शनिवार, 4 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११३ ॥ -----

दरिया मानिंद दुनिया, सतहे-आब जहाज़ । 
मंजिल साहिले-अल्ला, रहे बंदा निवाज़ ।११३१। 
भावार्थ : -- ये दुनिया दरिया के मानिंद है यह जिस्म जहाज है जो आबे-सतह पर है । जिसकी मंजिल अल्लाह का कनारा है ।  मेरे निवाज़,राह में ये रूह है ॥

चरे समंदर पाउ अस, प्रीतिहि के बरताउ । 
आगिन दरिया पार किए, चढ़े लाकरी नाउ।११३२। 
भावार्थ : -- प्रेम का व्यवहार ऐसा है कि, समनदर को पांवों से चलकर पार करना पड़ता है, और आग के दरिया को लकड़ी की नाव से ॥

महजिद महला मुहल्ला, मीनारो सह कार । 
कहँ गए मलिके-मुअज्जम,  कँह गए वो दरबार ।११३३। 
भावार्थ : -- जिन मुगलों की सल्तनत हिंदुस्तान में हज़ार बरसों तक रही । उन की निशानियाँ ये मस्जिद ये महल ये मुहल्ला ये अजीमो-शानो-शहकार मीनार के शहंशाह कहाँ गए? और उनके दरबार वे कहाँ गए ?

लहर लहर टकराइ के, करे समंदर शोर । 
कल फिर आए नज़र मिरी, किश्तीयों के चोर । ११३४।  

जिक्रे ख़ुदा औ ख़ैर में, लगी रहे ये जान । 
पराइ जान अमान में, तेरी जान अमान ।११३५। 
भावार्थ : -- ईश्वर का स्मरण करते हुवे सत्कार्य में ही तेरा जीवन लगा रहे । पराए जीवन की रक्षा में ही तेरे जीवन की सुरक्षा है, सनद रहे ॥ 

सुलग उठी शामे-शम्म,रुखसारों पुरनूर । 
कहीं सरोदो-सारँगी, कही बजे संतूर ।११३६।  

अमन का पैरवीकार, दिल से जफ़ा शियार 
लब से खुदा खुदा करे, दस्ते-बंद तलवार ।११३७। 
भावार्थ : - जो अमनो-अमां का पैरोंकार है वह दिल से जफ़ाशियार (अत्याचारी) है । जो लब से तो खुदा खुदा कर रहा है उसके दस्त में  तलवारें बन्द हैं ॥ 

जफ़ा शियार = जुल्मी, अत्याचारी  

मुलक दारी जमहूरी, रइअत खूनम खून । 
शाहानी सकूनत मेँ, गुलाम बड़े सकून ।११३८। 
भावार्थ : -  मुल्क में रअय्यत दारी तो जम्हूरी है और रिआया खूनम खुण हो गई । और गुलाम शाही महलो-मलम्मों में आराम फरमाएं ॥ िानको बस शाही महलमलम्मा चाहिए  ॥ 

जाँ रहे ना ज़िस्म रहे, रहे न रौब रुआब । 
हुए जो बुत ए बुतपरस्त, रहे सवाबी ताब ।११३९। 

भावार्थ : -- न ये जिस्म रहता न ये जाँ रहती है.. , 
                न रुआब रहता न वो रौब-दाब रहता..,  
                हुवे बुतो-ताबूत ए हुस्न परस्त तब.., 
                 बस तिरे सवाबों की ही ताब रहती है..... 

  जाँ = जॉब 

ख़ैरात किए कफ़े -दस्त, सर पर मारे चोट । 
वो इस कसब कादिर हुए, शबे कफ़न खसोट ।११४० । 

भावार्थ : -- इत्तफाक खैराते दस्त किए मुश्तहर हुवे..,   
                वो कहने-जख्म दिए ज़ख़्मी हर सर हुए..,
                ख़सलत से मजबूर हुवे इस कसब कादिर..,  
                शबे -कफ़न खसोट के सुब्हे पेशतर हुवे.....

कसब = धंधा 
कादिर  = सेठ 

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