गुरुवार, 2 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १११ ॥ -----

गंगा धुनी गंगोदक, गंगा तट गंगौट । 
ते गंगा गति लहे जे, धारे तिन्ह पपोट ।११११।
भावार्थ : -- बड़े -बूढ़ों का कहना है, जो गंगा की ध्वनि, गंगा का जल, गंगा के तट, गंगा की रेणु, को  पलकों पर धारण करता है वह परम गति का अधिकारी होता है ॥  

भगति सेवा प्रनय दान, सुमिरन सुरत सुभाउ । 
भाव गहे ना कछु लहे, पतियाउ न पतियाउ ।१११२। 
भावार्थ : -- विश्वास करो या न करो सेवा, भक्ति, प्रेम,दान,चिंतन, स्मरण, धर्म आदि विषयों में यदि श्रद्धा संयुक्त न हो तो वह व्यर्थ है ॥  

भाव राखत पिया मिलै, करत पग सेउकाइ । 
ते सब भरमन तोड़ि दैं, रह जे रूप मताइ ।१११३। 
भावार्थ : -- श्रद्धा एवं प्रीत रख कर एवं चरणों की सेवा करने से ही पिया मिलते हैं । वे सब अपना भ्रम तोड़ दें,जो रूप के घमंड में इतराती फिर रही हैं ॥ 

झूठा झूठन जा जुगे , कूट कपट फैलाए । 
साँचा साँचै आ जुगे, प्रभुताइ प्रभूताए ।१११४। 
भावार्थ : -- झूठा यदि झूठे से जा मिलता है तब संसार में कूट-कपट ही फैलता है । साँचा सांचे से आ मिलता है तब प्रभु का भाव, प्रभु का वैभव, प्रभु का महत्व, प्रभु का गौरव ही वर्धित होता है ॥ 

बरन बरन मैं भेद है, बरन बरन मैं भाउ । 
सोइ बरन नित बंदिये , बताए भाउ सुभाउ ।१११५। 
भावार्थ : -- वर्ण वर्ण में भेद है,विभिन्न वर्ण में भिन्न भिन्न भाव ग्रहण किये होते हैं । केवल उन्हीं वर्णों की वंदना करनी चाहिए अर्थात उन्हीं वर्णों को ग्रहण करना चाहिए जो उस भाव का स्वभाव बताते हो,अर्थात यह उत्तम है कि अनुत्तम ॥ 

अर्थात : -- लेखक भी एक मनुष्य ही है, उससे भी त्रुटियां होती हैं । उसके वर्णों में उन्हीं भावों को ग्रहण करना चाहिए जो जगत हेतु कल्याणकारी हो ॥ 

तैरन हारा तैर के, पानी थाह बताए । 
तैर न हारा तैर के, अवगाहत मरि जाए ।१११६। 
भावार्थ : -- तैरने वाला तैर कर पानी की थाह बता देता है । अनाड़ी डूब के मर जाता है ॥ 

तब लग जीवन जी लिए, जब लग काया लाहि । 
काइ कमन के भजन किए, हाथ लगे कछु नाहि ।१११७। 
भावार्थ : -- जीवात्मा को एक देह की आवश्यकता होती है, देह में उत्तम है मनुष्य की देह । मनुष्य का तब तक का जीवना है जब तक यह देह प्राप्त है ।संसार का उत्थान करने के लिए देह एक  श्रेष्ठ साधन है  यदि देह को सजाने में ही व्यस्त रहे तो फिर कुछ हाथ नहीं आएगा ॥ 

भगवन को सब ना चहेँ, भगवन सब कौ चाहिँ । 
भूखन के कर अन धरे, तिसनई तीस बुझाहिँ ।१११८। 
भावार्थ : -- भगवान को कोई चाहता है कोई नहीं, कोई मानता है कोई नहीं  । किन्तु,भगवान सभी को मानते हैं भगवान सभी को चाहते हैं । वे भूखों की भूख मिटाते हैं प्यासों की प्यास बुझाते हैं ॥ 

का को लावनै लावना, का को भया अलोन । 
ऐसो भोजन चाहिये, सबजन ले रस लोन ।१११९। 
भावार्थ : -- किसी के भोजन में नमक ही नमक है, किसी का फीका फाका है । किसी को मिठाई कड़वी लगती है किसी के भोजन में करेले की भी मिठास नहीं है । भोजन ऐसा होना चाहिए कि रसों का स्वाद सभी वर्ग ले सकें ॥ 

कहन रही जह सदा की, गगन रहे जस सौर । 
प्रियजन रूठे ठौर है, प्रिय रूठे नहि ठौर ।११२०। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार गगन में सूर्य सदैव विद्यामान है उसी  प्रकार यह कहावत चली आ रही है कि प्रियजनों के रूठने से कूछ बिगड़ने वाला नहीं, किन्तु प्रियतम यदि रूठ जाएं तब कुछ संवरने वाला नहीं दूसरे शब्दों में परिजन रूठत जाएं तो जाएँ प्रियतम रूठे कहो कहाँ जाएं लाग लगई तो प्रियतम बिथुरे ये रुसवाई सही नहीं जाए ॥ 




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