कहाँ गए? और उनके दरबार वे कहाँ गए ?
लहर लहर टकराइ के, करे समंदर शोर ।
कल फिर आए नज़र मिरी, किश्तीयों के चोर । ११३४।
जिक्रे ख़ुदा औ ख़ैर में, लगी रहे ये जान ।
पराइ जान अमान में, तेरी जान अमान ।११३५।
भावार्थ : -- ईश्वर का स्मरण करते हुवे सत्कार्य में ही तेरा जीवन लगा रहे । पराए जीवन की रक्षा में ही तेरे जीवन की सुरक्षा है, सनद रहे ॥
सुलग उठी शामे-शम्म,रुखसारों पुरनूर ।
कहीं सरोदो-सारँगी, कही बजे संतूर ।११३६।
अमन का पैरवीकार, दिल से जफ़ा शियार
लब से खुदा खुदा करे, दस्ते-बंद तलवार ।११३७।
भावार्थ : - जो अमनो-अमां का पैरोंकार है वह दिल से जफ़ाशियार (अत्याचारी) है । जो लब से तो खुदा खुदा कर रहा है उसके दस्त में तलवारें बन्द हैं ॥
जफ़ा शियार = जुल्मी, अत्याचारी
मुलक दारी जमहूरी, रइअत खूनम खून ।
शाहानी सकूनत मेँ, गुलाम बड़े सकून ।११३८।
भावार्थ : - मुल्क में रअय्यत दारी तो जम्हूरी है और रिआया खूनम खुण हो गई । और गुलाम शाही महलो-मलम्मों में आराम फरमाएं ॥ िानको बस शाही महलमलम्मा चाहिए ॥
जाँ रहे ना ज़िस्म रहे, रहे न रौब रुआब ।
हुए जो बुत ए बुतपरस्त, रहे सवाबी ताब ।११३९।
भावार्थ : -- न ये जिस्म रहता न ये जाँ रहती है.. ,
न रुआब रहता न वो रौब-दाब रहता..,
हुवे बुतो-ताबूत ए हुस्न परस्त तब..,
बस तिरे सवाबों की ही ताब रहती है.....
जाँ = जॉब
ख़ैरात किए कफ़े -दस्त, सर पर मारे चोट ।
वो इस कसब कादिर हुए, शबे कफ़न खसोट ।११४० ।
भावार्थ : -- इत्तफाक खैराते दस्त किए मुश्तहर हुवे..,
वो कहने-जख्म दिए ज़ख़्मी हर सर हुए..,
ख़सलत से मजबूर हुवे इस कसब कादिर..,
शबे -कफ़न खसोट के सुब्हे पेशतर हुवे.....
कसब = धंधा
कादिर = सेठ
मंजिल साहिले-अल्ला, रहे बंदा निवाज़ ।११३१।
भावार्थ : -- ये दुनिया दरिया के मानिंद है यह जिस्म जहाज है जो आबे-सतह पर है । जिसकी मंजिल अल्लाह का कनारा है । मेरे निवाज़,राह में ये रूह है ॥
चरे समंदर पाउ अस, प्रीतिहि के बरताउ ।
आगिन दरिया पार किए, चढ़े लाकरी नाउ।११३२।
भावार्थ : -- प्रेम का व्यवहार ऐसा है कि, समनदर को पांवों से चलकर पार करना पड़ता है, और आग के दरिया को लकड़ी की नाव से ॥
महजिद महला मुहल्ला, मीनारो सह कार ।
कहँ गए मलिके-मुअज्जम, कँह गए वो दरबार ।११३३।
भावार्थ : -- जिन मुगलों की सल्तनत हिंदुस्तान में हज़ार बरसों तक रही । उन की निशानियाँ ये मस्जिद ये महल ये मुहल्ला ये अजीमो-शानो-शहकार मीनार के शहंशाह कहाँ गए? और उनके दरबार वे कहाँ गए ?
लहर लहर टकराइ के, करे समंदर शोर ।
कल फिर आए नज़र मिरी, किश्तीयों के चोर । ११३४।
जिक्रे ख़ुदा औ ख़ैर में, लगी रहे ये जान ।
पराइ जान अमान में, तेरी जान अमान ।११३५।
भावार्थ : -- ईश्वर का स्मरण करते हुवे सत्कार्य में ही तेरा जीवन लगा रहे । पराए जीवन की रक्षा में ही तेरे जीवन की सुरक्षा है, सनद रहे ॥
सुलग उठी शामे-शम्म,रुखसारों पुरनूर ।
कहीं सरोदो-सारँगी, कही बजे संतूर ।११३६।
अमन का पैरवीकार, दिल से जफ़ा शियार
लब से खुदा खुदा करे, दस्ते-बंद तलवार ।११३७।
भावार्थ : - जो अमनो-अमां का पैरोंकार है वह दिल से जफ़ाशियार (अत्याचारी) है । जो लब से तो खुदा खुदा कर रहा है उसके दस्त में तलवारें बन्द हैं ॥
जफ़ा शियार = जुल्मी, अत्याचारी
मुलक दारी जमहूरी, रइअत खूनम खून ।
शाहानी सकूनत मेँ, गुलाम बड़े सकून ।११३८।
भावार्थ : - मुल्क में रअय्यत दारी तो जम्हूरी है और रिआया खूनम खुण हो गई । और गुलाम शाही महलो-मलम्मों में आराम फरमाएं ॥ िानको बस शाही महलमलम्मा चाहिए ॥
जाँ रहे ना ज़िस्म रहे, रहे न रौब रुआब ।
हुए जो बुत ए बुतपरस्त, रहे सवाबी ताब ।११३९।
भावार्थ : -- न ये जिस्म रहता न ये जाँ रहती है.. ,
न रुआब रहता न वो रौब-दाब रहता..,
हुवे बुतो-ताबूत ए हुस्न परस्त तब..,
बस तिरे सवाबों की ही ताब रहती है.....
जाँ = जॉब
ख़ैरात किए कफ़े -दस्त, सर पर मारे चोट ।
वो इस कसब कादिर हुए, शबे कफ़न खसोट ।११४० ।
भावार्थ : -- इत्तफाक खैराते दस्त किए मुश्तहर हुवे..,
वो कहने-जख्म दिए ज़ख़्मी हर सर हुए..,
ख़सलत से मजबूर हुवे इस कसब कादिर..,
शबे -कफ़न खसोट के सुब्हे पेशतर हुवे.....
कसब = धंधा
कादिर = सेठ
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